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सोमवार, 25 मई 2026

५.कर्त्ता तथा क्रिया का समन्वय

संस्कृत भाषा में कर्त्ता तथा क्रिया का समन्वय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वाक्य में कर्ता के पुरुष (प्रथम, मध्यम, उत्तम) तथा वचन (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) के अनुसार ही क्रिया का प्रयोग किया जाता है। अर्थात् कर्ता जैसा होगा, क्रिया भी उसी के अनुरूप होगी।
जैसे—
बालकः पठति। (एकवचन)
बालकौ पठतः। (द्विवचन)
बालकाः पठन्ति। (बहुवचन)
यहाँ “बालकः, बालकौ, बालकाः” कर्ता हैं और “पठति, पठतः, पठन्ति” क्रियाएँ हैं, जो कर्ता के वचन के अनुसार बदली हैं।
इसी प्रकार पुरुष के अनुसार भी क्रिया बदलती है—
अहं गच्छामि।
त्वं गच्छसि।
सः गच्छति।
अतः संस्कृत में शुद्ध वाक्य निर्माण के लिए कर्ता और क्रिया का समुचित समन्वय आवश्यक होता है।
वह जाता है — सः गच्छति।
वे दोनों जाते हैं — तौ गच्छतः।
वे सब जाते हैं — ते गच्छन्ति।
तुम जाते हो — त्वं गच्छसि।
तुम दोनों जाते हो — युवाम् गच्छथः।
तुम सब जाते हो — यूयम् गच्छथ।
मैं जाता हूँ — अहं गच्छामि।
हम दोनों जाते हैं — आवाम् गच्छावः।
हम सब जाते हैं — वयम् गच्छामः।
वह पढ़ता है — सः पठति।
वे दोनों पढ़ते हैं — तौ पठतः।
वे सब पढ़ते हैं — ते पठन्ति।
तुम पढ़ते हो — त्वम् पठसि।
तुम दोनों पढ़ते हो — युवाम् पठथः।
तुम सब पढ़ते हो — यूयम् पठथ।
मैं पढ़ता हूँ — अहम् पठामि।
हम दोनों पढ़ते हैं — आवाम् पठावः।
हम सब पढ़ते हैं — वयम् पठामः।

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जयतु संस्कृतम्।