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मंगलवार, 13 सितंबर 2022

मानो हि महतां धनम्

 

मानो हि महतां धनम्

     प्रस्तुत पाठ महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत के उद्योग पर्व के 131तथा 134 अध्यायों से संकलित है। इसमें क्षात्र धर्म के कर्त्तव्यों का उपदेश देती हुई कुन्ती के पुरातन इतिहास का उल्लेख करते हुए विदुरा द्वारा सिन्धुराज से युद्ध में परास्त अपने पुत्र को, कायरता का त्याग कर, अपने स्वाभिमान को पुनः प्राप्त करने का उपदेश दिया गया है।इस पाठ के श्लोकों में मानव के कुल के उत्थान, आत्मबल, परोपकार की महिमा एवं उसके उत्कृष्ट स्वरूप का वर्णन है।
कुन्ती उवाच-
क्षात्रधर्मरता धन्या विदुरा दीर्घदर्शिनी ।
विश्रुता राजसंसत्सु श्रुतवाक्या बहुश्रुता ॥ 1 ॥

अन्वयः - क्षात्रधर्मरता, दीर्घदर्शिनी, राज संसत्सु विश्रुता श्रुतवाक्या, बहुश्रुता विदुरा धन्या॥               शब्दार्थ/हिन्दी अनुवाद-  

हिन्दी अर्थ- क्षात्र धर्म का पालन करने वाली, भविष्य के संदर्भ में चिन्तन-मनन करने वाली, राज्य सभाओं में प्रसिद्ध, न्याय पारंगत अथवा निपुण विदुषी विदुरा धन्य है। 
कुन्ती उवाच-कुन्ती ने कहा-

 क्षात्रधर्मरता=क्षात्र धर्म का पालन करने वाली,

दीर्घदर्शिनी=भविष्य के संदर्भ में चिन्तन-मनन करने वाली,

राज संसत्सु=राज्य सभाओं में

विश्रुता=प्रसिद्ध, 

श्रुतवाक्या=न्याय पारंगत अथवा निपुण 
 बहुश्रुता=विदुषी 
विदुरा=विदुरा धन्य है  
धन्या=धन्य है

विदुरा नाम वै सत्या जगर्हे पुत्रमौरसम्।

निर्जितं सिन्धुराजेन शयानं दीनचेतसम् ।

अनन्दनमधर्मज्ञं द्विषतां हर्षवर्धनम् ॥ 2 ॥                                                                                   अन्वयः - विदुरा नाम सत्या सिन्धुराजेन निर्जितम् शयानम् दीनचेतसम् अनन्दनम् अधर्मज्ञम् द्विषतां हर्षवर्धनम् औरसं पुत्रं जगर्हे।।                                                                                                     हिन्दी अर्थ- निश्चय ही विदुरा नाम वाली, सत्य भाषण करने वाली माता ने सिन्धुराज से पराजित, सोते हुये, उदास मन वाले, दूसरों को अप्रसन्न करने वाले, धर्म को न जानने वाले, शत्रुओं को प्रसन्न करने वाले अपने पुत्र की निन्दा की।                                                                                                                                       शब्दार्थ/हिन्दी अनुवाद-

(निश्चय ही)  

विदुरा नाम=विदुरा नाम वाली,

सत्या= सत्य भाषण करने वाली माता ने   
सिन्धुराजेन=सिन्धुराज से  
निर्जितम्=पराजित,  
शयानम्=सोते हुये,

दीनचेतसम्=उदास मन वाले,   
अनन्दनम्=दूसरों को अप्रसन्न करने वाले, 
अधर्मज्ञम्=धर्म को न जानने वाले,  
द्विषतां=शत्रुओं को    
हर्षवर्धनम्=प्रसन्न करने वाले  
औरसं पुत्रं=अपने पुत्र की निन्दा की 

जगर्हे=निन्दा की । 

 उत्तिष्ठ हे कापुरुष मा शेष्वैवं पराजितः । 

अमित्रान्नन्दयन्सर्वान् निर्मानो बन्धुशोकदः || 3 ||

हिन्दी अर्थ- हे कायर पुरुष! (अपने) सम्पूर्ण शत्रुओं को हर्षित करते हुये, सम्मान रहित, बन्धु बान्धवों को शोक प्रदान करने वाले, पराजित (तुम) इस प्रकार मत सोओ, उठो। 

अन्वयः - हे कापुरुष ! सर्वान् अमित्रान् नन्दयन् निर्मानः बन्धु शोकदः एवं पराजितः, मा शेष्व, उत्तिष्ठ।

शब्दार्थ/हिन्दी अनुवाद-

हे कापुरुष !=हे कायर पुरुष!   

सर्वान्=(अपने) सम्पूर्ण  

अमित्रान्=शत्रुओं को 

 नन्दयन्=हर्षित करते हुये,

निर्मानः= सम्मान रहित,   

 बन्धु शोकदः= बन्धु बान्धवों को शोक प्रदान करने वाले, 

 एवं पराजितः=पराजित (तुम) इस प्रकार 

 मा शेष्व=मत सोओ, 

उत्तिष्ठ=उठो।

उद्भावयस्व वीर्यं वा तां वा गच्छ ध्रुवां गतिम् ।

धर्मं पुत्राग्रतः कृत्वा किं निमित्तं हि जीवसि ॥4 ॥

हिन्दी अर्थ-  हे पुत्र! धर्म को आगे करके या तो वीरता को प्रकट करो अथवा उस अटल या निश्चित गति को प्राप्त करो। निश्चय ही तुम किस कारण जी रहे हो? अर्थात् इस प्रकार का जीवन जीना व्यर्थ है। 

अन्वयः - पुत्र! धर्मम् अग्रतः कृत्वा वीर्यं वा उद्भावयस्व, तां ध्रुवाम् वा गतिं गच्छ। हि किं निमित्तम् जीवसि ॥

पुत्र!= हे पुत्र! 

धर्मम्=धर्म को   

अग्रतः=आगे 

कृत्वा=करके  

वीर्यं वा=या तो वीरता को 

उद्भावयस्व=प्रकट करो अथवा

 तां ध्रुवाम् वा= उस अटल या निश्चित

 गतिं= गति को 

गच्छ=प्राप्त करो। 

 हि किं=(निश्चय) ही (तुम) किस 

 निमित्तम्= कारण 

जीवसि=जी रहे हो? अर्थात् इस प्रकार का जीवन जीना व्यर्थ है।

कुरु सत्त्वं मानं च विद्धि पौरुषमात्मनः ।
 उद्भावय कुलं मग्नं त्वत्कृते स्वयमेव हि ॥5॥
हिन्दी अर्थ- हे पुत्र! तुम स्वयं ही अपने पराक्रम एवं वीरता को व्यक्त करो, अपना सम्मान प्रकट करो एवं अपने पौरुष को जानो क्योंकि तुम्हारे ही कारण यह वंश अथवा कुल डूब रहा है। अतः तुम अपने पुरुषार्थ को प्रकट करो। अपने कुल की मर्यादा को समझो। 
शब्दार्थ/हिन्दी अनुवाद-

अन्वयः - स्वयम् एव सत्त्वम् मानम् च कुरु, आत्मनः पौरुषम् विद्धि, हि तत्कृते मग्नम् कुलम् उद्भावय ।। 

स्वयम् एव=(हे पुत्र! तुम) स्वयं ही  

सत्त्वम्=(अपने) पराक्रम एवं वीरता को 

मानम् च कुरु= तथा अपने सम्मान को प्रकट करो

आत्मनः=अपने   

पौरुषम्=पौरुष को   

विद्धि=जानो 

हि तत्कृते=क्योंकि तुम्हारे कारण

कुलम्= यह वंश अथवा कुल को 

मग्नम्=डूब गया है

उद्भावय=अतः इसे उठाओ ।

यस्य वृत्तं न जल्पन्ति मानवा महदद्भुतम् ।
 राशिवर्धनमात्रं स नैव स्त्री न पुनः पुमान् ॥6॥
हिन्दी अर्थ-  मनुष्य जिसके अत्यन्त विचित्र, मात्र संख्या बढ़ाने वाले वृत्तान्त को नहीं कहते हैं, वह न तो स्त्री है और न फिर पुरुष ही है। भाव यह है कि जिस पुरुष के वृत्तान्त को लोग मात्र संख्या बढ़ाने वाला समझते हैं, वह अत्यन्त अद्भुत वृत्त वाला व्यक्ति न तो स्त्री कहलाने योग्य है और न ही पुरुष। भाव यह है कि जिस पुरुष के वृत्तान्त को लोग मात्र संख्या बढ़ाने वाला समझते हैं, वह अत्यन्त अद्भुत वृत्त वाला व्यक्ति न तो स्त्री कहलाने योग्य है और न ही पुरुष।  

अन्वयः - मानवाः यस्य महत् अद्भुतम् राशिवर्धन मात्रम् वृत्तं न जल्पन्ति, सः न एव स्त्री, न पुनः पुमान् (अस्ति)॥ 

शब्दार्थ/हिन्दी अनुवाद-

 मानवाः= मनुष्य   

यस्य महत्=जिसके अत्यन्त

अद्भुतम्=विचित्र,
मात्रम्=मात्र 
राशिवर्धन= संख्या बढ़ाने वाले 
वृत्तं=वृत्तान्त को 
न जल्पन्ति=नहीं कहते हैं,
सः न एव स्त्री= वह न तो स्त्री है 
 न पुनः पुमान्=और न फिर पुरुष 

(अस्ति)=ही है।  

य आत्मनः प्रियसुखे हित्वा मृगयते श्रियम् ।   
अमात्यानामथो हर्षमादधात्यचिरेण सः ॥7॥
हिन्दी अर्थ-  जो अपने प्रिय सुख को छोड़कर शोभा अथवा लक्ष्मी को खोजता है, वह शीघ्र ही अपने मंत्रियों को हर्ष पहुँचाता है अर्थात् वह राजा अपने मंत्रियों के लिए प्रसन्नता उत्पन्न करता है। 
अन्वयः - यः आत्मनः प्रियं सुखं हित्वा श्रियम् मृगयते, अथो सः अचिरेण अमात्यानाम् हर्षं आदधाति॥
शब्दार्थ/हिन्दी अनुवाद- 
यः आत्मनः=जो अपने   
प्रियं सुखं=प्रिय सुख को 
 हित्वा=छोड़कर 
श्रियम्= शोभा अथवा लक्ष्मी को  
मृगयते=खोजता है, 
अथो सः=वह 
अचिरेण=शीघ्र ही 
अमात्यानाम्=अपने मंत्रियों को    
हर्षं=हर्ष 
आदधाति=पहुँचाता है।
( अर्थात् वह राजा अपने मंत्रियों के लिए प्रसन्नता उत्पन्न करता है।)  
पुत्र उवाच-पुत्र ने कहा - 
किं नु मामपश्यन्त्याः पृथिव्या अपि सर्वथा । 
किमाभरणकृत्यं ते किं भोगैर्जीवितेन वा ॥8॥
हिन्दी अर्थ- निश्चय ही सर्वथा मुझको न देखते हुये तुम्हारी पृथ्वी का क्या लाभ? तुम्हारे आलंकारिक कार्य भी क्या? अर्थात् उनसे भी क्या प्रयोजन! भोगों से क्या अथवा इस जीवन से क्या? अर्थात् इन सबसे क्या लाभ? 
विशेष - यहाँ विदुरा के पुत्र द्वारा भौतिक सुख-साधनों की सार्थकता जीवित रहने पर ही मानते हुए जिज्ञासा प्रकट की गई है। 
अन्वयः - नु सर्वथा माम् अपश्यन्त्याः पृथिव्याः अपि ते किम्, ते आभरणकृत्यम् किम्, भोगैः जीवितेन वा किम्॥ 
शब्दार्थ/हिन्दी अनुवाद-
 नु सर्वथा=निश्चय ही सर्वथा  
 माम्=मुझको 
अपश्यन्त्याः=न देखते हुये तुम्हारी   
पृथिव्याः=पृथ्वी का  
अपि ते किम्=क्या लाभ? 
 ते आभरणकृत्यम्=तुम्हारे आलंकारिक 
 किम्,=कार्य भी क्या? अर्थात् उनसे भी क्या प्रयोजन?
भोगैः=भोगों से क्या  
जीवितेन वा=अथवा इस जीवन से 
 किम्=क्या? अर्थात् इन सबसे क्या लाभ?
माता उवाच -माता ने कहा -
 यमाजीवन्ति पुरुषं सर्वभूतानि संजय ! |
 पक्वं द्रुममिवासाद्य तस्य जीवितमर्थवत् ॥9॥
हिन्दी अर्थ- हे (पुत्र) संजय! (संसार के) सभी प्राणी जिस पुरुष को पके हुये वृक्ष के समान प्राप्त कर उसका आश्रय ग्रहण करते हैं, उसका जीवन सफल होता है।
विशेष - यहाँ विदुरा ने परोपकारी एवं स्वाभिमानी व्यक्ति के ही जीवन को सार्थक माना है।
अन्वयः - संजय! सर्वभूतानि यम् पुरुषम् पक्वम् द्रुमम् इव आसाद्य आजीवन्ति, तस्य जीवितम् अर्थवत् (भवति)॥
शब्दार्थ/हिन्दी अनुवाद- 
संजय!=हे (पुत्र) संजय! 
सर्वभूतानि=(संसार के) सभी प्राणी 
यम् पुरुषम्=जिस पुरुष को 
पक्वम् द्रुमम्=पके हुये वृक्ष के   
इव आसाद्य= समान प्राप्त कर  
आजीवन्ति=उसका आश्रय ग्रहण करते हैं, 
तस्य जीवितम्=उसका जीवन   
अर्थवत् (भवति)=सफल होता है।
स्वबाहुबलमाश्रित्य योऽभ्युज्जीवति मानवः ।
 स लोके लभते कीर्त्तिं परत्र च शुभां गतिम्॥10॥
हिन्दी अर्थ-  जो मनुष्य अपनी भुजाओं की शक्ति का सहारा लेकर जीवित रहता है, वह इस लोक में यश को प्राप्त करता है तथा परलोक में श्रेष्ठ गति (सद्गति) को प्राप्त करता है।
विशेष - विदुरा के अनुसार पराक्रमी व्यक्ति ही इस लोक में यश एवं परलोक में परम गति को प्राप्त करता है।
अन्वयः-यः मानवःस्वबाहुबलम् आश्रित्य अभ्युज्जीवति सःलोके कीर्तिं लभते,परत्र च शुभाम् गतिम् (लभते)॥ 
शब्दार्थ/हिन्दी अनुवाद-
यः मानवः=जो मनुष्य 
 स्वबाहुबलम्=अपनी भुजाओं की शक्ति का 
 आश्रित्य=सहारा लेकर 
अभ्युज्जीवति सः=जीवित रहता है, वह 
 लोके कीर्तिं=इस लोक में यश को   
लभते=प्राप्त करता है 
 परत्र च=तथा परलोक में  
शुभाम्=श्रेष्ठ गति (सद्गति)
गतिम् (लभते)= को प्राप्त करता है।  
कुन्ती उवाच-कुन्ती ने कहा-
 सदश्व इव स क्षिप्तः प्रणुन्नो वाक्यसायकैः ।
 तच्चकार तथा सर्वं यथावदनुशासनम्॥॥11॥
हिन्दी अर्थ- वह (संजय) (अपनी माता विदुरा के) वाणी के बाणों से फेंके गये अच्छे घोड़े के समान प्रेरित किया गया । जैसा माता ने उसे उपदेश या आदेश दिया, उसने वैसा ही सब कुछ किया। अर्थात् कायरता को छोड़कर स्वाभिमानपूर्वक रहना प्रारंभ किया।व प्रेरक वचनों का उसके पुत्र सञ्जय पर पड़े प्रभाव को दर्शाया गया है.वह अपनी कायरता को त्यागकर स्वाभिमानी जीवन जीने को तत्पर हो जाता है।   
अन्वयः - सः वाक्यसायकैः क्षिप्तः सत् अश्व इव प्रणुन्नः यथावत् अनुशासनम् तथा तत् सर्वम् चकार ॥
शब्दार्थ/हिन्दी अनुवाद-
सः वाक्यसायकैः=वह (संजय) (अपनी माता विदुरा के) वाणी के बाणों से 
क्षिप्तः सत्= फेंके गये अच्छे 
अश्व इव प्रणुन्नः=घोड़े के समान प्रेरित किया गया ।  
 यथावत्=जैसा माता ने उसे 
अनुशासनम्=उपदेश या आदेश दिया, 
तथा तत्=उसने वैसा ही   
सर्वम् चकार=सब कुछ किया।


प्रश्नावली

प्रश्न 1.

अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तरं संस्कृतेन देयम्—

(क) 'मानो हि महतां धनम्' इत्ययं पाठः कस्मात् ग्रन्थात् संकलितः?

(ख) विदुरा कुत्र विश्रुता आसीत्?

(ग) विदुरायाः पुत्रः केन पराजितः अभवत्?

(घ) कः स्त्री पुमान् वा न भवति?

(ङ) कः अमात्यानां हर्षम् न आदधाति?

(च) अपुत्रया मात्रा किं आभरणकृत्यं न भवति?

(छ) कस्य जीवितम् अर्थवत् भवति?

प्रश्न 2.

'यः आत्मनः प्रियसुखम्... अचिरेण सः' अस्य श्लोकस्य आशयं हिन्दीभाषया स्पष्टीकुरुत।

प्रश्न 3.

रिक्तस्थानानि पूरयत—

(क) विदुरा ओरसपुत्रं __________।

(ख) हे कापुरुष! __________ मा शेष्व।

(ग) त्वत्कृते स्वयमेव मग्नं __________ उद्भावय।

(घ) यः प्रियसुखं हित्वा __________ मृगयते।

(ङ) माम् अपश्यन्त्याः __________ अपि सर्वथा किम्?

(च) सर्वभूतानि __________ यमाजीवन्ति।

(छ) सः यथावत् __________ चकार।

प्रश्न 4.

अधोलिखितानां शब्दानां विलोमान् लिखत—

(क) विश्रुता

(ख) सत्या

(ग) अधर्मज्ञम्

(घ) अमित्रान्

(ङ) कापुरुषः

(च) अचिरेण

(छ) आसाद्य

प्रश्न 5.

पञ्चभिः वाक्यैः विदुरायाः चरित्रं वर्णयत।

प्रश्न 6.

'सर्वभूतानि... जीवितमर्थवत्' अस्य श्लोकस्य अन्वयं लिखत।

प्रश्न 7.

अधोलिखितपदानां संस्कृतवाक्येषु प्रयोगं कुरुत—

(क) विश्रुता

(ख) शयानम्

(ग) द्विषताम्

(घ) गतिम्

(ङ) पक्वम्

(च) क्षिप्तः

संस्कृतभाषया उत्तरं दीयताम्

प्रश्न 1.

महतां किं धनम्?

प्रश्न 2.

क्षात्रधर्मरता का आसीत्?

प्रश्न 3.

विदुरा कं जगाह?

प्रश्न 4.

द्विषतां हर्षवर्धनः कः आसीत्?

प्रश्न 5.

विदुरा स्वपुत्रं किम् उक्तवती?

प्रश्न 6.

विदुरयानुसारेण कः लोके कीर्तिं लभते?

प्रश्न 7.

वाक्यसायकैः प्रणुन्नः सः किमिव क्षिप्तः?

प्रश्न 8.

'मानो हि महतां धनम्' पाठे विदुरया स्वपुत्राय किं उपदिष्टम्?

प्रश्न 9.

परत्र शुभां गतिं कः लभते?

प्रश्न 10.

विदुरायाः पुत्रस्य किं नाम आसीत्?

प्रश्न 11.

दीर्घदर्शिनी श्रुतवाक्या का आसीत्?

प्रश्न 12.

निर्मानो बन्धुशोकदः कस्य विशेषणे स्तः?

उत्तरावली

प्रश्न 1.

(क) 'मानो हि महतां धनम्' इत्ययं पाठः महाभारतग्रन्थात् संकलितः।

(ख) विदुरा राजसंसत्सु विश्रुता आसीत्।

(ग) विदुरायाः पुत्रः सिन्धुराजेन पराजितः अभवत्।

(घ) यः स्वबाहुबलमाश्रित्य नाभ्युज्जीवति, सः नैव स्त्री न पुनः पुमान् भवति।

(ङ) यः आत्मनः प्रियसुखं न जहाति, सः अमात्यानां हर्षं न आदधाति।

(च) अपुत्रया मात्रा पुत्रोपेक्षणम् आभरणकृत्यं न भवति।

(छ) यं आश्रित्य सर्वभूतानि जीवन्ति, तस्य जीवितम् अर्थवत् भवति।

प्रश्न 2.

हिन्दी आशय—

इस श्लोक का आशय यह है कि जो व्यक्ति अपने व्यक्तिगत सुख का त्याग करके लक्ष्मी अथवा समृद्धि की प्राप्ति का प्रयास करता है, वह शीघ्र ही अपने सहयोगियों एवं मंत्रियों को प्रसन्न करता है। त्याग और परिश्रम से ही सफलता प्राप्त होती है।

प्रश्न 3.

(क) जगाह।

(ख) उत्तिष्ठ।

(ग) कुलम्।

(घ) श्रियम्।

(ङ) पृथिव्या।

(च) सञ्जयम्।

(छ) अनुशासनम्।

प्रश्न 4.

शब्द

विलोम

विश्रुता

अविश्रुता

सत्या

असत्या

अधर्मज्ञम्

धर्मज्ञम्

अमित्रान्

मित्रान्

कापुरुषः

वीरपुरुषः

अचिरेण

चिरेण

आसाद्य

अनासाद्य

प्रश्न 5.

विदुरा क्षात्रधर्मरता आसीत्।

सा दीर्घदर्शिनी श्रुतवाक्या च आसीत्।

सा राजसंसत्सु विश्रुता आसीत्।

सा बहुश्रुता आसीत्।

सा सत्यवादिनी आसीत्।

प्रश्न 6.

अन्वयः—

सञ्जय! सर्वभूतानि यं पुरुषं पक्वं द्रुमम् इव आसाद्य आजीवन्ति, तस्य जीवितम् अर्थवत् भवति।

प्रश्न 7.

विदुरा राजसंसत्सु विश्रुता आसीत्।

माता शयानं पुत्रं अबोधयत्।

रामः द्विषतां हर्षवर्धनः आसीत्।

भाग्यस्य गतिं कश्चिदपि न जानाति।

पक्वं फलं स्वादु भवति।

धनुषा क्षिप्तः शरः लक्ष्यं प्राप्नोति।

संस्कृतभाषया उत्तराणि

1.

मानः हि महतां धनम् अस्ति।

2.

विदुरा क्षात्रधर्मरता आसीत्।

3.

विदुरा ओरसपुत्रं जगाह।

4.

विदुरायाः पुत्रः द्विषतां हर्षवर्धनः आसीत्।

5.

विदुरा स्वपुत्रम् उक्तवती— "हे कापुरुष! उत्तिष्ठ, पराजितः मा शेष्व।"

6.

यः स्वबाहुबलमाश्रित्य अभ्युज्जीवति, सः लोके कीर्तिं लभते।

7.

सः सदश्व इव क्षिप्तः।

8.

विदुरया स्वपुत्राय कायरतां त्यक्त्वा स्वाभिमानपूर्वकं जीवनं यापयितुम् उपदिष्टम्।

9.

यः स्वबाहुबलमाश्रित्य अभ्युज्जीवति, सः परत्र शुभां गतिं लभते।

10.

विदुरायाः पुत्रस्य नाम सञ्जयः आसीत्।

11.

विदुरा दीर्घदर्शिनी श्रुतवाक्या आसीत्।

12.'निर्मानः' तथा 'बन्धुशोकदः' इति पदे सञ्जयस्य विशेषणे स्तः।


परोपकाराय सतां विभूतयः

 

 परोपकाराय सतां विभूतयः

            जेसीईआरटी तथा एनसीईआरटी के कक्षा-11 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग-1 के द्वितीय: पाठ: परोपकाराय सतां विभूतयः  का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं।
         संस्कृत साहित्य में जातक कथाओं का अपना विशेष महत्त्व है। ये कथाएँ मूलतः पालि में हैं, जिनकी संख्या 547 है। बोधिसत्त्व के कर्म दिव्य और अद्भुत हैं। उनका जीवन अलौकिक और आदर्श है। इसी से प्रेरणा लेकर आर्यशूर ने जातकमाला ग्रन्थ की रचना की । यह ग्रन्थ गद्य-पद्य मिश्रित संस्कृत में है। प्रस्तुत पाठ इसी ग्रन्थ के पन्द्रहवें जातक ‘मत्स्यजातकम्' का संक्षेप है।
        इसमें बताया गया है कि सत्य तपोबल के आधार पर किस प्रकार मत्स्याधिपति के रूप में बोधिसत्त्व अपने साथी मत्स्यों की प्राण रक्षा करने में समर्थ होते हैं। वस्तुतः सत्त्वगुण से परिपूर्ण आचरण देवताओं को भी वश में कर सकता है।इस पाठ का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://www.sanskritsight.in/2022/09/blog-post_28.html
        बोधिसत्त्वः किल कस्मिंश्चित् नातिमहति कमलकुवलयादि- विभूषितसलिले हंसचक्रवाकादिशोभिते तीरान्ततरुकुसुमावकीर्णे सरसि मत्स्याधिपतिः बभूव । बहुषु जन्मान्तरेषु परोपकाराभ्यासवशात् तत्रस्थः अपि परहितसुखसाधने व्यापृतः अभवत्। इष्टानामिव च स्वेषाम् अपत्यानाम् उपरि सौहार्दत्वाद् महासत्त्वः तेषां मीनानां दानप्रिय- वचनादिक्रमैः परमनुग्रहं चकार ।
 अर्थ-निश्चित रूप से बोधिसत्व किसी छोटे, कमलों, नील कमलों आदि से सुशोभित जल वाले, हंस, चकवा आदि पक्षियों से शोभित, जिसके किनारे के प्रान्तों पर वृक्षों एवं पुष्पों से परिपूर्ण तालाब में मत्स्याधिपति  के रूप में अवतीर्ण हुए बहुत से जन्म-जन्मान्तरों में परोपकार करने के अभ्यासवश, वहाँ, उस जन्म में स्थित होते हुये भी दूसरों की भलाई एवं सुख साधने में वे तल्लीन हुये। अपने इष्ट लोगों की भाँति अपनी सन्तानों के ऊपर सौहार्द भाव के कारण महान् उदार प्राणी के रूप में उन मछलियों पर दान, प्रिय वचन आदि के क्रम में अत्यन्त कृपा की।
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
 किल= निश्चित रूप से
बोधिसत्त्वः=बोधिसत्व 
कस्मिंश्चित्=किसी  
नातिमहति=छोटे,
कमलकुवलयादि-=कमलों,नील कमलों आदि से  
विभूषितसलिले=सुशोभित जल वाले, 
हंसचक्रवाकादिशोभिते=हंस चक्रवाक आदि पक्षियों से सुशोभित,
तीरान्ततरु=किनारे के प्रान्तों पर वृक्षों
कुसुमावकीर्णे= एवं पुष्पों से परिपूर्ण, 
सरसि= तालाब में 
मत्स्याधिपतिः=मछलियों के स्वामी के रूप में 
बभूव=अवतीर्ण हुए। 
बहुषु जन्मान्तरेषु=बहुत से जन्म-जन्मान्तरों में 
परोपकाराभ्यासवशात्=परोपकार करने के अभ्यासवश 
तत्रस्थः अपि=वहाँ,उस जन्म में स्थित होते हुये भी 
परहितसुखसाधने=दूसरों की भलाई एवं सुख साधने में 
व्यापृतः अभवत्=वे तल्लीन हुये।
 इष्टानामिव च=तथा अपने इष्ट लोगों की भाँति  
स्वेषाम्=अपनी 
अपत्यानाम्=सन्तानों के 
उपरि=ऊपर 
सौहार्दत्वाद्=सौहार्द भाव के कारण 
महासत्त्वः =महान् उदार प्राणी के रूप में
तेषां मीनानां=उन मछलियों पर 
दानप्रियवचनादिक्रमैः=दान,प्रिय वचन आदि के क्रम में 
परमनुग्रहं=अत्यन्त कृपा  
चकार=की। 
अथ कदाचित् सत्त्वानां भाग्यवैकल्यात् प्रमादाच्च सम्यग् देवो न ववर्ष। वृष्टेः अभावे तत् सरः कदम्बकुसुमगौरेण नवसलिलेन यथापूर्वं न परिपूर्णम् जातम्। क्रमेण च उपगते निदाघकाले दिनकरकिरणैः अभितप्तया धरण्या, ज्वालानुगतेनेव मारुतेन पिपासावशादिव प्रत्यहम् आपीयमानं तत् सरः लघुपल्वलमिवाभवत्। तत्रस्थिताः मीनाश्च जलाभावात् मृतप्रायाः इव सञ्जाताः।
अर्थ- इसके बाद कभी प्राणियों के भाग्य के अनकल न होने के कारण तथा लापरवाही के कारण देवता ने अच्छी तरह वर्षा नहीं की अर्थात् अच्छी वर्षा नहीं हुई। वर्षा के न होने पर वह तालाब कदम्ब के पुष्यों के समान गौरवर्ण (श्वेत) नये पानी से पहले की तरह परिपूर्ण नहीं हुआ अर्थात् वर्षा के अभाव में तालाब में स्वच्छ नवीन, जल का आगमन नहीं हुआ। इसके बाद क्रमश: गर्मी की ऋतु आने पर सूर्य की तेज किरणों से तपी हुई धरती से, ज्वाला से परिपूर्ण वायु से प्यास के कारण प्रतिदिन चारों ओर से पीया जाता हुआ वह तालाब एक छोटे तालाब (पोखर) के समान हो गया और वहाँ स्थित मछलियाँ जल की कमी के कारण मानो मृतप्राय हो गई। 
शब्दार्थ और वाक्यार्थ- 
अथ कदाचित्=इसके बाद कभी 
सत्त्वानां= प्राणियों के
भाग्यवैकल्यात्=भाग्य के अनुकूल न होने के कारण, 
प्रमादाच्च=तथा लापरवाही के कारण,
 देवो=देवता ने 
सम्यग्=अच्छी तरह
न ववर्ष=नहीं वृष्टि की 
वृष्टेः अभावे=वर्षा के न होने पर  
तत् सरः=वह तालाब
कदम्बकुसुमगौरेण= कदम्ब के पुष्यों के समान गौरवर्ण (श्वेत) 
नवसलिलेन=नये (ताजे) पानी से 
यथापूर्वं=पहले की तरह  
न परिपूर्णम् जातम्=परिपूर्ण नहीं हुआ।
 क्रमेण च=इसके बाद क्रमश: 
 निदाघकाले=ग्रीष्म ऋतु के
उपगते=समीप होने पर 
दिनकरकिरणैः=सूर्य की किरणों से 
अभितप्तया=तपी हुई 
धरण्या=पृथ्वी से, 
ज्वालानुगतेनेव=ज्वाला से परिपूर्ण
मारुतेन=वायु से,  
पिपासावशादिव=प्यास के कारण 
 प्रत्यहम्=प्रतिदिन 
आपीयमानं=चारों ओर से पीया जाता हुआ
 तत् सरः= वह तालाब
लघुपल्वलमिवाभवत्=छोटे तालाब के समान हो गया
जलाभावात्=तथा जल के अभाव से
तत्रस्थिताः मीनाश्च=उसमें स्थित मछलियाँ  
मृतप्रायाः इव=मृतप्राय के समान
सञ्जाताः=हो गयीं। 
 सलिलतीरवासिनः पक्षिणः वायसगणाः च यावत् तान् मत्स्यान् भक्षयितुं चिन्तयन्ति स्म तावद् विषाददैन्यवशगं मीनकुलमवेक्ष्य बोधिसत्त्वः करुणायमानः चिन्तामापेदे । कष्टा व्रत इयम् आपद् आपतिता मीनानाम्।
अर्थ- जल के किनारे पर रहने वाले पक्षी एवं कौए जब तक उन मछलियों को खाने के लिए विचार कर रहे थे, तब तक दुःख एवं दीनता के वशीभूत मछलियों के समूह को देखकर बोधिसत्त्व करुणायुक्त होकर चिन्ता को प्राप्त हो गये अर्थात् अत्यन्त चिन्तित हो गये। (वे विचार करने लगे) हाय! यह आपत्ति जो मछलियों पर आ पड़ी है, वह अत्यन्त कष्टप्रद है।
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
सलिलतीरवासिनः=जल के किनारे पर रहने वाले
 पक्षिणः=पक्षी 
वायसगणाः च=तथा कौओं के समूह
 यावत् तान्=जब तक उन 
मत्स्यान्=मछलियों को  
भक्षयितुं=खाने के लिए 
चिन्तयन्ति स्म=विचार कर रहे थे 
तावद्=तब तक 
विषाददैन्यवशगं=विषाद एवं दीनता के वशीभूत
 मीनकुलमवेक्ष्य=मछलियों के समुह को देखकर
 बोधिसत्त्वः=बोधिसत्त्व 
करुणायमानः=दयाभाव से युक्त होकर 
चिन्तामापेदे=चिन्ता को प्राप्त हो गये
(वे विचार करने लगे हाय!)   
मीनानाम्=जो मछलियों पर
इयम् आपद्=यह आपत्ति
आपतिता=आ पड़ी है,
कष्टा व्रत=अत्यन्त कष्टप्रद है।  
                  अद्यापि च   चिरेणैव लक्ष्यते    जलदागमः ॥ 
                 अपयानक्रमो नास्ति  नेताप्यन्यत्र को   भवेत्।
                 अस्मद्व्यसनसङ्कृष्टाः समायान्ति च नो द्विषः॥
                   प्रत्यहं   क्षीयते    तोयं स्पर्धमानमिवायुषा । 
 अर्थ- प्रतिदिन आयु से स्पर्धा करता हुआ मानो जल (आयु की तरह) क्षीण हो रहा है। (क्रमशः घट रहा है) तथा आज भी बादलों का आगमन दूर ही दिखाई देता है अर्थात् बादलों के आगमन की निकट भविष्य में संभावना नहीं है। बाहर जाने का भी मार्ग नहीं है। दूसरे स्थान पर नेता भी कौन बने? साथ ही हमारे दुःखों से खिंचे हुये हमारे शत्रुगण भी आ रहे हैं। भाव यह है कि इस बड़ी मुसीबत में कोई भी मार्ग दिखाई नहीं दे रहा है।   
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
 प्रत्यहम्=प्रतिदिन 
आयुषा= आयु से
स्पर्धमानम् इव=स्पर्धा करता हुआ 
तोयम्=जल 
क्षीयते=कम हो रहा है।
अद्य अपि च=तथा आज भी  
चिरेण =विलम्ब से 
जलद-आगमः=बादलों का आगमन 
एव लक्ष्यते=ही दिखाई देता है।
अस्मद्व्यसनसकृष्टाः=हमारे दुःखों से खिंचे हुए 
च न द्विषः=शत्रुगण
समायान्ति=आ रहे हैं।  
अपयानक्रमः=बाहर जाने का मार्ग 
न अस्ति=नहीं है। 
अन्यत्र नेता=दूसरे स्थान पर नेता  
अपि कः भवेत्=भी कौन बने?
 तत्किमत्र प्राप्तकालं स्यादिति विमृशन् स महात्मा स्वकीय- सत्यतपोबलमेव तेषां रक्षणोपायम् अमन्यत । करुणया समापीड्यमानहृदयो दीर्घं निःश्वस्य नभः समुल्लोकयन् उवाच -
अर्थ- तो इस विषय में समयोचित क्या हो? इस प्रकार विचार करते हुये उस महात्मा (बोधिसत्व) ने अपनी सत्यता एवं तपस्या के बल को ही उन मछलियों की रक्षा का उपाय माना। करुणा से संवेदनशील हृदय वाले वे लम्बी साँस लेकर आकाश की ओर देखते हुये बोले।  
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
तत्किमत्र=तो इस विषय में 
 प्राप्तकालं=समयोचित
 स्यादिति= क्या हो?
विमृशन् स= इस प्रकार विचार करते हुये उस 
महात्मा=महात्मा (बोधिसत्व) ने   
स्वकीय-=अपनी   
सत्यतपोबलमेव=सत्यता एवं तपस्या के बल को ही  
तेषां रक्षणोपायम्=उन मछलियों की रक्षा का 
अमन्यत=उपाय माना। 
करुणया=करुणा से 
समापीड्यमानहृदयो= संवेदनशील हृदय वाले वे 
दीर्घं निःश्वस्य नभः=लम्बी साँस लेकर आकाश की ओर
समुल्लोकयन्= देखते हुये बोले।  
उवाच -= बोले-
स्मरामि न प्राणिवधं यथाहं सञ्चिन्त्य कृच्छ्रे परमेऽपि कर्तुम् । 
अनेन      सत्येन   सरांसि    तोयैरापूरयन्   वर्षतु देवराजः ॥
अर्थ-जैसे मैं बड़े कष्ट के समय में भी (किसी) प्राणी का वध करने की बात स्मरण नहीं करता अर्थात् मैंने अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में भी आज तक किसी प्राणी का वध नहीं किया। मेरे इस सत्य के सन्दर्भ में सोचकर देवराज इन्द्र तालाबों को पानी से भरने के लिए वर्षा करें। 
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
यथा अहम्= जैसे मैं 
परमे कृच्छ्रे अपि=बड़े कष्ट के समय में भी 
 प्राणिवधम्=(किसी) प्राणी का वध करने की बात
स्मरामि=स्मरण 
कर्तुम् न= नहीं करता। 
 अनेन सत्येन=मेरे इस सत्य के सन्दर्भ में  
 सञ्चिन्त्य=सोचकर 
देवराजः=देवराज इन्द्र  
सरांसि=तालाबों को पानी से भरने के लिए वर्षा करें।
तोयैः=पानी से 
 आपूरयन्=भरने के लिए    
वर्षतु=वर्षा करें।  
अथ तस्य महात्मनः पुण्योपचयात् सत्याधिष्ठानबलात् च समन्ततः तोयपरिपूर्णाः गम्भीरमधुरनिर्घोषा अकाला अपि कालमेघाः विद्युल्लताऽलङ्कृताः प्रादुरभवन् । बोधिसत्त्वः समन्ततोऽभिप्रसृतैः सलिलप्रवाहैरापूर्यमाणे सरसि, धारानिपातसमकालेन विद्रुतवाया पक्षिगणे, लब्धजीविताशे च प्रमुदिते मीनगणे प्रीत्याभिसार्यमाणहृदयो वर्षानिवृत्तिसाशङ्कः पुनः पुनः पर्जन्यमाबभाषे -
 अर्थ-इसके बाद उस महात्मा के पुण्यों की वृद्धि से तथा सत्य पर दृढ़ रहने की शक्ति से चारों ओर जल से परिपूर्ण गंभीर तथा मधुर ध्वनि करने वाले, असमय प्रकट होने वाले होते हुये भी प्रलयकाल के समान बादल बिजली रुपी लता से अलंकृत होकर प्रकट हो गये। बोधिसत्त्व, चारों ओर फैले पानी के प्रवाह से परिपूर्ण तालाब के होने पर, मूसलाधार वर्षा पड़ने के समय के साथ ही कौए आदि पक्षियों के वहाँ से भाग जाने पर तथा जीवन की आशा प्राप्त होने पर, मछलियों के प्रसन्न हो जाने पर, प्रसन्नता से प्रसन्न किये जाते हुये हृदय वाले वर्षा की समाप्ति की आशंका वाले (बोधिसत्त्व) बार-बार बादल से बोले (कहने लगे)।
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
अथ तस्य=इसके बाद उस
 महात्मनः= महात्मा के
पुण्योपचयात्=पुण्यों की वृद्धि से 
सत्याधिष्ठानबलात् च =तथा सत्य पर दृढ़ रहने की शक्ति से 
समन्ततः=चारों ओर
तोयपरिपूर्णाः=जल से परिपूर्ण 
गम्भीरमधुरनिर्घोषा=गंभीर तथा मधुर ध्वनि करने वाले 
अकाला अपि=असमय प्रकट होने वाले होते हुये भी 
कालमेघाः=प्रलयकाल के समान बादल  
विद्युल्लताऽलङ्कृताः=बिजली रुपी लता से अलंकृत 
प्रादुरभवन्=प्रकट हो गये। 
बोधिसत्त्वः= बोधिसत्त्व, 
समन्ततोऽभिप्रसृतैः=चारों ओर फैले
 सलिलप्रवाहैरापूर्यमाणे=पानी के प्रवाह से परिपूर्ण 
सरसि=तालाब के होने पर,
धारानिपातसमकालेन=मूसलाधार वर्षा पड़ने के समय के साथ ही 
विद्रुतवाया पक्षिगणे=कौए आदि पक्षियों के वहाँ से भाग जाने पर 
लब्धजीविताशे च=तथा जीवन की आशा प्राप्त होने पर,
 प्रमुदिते मीनगणे=मछलियों के प्रसन्न हो जाने पर,
 प्रीत्याभिसार्यमाणहृदयो=प्रसन्नता से प्रसन्न किये जाते हुये हृदय वाले 
वर्षानिवृत्तिसाशङ्कः=वर्षा की समाप्ति की आशंका वाले (बोधिसत्त्व) 
पुनः पुनः=बार-बार 
पर्जन्यमाबभाषे =बादल से बोले-                                                                                                                        उद्गर्ज    पर्जन्य    गभीरधीरं     प्रमोदमुद्वासय वायसानाम्। 
रत्नायमानानि पयांसि वर्षन् संसक्तविद्युज्ज्वलितद्युतीनि ॥
अर्थ-हे मेघ ! निरन्तर चमकती हुई बिजली के प्रकाश से युक्त होने के कारण रत्नों के समान दिखाई पड़ने वाले जल की वर्षा करते हुये (तुम) कौओं की प्रसन्नता को समाप्त करो तथा गंभीर धीर आवाज में गर्जना करो। 
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ- 
 पर्जन्य=हे मेघ !  
संसक्त=निरन्तर चमकती हुई 
विद्युत-ज्वलित,=बिजली के प्रकाश से युक्त होने के कारण  
द्युतीनि रत्नायमानानि =रत्नों के समान दिखाई पड़ने वाले
पयांसि वर्षन्,=जल की वर्षा करते हुये (तुम) 
वायसानाम् =कौओं की 
प्रमोदम्=प्रसन्नता को तथा गंभीर धीर आवाज में गर्जना करो।  
उद्वासय = समाप्त करो 
गंभीर धीरं (च) =तथा गंभीर धीर आवाज में
उद्गर्ज=गर्जना करो। 
 तदुपश्रुत्य देवानाम् इन्द्रः शक्रः परमविस्मितमनाः साक्षात् अभिगम्यैनम् अभिसंराधयन् उवाच-
अर्थ-यह (बात) सुनकर देवताओं के अधिपति इन्द्र अत्यन्त आश्चर्यचकित मन वाले साक्षात् बोधिसत्त्व के पास आकर उनकी स्तुति करते हुये कहने लगे।
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
तदुपश्रुत्य= यह (बात) सुनकर
देवानाम्=देवताओं के अधिपति
इन्द्रःशक्रः=इन्द्र 
परमविस्मितमनाः=अत्यन्त आश्चर्यचकित मन वाले 
साक्षात्=साक्षात्    
अभिगम्यैनम्=बोधिसत्त्व के पास आकर 
अभिसंराधयन्=उनकी स्तुति करते हुये 
उवाच=कहने लगे।
आवर्जिता यत्कलशा इवेमे क्षरन्ति रम्यस्तनिताः पयोदाः ॥
अर्थ-हे महापुरुष! मत्स्याधिपति! निश्चय ही यह आपके सत्य का अत्यधिक प्रभाव है कि उंडेले गये घड़ों के समान ये सुन्दर ध्वनि वाले मेघ बरस रहे हैं। 
   इत्येवं प्रियवचनैः संराध्य तत्रैवान्तर्दधे। तच्च सरः तोयसमृद्धिमवाप । तदेवं शीलवताम् इह एव कल्याणा: अभिप्रायाः वृद्धिम् आप्नुवन्ति प्रागेव परत्र च । अतः शीलविशुद्धौ प्रयतितव्यम्।
अर्थ-इस प्रकार प्रिय वचनों से स्तुति करके इन्द्र वहीं पर अन्तर्ध्यान हो गये तथा वह तालाब जल से परिपूर्ण हो गया। तो इस प्रकार चरित्रवान् इस लोक में ही तथा परलोक में भी कल्याणकारी मनोरथों को बढ़ाते रहते हैं। इसलिए शील (चरित्र) की विशुद्धि का प्रयास करना चाहिए। अर्थात् चरित्रवान बनने का सदैव प्रयास करना चाहिए। 
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
इत्येवं=इस प्रकार 
प्रियवचनैः=प्रिय वचनों से
संराध्य= स्तुति करके इन्द्र   
तत्रैवान्तर्दधे=वहीं पर अन्तर्ध्यान हो गये 
तच्च सरः=तथा वह तालाब 
तोयसमृद्धिमवाप=जल से परिपूर्ण हो गया। 
तदेवं शीलवताम्=तो इस प्रकार चरित्रवान्   
इह एव कल्याणा:=इस लोक में ही तथा परलोक में भी कल्याणकारी
अभिप्रायाः= मनोरथों को  
वृद्धिम्=बढ़ाते 
आप्नुवन्ति=रहते हैं    
प्रागेव परत्र च=पहले तथा बाद में। 
तवैव खल्वेष महानुभाव ! मत्स्येन्द्र ! सत्यातिशयप्रभावः । 
अतः शीलविशुद्धौ=इसलिए शील (चरित्र) की विशुद्धि का 
प्रयतितव्यम्=प्रयास करना चाहिए। 
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
महानुभाव!=हे महापुरुष!
 मत्स्येन्द्र != मत्स्याधिपति!
खलु एषः= निश्चय ही यह 
तव एव= आपके ही 
सत्यातिशय=सत्य का अत्यधिक 
प्रभावः (वर्तते)=प्रभाव है
यत् आवर्जिताः= कि उंडेले गये 
कलशाः इव=घड़ों के समान
इमे रम्यस्तनिताः= ये सुन्दर ध्वनि वाले 
पयोदाः=मेघ 
क्षरन्ति= बरस रहे हैं। 
  अभ्यास
प्रश्न: 1. संस्कृतभाषया उत्तरत - 
(क) जातकमालायाः लेखकः कः? 
उत्तरम्-जातकमालायाः लेखकः आर्यशूरः वर्तते।
(ख) कथायां वर्णिते जन्मनि बोधिसत्त्वः कः बभूव ?
उत्तरम् : कथायां वर्णिते जन्मनि बोधिसत्त्वः मत्स्याधिपतिः बभूव।
(ग) महासत्त्वः मीनानां कैः परमनुग्रहम् अकरोत् ?
उत्तरम् : महासत्त्वः मीनानाम् स्वकीय सत्य तपोबलेन परमनुग्रहम् अकरोत्।
(घ) सरः लघुपल्वलमिव कथमभवत् ?
उत्तरम् : उपगते निदाघकाले दिनकरकिरणैः अभितप्तया धरित्र्या, ज्वालानुगतेनेव मारुतेन पिपासा वशादिव प्रत्यहम् आपीयमानः तद् सरः लघुपल्वलमिवाभवत्। 
(ङ) बोधिसत्त्वः किमर्थं चिन्तामकरोत् ?
उत्तरम् : विषाददैन्यवशगं मीनकुलमवेक्ष्य बोधिसत्त्वः करुणायमानः चिन्तामापेदे।
(च) तोयं प्रतिदिनं केन स्पर्धमानं क्षीयते स्म?
उत्तरम् : तोयं आयुषा स्पर्धमानभिव प्रत्यहं क्षीयते स्म।
(छ) आकाशे अकाला अपि के प्रादुरभवन् ?  
उत्तरम् : आकाशे अकाला अपि कालमेघाः प्रादुर्भवन्।
(ज) कया आशङ्कया बोधिसत्त्वः पुनः पुनः पर्जन्यं प्रार्थितवान्?
उत्तरम् : वर्षानिवृत्ति आशंकया बोधिसत्त्वः पुनः पुनः पर्जन्यं प्रार्थितवान्।
(झ) शक्रः केषां राजा आसीत्?
उत्तरम् : शक्रः देवानाम् राजा आसीत्।
(ञ) अस्माभिः कुत्र प्रयतितव्यम् ?  
उत्तरम् : अस्माभिः शीलविशुद्धौ प्रयतितव्यम्। 
2.रिक्त स्थानानि पूरयत- 
(क) बोधिसत्त्वः परहितसुखसाधने.......अभवत्। 
उत्तरम् :  व्याप्तः
(ख).तत्रस्थिताः मीनाः जलाभावात् .................. इव संजाताः। 
उत्तरम् :मृतप्रायाः 
(ग)विषाददैन्यवशगं मीनकुलमवेक्ष्य बोधिसत्त्वः करुणायमानम् .................... आपेदे। 
उत्तरम् : चिन्ताम्
(घ)स महात्मा स्वकीय सत्यतपोबलमेव तेषां..................अमन्यत।
उत्तरम् : रक्षणोपायम्  
सप्रसङ्ग व्याख्या कार्या- 
(ङ) तत्...............................तोयसमृद्धिमवाप।
उत्तरम् :सरः
3.सप्रसङ्ग व्याख्या कार्याः
 (क)बहुषु जन्मान्तरेषु परोपकार-अभ्यासवशात् तत्रस्थः अपि परहितसुखसाधने व्यापृतः अभवत्। 
उत्तरम् : 
प्रसङ्गः - पंक्तिरियं अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य 'परोपकाराय सतां विभूतयः' इति पाठात् उद्धृतः। मूलतः अयं पाठः आर्यशूर विरचितात् 'जातकमाला' इति कथाग्रन्थात् संकलितः। अत्र लेखकः बोधिसत्त्वस्य परहित दयार्द्रतां वर्णयति 
(यह पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक के 'परोपकाराय सतां विभूतयः' पाठ से ली गई है। मूलतः यह पाठ आर्यशूर विरचित 'जातकमाला' कथाग्रन्थ से संकलित किया गया है। यहाँ लेखक बोधिसत्त्व की परहित दयार्द्रता का वर्णन करता है -
(अनेक पूर्व जन्मों में परहित कार्य अनवरत रूप से सम्पादित करने के कारण अभ्यस्त हुये ये बोधिसत्त्व, उस जन्म में अर्थात् मत्स्याधिपति के जन्म में रहकर परोपकाररत हो गये तथा उनके (मछलियों के) सुख साधन जुटने में संलग्न हो गये।) 
(ख)अस्मद् व्यसनसकृष्टाः समायान्ति नो द्विषः।। 
उत्तरम् : 
प्रसङ्गः - पंक्तिरियं अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य 'परोपकाराय सतां विभूतयः' पाठात् अवतरितः। मूलतोऽयं पाठः आर्यशूर विरचितात् 'जातकमाला' इति कथाग्रन्थात् संकलितः। अस्मिन् वाक्ये बोधिसत्त्वः कथयति यत् मानवः स्वकर्मणां फलं अवश्यमेव भुङ्क्ते। 
(यह पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक के 'परोपकाराय सतां विभूतयः' पाठ से ली गई है। मूल रूप से यह पाठ आर्यशूर विरचित 'जातकमाला' कथाग्रन्थ से संकलित है। इस वाक्य में बोधिसत्व कहता है कि मनुष्य अपने कर्मों के फल अवश्य भोगता है।) 
(हमारे पापकर्मों से ही खींचे हुये हमारे शत्रु इति भीति आदि (दु:ख) सभी ओर से आते हैं। अर्थात् मानव अपने किये हुये कर्मों का फल अवश्य भोगता है।)
 (ग)शीलवताम् इह एव कल्याणा: अभिप्रायाः वृद्धिम् आप्नुवन्ति। 
उत्तरम् : 
प्रसङ्गः - इयं पंक्तिः अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य 'परोपकाराय सतां विभूतयः' पाठात् अवतरिता। अस्यां पंक्तौ बोधिसत्वः मानवेभ्यः उपदिशति 
(यह पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक के 'परोपकाराय सतां विभूतयः' पाठ से ली गई है। इस पंक्ति में बोधिसत्त्व मनुष्यों को उपदेश दे रहे हैं।) 
(जो मनुष्य चरित्रवान् हैं, सदाचारशील हैं, वे इस संसार में ही कल्याणकारी मनोरथों की वृद्धि को प्राप्त करते हैं। भाव यह है कि मानव अपने कर्मों का फल यहीं पर इसी जन्म में तथा इसी लोक में प्राप्त करता है।) 
4.अधोलिखित शब्दानां ल्यबन्तेषु शतृ प्रत्ययान्तेषु शानच प्रत्ययान्तेषु च विभज्य लिखत 
आपीयमानम्, अवेक्ष्य, स्पर्धमानम्, समापीड्यमानम्, नि:श्वस्य, रत्नायमानानि, अभिगम्य, संराधयन्, विमृशन्, समुल्लोकयन्।
उत्तरम् : 
ल्यबन्त -अवेक्ष्य = अव + ईक्ष् + ल्यप् निःश्वस्य 
निः + श्वस् + ल्यप् 
अभिगम्य = अभि + गम् + ल्यप्। 
संराधयन् = सम् + राध् + शतृ 
विमृशन् = वि + मृश् + शतृ 
समुल्लोकयन् = सम् + उत् + लोक् + शतृ 
आपीयमानम् = आ + पा + शानच्। 
स्पर्धमानम् = स्पर्ध + शानच्। 
समापीड्यमानम् = सम् + आङ् + पीड् + शानच्। 
रत्नायमानानि = रत्नाय + शानच्। 
5.विशेषणानि विशेष्यै सह योजयत 
(क) सरसि - इष्टानाम् 
(ख) धरण्या - कदम्बकुसुमभारेण 
(ग) अपत्यानाम् - हंसचक्रवाकादि शोभिते 
(घ) नवसलिलेन - अभितप्तया 
(ङ) पक्षिणः - ज्वालानुगतेन
(च) बोधिसत्त्वः - तत्रस्थाः 
(छ) मीनाः - सलिलतीरवासिनः 
(ज) मारुतेन - करुणायमानः 
उत्तरम् :  
(क) सरसि - हंसचक्रवाकादि शोभिते 
(ख) धरण्या - अभितप्तया 
(ग) अपत्यानाम् - इष्टानाम् 
(घ) नवसलिलेन - कदम्बकुसुमगौरेण 
(ङ) पक्षिणः - सलिलतीरवासिनः 
(च) बोधिसत्त्वः - करुणायमानः 
(छ) मीनाः - तत्रस्थाः 
(ज) मारुतेन - ज्वालानुगतेन 
6.अधोलिखित पदानि संस्कृत वाक्येषु प्रयुध्वम् - 
कस्मिंश्चित्, भाग्यवैकल्यात्, आपीयमानम्, लक्ष्यते, विमृशन्, अभिगम्य, प्रयतितव्यम्। 
उत्तरम् : 
 कस्मिंश्चित् वने एकः सिंहः वसति स्म।
 प्राणिनाम् भाग्यवैकल्यात् देवो न ववर्ष।
 प्रत्यहम् आपीयमानम् तत् सरः शुष्कमभवत्। 
अस्मात् स्थानात् तत् चित्रं न लक्ष्यते। 
अस्मिन् विषये विमृशन् सः सुप्तः। 
देवराजः साक्षात् अभिगम्य बोधिसत्त्वं उवाच। 
अस्माभिः अस्मिन् विषये प्रयतितव्यम्।
प्रश्न: 4. 
शतृ प्रत्ययान्त -
शानच् प्रत्ययान्त -
प्रश्नः 5. 
प्रश्नः 6. 
प्रश्नः 7. पर्यायवाचकं लिखत 
मीनः, पक्षी, प्रत्यहम्, आपद्, पजेन्यः।
उत्तरम् :  
शब्द - पर्याय 
  • मीनः = मत्स्यः, झषः। 
  • पक्षी = खगः, शकुन्तः। 
  • प्रत्यहम् = प्रतिदिनम्। 
  • आपद् = विपद्, विपत्तिः। 
  • पर्जन्यः = मेघः, वारिधरः, वारिदः। 

प्रश्नः 8. 
अधोलिखित वाक्येषु उपमानानि योजयत -
(क) .......... इव मीनानां परमानुग्रहं चकार। 
(ख) ........... इव तोयं प्रत्यहं क्षीयते। 
(ग) ............. इव इमे पयोदाः क्षरन्ति। 
(घ) .......... इव नवसलिलेन सरः प जातम्। 
(ङ) सरः ग्रीष्मकाले ............... इव सञ्जातम्। 
उत्तरम् : 
(क) इष्टानाम् 
(ख) आयुषा 
(ग) आवर्जिताः कलशाः 
(घ) कदम्बकुसुमगौरेण 

(ङ) लघुपल्वलम्।
संस्कृतभाषया उत्तरम् दीयताम् -
प्रश्न: 1. जातककथाः मूलतः कस्यां भाषायां सन्ति? 
उत्तरम् : जातककथा: मूलतः पालिभाषायां सन्ति। 
प्रश्नः 2. 'परोपकाराय सतां विभूतयः पाठः कस्य जातकस्य संक्षेपः वर्तते? 
उत्तरम् :'परोपकाराय सतां विभूतयः पाठः 'मत्स्यजातकस्य' संक्षेपः वर्तते। 

प्रश्न: 3. 
बोधिसत्त्वस्य जीवनं कीदृशं अस्ति? 
उत्तरम् : 
बोधिसत्त्वस्य जीवनं अलौकिकं आदर्शश्चास्ति। 

प्रश्न: 4. 
सत्त्वानां भाग्यवैकल्यात् किं अभवत्? 
उत्तरम् : 
सत्त्वानां भाग्यवैकल्यात् प्रमादाच्च देवो सम्यक् न ववर्ष। 

प्रश्नः 5. 
जलाभावात् तत्रस्थिताः मीनाः कथं संजाता? 
उत्तरम् : 
जलाभावात् तत्रस्थिताः मीनाः मृतप्रायाः इव संजाताः। 

प्रश्नः 6.
सः महात्मा तेषां मीनानां रक्षणोपायं किं अमन्यत? 
उत्तरम् : 
सः महात्मा तेषां मीनानां रक्षणोपायं स्वकीयसत्यतपोबलमेव अमन्यत। 

प्रश्नः 7. 
सत्त्वगुणैः परिपूर्णं आचरणं कान् अपि वशीकर्तुम् शक्यते? 
उत्तरम् : 
सत्त्वगुणैः परिपूर्णं आचरणं देवान् अपि वशीकर्तुं शक्यते। 

प्रश्न: 8. 
बोधिसत्त्वस्य प्रार्थनां श्रुत्वा तत्र को आगतवान्? 
उत्तरम् : 
बोधिसत्त्वस्य प्रार्थनां श्रुत्वा तत्र देवानां इन्द्रः शक्रः आगतवान्। 

प्रश्नः 9. 
प्रियवचनैः संराध्य तत्रैव को अन्तर्दधे? 
उत्तरम् : 
प्रियवचनैः संराध्य तत्रैव इन्द्रः अन्तर्दधे। 

प्रश्न: 10.
केषां इह एव कल्याणा: अभिप्रायाः वृद्धिम् आप्नुवन्ति? 
उत्तरम् : 
शीलवताम् इह एव कल्याणा: अभिप्रायाः वृद्धिम् आप्नुवन्ति। 

प्रश्न: 11. 
विषाद दैन्यवशगं मीनकुलमवेक्ष्य कः चिन्तामापेदे? 
उत्तरम् : 
विषाद दैन्यवशगं मीनकुलमवेक्ष्य बोधिसत्त्वः करुणायमानः चिन्तामापेदे। 

प्रश्न: 12. 
संस्कृतसाहित्ये कासां विशेषमहत्त्वमस्ति? 
उत्तरम् : 
संस्कृतसाहित्ये जातककथानां विशेषमहत्त्वमस्ति। 


ऋतुचित्रणम्

                                                                                                              ऋतुचित्रणम्

          प्रस्तुत पाठ आदिकवि महर्षि वाल्मीकिकृत रामायण के किष्किन्धा, अरण्य तथा सुन्दर काण्डों से संकलित है। रामायण संस्कृत साहित्य का आदि महाकाव्य माना जाता है। इस ग्रन्थ का सांस्कृतिक महत्त्व बहुत अधिक है। इसमें महर्षि वाल्मीकि ने जीवन के आदर्शभूत और शाश्वत मूल्यों का निर्देश किया है। इसमें राजा, प्रजा, पुत्र, माता, पत्नी, पति, सेवक आदि के पारस्परिक संबन्धों का एक आदर्श स्वरूप प्रस्तुत किया गया है। इस महाकाव्य में वाल्मीकि का प्रकृति-चित्रण अत्यन्त मनोरम एवं हृदयाकर्षक है।
       इस पाठ में 1-3 श्लोकों में वसन्त ऋतु का, 4-6 श्लोकों में वर्षा ऋतु का, 7वें एवं 8वें श्लोक में शरद् ऋतु का, नवम में हेमन्त तथा दशम में शिशिर ऋतु का और एकादश में चन्द्रोदय का विशद एवं मनोहारी वर्णन किया गया है।
वाल्मीकिरामायणकिष्किन्धाकाण्डः - 1.10, 9, 13-
1.सुखानिलोऽयं सौमित्रे! कालः प्रचुरमन्मथः ।
 गन्धवान् सुरभिर्मासो जातपुष्पफलद्रुमः ॥1॥ 
अन्वयः - सौमित्रे! सुखानिलः गन्धवान् जातपुष्पफलद्रुमः प्रचुरमन्मथः अयं कालः सुरभिः मासः॥1॥
अर्थ एवं शब्दार्थ-
सौमित्रे!=सुमित्रा के पुत्र हे लक्ष्मण !  
सुखानिलः=सुख देने वाली हवा  
गन्धवान्=सुगन्ध से युक्त  
जातपुष्पफलद्रुमः=उत्पन्न हुये फूलों,फलों तथा वृक्षों वाला,  
प्रचुरमन्मथः=सुन्दरता की अधिकता वाला,  
अयं कालः= यह समय 
सुरभिः=वसन्त ऋतु का  
मासः=मास है। 
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - हे सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण! सुख प्रदान करने वाली हवा को देने वाला, सुगन्ध प्रदान करने वाला, उत्पन्न हुए फूलों, फलों वाले वृक्षों वाला, कामदेव के आधिक्य को व्यक्त करने वाला, यह वसन्त ऋतु का समय है। फलों से परिपूर्ण, कामदेव की अधिकता-ये सभी विशेषण वसन्त ऋतु के द्योतक हैं। 
विशेष - यहाँ वसन्त ऋतु का मनोहारी चित्रण किया गया है। वसन्त ऋतु में सुख देने वाली एवं सुगन्धित वायु बहती है, कामभाव में वृद्धि होती है तथा वृक्षों पर पुष्प एवं फल उत्पन्न होते हैं। सभी जगह सुगन्धित एवं रमणीय वातावरण हो जाता है। 
पुष्पभारसमृद्धानि शिखराणि समन्ततः।
 लताभिः पुष्पिताग्राभिरुपगूढानि सर्वतः ॥2॥ 
अन्वयः - समन्ततः पुष्पभार समृद्धानि सर्वतः पुष्पिताग्राभिः लताभिः उपगूढानि शिखराणि (सन्ति) ॥2॥
अर्थ एवं शब्दार्थ-
समन्ततः=चारों ओर
 पुष्पभार= फलों के भार से 
 समृद्धानि=समृद्ध
 सर्वतः= सब ओर से
पुष्पिताग्राभिः=खिले हुए फूलों वाली
 लताभिः=लताओं से
 उपगूढानि=भरी हुई 
शिखराणि=पहाड़ों की चोटियाँ
 (सन्ति)=(दिखाई दे रही) हैं।  
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - इस वसन्त ऋतु में चारों ओर से फूलों के भार से समृद्ध (परिपूर्ण), सब ओर से खिले हुए फूलों वाली लताओं से भरी हुई पहाड़ों की चोटियाँ दिखाई दे रही हैं। 
विशेष - यहाँ वसन्तकालीन पर्वतों की शोभा का यथार्थ व सुन्दर चित्रण किया गया है। 
3.पतितैः पतमानैश्च पादपस्थैश्च मारुतः । 
कुसुमैः पश्य सौमित्रे! क्रीडन्निव समन्ततः ॥3॥ 
अन्वयः - सौमित्रे! पश्य, समन्ततः पतितैः पतमानैः च पादपस्थै च कुसुमैः क्रीडन् इव मारुतः (अस्ति)॥3॥
अर्थ एवं शब्दार्थ- 
सौमित्रे!=हे लक्ष्मण! 
 पश्य= देखो,
समन्ततः=चारों ओर से 
पतितैः= गिरे हुए 
पतमानैः च=गिरते हुये 
पादपस्थै च=पेड़ों पर स्थित
 कुसुमैः=पुष्पों से 
क्रीडन् इव=मानो खेलता हुआ सा 
मारुतः (अस्ति)=वायु है।
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - हे लक्ष्मण! देखो, (इस वसन्त ऋतु में) चारों ओर से गिरे हुए तथा गिरते हुए एवं पेड़ों पर विद्यमान फूलों से मानो क्रीड़ा करता हुआ पवन विद्यमान है। 
विशेष - यहाँ पम्पासरोवर पर वसन्तकालीन वायु का रमणीय वर्णन किया गया है।
रामायणकिष्किन्धाकाण्ड:- 28.17, 22, 26  
4. क्वचित्प्रकाशं क्वचिदप्रकाशं नभः प्रकीर्णाम्बुधरं विभाति।
 क्वचित्क्वचित्पर्वतसन्निरुद्धं रूपं यथा शान्तमहार्णवस्य ॥4॥
अन्वयः - क्वचित् प्रकाशम् क्वचित् अप्रकाशम् प्रकीर्ण अम्बुधरम् नभः विभाति। क्वचित्-क्वचित् शान्तमहार्णवस्य यथा पर्वतसन्निरुद्धं रूपम् (विभाति)॥4॥
अर्थ एवं शब्दार्थ-
(वर्षा ऋतु में)
क्वचित्=कहीं पर 
प्रकाशम्=उजाला (तथा) 
क्वचित्=कहीं पर 
अप्रकाशम्= अंधेरा 
प्रकीर्ण=फैले हुए हैं। 
अम्बुधरम्=बादल 
नभः=आकाश (को) 
विभाति=शोभा दे रहा है। (तथा)
क्वचित्-क्वचित्=कहीं-कहीं पर 
शान्तमहार्णवस्य=महासमुद्र के 
यथा=जैसा 
पर्वतसन्निरुद्धं=पर्वतों से घिरे हुए 
रूपम्=रूप को 
(विभाति)=धारण किये हुए है। । 
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - (वर्षा ऋतु में) कहीं पर प्रकाश (उजाला) है तो कहीं पर अप्रकाश (अन्धेरा) है। जिसमें सर्वत्र बादल फैले हुए हैं, ऐसा आकाश शोभा दे रहा है। कहीं-कहीं पर शान्त महासागर के समान पर्वतों से घिरे हुए रूप को धारण किये हुए है। भाव यह है कि समुद्र का स्वरूप वर्षा ऋतु में ऐसा हो जाता है, जैसे कि वह पहाड़ों से घिरा हुआ हो। 
5.समुद्वहन्तः सलिलाऽतिभारं बलाकिनो वारिधरा नदन्तः ।
 महत्सु शृङ्गेषु महीधराणां विश्रम्य विश्रम्य पुनः प्रयान्ति ॥5॥
अन्वयः - सलिल अतिभारं सम् उद्वहन्तः बलाकिनः वारिधराः नदन्तः महीधराणाम् महत्सु शृङ्गेषु विश्रम्य विश्रम्य पुनः प्रयान्ति॥5॥ 
अर्थ एवं शब्दार्थ-
 सलिल= जल के
अतिभारं=अत्यधिक भार को 
सम् उद्वहन्तः=धारण करते हुए
बलाकिनः=बगुलों से युक्त
 वारिधराः=बादल 
नदन्तः=गर्जना करते हुए 
महीधराणाम्=पर्वतों की 
महत्सु=बड़ी-बड़ी 
शृङ्गेषु=चोटियों पर 
विश्रम्य=विश्राम करके 
विश्रम्य=कर-करके  
पुनः= पुनः
प्रयान्ति=चल पड़ते हैं।
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - पानी के अत्यधिक भार को वहन करते हुए बगुलों से युक्त बादल, गर्जना करते हुए पर्वतों की बड़ी-बड़ी चोटियों पर विश्राम कर-करके (पुनः) (आकाश की ओर) चल पड़ते हैं। 
विशेष - यहाँ वर्षाकाल में आकाश में उमड़ते हुए बादलों की शोभा का सुन्दर एवं यथार्थ वर्णन किया गया है। 
6.वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति भान्ति ध्यायन्ति नृत्यन्ति समाश्वसन्ति ।
नद्यो घना मत्तगजा वनान्ताः प्रियाविहीनाः शिखिनः प्लवङ्गाः॥6॥ 
अन्वयः - नद्यः वहन्ति, घनाः वर्षन्ति, मत्तगजाः नदन्ति, वनान्ताः भान्ति, प्रियाविहीनाः ध्यायन्ति, शिखिनः नृत्यन्ति, प्लवङ्गाः समाश्वसन्ति ॥ 6॥
अर्थ एवं शब्दार्थ-
(वर्षा ऋतु में)
नद्यः=नदियाँ 
वहन्ति=बहती हैं,
 घनाः=बादल
 वर्षन्ति=वर्षा करते हैं,
 मत्तगजाः=मतवाले हाथी 
नदन्ति=चिंघाड़ते हैं,
वनान्ताः=वन प्रदेश के भाग
भान्ति=शोभित हो रहे हैं,
प्रियाविहीनाः=अपनी प्रियाओं से वियुक्त जन
 ध्यायन्ति=ध्यान करके उन्हें याद करते हैं,
 शिखिनः=मोर
 नृत्यन्ति=नाचते हैं तथा
 प्लवङ्गाः=मेंढक 
समाश्वसन्ति=प्रसन्न होते हैं।  
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - वर्षा ऋतु में नदियाँ बहती हैं। बादल वर्षा करते हैं। मदमस्त हाथी चिंघाड़ते हैं। वन प्रदेश के भाग सुशोभित होते हैं। अपनी प्रियाओं से वियुक्त जन ध्यान करके उन्हें याद करते हैं। मोर नाचते हैं। मेंढक प्रसन्न होते हैं। 
विशेष - यहाँ वर्षाकाल में प्रसन्नचित्त पशु-पक्षी, प्रकृति व मानव-हृदय का दृश्य उपस्थित किया गया है।
7. जलं प्रसन्नं कुसुमप्रहासं क्रौञ्चस्वनं शालिवनं विपक्वम् । 
मृदुश्च वायुर्विमलश्च चन्द्रः शंसन्ति वर्षव्यपनीतकालम् ॥7॥ 
अन्वयः - कुसुमप्रहासम् प्रसन्नम् जलम्, क्रौञ्चस्वनम्, विपक्वम् शालिवनम्, मृदुः वायुः च विमलः चन्द्रः च वर्षव्यपनीतकालं शंसन्ति ॥7॥
अर्थ एवं शब्दार्थ- 
कुसुमप्रहासम्=खिले हुए फूलों से युक्त 
प्रसन्नम्=स्वच्छ 
जलम्= जल, 
क्रौञ्चस्वनम्=क्रौञ्च पक्षी की आवाज,
विपक्वम्=पका हुआ 
शालिवनम्=धान का खेत एवं
मृदुः वायुः च=कोमल पवन तथा
विमलः चन्द्रः च=स्वच्छ चन्द्रमा 
वर्षव्यपनीतकालं=वर्षा ऋतु व्यतीत होने के समय को 
शंसन्ति=बतला रहे हैं।
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - खिले हुए फूलों से युक्त स्वच्छ जल, क्रौञ्च पक्षी की आवाज, पका हुआ धान का खेत, कोमल शीतल पवन एवं स्वच्छ चन्द्रमा-वर्षा ऋतु व्यतीत होने के बाद आने वाली शरद् ऋतु की सूचना दे रहे हैं अर्थात् ये सभी दृश्य शरद् ऋतु के आगमन के सूचक हैं। 
विशेष - यहाँ कवि ने वर्षाकाल के समाप्त होने के बाद शरद् ऋतु के आगमन पर प्रकृति के स्वरूप का सुन्दर एवं यथार्थ चित्रण किया है। 
लोकं सुवृष्ट्या परितोषयित्वा नदीस्तटाकानि च पूरयित्वा । 
निष्पन्नशस्यां वसुधां च कृत्वा त्यक्त्वा नभस्तोयधराः प्रयाताः ॥8॥
अन्वयः - तोयधराः सुवृष्ट्या लोकं परितोषयित्वा, नदीः तटाकानि च पूरयित्वा, वसुधाम् च निष्पन्नशस्याम् कृत्वा, नभः त्यक्त्वा प्रयाताः॥8॥
अर्थ एवं शब्दार्थ-
तोयधराः= बादल 
सुवृष्ट्या=अच्छी वर्षा से 
लोकं=संसार के प्राणियों को 
परितोषयित्वा=सन्तष्ट करके
नदीः=नदियों एवं  
तटाकानि =तालाबों को 
पूरयित्वा=भरकर
वसुधाम् च=पृथ्वी को 
निष्पन्नशस्याम्=खेती-बाड़ी का कार्य सम्पन्न होने वाली  
कृत्वा=बनाकर
नभः=आकाश को 
त्यक्त्वा= छोड़कर 
प्रयाताः=चले गये हैं।
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - बादल अच्छी वर्षा से संसार के प्राणियों को संतुष्ट करके, नदियों एवं तालाबों को भरकर तथा पृथ्वी को खेती-बाड़ी का कार्य सम्पन्न होने वाली बनाकर, आकाश को छोड़कर चले गये हैं। अर्थात् वर्षा ऋतु की समाप्ति हो गई है तथा शरद् का आगमन हो गया है। 
वाल्मीकिरामायणकिष्किन्धाकाण्डः - 30, 53, 57
9. रविसङ्क्रान्तसौभाग्यस्तुषारारुणमण्डलः ।
निःश्वासान्ध इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते ॥9॥
अन्वयः - रविसङ्क्रान्तसौभाग्यः तुषार अरुणमण्डल: निःश्वास-अन्ध: आदर्श इव चन्द्रमा न प्रकाशते॥
अर्थ एवं शब्दार्थ-
रविसङ्क्रान्तसौभाग्यः=सर्य के द्वारा जिसका प्रकाश मलिन कर दिया गया है
 तुषार=तुषार से 
अरुणमण्डल:=जिसका मण्डल अरुण वर्ण का कर दिया गया है(तथा) 
निःश्वास-अन्ध:=श्वास से मलिन किये गये
 आदर्श इव=दर्पण के समान 
चन्द्रमा =चन्द्रमा 
न प्रकाशते=प्रकाशित नहीं हो रहा है। 
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - सूर्य के द्वारा जिसका प्रकाश मलिन कर दिया गया है, तुषार से जिसका मण्डल (घेरा) अरुण वर्ण का कर दिया गया है (इस प्रकार का) तथा श्वास से मलिन किये गये दर्पण के समान चन्द्रमा प्रकाशित नहीं हो रहा है अर्थात् हेमन्त ऋतु में चन्द्रमा की कान्ति फीकी पड़ गई है।
वाल्मीकिरामायणम्, अरण्यकाण्ड: - 16, 9,13,24  
10.वाष्पसञ्छन्नसलिला रुतविज्ञेयसारसाः ।
हिमाईबालुकास्तीरैः सरितो भान्ति साम्प्रतम् ॥10॥
अन्वयः - साम्प्रतम् वाष्पसञ्छन्नसलिला: रुतविज्ञेयसारसाः हिमाद्रबालुकाः सरितः तीरैः भान्ति।
अर्थ एवं शब्दार्थ-
साम्प्रतम्=इस समय (अर्थात् शिशिर ऋतु में)
 वाष्पसञ्छन्नसलिला:=भाप से ढके हुए जल वाली
सारसाः=सारसों की 
रुत=ध्वनि से
विज्ञेय=विशेष रूप से जानने योग्य 
हिमाद्रबालुकाः=बर्फ से शीतल गीली रेत वाली  
सरितः=नदियाँ 
तीरैः=(अपने) किनारों से 
भान्ति=प्रतीत हो रही हैं।
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - इस समय अर्थात् शिशिर ऋतु में भाप से ढके हुए जल वाली, सारसों की आवाज से विशेष रूप से जानने योग्य, बर्फ से शीतल गीली रेत वाली नदियाँ (अपने) किनारों से प्रतीत हो रही हैं।
विशेष - यहाँ नदियों पर शिशिर ऋतु के प्रभाव का सुन्दर एवं स्वाभाविक चित्रण हुआ है। नदियों में जल दिखलाई नहीं देता है, अपितु बर्फ से उठती हुई भाप ही दिखाई देती है।
वाल्मीकिरामायणसुन्दरकाण्ड:-5,4 
11.हंसो यथा राजतपञ्जरस्थः
सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः।
वीरो यथा गर्वितकुञ्जरस्थ-
श्चन्द्रोऽपि बभ्राज तथाम्बरस्थः ॥11॥
अन्वयः - यथा हंसः राजतपञ्जरस्थः, यथा सिंहः मन्दरकन्दरस्थः, यथा वीरः गर्वितकुञ्जरस्थः च, तथा अम्बरस्थ: चन्द्रः अपि बभ्राज॥ 
अर्थ एवं शब्दार्थ-
यथा हंसः=जिस प्रकार हंस
राजतपञ्जरस्थः=चाँदी के पिंजरे में स्थित (होकर शोभित होता है), 
यथा सिंहः=जिस प्रकार सिंह
मन्दरकन्दरस्थः=मन्दराचल की कन्दरा में स्थित (होकर शोभित होता है)
यथा वीरः=जिस प्रकार
 गर्वितकुञ्जरस्थः च=गर्व से युक्त हाथियों में स्थित (होकर शोभित होता है)
 तथा अम्बरस्थ:=उसी प्रकार आकाश में स्थित
 चन्द्रः अपि=चन्द्रमा भी
 बभ्राज=सुशोभित हो रहा था।
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - जिस प्रकार चाँदी के पिंजरे में स्थित हंस शोभित होता है, जिस तरह मन्दर पर्वत की कन्दरा (गुफा) में स्थित शेर शोभित होता है और जिस प्रकार गर्व से परिपूर्ण हाथी की पीठ पर वीर स्थिर होकर शोभित होता है, उसी प्रकार (उदित होता हुआ) चन्द्रमा आकाश के मध्य में शोभित हो रहा था। .
 विशेष - यहाँ शिशिर ऋतु में आकाश में स्थित धवल चन्द्रमा की शोभा का विविध उपमानों से सुन्दर चित्रण किया गया है। 
अभ्यासः
उत्तरम्-
प्रश्न: 1.
संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् - 
(क) अयं पाठः कस्मात् ग्रन्थात् संकलितः? 
उत्तरम्- 
अयं पाठः महर्षिः वाल्मीके: रामायणात् संकलितः।
(ख) वसन्ते समन्ततः गिरिशिखराणि कीदृशानि भवन्ति? 
उत्तरम्-  
वसन्ते समन्ततः गिरिशिखराणि पुष्पभारसमृद्धानि भवन्ति। 
ऋतुचित्रणम्
(ग) मारुतः कीदृशैः कुसुमैः क्रीडन्निव अवलोक्यते? 
उत्तरम्-: 
मारुतः पतितैः पतमानैश्च पादपस्थैश्च कुसुमैः क्रीडन्निव अवलोक्यते। 
(घ) प्रकीर्णाम्बुधरं नभः कथं विभाति? 
उत्तरम्- 
प्रकीर्णाम्बुधरं नभः क्वचित् प्रकाशं क्वचिद प्रकाशं विभाति। 
(ङ) कस्यातिभारं समुद्वहन्तः वारिधराः प्रयान्ति? 
उत्तरम्-
सलिलातिभारं समुद्वहन्तः वारिधराः प्रयान्ति। 
(च) वर्षर्तौ मत्तगजाः किं कुर्वन्ति?
उत्तरम्-
वर्षों मत्तगजाः नदन्ति। 
(छ) शरदृतौ चन्द्रः कीदृशो भवति? 
उत्तरम्-
शरदृतौ चन्द्रः विमल: भवति। 
(ज) कानि पूरयित्वा तोयधराः प्रयाताः? 
उत्तरम्-
नदी: तटाकानि च पूरयित्वा तोयधराः प्रयाताः। 
(झ) अस्मिन् पाठे 'तोयधराः' इत्यस्य के के पर्यायाः प्रयुक्ताः? 
उत्तरम्-
अस्मिन् पाठे 'तोयधराः' इत्यस्य अंबुधराः, वारिधराः, घनाः च एते पर्यायाः प्रयुक्ताः।
(ञ) कीदृशः आदर्शः न प्रकाशते? 
उत्तरम्- 
निःश्वासान्धः आदर्श: न प्रकाशते। 
(ट) शिशिरौ सरितः कैः भान्ति? 
उत्तरम्- 
शिशिरौ सरितः हिमाद्रबालुकास्तीरैः भान्ति। 
प्रश्नः 2. 
रिक्तस्थानानि पुरयत - 
(क) समन्ततः .............. शिखराणि सन्ति। 
उत्तरम्-
समन्ततः पुष्यभारसमृद्धानि शिखराणि सन्ति।
(ख) नभः ......................"विभाति। 
उत्तरम्-
नभः प्रकीर्णाम्बुधरम् विभाति। 
(ग) वारिधराः महीधराणां शृङ्गेषु. प्रयान्ति। 
उत्तरम्- 
वारिधराः महीधराणां शृङ्गेषु विश्रम्य पुनः प्रयान्ति।
(घ) तोयधरा:..........प्रयाताः। 
उत्तरम्- 
तोयधराः नभः त्यक्त्वा प्रयाताः।
(ङ) नि:श्वासान्धः आदर्श इव ....................... 'न प्रकाशते। 
उत्तरम्-
निःश्वासान्धः आदर्श इव चन्द्रमा न प्रकाशते। 
प्रश्न: 3. 
अधोलिखितानां सप्रसङ्ग व्याख्या कार्या - 
(क) मारुतः कुसुमैः पश्य सौमित्रे ! क्रीडन्निव समन्ततः। 
अन्वयः - श्लोकांशोऽयं अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य 'ऋतुचित्रणम्' इति पाठात् उद्धृतः। मूलतः एषः पाठः वाल्मीकि विरचितात् रामायण महाकाव्यात् संकलितोऽस्ति। अस्यां पंक्तौ सीता वियुक्तः श्रीरामः लक्ष्मणं वसन्तऋतोः दृश्यं वर्णयन् कथयति 
व्याख्या - सौमित्रे! = हे सुमित्रानन्दन! पश्य = इत:वीक्ष मारुतः = अयं वायुः, समन्ततः = सर्वतः, कुसुमैः = पुष्पैः सह, क्रीडन् इव = क्रीडति यथा प्रतीयते। इदं दृश्य इत्थं शोभते यत् पवनः पुष्पैः सार्द्ध क्रीडतीव। 
(हे लक्ष्मण! इधर देखो, यह वायु सभी ओर से फूलों के साथ जैसे खेल रही है, ऐसा प्रतीत होता है। यह दृश्य ऐसा सुशोभित हो रहा है कि हवा पुष्पों के साथ मानो खेल खेल रही है।) 
विशेषः - क्रीडन्निव-इत्यत्र उपमाऽलंकारः। 
(ख) निःश्वासान्धः इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते। 
अन्वयः - अयं श्लोकांशः अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य 'ऋतुचित्रणम्' इति पाठात् उद्धृतः। अस्यां पंक्तौ गोदावरी रीति नद्यास्तरे पञ्चवट्यां रामानुजः लक्ष्मणः स्वाग्रज हेमन्त ऋतोः वर्णनं करोति -
व्याख्या - नि:श्वासान्धः दीर्घ निःश्वासेन, अन्धः = मलिनः, आदर्श इव = दर्पणवत्, चन्द्रमा = शशिः, न प्रकाशते = न शोभते। भावोऽयं यत् यथा दीर्घ निःश्वासेन निसतेन वाष्पेण अन्धः मलिनः दर्पणः न शोभते तथैव शशिः अपि सूर्येण आक्रान्तः हिमकणैः च मलिनः न शोभते। 
(दीर्घ निःश्वास से मलीन दर्पण के समान चन्द्रमा सुशोभित नहीं हो रहा है। भाव यह है कि जैसे लम्बी साँस से निकली हुई भाप से अन्धा (मलिन) हुआ दर्पण शोभा नहीं देता, उसी प्रकार सूर्य द्वारा आक्रान्त हुआ तथा हिमकणों से मलिन हुआ चन्द्रमा शोभा नहीं देता।)। 
प्रश्न: 4. 
प्रकृतिं प्रत्ययं च योजयित्वा पदरचनां कुरुत - 
कृ + क्त्वा (त्वा), क्रीड्+शतृ, गन्ध+मतुप्, सम्+नि+रुध् क्त। 
उत्तरम् : 
कृ + क्त्वा = कृत्वा। भोजनं कृत्वा अहं आपणं गमिष्यामि।
 क्रीड् + शतृ = क्रीडन्। क्रीडन् बालकः अपतत्। 
गन्ध + मतुप् = गन्धवान्। गन्धवान् अयं काल: वसन्त मासः वर्तते। 
सम् + नि + रुध् + क्त = सन्निरुद्धम्। 
शान्तमहार्णवस्य इव पर्वत - सन्निरुद्धं रूपं शोभते। 
प्रश्नः 5. 
प्रकृतिप्रत्ययविभागः क्रियताम् - 
त्यक्त्वा, विश्रम्य, समुद्वहन्तः, पतमानः, हिमवान्। 
उत्तरम्-
प्रश्नः 6. 
अधोलिखितान् शब्दान् आश्रित्य वाक्यरचनां कुरुत - 
क्रीडन्, गन्धवान्, विश्रम्य, पूरयित्वा, नभः, नदन्तः, त्यक्त्वा, साम्प्रतम्, शिखिनः, प्रयाति। 
उत्तरम्-
पवनः पुष्पैः क्रीडन् अस्ति। 
गन्धवान् वायुः वाति। 
अत्र विश्रम्य अहं ग्रामं गमिष्यामि।
तव मनोरथं पूरयित्वा सा गता। 
अद्य नभः विमलं वर्तते। 
नदन्तः मेघाः भयं जनयन्ति। 
बालकः स्वजनकं त्यक्त्वा न गमिष्यति। 
साम्प्रतम् अहं अध्ययनं करिष्यामि। 
शिखिनः वर्षाकाले नृत्यन्ति। 
रमा पाठशाला प्रयाति।
प्रश्नः 7. 
सन्धिं/सन्धिविच्छेदं वा कुरुत -
(क) सुख + अनिलः + अयम् = ....................
(ख) प्रकीर्णाम्बुधरम् = .............. + ............
(ग) क्रीडन् + इव = ................
(घ) चन्द्रोऽपि = .................. + .............
(ङ) नि:श्वास + अन्धः = ..............
उत्तरम्- 
(क) सुखानिलोऽयम्। 
(ख) प्रकीर्ण + अम्बुधरम्।
(ग) क्रीडन्निव। 
(घ) चन्द्रः + अपि। 
(ङ) निःश्वासान्धः। 
प्रश्न: 8. 
अधोलिखितानां कर्तृक्रियापदानां समुचितं मेलनं कुरुत - 
(क) प्लवङ्गाः - नदन्ति 
(ख) वनान्ताः - समाश्वसन्ति 
(ग) शिखिनः - भान्ति 
(घ) नद्यः - ध्यायन्ति 
(ङ) मत्तगजाः - वर्षन्ति 
(च) प्रियाविहीनाः - नृत्यन्ति 
(छ) घनाः - वहन्ति। 
उत्तरम्- 
(क) प्लवङ्गाः - समाश्वसन्ति 
(ख) वनान्ताः - भान्ति 
(ग) शिखिनः - नृत्यन्ति 
(घ) नद्यः - वहन्ति 
(ङ) मत्तगजाः - नदन्ति 
(च) प्रियाविहीनाः - ध्यायन्ति 
(छ) घनाः - वर्षन्ति।
प्रश्नः 9.
अधोलिखितयोः श्लोकयोः अन्वयं प्रदर्शयत - 
(क) समुद्वहन्तः सलिलातिभारं .......... प्रयान्ति। 
(ख) हंसो यथा ............ तथाम्बरस्थः। 
उत्तरम्-
(क) उत्तर के लिए पाठ के पाँचवें श्लोक का अन्वय देखिये। 
(ख) उत्तर के लिए पाठ के ग्यारहवें श्लोक का अन्वय देखिये। 
प्रश्नः 10. 
अधोलिखितेषु श्लोकेषु प्रयुक्तालङ्काराणां निर्देशं कुरुत - 
(क) पतितैः पतमानैश्च .......... क्रीडन्निव समन्ततः। 
(ख) वहन्ति वर्षन्ति ............. प्लवङ्गाः। 
(ग) रविसङ्क्रान्तः सौभाग्य: ............... चन्द्रमा न प्रकाशते। 
उत्तरम्-
(क) 'प वर्ण' की आवृत्ति होने से इस श्लोक में अनुप्रास अलंकार है। 'क्रीडन्निव' में उत्प्रेक्षा अलंकार 
(ख) इस श्लोक में अनुप्रास तथा यथासंख्य अलंकार हैं। 
(ग) इस श्लोक में उपमा तथा अनुप्रास अलंकार हैं। 
प्रश्नः 11. 
अधोलिखित श्लोकेषु छन्दो निर्देशः कार्य: - 
(क) क्वचित्प्रकाशम् ......... शान्तमहार्णवस्य। 
(ख) हंसो यथा ................ तथाम्बरस्थः। 
(ग) रविसङ्क्रान्त सौभाग्य: ............... न प्रकाशते। 
उत्तरम्- 
(क) इस श्लोक में 'उपजाति' छन्द है।
(ख) इस श्लोक में 'इन्द्रवज्रा' छन्द है। 
(ग) इस श्लोक में 'अनुष्टुप् छन्द है।
संस्कृतभाषया उत्तरम् दीयताम् -
प्रश्न: 1. 
रामायणस्य रचयिता कः? 
उत्तरम् :
रामायणस्य रचयिता वाल्मीकिः अस्ति। 
प्रश्न: 2. 
संस्कृत साहित्यस्य आदि महाकाव्यं किं मन्यते? 
उत्तरम् : 
संस्कृत साहित्यस्य आदि महाकाव्यं रामायणं मन्यते। 
प्रश्न: 3. 
रामायणे प्रकृतिचित्रणं कीदृशं वर्तते? 
उत्तरम् : 
रामायणे प्रकृतिचित्रणं अतिमनोरम हृदयाकर्षकं चास्ति। 
प्रश्न: 4. 
प्रचुरमन्मथः को मास:? 
उत्तरम् : 
प्रचुरमन्मथः वसन्तमासः अस्ति। 
प्रश्नः 5. 
महीधराणाम् महत्सु शृङ्गेषु विश्रम्य विश्रम्य के प्रयान्ति? 
उत्तरम् :
वारिधराः महीधराणां महत्सु शृङ्गेषु विश्रम्य पुनः प्रयान्ति।
प्रश्नः 6. 
वर्षौ प्रियाविहीनाः किं कुर्वन्ति? 
उत्तरम् : 
वर्षौ प्रियाविहीनाः ध्यायन्ति।
प्रश्नः 7. 
कं परिपोषयित्वा तोयधराः प्रयाता? 
उत्तरम् : 
लोकं सुवृष्ट्या परिपोषयित्वा तोयधराः प्रयाताः। 
प्रश्नः 8. 
चन्द्रोदयस्य मनोहारी वर्णनं कस्मिन् श्लोके कृतम्? 
उत्तरम् :
चन्द्रोदयस्य मनोहारी वर्णनं एकादश श्लोके कृतम्। 
प्रश्न: 9. 
साम्प्रतम् सरितो कथं कैः भान्ति? 
उत्तरम् : 
साम्प्रतम् हिमाबालुकास्तीरैः सरितो भान्ति। 
प्रश्न: 10. 
सिंहो कथं राजते? 
उत्तरम् :
सिंहो मन्दरकन्दरस्य: राजते। 
प्रश्न: 11.
कविषु आदिकविः कः कथ्यते? 
उत्तरम् : 
कविषु आदिकविः वाल्मीकिः कथ्यते। 
प्रश्न: 12. 
वीरो कथं राजते? 
उत्तरम् : 
वीरो गर्वितकुञ्जरस्थः राजते। 
योग्यता विस्तार पर आधारित प्रश्न -
प्रश्नः 1. 
महाकवि कालिदासेन कस्मिन् काव्ये षड् ऋतूनां वर्णनं कृतम्? 
उत्तरम् : 
महाकवि कालिदासेन 'ऋतुसंहार' काव्ये षण्णाम् ऋतूनां वर्णनं कृतम्। 
प्रश्नः 2. 
षण्णाम् ऋतूनां क्रमेण नामानि लिखत? 
उत्तरम् : 
ग्रीष्म-वर्षा-शरद्-हेमन्त-शिशिर-वसन्ताश्च इमे षड् ऋतवः सन्ति। 
प्रश्न: 3. 
कस्मिन् ऋतौ सूर्यः प्रचण्डः जायते? 
उत्तरम् : 
ग्रीष्म ऋतौ सूर्यः प्रचण्डः जायते। 
प्रश्नः 4.
कास्मन् ऋता शालिः परिपक्व भवति? 
उत्तरम् : 
हेमन्त ऋतौ शालिः परिपक्व भवति। 
प्रश्नः 5. 
कस्मिन् ऋतौ सर्वं चारुतरं प्रतीयते? 
उत्तरम् : 
वसन्तौ सर्वं चारुतरं प्रतीयते।

वेदामृतम्

                           वेदामृतम्

       भारतीय वैदिक वाङ्मय संपूर्ण विश्व का प्राचीनतम वाङ्मय होने के साथ मनुष्य की अंतश्चेतना से फूटी उदात्त कविता का भी प्रथम निदर्शन है। वैदिक काव्य में विश्वशान्ति, विश्वबन्धुत्व, लोकतान्त्रिक मूल्य, निर्भयता तथा राष्ट्रप्रेम का सन्देश भरा पड़ा है जो आज के वातावरण में पहले से भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।
        प्रस्तुत पाठ में वैदिक काव्य का अमृततत्व ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद से संकलित किया गया है। इन कविताओं में अत्यन्त उदात्त एवं अनुकरणीय आदर्श विद्यमान है।
सङ्गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो॒ मनांसि जानताम्। 
दे॒वा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।1।। (ऋग्वेदः 10-191-2)                                           अन्वयः-सम् गच्छध्वम्,सम् वदध्वम्, वः मनांसि सम् जानताम्। यथा पूर्वे देवाः सञ्जानानाः भागम् उपासते।
अर्थ एवं शब्दार्थ-
सम् गच्छध्वम्=(हमसब)एक साथ चलें,
सम् वदध्वम्=एक साथ बोलें,
 वः= तुम्हारे 
मनांसि=मन
 सम् जानताम्=समान रूप से अर्थ को समझें
 यथा=जैसे  
 पूर्वे=प्राचीन काल के 
देवाः=देवगण
 सञ्जानानाः= एकमत होकर
भागम्=अपने-अपने हवि के भाग को
 उपासते=ग्रहण करते हैं।
भावार्थ–हे स्तोताओ ! जिसप्रकार प्राचीन काल में देवता लोग एकमत होकर अपने-अपने हवि के भाग को ग्रहण करते रहे हैं।उसीप्रकार हम सब साथ-साथ मिलकर चलों, साथ-साथ मिलकर बोलें अर्थात् हम सब लोगों की वाणी एक जैसी हो, कथनों में परस्पर विरोध न हो तथा तुम्हारे मन समान रूप से वस्तुस्थिति को समझें।  
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः । 
समानमस्तु वो मनो यथा॑ वः सुसहासति॥2॥ (ऋग्वेदः 10-191-4)
अन्वयः- वः आकूतिः समानी, वः हृदयानि समाना, वः मनः समानमस्तु। यथा वः सुसह असति।
अर्थ एवं शब्दार्थ- 
 वः=तुम्हारे 
आकूतिः=संकल्प या वचन
 समानी=समान हों
 वः=तुम्हारे
हृदयानि= हृदय  
समाना=समान हों
 वः=तुम्हारे 
मनः= मन
समानमस्तु=समान हों
यथा= जिससे
वः=तुम्हारे 
सुसह=संगठन 
असति=अच्छा हो सके। 
भावार्थ–हे सुख समृद्धि और उन्नति के इच्छुक मनुष्यों, तुम्हारे संकल्प एक सा होना चाहिए, तुम्हारे हृदय के अन्तर्भाव समान होने चाहिए,तुम्हारा चिन्तन तथा विचार समान होने चाहिए एवं तुम्हारे लक्ष्य समान होने चाहिए।ऐसा करने से तुम्हारे संगठन अच्छा होगा तथा तुम सभी का कल्याण होगा।
मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । 
माध्वीर्नः स॒न्त्वोषधीः॥3॥                          (ऋग्वेद: 1-90-7)
अन्वयः-ऋतायते वाताः मधु (सन्तु), सिन्धवः मधु क्षरन्ति। नः ओषधीः माध्वीः सन्तु।
अर्थ एवं शब्दार्थ-
(अपने लिए यज्ञ की कामना करने वाले) 
ऋतायते=यजमान के लिए 
वाताः=वायु 
मधु (सन्तु)= माधुर्ययुक्त हों,
 सिन्धवः=समुद्र अथवा नदियाँ
 मधु=  (मीठे) जल
क्षरन्ति=बहायें
(तथा)
 नः= हमारी
ओषधीः=औषधियाँ
माध्वीः=मधुरता से भरी हुई 
सन्तु=हों।
भावार्थ–अपने लिए यज्ञ की कामना करने वाले यजमान के लिए सभी हवायें मधुरता से युक्त हो जाएँ। सभी नदियाँ अथवा समुद्र मीठे जल को प्रवाहित करें। हमारी सभी औषधियाँ मधुरता से युक्त हो जाएँ।।मना करोगे ।
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरङ्गमञ्ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शि॒वसङ्कल्पमस्तु ॥4॥  (यजुर्वेद: 34.1)
अन्वयः- जाग्रतः यत् (मनः) दूरम् उदैति। तथा एव सुप्तस्य तदु दैवम् (मनः) इति। (यत्) ज्योतिषाम् दूरम् गमम् एकं ज्योतिः। मे तत् मनः शिवसंकल्पम् अस्तु 
अर्थ एवं शब्दार्थ-
जाग्रतः= जागते हुए (प्राणी) का
यत् (मनः)= जो मन
दूरम्=दूर 
उदैति=भाग जाता है
तथा एव=यत् (मनः)= जो मन
 सुप्तस्य=सोये हुए (प्राणी) की भी 
तदु=वही दशा होती है। 
(परन्तु वही) 
दैवम् (मनः) इति=दिव्य विज्ञान युक्त  (मन)
 (यत्)=जो  
ज्योतिषाम्=विषयों का प्रकाशन करने वाली इन्द्रियों में
 दूरम्=सर्वाधिक दूर तक
 गमम्=पहुँचने वाली 
एकं=एक 
ज्योतिः=ज्योति है,
 मे तत्=मेरा वह
मनः=मन 
शिवसंकल्पम्= कल्याणकारी विचार वाला 
अस्तु= बने। 
भावार्थ–जागते हुए प्राणी का जो मन दूर भाग जाता है, वैसे ही सोये हुए प्राणी की भी वही दशा होती है। परन्तु वही दिव्य विज्ञान युक्त मन जो विषयों का प्रकाशन करने वाली इन्द्रियों में सर्वाधिक दूरी तक पहुँचाने वाला एक ज्योति है, मेरा वह मन कल्याणकारी, शुभ विचार वाला बने।
तच्चक्षुर्देवहितं पु॒रस्ताच्छुक्रमुच्चरत्
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम् ।
शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतम्
अदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च श॒रदः शतात् ॥5॥  (यजुर्वेद 36-24)                                                     अन्वयः- देवहितं शुक्रं तत् चक्षुः पुरस्तात् उच्चरत्। शतम् शरदः पश्येम, शतम् शरदः जीवेम, शतम् शरदः शृणुयाम, शतम् शरदः प्रब्रवाम, शतम् शरदः अदीनाः स्याम, भूयः च शतात् शरदः।
अर्थ एवं शब्दार्थ-
देवहितम् = देवताओं के हितकारक,
 शुक्रम् = दिव्य तथा चमकीला
तत्=उस(परमब्रह्म)का
 चक्षुः = नेत्र रुपी सूर्य
पुरस्तात् = पूर्व दिशा में 
उच्चरत् = उदित हुआ है।
(उस परमब्रह्म को हम लोग)
 शतम् = सौ
 शरदः = वर्ष तक
पश्येम=देखें,
(हम लोग)
शतम्=सौ
 शरदः=  वर्ष तक
जीवेम=जीवें,
 शतम्=सौ 
शरदः= वर्ष तक 
शृणुयाम = सुनें,
शतम्= सौ
शरदः= वर्ष तक
 प्रब्रवाम = बोलें। 
(तथा) 
शतम्=सौ
शरदः= वर्ष तक
अदीनाः = दीनता से रहित
 स्याम = होवें।
 भूयश्च = पुनः, बार-बार।
शतात्= सौ
शरदः= वर्ष के बाद भी
(हम लोग देखें,जीवें,सुनें तथा दीनता से रहित होवें।)
भावार्थ-जो परमब्रह्म देवताओं के हितकारक दिव्य तथा चमकीला,उस परमब्रह्म का नेत्र रुपी सूर्य पूर्व दिशा में  उदित हुआ है। उसी ब्रह्म को हम लोग सौ वर्ष पर्यन्त देखें, जीवें, सुनें, उसी ब्रह्म का उपदेश करें तथा  उनकी कृपा से सौ वर्ष तक दीनता से रहित होवें।. उसी परमेश्वर की आज्ञा पालन व कृपा से सौ वर्षो के उपरान्त भीहम लोग देखें,जीवें,सुनें तथा दीनता से रहित होवें।
जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसम् नाना॑धर्माणं पृथिवी यथौकसम्।
सहस्रं   धारा   द्रविणस्य   मे   दुहां   ध्रुवेव॑ धेनुरनुपस्फुरन्ती ॥6॥(अथर्ववेदः पृथिवीसूक्तम् 12.1.45)  
अन्वयः-बहुधा विवाचसम् यथौकसम् नानाधर्माणं जनम् बिभ्रती पृथिवी ध्रुवा अनुपस्फुरन्ती धेनुः इव मे द्रविणस्य सहस्रम् धाराः दुहाम् ।
अर्थ एवं शब्दार्थ-
बहुधा = प्रायः 
विवाचसम् = विभिन्न भाषा वाले, 
यथौकसम् = धारण करने वाले घर के समान
 नानाधर्माणं = अनेक धर्मों वाले 
जनम् =लोगों को
बिभ्रती = धारण करती हुई 
पृथिवी = पृथ्वी 
अनुपस्फुरन्ती = न काँपती हुई (तथा)
धुवा = निश्चिल
धेनुः इव मे =खड़ी गाय की तरह
द्रविणस्य = (मेरे लिए )धन की
सहस्रम् धाराः =हजारों धाराओं से
दुहाम् =दुहे गये (दूध की तरह है।)
भावार्थ – विभिन्न भाषा वाले तथा धारण करने वाले घर के समान अनेक धर्मों वाले लोगों को धारण करती हुई पृथ्वी न काँपती हुई तथा निश्चल खड़ी गाय की तरह मेरे लिए धन की हजारों धाराओं से दुहे गये दूध की तरह है। जिस प्रकार अचल होकर खड़ी एक धेनु से हजारों धाराओं वाला दूध निकाला जा सकता है,उसी प्रकार यह पृथ्वी भी अपार सम्पदा को धारण करती हुई भी उसी तरह अटल, स्थिर तथा कम्पन रहित होकर खड़ी है। यह हमारी मातृभूमि नाना भाषा-भाषी तथा नाना कर्तव्य करने वाले मनुष्यों को एक घर के समान धारण करती है, वह लात न मारने वाली गाय के समान प्रसन्न होकर मेरे लिये धन की हजारों धाराओं को दुहे।
अभ्यासः
1. संस्कृतभाषया उत्तरत ।
(क) सङ्गच्छध्वम् इति मन्त्रः कस्मात् वेदात् सङ्कलित: ?
(ख) अस्माकम् आकूतिः कीदृशी स्यात् ?
(ग) अत्र मन्त्रे 'यजमानाय' इति शब्दस्य स्थाने कः शब्दः प्रयुक्तः ?
(घ) अस्मभ्यम् इति कस्य शब्दस्य अर्थः ?
(ङ) ज्योतिषां ज्योतिः कः कथ्यते ?
(च) माध्वी: काः सन्तु ?
(छ) पृथिवीसूक्तं कस्मिन् वेदे विद्यते ?
उत्तरम्-(क)ऋग्वेदात्  (ख)समानी (ग)ऋतायते (घ) नः (ङ)दैवम्(मनः) (च)ओषधीः(छ)अथर्ववेदे
2. अधोलिखितक्रियापदैः सह कर्तृपदानि योजयत ।
(क)......................... सञ्जानानाः उपासते ।
(ख)......................... मधु क्षरन्ति ।
(ग) मे...................... शिवसङ्कल्पम् अस्तु।
(घ)...........................शतं शरद: शृणुयाम ।
उत्तरम्-
(क) देवाः
(ख)सिन्धवः
(ग) मनः
(घ)वयं 
3. शुद्धं विलोमपदं योजयत ।
जाग्रतः                                 वः
नः                                       अदीनाः
दीना:                                  सुप्तस्य
उत्तरम्-
जाग्रतः                                सुप्तस्य
नः                                        वः
दीना:                                  अदीनाः
4. अधोलिखितपदानाम् आशयं हिन्दी-भाषया स्पष्टीकुरुत । 
उपासते, सिन्धवः, सवितः, जाग्रतः, पश्येम।
5.(क) वेदे प्रकल्पितस्य समाजस्य आदर्शस्वरूपम् पञ्चवाक्येषु चित्रयत।
उत्तरम् —
वैदिके समाजे सर्वे जनाः परस्परं प्रेम्णा सह जीवन्ति।सर्वे सत्यं वदन्ति धर्मं च आचरन्ति।
समाजे स्त्री-पुरुषयोः समानः आदरः भवति।
सर्वे जनाः परस्परं सहयोगं कुर्वन्ति।लोककल्याणाय च प्रयतन्ते।एवं वैदिकसमाजः शान्तिमयः, समृद्धः, धर्मप्रधानः च भवति।
(ख) मनसः किं वैशिष्ट्यम्?
 मनः अतीव वेगवान् अस्ति।तत् क्षणमात्रेण सर्वत्र गन्तुं समर्थम् अस्ति।मनः चिन्तनस्य संकल्पस्य च कारणम् अस्ति।मनसा एव ज्ञानस्य ग्रहणं भवति।अतः मनसः संयमः मनुष्यस्य जीवने अत्यन्तम् आवश्यकः अस्ति।
6. पश्येम, शृणुयाम, प्रब्रवाम, इति क्रियापदानि केन इन्द्रियेण सम्बद्धानि ?
उत्तरम्—
पश्येम — चक्षुरिन्द्रियेण (नेत्रेण) सम्बद्धम्।
शृणुयाम — श्रोत्रेन्द्रियेण (कर्णेन) सम्बद्धम्।
प्रब्रवाम — वागिन्द्रियेण (मुखेन / जिह्वया) सम्बद्धम्।
7. अधोलिखितवैदिकक्रियापदानां स्थाने लौकिकक्रियापदानि लिखत ।
 असति, उच्चरत्, दुहाम्।
उत्तरम्—
असति — अस्ति
उच्चरत् — उच्चरति
दुहाम् — दुहाव