राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) एवं झारखण्ड शैक्षिक अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद् (जेसीईआरटी) के संस्कृत पाठ्यपुस्तक, व्याकरण,अनुवाद एवं रचना पर आधारित अध्ययन सामग्री।
मंगलवार, 25 नवंबर 2025
संजय कुमार कुशवाहा,प्रभारी प्रधानाध्यापक,राजकीयकृत उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय, सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मंगलवार, 11 नवंबर 2025
सत्त्वमाहो रजस्तमः
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥
देहधारियों (मनुष्यों) की वह स्वाभाविक (ज्ञानरहित) श्रद्धा तीन प्रकार की - सात्त्विक, राजसिक और तामसिक - होती हैं, उसे तुम मुझसे सुनो।।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
यह पुरुष अर्थात् संसारी जीव श्रद्धामय है क्योंकि जो जिस श्रद्धावाला है अर्थात् जिस जीवकी जैसी श्रद्धा है? वह स्वयं भी वही है? अर्थात् उस श्रद्धाके अनुरूप ही है।
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥
सात्त्विक निष्ठावाले पुरुष देवोंका पूजन करते हैं? राजसी पुरुष यक्ष और राक्षसोंका तथा अन्य जो तामसी मनुष हैं? वे प्रेतों और सप्तमातृकादि भूतगणोंका पूजन किया करते हैं।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥
जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ।
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥
आहार भी सबको तीन प्रकारका प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, दान और तप भी तीन प्रकारके होते हैं अर्थात् शास्त्रीय कर्मोंमें भी तीन प्रकारकी रुचि होती है, तू उनके इस भेदको सुन।
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥
आयु? बुद्धि? बल? आरोग्यता? सुख और प्रीति? इन सबको बढ़ानेवाले तथा रस्यरसयुक्त? स्निग्ध -- चिकने? स्थिर -- शरीरमें बहुत कालतक ( साररूपसे ) रहनेवाले और हृद्य -- हृदयको प्रिय लगनेवाले ऐसे आहार ((৷৷) भोजन करनेके पदार्थ ) सात्त्विक पुरुषको प्रिय इष्ट होते हैं।
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥
अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखे, अति रूखे और अति दाहकारक आहार अर्थात् भोजनके पदार्थ राजस मनुष्यको प्रिय होते हैं, जो कि दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले हैं।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो महान् अपवित्र भी है, वह तामस मनुष्यको प्रिय होता है।
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥
देवता, ब्राह्मण, गुरुजन और जीवन्मुक्त महापुरुषका पूजन करना, शुद्धि रखना, सरलता, ब्रह्मचर्यका पालन करना और हिंसा न करना -- यह शरीरसम्बन्धी तप कहा जाता है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥
उद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥
मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन आत्मसंयम और अन्त:करण की शुद्धि यह सब मानस तप कहलाता है।।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥
फल की आकांक्षा न रखने वाले युक्त पुरुषों के द्वारा परम श्रद्धा से किये गये उस पूर्वोक्त त्रिविध तप को सात्त्विक कहते हैं।।
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥
जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा दिखानेके भावसे किया जाता है, वह इस लोकमें अनिश्चित और नाशवान् फल देनेवाला तप राजस कहा गया है।
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥
जो तप मूढ़तापूर्वक हठसे अपनेको पीड़ा देकर अथवा दूसरोंको कष्ट देनेके लिये किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है।
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
दान देना कर्तव्य है -- ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर अनुपकारीको दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।
यत्तु प्रत्त्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥
किन्तु जो दान प्रत्युपकारके लिये अथवा फलप्राप्तिका उद्देश्य बनाकर फिर क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है।
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
जो दान बिना सत्कारके तथा अवज्ञापूर्वक अयोग्य देश और कालमें कुपात्रको दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
मंगलवार, 5 अगस्त 2025
महत्वपूर्णप्रश्न
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
रविवार, 20 जुलाई 2025
सन्धि-प्रकरणम्
सन्धि-प्रकरणम्
दो वर्णों के मिलने से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे सन्धि कहते हैं-द्वयोः वर्णयोः मेलनेन यः विकारः उत्पन्नः भवति,सः सन्धिः कथ्यते।यथा -गण+ईशः-गणेशः,दिक्+अम्बर-दिगम्बरः,निः+मलः-निर्मलः इत्यादि।दो स्वर वर्णों के मिलने से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं। संस्कृत में इसे अच् सन्धि भी कहा जाता है, क्योंकि माहेश्वर सूत्र के आधार पर इसमें अच् प्रत्याहार के वर्णों का प्रयोग किया जाता है। स्वर संधि के मुख्यतः पांच प्रकार हैं, जिनमें से एक प्रकार दीर्घ सन्धि का यहां परिचय कराया जायेगा।दो समानस्वरों के मिलने से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे दीर्घ संधि कहते हैं।माहेश्वर सूत्र के आधार पर इसकी परिभाषा या सूत्र है- अकः सवर्णः दीर्घः अर्थात् अक् प्रत्याहार के किसी स्वर के बाद उसी प्रत्याहार का समान स्वर आता है तो दोनों मिलकर दीर्घ स्वर बन जाते हैं अर्थात् अ, आ, इ, ई, उ,ऊ, ऋ वर्णों के बीच होने वाली संधि दीर्घ संधि कहलाती है। नियम-1.जब दो शब्दों की संधि करते समय अ या आ के बाद अ या आ ही आता है तो ‘आ‘ बन जाता है- अ +अ = आ,अ + आ = आ,आ + अ = आ,आ + आ = आ। उदाहरण- अ + अ = आ के आधार पर-सुर + अरि: = सुरारि:,स्व +अधीनः=स्वाधीनः,सर्व +अधिकः =सर्वाधिकः, परम +अर्थः = परमार्थः। अ + आ = आ के आधार पर- हिम + आलयः = हिमालयः,अंड + आकारः=अंडाकारः ,अल्प + आयुः=अल्पायुः। आ + अ = आ के आधार पर-आत्मा+अवलंबनम् =आत्मावलंबनम्,विद्या + अर्थी = विद्यार्थी,विद्या + अभ्यासः= विद्याभ्यासः,दया + अर्णव: = दयार्णव:। आ + आ = आ के आधार पर-महा+आशयः=महाशयः,दुर्भगा+आभरणम्=दुर्भगाभरणम्,महा+आकारः=महाकारः। नियम-2-जब दो शब्दों की संधि करते समय इ या ई के बाद इ या ई ही आता है तो ‘ई‘ बन जाता है- इ + इ = ई, इ + ई = ई, ई + इ = ई, ई + ई = ई ।उदाहरण- इ + इ = ई के आधार पर-रवि + इन्द्रः = रवीन्द्रः,मुनि + इन्द्रः = मुनीन्द्रः, गिरि + इन्द्र: = गिरीन्द्र:। इ + ई = ई के आधार पर-गिरि + ईशः = गिरीशः,मुनि + ईशः = मुनीशः , कवि + ईश्वरः = कवीश्वरः, हरि + ईशः= हरीशः,क्षिति + ईश: = क्षितीश:। ई + इ = ई के आधार पर-मही + इन्द्रः = महींद्रः,नारी + इन्दुः = नारीन्दुः,सुधी + इन्द्र: = सुधीन्द्रः । ई + ई = ई के आधार पर-नदी + ईशः = नदीशः,मही + ईशः = महीशः,श्री + ईश: = श्रीश: ।नियम-3-जब दो शब्दों की संधि करते समय उ या ऊ के बाद उ या ऊ ही आता है तो ‘ऊ‘ बन जाता है- उ + उ =ऊ ,उ + ऊ = ऊ, ऊ + उ = ऊ,ऊ + उ = ऊ,ऊ + ऊ = ऊ। उदाहरण- उ + उ = ऊ के आधार पर- भानु + उदयः = भानूदयः,विधु + उदयः = विधूदयः,लघु+उत्तर-लघूत्तर।
ऊ + उ = ऊ के आधार पर- वधू + उत्सवः = वधूत्सवः,वधू + उल्लेखः = वधूल्लेखः।
नियम-4-जब दो शब्दों की संधि करते समय ऋ या ऋृ के बाद ऋ या ऋृ ही आता है तो ‘ऋृ‘ बन जाता है।
यदि अ या आ के बाद इ, ई, उ, ऊ,ऋ,ऋृ और लृ में से कोई एक स्वर आने से जो विकार उत्पन्न होता है,तो उसे गुण सन्धि कहते हैं-अदेङ्गुणः अथवा आद्गुणः।गुण का अर्थ यहाँ पर ए, ओ, अर् और अल् से है। नियम-1-अ या आ के बाद इ या ई आने से ए हो जाता है-अ+इ = ए,अ+ई = ए,आ+इ = ए,आ+ई = ए ।
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च
विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
संज्ञा प्रकरणम्- माहेश्वर सूत्र
संज्ञा प्रकरणम्- माहेश्वर सूत्र
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्।।
2.ऋलृक्
3.एओङ्
4.ऐऔच्
5.हयवरट्
6.लण्
7.ञमङणनम्
8.झभञ्
9.घढधष्
10.जबगडदश्
11.खफछठथचटतव्
12.कपय्
13.शषसर्
14.हल्
यह सूत्र आगे चलकर विश्व की दो प्राचीनतम भाषाओं संस्कृत और तमिल का आधार बना। इस सूत्र में प्रयुक्त वर्णों का प्रयोग करते हुए प्रत्याहार सूत्र का निर्माण हुआ।प्रत्याहार शब्द का अर्थ होता है-संक्षिप्त। इन 14 सूत्रों के द्वारा 281 प्रत्याहार सूत्रों का निर्माण कर सकते हैं, परंतु व्याकरण शास्त्र में 42 प्रत्याहार सूत्र प्रयुक्त हैं। इन सूत्रों के अंतिम वर्ण इत् कहलाते हैं ।उच्चारण और संक्षिप्त करने की सुविधा के लिए इन सूत्रों के अंत में एक इत् वर्ण दिए गए हैं। प्रत्याहार सूत्रों के वर्णों की गणना में इनका ग्रहण नहीं होता है। जैसे- अक् प्रत्याहार में 2 सूत्र हैं- 1.अइउण् 2.ऋलृक्।यहां प्रथम सूत्र का अंतिम वर्ण 'ण्' है जो कि इत् संज्ञक है तथा द्वितीय सत्र का अंतिम वर्ण 'क्' है जो कि इत् संज्ञक है। इत् संज्ञक होने के कारण इन दोनों वर्णों की गणना प्रत्याहार में नहीं किया जाएगा। अतः अक् प्रत्याहार में वर्ण होते हैं-अ,इ,उ,ऋ,लृ।इसी प्रकार से जष् प्रत्याहार में 2 सूत्र हैं-1.झभञ् 2.घढधष्। यहां प्रथम सूत्र का अंतिम वर्ण है-ञ्'' जो कि इत् संज्ञक है तथा द्वितीय सत्र का अंतिम वर्णः 'ष्' है जो कि इत् संज्ञक है। इत् संज्ञक होने के कारण यहां भी इन दोनों वर्णों की गणना प्रत्याहार में नहीं होगी।इस प्रकार जष् प्रत्याहार में वर्ण हैं-झ,भ,घ,ढ,ध। इसी प्रकार से अन्य प्रत्याहार सूत्र होते हैं।
कुछ अन्य प्रमुख प्रत्याहार सूत्र हैं-
*अट्-अ,इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ,ह,य,व,र।
*अच्-अ,इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ।
*अण्-अ,इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ,ह,य,व,र,ल।
*अम्-अ,इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ,
ह,य,व,र,ल,ञ,म,ङ,ण,न।
*इक्-इ,उ,ऋ,लृ।
*इच्-,इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ।
*उक्-उ,ऋ,लृ।
*एङ्-ए,ओ।
*एच्-ए,ओ,ऐ,औ।
*खर्-ख,फ,छ,ठ,थ,च,ट,त,क,प,श,ष,स।
*जश्-ज,ब,ग,ड,द।
*झल्-झ,भ,घ,ढ,ध,ज,ब,ग,ड,द,ख,फ,
छ,ठ,थ,च,ट,त,क,प,श,ष,स,ह।
*झश्-झ,भ,घ,ढ,ध,ज,ब,ग,ड,द।
*झष्-झ,भ,घ,ढ,ध।
*हल्-,ह,य,व,र,ल,ञ,म,ङ,ण,न,झ,
भ,घ,ढ,ध,ज,ब,ग,ड,द,ख,फ,
छ,ठ,थ,च,ट,त,क,प,श,ष,स,ह।
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च
विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
वर्ण-प्रकरणम्
वर्ण्यते अभिव्यञ्जयते वा लघुतमो ध्वनि येन सः वर्णः-वर्ण वह मूल ध्वनि है, जिसे पुनः खंडित नहीं किया जा सके। वर्ण ध्वनि की सबसे छोटी इकाई है। न क्षरः क्षरणं यस्मात् तद् अक्षरम्-वर्ण के लिखित रूप को अक्षर कहते हैं अर्थात् ध्वनिका वह लघुतम रूप अक्षर है, जिसका खंड नहीं होता है।यथा-अ,इ,उ,ऋ,लृ,ह,य,व,र इत्यादि। संस्कृत व्याकरण में वर्णों की चर्चा माहेश्वर सूत्र में की गई है- 1.अइउण 2.ऋलृक् 3.एओङ् 4.ऐऔच् 5.हयवरट् 6.लण् 7.ञमङणनम् 8.झभञ् 9.घढधष् 10.जबगडदश् 11.खफछठथचटतव् 12.कपय् 13.शषसर् 14.हल्। माहेश्वर सूत्र के सभी 14 सूत्रों के अंत में स्थित वर्ण इत् संज्ञक कहलाते हैं, जिनकी गणना नहीं की जाती है। इस प्रकार माहेश्वर सूत्र के आधार पर संस्कृत वर्णमाला का क्रम है-
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च
विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
शुक्रवार, 2 मई 2025
संस्कृत साहित्य
वैदिक साहित्य,दर्शन साहित्य,संस्कृत साहित्य,काव्यशास्त्र,छन्दशास्त्र, पुराणेतिहास,धर्मशास्त्र,अभिलेखशास्त्र, व्याकरण एवं भाषाविज्ञान से सम्बन्धित विषय।
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406