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शनिवार, 23 मई 2026

संस्कृत व्याकरण तथा अनुवाद का पाठ्यक्रम

 संस्कृत व्याकरण तथा अनुवाद का पाठ्यक्रम  
क.संस्कृत व्याकरण-
इकाई–१ :  वर्ण प्रकरण
१. वर्ण की परिभाषा २. वर्ण एवं अक्षर में अन्तर
३. वर्णमाला का परिचय ४. स्वर वर्ण ५. व्यञ्जन वर्ण ६. अयोगवाह वर्ण ७. स्वर के भेद (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) ८.स्वर के भेद (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित)
९. उच्चारण-स्थान १०. उच्चारण-प्रयत्न
११. स्पर्श, अन्तःस्थ एवं ऊष्म वर्ण १२. अल्पप्राण एवं महाप्राण वर्ण १३. घोष एवं अघोष वर्ण १४. सवर्ण की परिभाषा १५. संयुक्ताक्षर एवं वर्ण-संयोग १६. अनुस्वार का प्रयोग १७. विसर्ग का प्रयोग
 इकाई–२ : सन्धि प्रकरण-
१८. सन्धि का परिचय १९. सन्धि की आवश्यकता एवं महत्त्व
स्वर सन्धि-
२०. दीर्घ सन्धि २१. गुण सन्धि २२. वृद्धि सन्धि २३. यण् सन्धि २४. अयादि सन्धि
व्यञ्जन सन्धि- 
२५. श्चुत्व सन्धि २६. ष्टुत्व सन्धि २७. जश्त्व सन्धि २८. चरत्व सन्धि २९. अनुस्वार सन्धि ३०. परसवर्ण सन्धि
विसर्ग सन्धि-
३१. विसर्ग सन्धि का परिचय ३२. सत्व-विधायक विसर्ग सन्धि ३३. षत्व-विधायक विसर्ग सन्धि ३४. रुत्व-विधायक विसर्ग सन्धि ३५. विसर्ग-लोप ३६. सन्धि-विच्छेद ३७. सन्धि-निर्माण अभ्यास
इकाई–३ : समास प्रकरण-
३८.समास का परिचय ३९. समास की आवश्यकता ४०. समस्तपद एवं विग्रह ४१. पूर्वपद एवं उत्तरपद
अव्ययीभाव समास- 
४२. अव्ययीभाव समास की परिभाषा ४३. अव्ययीभाव समास के भेद
तत्पुरुष समास-
४४. तत्पुरुष समास का परिचय ४५. द्वितीया तत्पुरुष ४६. तृतीया तत्पुरुष ४७. चतुर्थी तत्पुरुष ४८. पञ्चमी तत्पुरुष ४९. षष्ठी तत्पुरुष ५०. सप्तमी तत्पुरुष ५१. नञ् तत्पुरुष ५२. उपपद तत्पुरुष
कर्मधारय समास-
५३. कर्मधारय समास ५४. विशेषण-विशेष्य कर्मधारय ५५. उपमान कर्मधारय
द्विगु समास-
५६. द्विगु समास
द्वन्द्व समास-
 ५७. इतरेतर द्वन्द्व ५८. समाहार द्वन्द्व ५९. एकशेष द्वन्द्व
बहुव्रीहि समास-
६०. बहुव्रीहि समास ६१. समानाधिकरण बहुव्रीहि ६२. व्यधिकरण बहुव्रीहि ६३. समास-विग्रह अभ्यास ६४. समास-निर्माण अभ्यास
इकाई–४ : प्रत्यय प्रकरण-
६५. प्रत्यय का परिचय ६६. प्रकृति एवं प्रत्यय ६७. धातु एवं प्रातिपदिक
कृत् प्रत्यय-
६८. कृत् प्रत्यय का परिचय ६९. क्त प्रत्यय ७०. क्तवत् प्रत्यय ७१. शतृ प्रत्यय ७२. शानच् प्रत्यय ७३. तव्यत् प्रत्यय ७४. अनीयर् प्रत्यय ७५. यत् प्रत्यय ७६. तुमुन् प्रत्यय ७७. क्त्वा प्रत्यय ७८. ल्यप् प्रत्यय ७९. ल्युट् प्रत्यय ८०. णिच् प्रत्यय (प्रेरणार्थक)
तद्धित प्रत्यय-
८१. तद्धित प्रत्यय का परिचय ८२. अपत्यार्थक तद्धित ८३. मतुप् प्रत्यय ८४. इनि प्रत्यय ८५. ठक् प्रत्यय ८६. त्व एवं तल् प्रत्यय
स्त्रीप्रत्यय-
८७. स्त्रीप्रत्यय का परिचय ८८. टाप् प्रत्यय ८९. ङीप् प्रत्यय ९०. ङीष् प्रत्यय ९१. प्रत्यय-निर्माण अभ्यास ९२. कृत् एवं तद्धित प्रत्ययों का तुलनात्मक अध्ययन ९३. उपसर्ग प्रकरण ९४. उपसर्गों का परिचय ९५. प्रमुख २२ उपसर्ग ९६. उपसर्गों के अर्थ-भेद ९७. उपसर्गयुक्त धातुओं का प्रयोग ९८. उपसर्ग-आधारित अनुवाद-अभ्यास
ख. संस्कृत अनुवाद-
इकाई–१ : संस्कृत अनुवाद का आधार-
१.पुरुष तथा वचन २.कर्ता तथा क्रिया ३.कर्ता का कोष्ठक ४.क्रिया का कोष्ठक ५.कर्ता तथा क्रिया का समन्वय ६.प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष एवं उत्तम पुरुष की संज्ञा ७.लट् लकार की प्रमुख क्रियाएँ ८.कर्म का प्रयोग ९.म् के बदले अनुस्वार का प्रयोग
इकाई–२ : अव्यय एवं सामान्य वाक्य-रचना-
१०.स्म का प्रयोग ११.च एवं तथा का प्रयोग १२. वा तथा अथवा का प्रयोग १३.प्रश्नवाचक अव्यय १४.स्थानवाचक अव्यय १५.समयवाचक अव्यय १६. नकारात्मक अव्यय १७. बलबोधक अव्यय (अपि, एव, तु) १८.प्रथम पुरुष के सर्वनाम १९. विशेषण का प्रयोग २०.संख्यावाचक शब्द
इकाई–३ : विशेष धातुएँ एवं आधारभूत क्रिया-प्रयोग-
२१. अस् धातु (लट् लकार) २२. अस् धातु (लङ् लकार) २३. कृ धातु (लट् लकार) २४. इच्छ् धातु (लट् लकार) २५. शक् धातु (लट् लकार) २६. ज्ञा धातु (लट् लकार) २७. श्रु धातु (लट् लकार) २८. क्री धातु (लट् लकार) २९. दा धातु (लट् लकार) ३०. ग्रह् धातु (लट् लकार) ३१. हन् धातु (लट् लकार)
इकाई–४ : काल एवं लकार-
३२. भूतकाल (लङ् लकार) ३३. भविष्यत्काल (लृट् लकार) ३४. लोट् लकार ३५. विधिलिङ् लकार ३६. लृङ् लकार
इकाई–५ : कृदन्तों का प्रारम्भिक अध्ययन-
३७. तुमुन् प्रत्यय ३८. क्त्वा प्रत्यय ३९. ल्यप् प्रत्यय ४०. ल्युट् प्रत्यय
इकाई–६ : आत्मनेपदी धातुएँ-
४१. आत्मनेपदी धातुओं का परिचय ४२. सेव् धातु ४३. लभ् धातु ४४. वृत् धातु ४५. आ + रभ् धातु ४६. आत्मनेपदी लट् लकार की क्रियाएँ ४७. आत्मनेपदी लङ् लकार की क्रियाएँ
इकाई–७ : वाच्य एवं उन्नत कृदन्त-
४८. वाच्य का परिचय एवं प्रयोग ४९. शतृ प्रत्यय ५०. शानच् प्रत्यय ५१. क्त प्रत्यय ५२. क्तवतु प्रत्यय ५३. तव्यत् प्रत्यय ५४. अनीयर् प्रत्यय ५५. णिच् प्रत्यय (प्रेरणार्थक क्रिया) ५६. उपसर्गों का प्रयोग
कारक प्रकरण-
इकाई–८ : कारक एवं विभक्ति का परिचय-
५७. कारक का परिचय ५८. कारक एवं विभक्ति का सम्बन्ध ५९. उपपद-विभक्ति एवं कारक-विभक्ति ६०. उपपद-विभक्ति एवं कारक-विभक्ति में अन्तर
इकाई–९ : कर्ता, कर्म एवं प्रथमा विभक्ति-
६१. कर्तृकारक का परिचय ६२. स्वतन्त्रः कर्ता ६३. प्रयोजक कर्ता (हेतुमति च) ६४. कर्मकारक का परिचय ६५. कर्तुरीप्सिततमं कर्म ६६. सकर्मक एवं अकर्मक धातुएँ ६७. अकथितं च एवं द्विकर्मक धातुएँ ६८. प्रथमा विभक्ति का परिचय ६९. प्रथमा विभक्ति के शब्दरूप ७०. प्रथमा विभक्ति के नियम ७१. उक्ते कर्मणि प्रथमा
इकाई–१० : द्वितीया विभक्ति
७२. द्वितीया विभक्ति का परिचय ७३. द्वितीया विभक्ति के शब्दरूप ७४. द्वितीया विभक्ति के नियम ७५. अधिशीङ्स्थासां कर्म ७६. प्रति, अभितः, परितः, सर्वतः, उभयतः के साथ द्वितीया ७७. समया, निकषा, अन्तरा, अन्तरेण, धिक् के साथ द्वितीया
इकाई–११ : तृतीया विभक्ति-
७८. तृतीया विभक्ति का परिचय ७९. तृतीया विभक्ति के शब्दरूप ८०. तृतीया विभक्ति के नियम ८१. करण कारक ८२. हेतौ तृतीया ८३. सह, साकम्, सार्धम्, समम् के साथ तृतीया ८४. अङ्गविकारे तृतीया ८५.इत्थंभूतलक्षणे तृतीया ८६. प्रकृत्या, गोत्रेण, नाम्ना आदि प्रयोग
इकाई–१२ : चतुर्थी विभक्ति-
८७. चतुर्थी विभक्ति का परिचय ८८. चतुर्थी विभक्ति के शब्दरूप ८९. चतुर्थी विभक्ति के नियम ९०. सम्प्रदान कारक ९१. धारयेरुत्तमर्णः ९२. अलम् का प्रयोग ९३. नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, वषट् ९४. रुच् धातु के साथ चतुर्थी ९५. स्पृह्, क्रुध्, द्रुह्, ईर्ष्या, असूय के साथ चतुर्थी
९६. हित, सुख, कल्याण, उपयोग आदि अर्थों में चतुर्थी
इकाई–१३ : सप्तमी विभक्ति-
९७. पञ्चमी विभक्ति का परिचय ९८. पञ्चमी विभक्ति के शब्दरूप ९९. पञ्चमी विभक्ति के नियम १००. अपादान कारक १०१. जनिकर्तुः प्रकृतिः तथा भूवः प्रभवः १०२. विना, ऋते, पृथक्, नाना के साथ पञ्चमी १०३. भय एवं रक्षा के अर्थ में पञ्चमी१०४. जुगुप्सा, विराम, प्रमाद के अर्थ में पञ्चमी १०५. आख्यातोपयोगे पञ्चमी १०६. तुलनार्थक पञ्चमी
इकाई–१४ : षष्ठी विभक्ति-
१०७. षष्ठी विभक्ति का परिचय १०८. षष्ठी विभक्ति के शब्दरूप १०९. षष्ठी विभक्ति के नियम ११०. सम्बन्ध कारक १११. हेतुप्रतियोगे षष्ठी ११२. स्मरण, दया, कृपा आदि के साथ षष्ठी ११३. परिमाणबोधक षष्ठी
इकाई–१५ : सप्तमी विभक्ति-
११४. सप्तमी विभक्ति का परिचय ११५. सप्तमी विभक्ति के शब्दरूप ११६. सप्तमी विभक्ति के नियम ११७. अधिकरण कारक ११८.औपश्लेषिक, वैषयिक एवं अभिव्यापक आधार ११९. भावलक्षण सप्तमी १२०. सति सप्तमी १२१. यतश्च निर्धारणम् १२२. यस्मिन्–तस्मिन्, यत्र–तत्र आदि प्रयोग १२३. कुशल, निपुण, दक्ष, प्रवीण, चतुर आदि शब्दों के साथ सप्तमी
इकाई–१६ : संबोधन एवं समेकित अभ्यास-
१२४. संबोधन का परिचय १२५. संबोधन के शब्दरूप १२६. संबोधन के नियम १२७. उपपद-विभक्तियों का समग्र पुनरावलोकन १२८. कारक-विभक्ति आधारित संस्कृत अनुवाद-अभ्यास

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

वार्षिक इंटरमीडिएट परीक्षा – 2026
खण्ड – A (1×30 = 30)
D – संन्यासी 
B – सम्राट्
A – सम्राट्
B – राजा
C – गुरुतः
A – आत्मज्ञानम्
D – जीवन अमृत
B – सुलेखन
D – गुरुपेक्षा
A – गुरु + उपेक्षा
C – वस्तुतः
B – वर्तमानः
C – अटवी
A – गुरु:
D – क्रियाविशेषणम्
A – सुगृहीतानाम्
D – अत्र
B – जनपदः
C – अस्माभिः
C – तत्पुरुष
C – केषु
B – केषु
A – कार्य
A – कार्ये
B – केषु
C – वाङ्मयस्तु
D – योग्यता
B – क्रियापद
A – गुरुदेवः
A – गच्छति

बुधवार, 11 मार्च 2026

झारखंड अधिविद्या परिषद वार्षिक परीक्षा 2026

Part–A
भाग–A
(Multiple Choice Type Questions)
(बहुविकल्पीय प्रश्न)
Question Nos. 1 to 30 are Multiple Choice Type. Each question has four options. Select the correct option and write it in the Answer Sheet. Each question carries 1 mark.
प्रश्न संख्या 1 से 30 तक बहुविकल्पीय प्रकार के हैं। प्रत्येक प्रश्न के चार विकल्प हैं। सही विकल्प चुनकर उत्तर पुस्तिका में लिखें। प्रत्येक प्रश्न 1 अंक का है।
1 × 30 = 30
प्रश्न संख्या 1 – 30 वस्तुनिष्ठ प्रश्नाः सन्ति।
सर्वे प्रश्नाः समानाङ्काः।
सर्वे प्रश्नाः अनिवार्याः।
प्रदत्तेषु विकल्पेषु समुचितम् उत्तरं चिनुत।
अपठितांश – अवबोधनम्
निर्देश: अधोलिखित अनुच्छेदं पठित्वा प्रदत्तानां विकल्पेषु उत्तरं लिखत।
अनुच्छेदः
एकदा एकः सम्राट् रथे उपविष्टः राजमार्गे गच्छति स्म। किञ्चित् कर्षन् संन्यासी तस्य पुरतः आगतः।
सम्राट् क्रोधेन अवदत् – “अये कर्तव्यम् ?”
संन्यासी समाजे समक्षं स्थित्वा अवदत् –
“अहमस्मि सम्राट्।”
कुद्धः राजा अवदत् –
“जीर्णवस्त्रधारी ननु पदः कथं सम्राट् भवितुम् अर्हति?”
संन्यासी अवदत् –
“किं सुवर्णरथः अहङ्कारं सम्राट् करोति ?”
भवितुम् अर्हति ? सम्राट् तु जितक्रोधः विनम्र भवति । लज्जितः सम्राट् संन्यासिनः पादयोः अफ्तत् ।
बहुविकल्पीय प्रश्न
1. सम्राट् शब्दस्य अर्थः कः अस्ति ?
(A) अश्वः
(B) अहङ्कारी
(C) जङ्गरः
(D) संन्यासी
2. “संन्यासिनः” पाठ्ये लिङ्गं किम् ?
(A) रायपालः
(B) सम्राट्
(C) ब्राह्मणः
(D) संन्यासी
3. “अगर्जित” इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम् ?
(A) सम्राट्
(B) संन्यासी
(C) क्रोधेन
(D) कर्तव्यम्
4. “कुद्धः” इति पदस्य विशेषणं किम् ?
(A) संन्यासी
(B) राजा
(C) अवदत्
(D) जीर्णवस्त्रधारी
5. “पश्यति” इति पदस्य क्रियापदस्य अत्र प्रयुक्तम् ?
(A) अवदत्
(B) एकदा
(C) पुरतः
(D) कर्षन्
6. गृहस्थाः कीदृशं दोषजातं हरति ?
(A) अतिलोभम्
(B) पितृदोषम्
(C) हृदयदोषम्
(D) पुण्यदोषम्
7. जनः केन भावेन राजवनम् गच्छति ?
(A) सद्भावेन
(B) दुःभावेन
(C) तापेन
(D) भयेन
8. “दुर्जन” इति पदस्य किं विलोमपदं अत्र प्रयुक्तम् ?
(A) अपकारणे
(B) सुजन
(C) गुरुपदेशः
(D) राजानम्
9. असतः समानं किम् ?
(A) गन्धनाम्
(B) सज्जनानाम्
(C) सत्कुलनाम्
(D) गुरुदेवः
10. गुरुपदेशः अत्र सन्धिविच्छेदः किम् ?
(A) गुरू + उपदेश + च
(B) गुरुत + उपदेशः
(C) गुरुपदेशः + च
(D) गुरो + उपदेश + च
11. कोषः कं प्रददाति ?
(A) रत्नम्
(B) शक्तिम्
(C) वतनम्
(D) मित्रियम्
12. कीर्तिः कस्य विषयः अस्ति ?
(A) प्रदे
(B) वतन्तो
(C) यशः
(D) तमसः
13. “यत्र” इत्यस्य किं पर्यायपदम् ?
(A) निश्शेष
(B) प्रदे
(C) अत्र
(D) शितांशु
14. “पीयूषः” इत्यस्य विलोमपदं किम् ?
(A) गृह
(B) वतन्तु
(C) प्रदे
(D) उपातिवर्षा
15. “तमसः” इत्यस्य विशेषणपदं किम् ?
(A) शितांशः
(B) निश्शेष
(C) गुरुदेवाचार्यः
(D) विशेषतः
प्रश्न (16–30)
16. वननीके अस्य के किम् नाम ?
(A) पुण्डरीकाक्षः
(B) कृष्णः
(C) शङ्करः
(D) धीरः
17. अस्मभ्यं कः मूर्तिविशेषः प्रतीयते ?
(A) असः
(B) चित्रकः
(C) व्यासः
(D) अस्यः
18. मूर्तिविशेषस्य किम् अनुशक्ति ?
(A) ग्रामेषु
(B) जनपदेṣu
(C) वनेषु
(D) गृहेषु
19. युधामिनः अस्य विलापपदं किम् ?
(A) मूर्तिविशेषः
(B) अस्यः
(C) अस्मामि
(D) तावत्
20. कवितायां पदे कः प्रत्ययः युक्तः ?
(A) त्वा
(B) कः
(C) तत्त्व
(D) त्वम्
21. दीपः किमर्थं कृतः ?
(A) कः
(B) कीदृशः
(C) केन
(D) कुन
22. सर्वेषामपि महान् उत्सवः कः ?
(A) कः
(B) कीदृशः
(C) केन
(D) कुन
23. पत्रस्य अधोलिखित भागः अभिवादनार्थः सः।
(A) कस्य
(B) कीदृशः
(C) केन
(D) कः
24. समुद्रः नारायणं वदति ज्ञाति दत्ते।
(A) कस्मै
(B) कीदृशः
(C) केन
(D) कुन
25. पीडानुभूतिर्विना समय आदाय ताण्डवं प्रारभत।
(A) कः
(B) कीदृशः
(C) केन
(D) कुन
26. कालिदासः कस्य रचना अस्ति ?
(A) भावः
(B) पवनः
(C) वागर्थः
(D) कालिदासस्य
27. योगाय बौद्धिकम् पाठः कस्मात् ग्रन्थात् संकलितः ?
(A) नीतिशतकात्
(B) रामायणात्
(C) महाभारतात्
(D) योगसूत्रात्
28. “साहित्यसद्वारिका” इति ग्रन्थस्य कः पाठः उद्धृतः ?
(A) बालकौशलम्
(B) विक्रमसंवत्
(C) ईशावास्योपनिषद्
(D) कार्य वा साधयेत् देहं वा पातयेत्
29. कालिदासस्य ग्रन्थं चिनुत —
(A) रघुवंशम्
(B) प्रश्नोत्तरमाला
(C) किरातार्जुनीयम्
(D) नीतिशतकम्
30. उत्तररामचरितम् कस्य रचना ?
(A) भवभूतिः
(B) कालिदासस्य
(C) बाणभट्टस्य
(D) भारविः
Section – A
Very Short Answer Type Questions (अति लघु उत्तरीय प्रश्न)
किन्हीं छः प्रश्नों के उत्तर दें।
निर्देश :
अधोलिखित गद्यांशं पठित्वा तदाधारितान् प्रश्नान् उत्तरत —
गद्यांश :
रामायणं हि वाल्मीकिना लिखितम्। अस्य मुख्यः राजनैतिकः धर्मनीतिः च आदर्शरूपः अस्ति।
रामायणम् लोकसंस्कृतस्य आदिकाव्यं विद्यते। अतः च “आदिकाव्यमिति” चापि कथ्यते।
वाल्मीकिना कृतं रामायणं संस्कृतभाषायाः चतुर्विंशतिसहस्रश्लोकाः सन्ति।
रामायणम् अनेकं आदर्शं शिक्षयति। इदं हि महाकाव्यं संस्कृतसाहित्यस्य गौरवम् अस्ति।
प्रश्न :
31. पूर्णवाक्येन उत्तरत —
(क) रामायणस्य रचयिता कः ?
(ख) रामायणं कीदृशं काव्यं विद्यते ?
32. यथानिर्देशम् उत्तरत —
(क) “धार्मिकः” इत्यस्य विलोमपदं किम् ?
(ख) “अति” कृत्वा किम् ?
(ग) “अनेकं” पदे का विभक्तिः ?
(घ) “ऐतिहासिकं” पदे कः प्रत्ययः ?
Section – B
निर्देश :
अधोलिखित पद्यान् पठित्वा तदाधारितान् प्रश्नान् उत्तरत —
पद्य :
मातृदेवो भव, पितृदेवो भव,
आचार्यदेवो भव।
सनातनधर्मे
वेदो धर्मस्य प्रमाणम्।
अयमात्मा ब्रह्म।
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।
प्रश्न :
33. पूर्णवाक्येन उत्तरत —
(क) कः प्रतिपादितः ?
(ख) कः प्रतिपादनार्थं प्रयुक्तः ?
34. यथानिर्देशम् उत्तरत —
(क) “प्रतिपादनं” इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम् ?
(ख) “उत्तम” इति पदस्य किं विशेषणम् ?
(ग) “अरण्यम्” इति पदस्य किं समासविग्रहः ?
(घ) “पशुभ्यः” इति पदस्य विभक्तिः किम् ?
35. पूर्णवाक्येन उत्तरत —
(क) अस्मत् कीदृशः आसीत् ?
(ख) कः दृष्टान्तः ?
खण्ड – B
(लघु उत्तरीय प्रश्न)
Answer any six questions
3 × 6 = 18
36. पद्यानुसारम् उत्तरत –
(क) न पराधीनं जीवितं कस्य न प्रियं भवति ?
(ख) ‘दीनम्’ अस्य पदस्य विलोमं किम् ?
(ग) ‘यौवनम्’ अस्य किं पर्यायपदम् ?
(घ) ‘भूताः’ पदे कः प्रत्ययः ?
37. पूर्णवाक्येन उत्तरत –
(क) अविद्या किं करोति ?
(ख) विद्या किम् अस्ति ?
38. पद्यानुसारम् उत्तरत –
(क) ‘शीलं’ इति कस्य विशेषणम् ?
(ख) ‘धर्मः’ अस्य कः पर्यायः ?
39. पूर्णवाक्येन उत्तरत –
(क) कालचक्रं किम् प्रतिनियच्छति ?
(ख) कस्य प्रतिनियन्त्रणेन मनुष्याणां कल्याणं भवति ?
40. सन्धिं लिखत –
(क) कर्म + इन्द्रिय = ______
(ख) मनसि + एव = ______
(ग) ग्राम + आगच्छति = ______
41. कोष्ठकस्थ पदेषु उचितं रूपं लिखत –
(क) श्री ______ नमः । (इन्द्र)
(ख) ______ फलानि पतन्ति । (वृक्ष)
(ग) ______ प्रति चल । (विद्यालय)
42. वचननिर्माणं कुरुत –
(क) कमल – ______
(ख) व्यवहार – ______
(ग) राम – ______
43. प्रकृतिप्रत्ययं कुरुत –
(क) तस्य कथां शृणु राम ।
(ख) सः कुत्र निवसति ।
(ग) सः शुभं कार्यं करोति ।
खण्ड – C
(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)
Answer any five questions
5 × 4 = 20
47. मञ्जूषात् अवलोक्य रिक्तस्थानानि पूरयत –
“एकदा कश्चन राज ______ आसीत् । स मित्राविरहितः
मनुष्यः आसीत् । स कुतः ______ तथा बालकान् कथयति –
भो बालकाः ! त्वं ______ वदसि किम् ?”
48. विद्यार्थिकामनाम् स्व प्रायेण प्रति एकम् आवेदनपत्रं लिखत।
49. नाट्यसाहित्य अथवा गद्यसाहित्य विषयकं प्रबन्धं लिखत।
50. अधोलिखितानां ग्रन्थानां लेखकानां नामानि लिखत –
(क) किरातार्जुनीयम्
(ख) महाभारतम्
(ग) पञ्चतन्त्र
(घ) शिवराजविजयम्
(ङ) कादम्बरी
51. मञ्जूषासहायतया चित्रं दृष्ट्वा पञ्च वाक्यानि लिखत।
मञ्जूषा –
विज्ञान, विज्ञानप्रदर्शनी, छात्राः, प्रतिभागिता, प्रयोगशाला, कवि, अध्यापक, बालवैज्ञानिक, विद्यालय
52. मञ्जूषासहायतया अधोलिखितं भावार्थस्य रिक्तस्थान पूर्तिः कुरुत –
“यदि नो सति सत्येव केषामपि विश्रान्तिका।
किमु तेभ्यः सदा तां पताका हरामि वः॥”
भावार्थ –
काम ते ______ सति ______ अहं एव न ।
कथनस्य अत्र आवश्यकता नास्ति।
अहं एव ______ अधुना नीताऽगच्छामि।
मञ्जूषा –
(भवतः, यदि वा, कष्टम्, सति, कथनस्य)

वार्षिक संस्कृत परीक्षा – 2026 उत्तरम्

वार्षिक संस्कृत परीक्षा – 2026 उत्तरम्
1.(B) अहङ्कारी
2.(D) संन्यासी
3.(A) सम्राट्
4.(B) राजा
5.(A) अवदत्
6.(A) अतिलोभम्
7.(A) सद्भावेन
8.(B) सुजन
9.(B) सज्जनानाम्
10.(D) गुरो + उपदेश + च
11.(A) रत्नम्
12.(C) यशः
13.(C) अत्र
14.(D) उपातिवर्षा
15.(A) शितांशः
16.(B) कृष्णः
17(B) चित्रकः
18.(D) गृहेषु
19.(D) तावत्
20.(A) त्वा
21.(C) केन
22.(A) कः
23.(D) कः
24.(A) कस्मै
25.(A) कः
26.(D) कालिदासस्य
27.(D) योगसूत्रात्
28.(D) कार्य वा साधयेत् देहं वा पातयेत्
29.(A) रघुवंशम्
30.(A) भवभूतिः
31.(क) रामायणस्य रचयिता महर्षिः वाल्मीकि: अस्ति।
(ख) रामायणं आदिकाव्यं विद्यते।
(क) अधार्मिकः
(ख) अत्यन्तम्
(ग) द्वितीया विभक्ति
(घ) इक
32.(क) धर्मः
(ख) वेदः
33.(क) वेदः
(ख) श्रेष्ठः
(ग) अरण्ये भवम्
(घ) चतुर्थी विभक्ति
34.(क) विनयी
(ख) मातृदेवो भव
34.(क) कर्तृपदं – सः
(ख) विशेष्यं – पुरुषः
(ग) समासविग्रहः – अरण्ये भवम्
(घ) विभक्तिः – पञ्चमी विभक्ति (बहुवचन)
35.(क) अस्माकं राजा दयालुः आसीत्।
(ख) सिंहः दृष्टान्तः अस्ति।
खण्ड – B
36.(क) पराधीनं जीवितं कस्यापि न प्रियं भवति।
(ख) ‘दीनम्’ अस्य विलोमपदम् – धनी
(ग) ‘यौवनम्’ अस्य पर्यायपदम् – तारुण्यम्
(घ) ‘भूताः’ पदे ‘क्त’ प्रत्ययः अस्ति।
37.(क) अविद्या मनुष्यं अज्ञानं करोति।
(ख) विद्या ज्ञानस्य प्रकाशः अस्ति।
38.(क) ‘शीलं’ इति मनुष्यस्य विशेषणम्।
(ख) ‘धर्मः’ अस्य पर्यायः – सदाचारः।
39.(क) कालचक्रं सर्वाणि कार्याणि प्रतिनियच्छति।
(ख) धर्मस्य प्रतिनियन्त्रणेन मनुष्याणां कल्याणं भवति।
40.(क) कर्मेन्द्रिय
(ख) मनस्येव
(ग) ग्रामागच्छति
41.(क) श्री इन्द्राय नमः।
(ख) वृक्षात् फलानि पतन्ति।
(ग) विद्यालयं प्रति चल।
42. वचननिर्माणं कुरुत
(क) कमल – कमलानि
(ख) व्यवहार – व्यवहाराः
(ग) राम – रामाः
43.(क) कथा + आम् = कथाम्
(ख) नि + वस् + ति = निवसति
(ग) कृ + ओति = करोति
खण्ड – C
47.“एकदा कश्चन राजा वनम् आसीत्। स मित्रविरहितः मनुष्यः आसीत्। स कुतः आगतः तथा बालकान् कथयति – भो बालकाः ! त्वं किम् वदसि किम्?”
48. आवेदनपत्र (संक्षेप)
49. गद्यसाहित्य पर संक्षिप्त प्रबन्ध
50. ग्रन्थ तथा लेखक
(क) किरातार्जुनीयम् – भारवि
(ख) महाभारतम् – वेदव्यास
(ग) पञ्चतन्त्र – विष्णुशर्मा
(घ) शिवराजविजयम् – अम्बिकादत्त व्यास
(ङ) कादम्बरी – बाणभट्ट
51.एतत् विद्यालये विज्ञानप्रदर्शनी अस्ति।
अत्र छात्राः प्रतिभागिता कुर्वन्ति।
अध्यापकाः बालवैज्ञानिकान् मार्गदर्शनं कुर्वन्ति।
छात्राः प्रयोगशालायाः प्रयोगान् दर्शयन्ति।
एषा विज्ञानस्य उन्नतिः दर्शयति।
52.काम ते कष्टम् सति भवतः यदि वा अहं एव न।
कथनस्य अत्र आवश्यकता नास्ति।
अहं एव भवतः अधुना नीताऽगच्छामि।

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

विश्व रंजन त्रिपाठी

3631340625

मॉडल प्रश्न - सेट

2026-27

माध्यमिक परीक्षा

संस्कृतस्थ प्रवनपवम

FM 80

I

समय होरायम

सामान्य निर्देशा:

1-30 बहु‌विकल्यान्मकाः सर्वे करना पायाः

31-38

अतिलपुजनरीमा बना

39-46

प्ररना 47-52

खण्ड A

गद्यांश पठित्वा विकल्पेभ्यः उत्तराणि निव्वा भिसत । परं विचित्रमषटत । चौरः एवं उच्चैः क्रोमितुमारभत । "चौरोडयम चौरोडयम इति । तस्य तारस्वरेण प्रबुळा ग्रामवासिनः स्वगृहाद निष्क्रम्य तत्रागच्छन्।


कः उच्चैः कोगितुमारभत ?

क ग्रामवासी

अतिभिः

चौरः

दैवगतिः

कोशितुमारभत शब्दे कः प्रध्यमः ?

तुमन

③ विचित्रमघटत पदे कः लकारः ?

कलङ् लकार:

लट लकार


लूट् लकार:

लोट् लकार:


अन्यभपदम् चिनुत-

अगवान

तंत्र

ग्रामवासिन्‌

II

गद्यांशं पठित्वा प्रश्नानाम उत्तराणि चिनुत ।

सेल्सिया - ताप- मात्रामाः आम्टबाताङ्‌कता मुपगतोऽयं कावारसो या नदीवेगेन प्रवहति तदा पारर्वस्त्रसामाः नगराणि वा नहुबरे क्षणेनैव समाविबानित । निहन्यसेच विवगाः प्राणिनः। ज्वालामुस्लि एते पर्वताः अपि भीषण भूकम्प जनमन्ति ।


लावारसः कर्ष प्रवहति ?

समुद्रने गेन

नदींवेगेन


ज्वालावेगेत

पर्वतवेगेन

के

निहन्यन्ते ?

प्राणिनः

सामा:
④ अष्टशताङ्‌‌कताम

के नदीवेगः

कः उपगत: 7


ग्रामः

लावारस:

नगर:

⑧ भीषण भूकम्प के जनयन्ति ?

पर्वताः

ख नघः

ग्रामा

नगराणि

श्लोकं पठित्वा प्ररनानाम उत्तराणि चित्वा लिखत ।

आश्वास्य पर्वतकु‌ले तपनोष्ठणतप्तं उद्यामदावविधुराणि च काननानि । नानानदीनदशतानि च पूरभिव्वा, खिनोडसि यज्जलद । सैव तवोत्तमा श्रीः ॥

कः रिक्तहस्तः ?

(क) जलदः

पर्वतः नदः

काननः

IN

⑩ नाना नदीनदशतानि केन पूरयन्ति ?

जलजेन

@ पर्वतेन

जनदेन विधुरेण

① नपनोष्णतप्तम कः ?

④ पर्वतकुलम

(ख) गगनम

⑪ विधुरम्

जलदम्


उद्यामदाव विद्युराणि कानि ?

काननानि अरण्यानि विपिनामि

क वनानि

नाट्‌यांशं पवित्वा प्रश्नानाम उत्तराणि चित्वा लिखत ।

"सिंहासनस्त्रः रामः । ततः प्रविशतः विदूषकेन उपविश्यमान मागौ कुशलवौ ।

विदूषक: इत इत आयौं ।

च) अपि कुराले महाराजस्य?

कुशलवौ - (रामम उपसृत्य प्रणम्य

युष्मद दर्शनात कुशलमित। भवतोः किं रामः वयम अत्र कुशल प्रहनस्य भोजनम् एव, न पुनः अतिभिजन समुचितस्य काठग श्लेष सूत्र। (परिष्वज्य) अहो हृदयग्राही स्पर्शः ।

ककुदाली

ख) समुचितः

हृदयग्राही

घ सिंहासनस्यः

14

इत इत आयौ "इति कः भणति ?

क) रामः

(ख) कुशलनों

अतिभिः

विदूषकः

15 सिंहासनस्थ : क?

विदूषकः ख रामः

कुशः

लव


कुशल बौ कम उपसूत्य प्रणमतः ?

महाराजे

भोजनम

राम्

मंगलवार, 11 नवंबर 2025

सत्त्वमाहो रजस्तमः


त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥

देहधारियों (मनुष्यों) की वह स्वाभाविक (ज्ञानरहित) श्रद्धा तीन प्रकार की - सात्त्विक, राजसिक और तामसिक - होती हैं, उसे तुम मुझसे सुनो।।

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥

यह पुरुष अर्थात् संसारी जीव श्रद्धामय है क्योंकि जो जिस श्रद्धावाला है अर्थात् जिस जीवकी जैसी श्रद्धा है? वह स्वयं भी वही है? अर्थात् उस श्रद्धाके अनुरूप ही है।

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ 

सात्त्विक निष्ठावाले पुरुष देवोंका पूजन करते हैं? राजसी पुरुष यक्ष और राक्षसोंका तथा अन्य जो तामसी मनुष हैं? वे प्रेतों और सप्तमातृकादि भूतगणोंका पूजन किया करते हैं।

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥

जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ।

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥

आहार भी सबको तीन प्रकारका प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, दान और तप भी तीन प्रकारके होते हैं अर्थात् शास्त्रीय कर्मोंमें भी तीन प्रकारकी रुचि होती है, तू उनके इस भेदको सुन।

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ 

आयु? बुद्धि? बल? आरोग्यता? सुख और प्रीति? इन सबको बढ़ानेवाले तथा रस्यरसयुक्त? स्निग्ध -- चिकने? स्थिर -- शरीरमें बहुत कालतक ( साररूपसे ) रहनेवाले और हृद्य -- हृदयको प्रिय लगनेवाले ऐसे आहार ((৷৷) भोजन करनेके पदार्थ ) सात्त्विक पुरुषको प्रिय इष्ट होते हैं।

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ 

अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखे, अति रूखे और अति दाहकारक आहार अर्थात् भोजनके पदार्थ राजस मनुष्यको प्रिय होते हैं, जो कि दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले हैं।

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥

जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो महान् अपवित्र भी है, वह तामस मनुष्यको प्रिय होता है।

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥

देवता, ब्राह्मण, गुरुजन और जीवन्मुक्त महापुरुषका पूजन करना, शुद्धि रखना, सरलता, ब्रह्मचर्यका पालन करना और हिंसा न करना -- यह शरीरसम्बन्धी तप कहा जाता है।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ 

उद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥

मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन आत्मसंयम और अन्त:करण की शुद्धि यह सब मानस तप कहलाता है।।

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥

फल की आकांक्षा न रखने वाले युक्त पुरुषों के द्वारा परम श्रद्धा से किये गये उस पूर्वोक्त त्रिविध तप को सात्त्विक कहते हैं।।

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥

जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा दिखानेके भावसे किया जाता है, वह इस लोकमें अनिश्चित और नाशवान् फल देनेवाला तप राजस कहा गया है। 

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ 

जो तप मूढ़तापूर्वक हठसे अपनेको पीड़ा देकर अथवा दूसरोंको कष्ट देनेके लिये किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है।

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ 

दान देना कर्तव्य है -- ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर अनुपकारीको दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।

यत्तु प्रत्त्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ 

किन्तु जो दान प्रत्युपकारके लिये अथवा फलप्राप्तिका उद्देश्य बनाकर फिर क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है।

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ 

जो दान बिना सत्कारके तथा अवज्ञापूर्वक अयोग्य देश और कालमें कुपात्रको दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।

 

मंगलवार, 5 अगस्त 2025

महत्वपूर्णप्रश्न

1. संस्कृतभाषया उत्तरत ।
(क) जातकमालायाः लेखकः कः?
(ख) कथायां वर्णिते जन्मनि बोधिसत्त्वः कः बभूव ?
(ग) महासत्त्वः मीनानां कैः परमनुग्रहम् अकरोत् ?
(घ) सरः लघुपल्वलमिव कथमभवत् ?
(ङ) बोधिसत्त्वः किमर्थं चिन्तामकरोत् ?
(च) तोयं प्रतिदिनं केन स्पर्धमानं क्षीयते स्म?
(छ) आकाशे अकाला अपि के प्रादुरभवन् ?
(ज) कया आशङ्कया बोधिसत्त्वः पुनः पुनः पर्जन्यं प्रार्थितवान्?
(झ) शक्रः केषां राजा आसीत्?
(ञ) अस्माभिः कुत्र प्रयतितव्यम् ?
2. रिक्तस्थानानि पूरयत ।

(क) बोधिसत्त्वः परहितसुखसाधने अभवत्।

(ख) तत्रस्थिताः मीनाः जलाभावात् इव सञ्जाताः।

(ग) विषाददैन्यवशगं मीनकुलमवेक्ष्य बोधिसत्त्वः आपेदे।

(घ) स महात्मा स्वकीयसत्यतपोबलमेव तेषां अमन्यत।

(ङ) तत् तोयसमृद्धिमवाप ।

3. सप्रसङ्ग व्याख्या कार्या ।

(क) बहुषु जन्मान्तरेषु परोपकार-अभ्यासवशात् तत्रस्थः अपि परहितसुखसाधने व्यापृतः अभवत्।

(ख) अस्मद्व्यसनस‌ङ्कृष्टयः समायान्ति नो द्विषः।

(ग) शीलवताम् इह एव कल्याणाः अभिप्रायाः वृद्धिम् आप्नुवन्ति ।

4. अधोलिखितशब्दान् ल्यबन्तेषु शतृप्रत्ययान्तेषु शानच्प्रत्ययान्तेषु च विभज्य लिखत ।

आपीयमानम्, अवेक्ष्य, स्पर्धमानम्, समापीड्यमानम्, निःश्वस्य, रत्नायमानानि, अभिगम्य, संराधयन्, विमृशन्, समुल्लोकयन्।

5. विशेषणानि विशेष्यैः सह योजयत ।

(क) सरसि

इष्टानाम्

(ख) धरण्या

(ग) अपत्यानाम्

कदम्बकुसुमगौरेण

हंसचक्रवाकादिशोभिते

(घ) नवसलिलेन

अभितप्तया

(ङ) पक्षिणः

ज्वालानुगतेन

(च) बोधिसत्त्वः

तत्रस्थाः

(छ) मीनाः

सलिलतीरवासिनः

(ज) मारुतेन

करुणायमानः

6. अधोलिखितपदानि संस्कृतवाक्येषु प्रयुद्ध्वम् ।

कस्मिश्चित्, भाग्यवैकल्यात्, आपीयमानम्, लक्ष्यते, विमृशन्, अभिगम्य, प्रयतितव्यम्।

7. पर्यायवाचकं लिखत ।

मीनः, पक्षी, प्रत्यहम्, आपद्, पर्जन्यः।
8.

अधोलिखितवाक्येषु उपमानानि योजयत ।

(क) इव मीनानां परमानुग्रहं चकार।

(ख) इव तोयं प्रत्यहं क्षीयते।

(ग) इव इमे पयोदाः क्षरन्ति।

(घ) इव नवसलिलेन सरः परिपूर्ण न जातम्।

(ङ) सरः ग्रीष्मकाले इव सञ्जातम्।

योग्यताविस्तारः

अधोलिखितानां सूक्तीनाम् अध्ययनं कृत्वा प्रस्तुतपाठेन भावसाम्यम् अवधत्त-

पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलन्ति वृक्षाः। धाराधरो वर्षति नात्महेतोः परोपकाराय सतां विभूतयः ॥1॥

अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ।।2।।

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥3॥ छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव ॥4॥ ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ।।5।
भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ॥6॥
प्रदानं प्रच्छन्नं गृहमुपगते सम्भ्रमविधिः, प्रियं कृत्वा मौनं सदसि कथनं चाप्युपकृतेः । अनुत्सेको लक्ष्म्यामनभिभवगन्धाः परकथाः सतां केनोद्दिष्टं विषममसिधाराव्रतमिदम् ।।7।।

श्रीनायारः केन्द्रसर्वकारतः स्थानान्तरणेन आगत्य ओडिशासर्वकारस्य अधीने प्रायः वर्षत्रयेभ्यः कार्यं करोति। तथाप्यस्मिन् वर्षत्रयात्मके कालखण्डे एकवारमपि स्वराज्यं केरलं प्रति गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् । स स्वल्पभाषी, अतस्तस्य मनःकथा मनोव्यथा वा बोधगम्या नास्ति। सन्तुलितो वार्तालापः, साक्षात्समये आगमनम्, ततः सञ्चिकासु मनोनिवेशः, कार्यं समाप्य स्वगृहं प्रत्यागमनञ्च तस्य वैशिष्ट्यमासीत्। तस्य कर्मनैपुण्यं दृष्ट्वा एव ओडिशासर्वकारस्तं स्थानान्तरणेन स्वीकृत्य खाद्यापूर्तिविभागे सचिवपदे नियुक्तवान् । गतस्य वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यद् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्। खाद्ये अपमिश्रणं न्यूनीभूतम्। अत उपभोक्तृणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे। मन्त्रिणां मध्येऽपि तस्य सुख्यातिः वर्तते।
6. श्रीनायरस्य मूलराज्यं किम्?
क. ओडिशाराज्यम्
ख. केरळराज्यम्
ग. तमिळनाडुराज्यम्
घ. कर्नाटकराज्यम्
7. श्रीनायरः ओडिशासर्वकारस्य अधीने कतिवर्षाणि कार्यं करोति?
क. एकवर्षम्
ख. द्विवर्षम्
ग. त्रिवर्षम्
घ. पञ्चवर्षम्
8. श्रीनायरः कस्य विभागस्य सचिवपदे नियुक्तः?
क. स्वास्थ्यविभागः
ख. खाद्यापूर्तिविभागः
ग. शिक्षाविभागः
घ. वित्तविभागः
9. श्रीनायरस्य कार्यकालस्य परिणामरूपेण विभागस्य कार्यनैपुण्यं कतिगुणं वर्धितम्?
क. द्विगुणम्
ख. पञ्चगुणम्
ग. दशगुणम्
घ. विंशतिगुणम्
10. अधोलिखितेषु कः गुणः श्रीनायरस्य न विशेषलक्षणम्?
क. सन्तुलितः वार्तालापः
ख. समये कार्यालयागमनम्
ग. अतिबहुभाषणप्रियता
घ. कार्यं समाप्त्य गृहं प्रत्यागमनम्