expr:class='"loading" + data:blog.mobileClass'>

मंगलवार, 30 जून 2020

सुक्ति सुधा

षष्ठः पाठः - सूक्तिसुधा
पाठ-परिचयः
प्रस्तुत पाठ कक्षा-12 की संस्कृत पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती द्वितीय भाग' का षष्ठ अध्याय 'सूक्तिसुधा' है। सूक्ति का अर्थ है - 'सुन्दर वचन' तथा सुधा का अर्थ है - 'अमृत', अर्थात् 'सुन्दर वचन रूपी अमृत'। इस पाठ में पण्डितराज जगन्नाथ, महाकवि माघ, भवभूति, महाकवि भारवि तथा महाकवि भर्तृहरि की बहुमूल्य सूक्तियाँ संकलित हैं। ये सूक्तियाँ जीवन के लिए पथप्रदर्शक हैं।
1. श्लोकः (पण्डितराजजगन्नाथः)
अस्ति यद्यपि सर्वत्र नीरं नीरजराजितम्।
रमते न मरालस्य मानसं मानसं विना॥ 1 ॥
अन्वयः – यद्यपि सर्वत्र नीरजराजितं नीरम् अस्ति, (परन्तु) मरालस्य मानसं मानसं विना न रमते।
सरलार्थः – यद्यपि सभी स्थानों पर कमलों से सुशोभित जल (सरोवर) उपलब्ध होता है, परन्तु हंस का मन मानसरोवर के बिना कहीं नहीं रमता।
भावार्थः – सरोवरों में जल और कमलपुष्प दोनों होते हैं, किन्तु साधारण सरोवरों का जल वर्षा में गंदा हो जाता है, जबकि मानसरोवर का जल सदा निर्मल रहता है। यह एक अन्योक्ति है, जिसके माध्यम से कवि यह सन्देश देना चाहता है कि उच्च विचार वाले श्रेष्ठ पुरुष तुच्छ वस्तुओं या स्थानों में आनंद प्राप्त नहीं करते।
विशेषः – छन्द: 'अनुष्टुप्', अलङ्कार: 'अन्योक्ति' तथा 'यमक'।
2. श्लोकः (पण्डितराजजगन्नाथः)
नीरक्षीरविवेके हंसालस्यं त्वमेव तनुषे चेत्।
विश्वस्मिन्नधुनान्यः कुलव्रतं पालयिष्यति कः॥ 2 ॥
अन्वयः – (हे) हंस! चेत् त्वम् एव नीरक्षीरविवेके आलस्यं तनुषे (तर्हि) अधुना अस्मिन् विश्वस्मिन् अन्यः कः कुलव्रतं पालयिष्यति?
सरलार्थः – हे हंस! यदि दूध का दूध और पानी का पानी (विवेकपूर्वक गुण-दोष का चयन) करने में तुम ही आलस्य करोगे, तो इस संसार में अब दूसरा कौन अपनी कुल-परम्परा का पालन करेगा? अर्थात् कोई नहीं।
भावार्थः – हंस को सत्य-असत्य एवं गुण-दोष के निर्णय का प्रतीक (विद्वान् का प्रतीक) माना गया है। यदि बुद्धिमान और योग्य व्यक्ति ही अपने उत्तरदायित्व से विमुख होकर विवेकहीन आचरण करने लगेंगे, तो समाज का मार्गदर्शन कौन करेगा?
विशेषः – छन्द: 'आर्या', अलङ्कार: 'अन्योक्ति'।
3. श्लोकः (पण्डितराजजगन्नाथः)
तावत् कोकिल विरसान् यापय दिवसान् वनान्तरे निवसन्।
यावन्मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति॥ 3 ॥
अन्वयः – हे कोकिल! तावत् वनान्तरे निवसन् विरसान् दिवसान् यापय, यावत् मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति।
सरलार्थः – हे कोयल! जब तक भौंरों के समूह से युक्त कोई आम का वृक्ष आम्रमंजरी से सुशोभित नहीं होता, तब तक इस वन में रहते हुए अपने रसहीन/नीरस दिनों को धैर्यपूर्वक व्यतीत करो।
भावार्थः – मनुष्य में निहित गुणों के प्रकट होने और फलने-फूलने के लिए सही समय और उचित वातावरण की आवश्यकता होती है। जब तक अनुकूल समय न आए, तब तक मनुष्य को धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी चाहिए।
विशेषः – छन्द: 'आर्या', अलङ्कार: 'अन्योक्ति' एवं 'अनुप्रास'।
4. श्लोकः (महाकविमाघः - शिशुपालवधम्)
नालम्बते दैष्टिकतां न निषीदति पौरुषे।
शब्दार्थौ सत्कविरिव द्वयं विद्वानपेक्षते॥ 4 ॥
अन्वयः – विद्वान् दैष्टिकतां न आलम्बते, पौरुषे न निषीदति, (अपितु) सत्कविः शब्दार्थौ इव द्वयं अपेक्षते।
सरलार्थः – विद्वान् मनुष्य न तो केवल भाग्य का ही सहारा लेता है और न ही केवल पुरुषार्थ (कर्म) के भरोसे बैठा रहता है; बल्कि वह दोनों का आश्रय लेता है—ठीक उसी प्रकार जैसे एक श्रेष्ठ कवि सुंदर काव्य-रचना के लिए शब्द और अर्थ दोनों की अपेक्षा रखता है।
भावार्थः – जीवन में सफलता के लिए भाग्य और पुरुषार्थ दोनों का संतुलन आवश्यक है।
विशेषः – छन्द: 'अनुष्टुप्', अलङ्कार: 'उपमा'।
5. श्लोकः (भवभूतिः)
न किञ्चिदपि कुर्वाणः सौख्यैर्दुःखान्यपोहति।
तत्तस्य किमपि द्रव्यं यो हि यस्य प्रियो जनः॥ 5 ॥
अन्वयः – यः हि यस्य प्रियः जनः, तत् तस्य किमपि द्रव्यम्, (सः) किञ्चित् अपि न कुर्वाणः (अपि) सौख्यैः दुःखानि अपोहति।
सरलार्थः – जो जिसका प्रियजन होता है, वह उसके लिए कोई अनिर्वचनीय (बहुमूल्य) निधि होता है। वह विशेष कुछ न करता हुआ भी केवल अपनी उपस्थितिमात्र के सुख से सारे दुःखों को दूर कर देता है।
भावार्थः – प्रिय व्यक्ति की केवल उपस्थिति ही मन को शांति देती है और दुःखों का निवारण कर देती है।
6. श्लोकः (महाकविभारविः - किरातार्जुनीयम्)
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥ 6 ॥
अन्वयः – सहसा क्रियां न विदधीत, (यतः) अविवेकः परमापदां पदं (भवति)। गुणलुब्धाः सम्पदः स्वयमेव विमृश्यकारिणं वृणते।
सरलार्थः – मनुष्य को बिना सोचे-समझे अचानक कोई कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि अज्ञान/अविवेक घोर विपत्तियों का स्थान होता है। गुणों की लोभी संपत्तियाँ (लक्ष्मी) विचारपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्ति का स्वयं वरण करती हैं।
भावार्थः – सोच-समझकर विवेकपूर्वक किया गया कार्य ही सफलता और समृद्धि प्रदान करता है।
विशेषः – छन्द: 'भारविप्रणीत वंशस्थ/आर्या', अलङ्कार: 'अर्थान्तरन्यास'।
7. श्लोकः (भर्तृहरिः - नीतिशतकम्)
स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम्॥ 7 ॥
अन्वयः – विधात्रा अज्ञतायाः छादनम् स्वायत्तम् एकान्तगुणं मौनं विनिर्मितम्। विशेषतः सर्वविदां समाजे (एतत्) अपण्डितानां विभूषणम् (अस्ति)।
सरलार्थः – ब्रह्मा ने मूर्खता को ढकने के लिए स्वयं के अधीन रहने वाला अत्यंत गुणकारी 'मौन' रूपी साधन बनाया है। विशेष रूप से विद्वानों की सभा में यह मौन मूर्खों का आभूषण बन जाता है।
भावार्थः – विद्वानों के बीच मूर्ख व्यक्ति यदि शांत रहे, तो उसकी अज्ञानता प्रकट नहीं होती और उसका मौन ही उसकी शोभा बन जाता है।
विशेषः – छन्द: 'उपजाति'।
8. श्लोकः (भर्तृहरिः - नीतिशतकम्)
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥ 8 ॥
अन्वयः – विपदि धैर्यम्, अथ अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता, युधि विक्रमः, यशसि च अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनम्, इदं हि महात्मनां प्रकृतिसिद्धम्।
सरलार्थः – विपत्ति में धैर्य, समृद्धि होने पर क्षमाशीलता, सभा में वाक्पटुता (बोलने की चतुरता), युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि और शास्त्र-ज्ञान प्राप्त करने में व्यसन (लगन)—ये गुण महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होते हैं।
भावार्थः – महापुरुषों का आचरण स्वाभाविक रूप से महानता और विवेक से परिपूर्ण होता है।
विशेषः – छन्द: 'द्रुतविलम्बित'।
9. श्लोकः (भर्तृहरिः - नीतिशतकम्)
पापान्निवारयति योजयते हिताय गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥ 9 ॥
अन्वयः – (यः) पापात निवारयति, हिताय योजयते, गुह्यं निगूहति, गुणान् प्रकटीकरोति, आपद्गतं च न जहाति, काले ददाति, सन्तः इदं सन्मित्रलक्षणं प्रवदन्ति।
सरलार्थः – जो पाप से रोकता है, हितकारी कार्यों में लगाता है, गुप्त बातों को छिपाता है, गुणों को प्रकट करता है, विपत्ति में साथ नहीं छोड़ता और समय आने पर सहायता देता है—सज्जन पुरुष इसे ही श्रेष्ठ मित्र के लक्षण कहते हैं।
भावार्थः – सच्चा मित्र जीवन में सन्मार्ग दिखाता है और हर परिस्थिति में सम्बल प्रदान करता है।
विशेषः – छन्द: 'वसन्ततिलका'।
10. श्लोकः (भर्तृहरिः - नीतिशतकम्)
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः।
परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः॥ 10 ॥
अन्वयः – मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः, उपकारश्रेणिभिः त्रिभुवनं प्रीणयन्तः, परगुणपरमाणून् नित्यं पर्वतीकृत्य निजहृदि विकसन्तः सन्तः कियन्तः सन्ति?
सरलार्थः – मन, वाणी और शरीर में पुण्य रूपी अमृत से भरे हुए, अपने उपकारों से तीनों लोकों को प्रसन्न करने वाले तथा दूसरों के परमाणु जैसे सूक्ष्म गुणों को भी पर्वत के समान बड़ा मानकर अपने हृदय में प्रसन्न होने वाले सज्जन पुरुष इस संसार में कितने (अत्यंत विरले) हैं!
भावार्थः – निष्काम भाव से परोपकार करने वाले और दूसरों के छोटे से गुण का सम्मान करने वाले संत पुरुष दुर्लभ होते हैं।
विशेषः – छन्द: 'मालिनी'।
11. श्लोकः (भर्तृहरिः - नीतिशतकम्)
केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥ 11 ॥
अन्वयः – पुरुषं केयूराणि न भूषयन्ति, न चन्द्रोज्ज्वलाः हाराः, न स्नानम्, न विलेपनम्, न कुसुमम्, न अलंकृताः मूर्धजाः भूषयन्ति। एका वाणी (एव) पुरुषं समलङ्करोति या संस्कृता धार्यते। भूषणानि खलु सततं क्षीयन्ते, वाग्भूषणं (तु) सततं भूषणम्।
सरलार्थः – मनुष्य को न बाजूबंद विभूषित करते हैं, न चंद्रमा के समान उज्ज्वल हार, न स्नान, न सुगंधित लेपन, न पुष्प और न ही सजे हुए केश। केवल एक संस्कारयुक्त (सभ्य) वाणी ही मनुष्य को भली-भांति अलंकृत करती है। समस्त बाहरी आभूषण नष्ट हो जाते हैं, परन्तु वाणी रूपी आभूषण ही सच्चा और शाश्वत आभूषण है।
विशेषः – छन्द: 'शार्दूलविक्रीडित'।
12. श्लोकः (भर्तृहरिः - नीतिशतकम्)
यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान् प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः॥ 12 ॥
अन्वयः – यावत् इदं कलेवरगृहं स्वस्थम्, यावत् च जरा दूरे, यावत् च इन्द्रियशक्तिः अप्रतिहता, यावत् आयुषः क्षयः न, तावत् एव विदुषा आत्मश्रेयसि महान् प्रयत्नः कार्यः। भवने प्रोद्दीप्ते च कूपखननं प्रति उद्यमः कीदृशः?
सरलार्थः – जब तक यह शरीर रूपी घर स्वस्थ है, जब तक बुढ़ापा दूर है, जब तक इंद्रियों की शक्ति क्षीण नहीं हुई है और जब तक आयु समाप्त नहीं हुई है, तब तक ही बुद्धिमान मनुष्य को अपने कल्याण के लिए महान प्रयास कर लेना चाहिए। घर में आग लग जाने पर कुआँ खोदने का प्रयास भला कैसा? (अर्थात् व्यर्थ है)।
भावार्थः – विपत्ति या वृद्धावस्था आने से पूर्व ही मनुष्य को आत्मकल्याण एवं साधना के मार्ग पर अग्रसर हो जाना चाहिए।
विशेषः – छन्द: 'शार्दूलविक्रीडित'।
अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
1. संस्कृतभाषाया प्रश्नोत्तराणि लिखत (संस्कृत में उत्तर दीजिए):
(क) सर्वत्र कीदृशं नीरम् अस्ति?
उत्तरम् : सर्वत्र नीरजराजितम् नीरम् अस्ति।
(ख) मरालस्य मानसं कं विना न रमते?
उत्तरम् : मरालस्य मानसं मानसं (मानसरोवरम्) विना न रमते।
(ग) विद्वान् कम् अपेक्षते?
उत्तरम् : विद्वान् दैष्टिकतां पौरुषं च द्वयं अपेक्षते।
(घ) सत्कविः कौ द्वौ अपेक्षते?
उत्तरम् : सत्कविः शब्दार्थौ द्वौ अपेक्षते।
(ङ) यः यस्य प्रियः जनः सः तस्य कृते किं भवति?
उत्तरम् : यः यस्य प्रियः जनः सः तस्य कृते किमपि (अनिर्वचनीयम्) द्रव्यं भवति।
(च) सहसा किम् न विदधीत?
उत्तरम् : सहसा क्रियां न विदधीत।
(छ) विधात्रा अज्ञतायाः छादनं किं विनिर्मितम्?
उत्तरम् : विधात्रा अज्ञतायाः छादनं मौनं विनिर्मितम्।
(ज) अपण्डितानां विभूषणं किम्?
उत्तरम् : अपण्डितानां विभूषणं मौनम् अस्ति।
(झ) महात्मनां प्रकृतिसिद्धं किं भवति?
उत्तरम् : विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता, युधि विक्रमः, यशसि अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनम् च महात्मनाम् प्रकृतिसिद्धं भवति।
(ञ) पापात् कः निवारयति?
उत्तरम् : पापात् सन्मित्रम् निवारयति।
(ट) सन्तः कान् पर्वतीकुर्वन्ति?
उत्तरम् : सन्तः परगुणपरमाणून् पर्वतीकुर्वन्ति।
(ठ) कीदृशं भूषणं न क्षीयते?
उत्तरम् : वाग्भूषणं भूषणं न क्षीयते।
(ड) कूपखननं कदा न उचितम्?
उत्तरम् : भवने प्रोद्दीप्ते कूपखननं न उचितम्।
2. अधोलिखितपद्यांशानां सप्रसङ्गं हिन्दीभाषाया व्याख्या विधेया (सप्रसंग व्याख्या):
(क) "वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः।"
प्रसंगः – प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी संस्कृत पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती (भाग-2)' के 'सूक्तिसुधा' नामक पाठ से उद्धृत हैं। इसके मूल रचयिता महाकवि भारवि (किरातार्जुनीयम्) हैं।
व्याख्या – महाकवि भारवि कहते हैं कि जो व्यक्ति विचार-विमर्श करके, सोच-समझकर कार्य करता है, लक्ष्मी अथवा धन-संपत्तियाँ स्वयं उसका वरण करती हैं, क्योंकि संपत्तियाँ गुणों की भूखी होती हैं। बिना विचारे कार्य करने से विपत्ति आती है, जबकि विवेकपूर्वक कार्य करने से सफलता प्राप्त होती है।
(ख) "क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्।"
प्रसंगः – प्रस्तुत पंक्ति 'शाश्वती (भाग-2)' के 'सूक्तिसुधा' पाठ से उद्धृत है। इसके रचयिता महर्षि भर्तृहरि (नीतिशतकम्) हैं।
व्याख्या – यहाँ वाणी के महत्त्व को दर्शाया गया है। संसार के सभी बाह्य आभूषण (सोना, हार, आभूषण आदि) समय के साथ नष्ट हो जाते हैं, किन्तु मधुर और संस्कारयुक्त वाणी रूपी आभूषण सदैव स्थिर रहता है और मनुष्य की वास्तविक शोभा बढ़ाता है।
(ग) "प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः?"
प्रसंगः – प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक के 'सूक्तिसुधा' पाठ से ली गई है, जिसके रचयिता महाकवि भर्तृहरि हैं।
व्याख्या – कवि का कथन है कि मनुष्य को स्वस्थ शरीर एवं युवावस्था रहते ही आत्मकल्याण और धर्म के मार्ग पर प्रयत्न कर लेना चाहिए। घर में आग लग जाने के बाद कुआँ खोदने का प्रयास जिस प्रकार व्यर्थ है, उसी प्रकार वृद्धावस्था या संकट आने पर किया गया उपाय निष्फल सिद्ध होता है।
3. रिक्तस्थानपूर्तिः करणीया (रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए):
(क) सत्कविरिव विद्वान् शब्दार्थौ द्वयम् अपेक्षते।
(ख) सन्तः इदं सन्मित्रलक्षणं प्रवदन्ति।
4. अन्वयलेखनम् (अन्वय लिखिए):
(क) नीरक्षीरविवेके हंसालस्यं त्वमेव तनुषे चेत्।
विश्वस्मिन्नधुनान्यः कुलव्रतं पालयिष्यति कः॥
अन्वयः – (हे) हंस! चेत् त्वम् एव नीरक्षीरविवेके आलस्यं तनुषे, (तर्हि) अधुना अस्मिन् विश्वस्मिन् अन्यः कः कुलव्रतं पालयिष्यति?
(ख) विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥
अन्वयः – विपदि धैर्यम्, अथ अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता, युधि विक्रमः, यशसि च अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनम्, इदं हि महात्मनां प्रकृतिसिद्धम्।
5. अर्थं लिखित्वा वाक्यप्रयोगं कुरुत (अर्थ लिखकर वाक्य-प्रयोग कीजिए):
नीरजम् (कमल) – सरोवरे विकसितं नीरजम् अतीव सुन्दरं दृश्यते।
रसालः (आम का वृक्ष) – वसन्तर्तौ रसालः आम्रमञ्जर्या सुशोभते।
पौरुषम् (पुरुषार्थ/कर्म) – सफलतौ पौरुषम् आवश्यकम् अस्ति।
विमृश्यकारिणम् (सोच-विचार कर कार्य करने वाले को) – सम्पदः विमृश्यकारिणं स्वयमेव वृणते।
जरा (बुढ़ापा) – जरा आगते शरीरस्य शक्तिः क्षीणा भवति।
6. अधोलिखितशब्दानां सार्थकं मेलनम् (उचित मिलान):
स्तम्भ 'क'स्तम्भ 'ख'
मरालस्यहंसस्य
नालम्बतेनाश्रयते / न अवलम्बते
अधुनासाम्प्रतम्
विधात्राब्रह्मणा
पर्वतीकृत्यविशदीकृत्य (बढ़ा-चढ़ाकर)
नीरजम्कमलम्
रसालःआम्रः
सम्पदःविभूतयः
यशसिकीर्तौ

7. विलोमपदानि लिखत (विलोम शब्द लिखिए):
मूर्खः = विद्वान्
अप्रियः = प्रियः
पुण्यात् = पापात्
यौवनम् = जरा
उपेक्षते = अपेक्षते
8. सन्धिविच्छेदः क्रियताम् (संधि-विच्छेद कीजिए):
(क) नालम्बते = न + आलम्बते
(ख) विश्वस्मिन्नधुनान्यः = विश्वस्मिन् + अधुना + अन्यः
(ग) कोऽपि = कः + अपि
(घ) चाभिरुचिर्व्यसनम् = च + अभिरुचिः + व्यसनम्
(ङ) चन्द्रोज्ज्वलाः = चन्द्र + उज्ज्वलाः
9. समास-विग्रहः एवं समस्तपदानि:
(अ) समास-विग्रहः कार्यः (विग्रह कीजिए):
अलिमालः = अलीनाम् माला यस्मिन् सः (बहुव्रीहि समास)
वाक्पटुता = वाचि पटुता (सप्तमी तत्पुरुष समास)
चन्द्रोज्ज्वलाः = चन्द्र इव उज्ज्वलाः (कर्मधारय समास)
अप्रतिहता = न प्रतिहता (नञ् तत्पुरुष समास)
वाग्भूषणम् = वाग् एव भूषणम् (कर्मधारय समास)
(आ) समस्तपदानि रचयत (समस्त पद बनाइए):
कुलस्य व्रतम् = कुलव्रतम्
वनस्य अन्तरे = वनान्तरे
गुणानां लुब्धाः = गुणलुब्धाः
प्रकृत्या सिद्धम् = प्रकृतिसिद्धम्
उपकारस्य श्रेणिभिः = उपकारश्रेणिभिः
आत्मनः श्रेयसि = आत्मश्रेयसि
10. प्रकृति-प्रत्यय-विभागः (प्रकृति और प्रत्यय का विभाजन):
राजितम् = राज् + क्त
दैष्टिकताम् = दैष्टिक + तल् (द्वितीया एकवचन)
कुर्वाणः = कृ + शानच्
पटुता = पटु + तल्
सिद्धम् = सिध् + क्त
विमृश्य = वि + मृश् + ल्यप्
11. छन्दो-निर्देशः (छंद बताइए):
तावत कोकिल विरसान्... = आर्या छन्दः
स्वायत्तमेकान्तगुणम्... = उपजाति छन्दः
विपदि धैर्यमथाभ्युदये... = द्रुतविलम्बित छन्दः
पापान्निवारयति योजयते... = वसन्ततिलका छन्दः
केयूराणि न भूषयन्ति... = शार्दूलविक्रीडित छन्दः
12. अलङ्कार-निर्देशः (अलंकार पहचानिए):
(क) शब्दार्थौ सत्कविरिव द्वयं विद्वानपेक्षते = उपमा अलङ्कारः
(ख) वाग्भूषणं भूषणम् = रूपक अलङ्कारः
(ग) निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः = अनुप्रास अलङ्कारः
(घ) रमते न मरालस्य मानसं मानसं विना = यमक अलङ्कारः
(ङ) यावन्मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति = अनुप्रास अलङ्कारः