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शुक्रवार, 2 मई 2025

संस्कृत साहित्य

 वैदिक साहित्य,दर्शन साहित्य,संस्कृत साहित्य,काव्यशास्त्र,छन्दशास्त्र, पुराणेतिहास,धर्मशास्त्र,अभिलेखशास्त्र, व्याकरण एवं भाषाविज्ञान से सम्बन्धित विषय।

*वैदिक-साहित्य-
(क) वैदिक-साहित्य का सामान्य परिचय-वेदों का काल, मैक्समूलर, ए. वेबर, जैकोबी, बालगंगाधर तिलक, एम. विण्टरनिट्ज, भारतीय परम्परागत विचार,संहिता साहित्य-संवाद सूक्त पुरुरवा-उर्वशी, यम यमी, सरमा-पणि,विश्वामित्र नदी,ब्राह्मण साहित्य,आरण्यक साहित्य,वेदांग शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।  (ख) वैदिक-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन-सूक्तों का अध्ययन-ऋग्वेद-अग्नि (1.1),वरुण (1.25).सूर्य (1.25), इन्द्र (2.12)उषस् (3.61),पर्जन्य (5.83).अक्ष (10.34),ज्ञान (10.71),पुरुष(10.90),पुरुष (10.90). हिरण्यगर्भ (10.121),वाक्(10.125),नासदीय (10.129),शुक्लयजुर्वेद-शिवसंकल्प,अध्याय-34 (1-6),प्रजापति,अध्याय 23 (1-5)अथर्ववेद : राष्ट्राभिवर्धनम् (1.29) काल (10.53),पृथिवी (12.1)                                                         
 ब्राह्मण-साहित्य प्रतिपाद्य विषय, विधि एवं उसके प्रकार,अग्रिहोत्र, अग्रिष्टोम, दर्शपूर्णमास यज्ञ, पंचमहायज्ञ, आख्यान,(शुन:शेप वाङ्मनस)।     
 उपनिषद्-साहित्य : उपनिषदों की विषयवस्तु तथा प्रमुख अवधारणाओं का अध्ययन ईश, कठ, केन, बृहदारण्यक,तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर।       
 वैदिक व्याकरण,निरुक्त एवं वैदिक व्याख्या पद्धति,ऋक्प्रातिशाख्य: परिभाषाएँ-समानाक्षर, सन्ध्यक्षर, अघोष, सोष्म, स्वरभक्ति, यम, रक्त,संयोग, प्रगृहा, रिफित।                                  
 निरुक्त (अध्याय 1 तथा 2)-चार पद-नाम विचार, आख्यात विचार, उपसर्गों का अर्थ,निपात की कोटियाँ,निरुक्त अध्ययन के प्रयोजन.निर्वचन के सिद्धान्त,शब्दों की व्युत्पत्ति-आचार्य, वीर, हद, गो, समुद्र, वृत्र, आदित्य, उषस्, मेघ,वाक्, उदक, नदी, अश्व, अग्नि, जातवेदस,वैश्वानार,निघण्टु, अध्याय 7 दैवत काण्ड-वैदिक स्वर उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित,वैदिक व्याख्या पद्धति प्राचीन एवं अर्वाचीन।                             
*दर्शन-साहित्य-
(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय,प्रमाणमीमांसा, तत्त्वमीमांसा, आचारमीमांसा (चार्वाक, जैन, बौद्ध, न्याय, सांख्य, योग, वैशेषिक, मीमांसा के सन्दर्भ में)।
(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन-
ईश्वरकृष्ण;सांख्यकारिका-सत्कार्यवाद, पुरुषस्वरूप,प्रकृतिस्वरूप, सृष्टिक्रम, प्रत्ययसर्ग, कैवल्य,सदानन्द वेदान्तसार-अनुबन्ध-चतुष्ट्य, अज्ञान,अध्यारोप- अपवाद, लिंगशरीरोत्पत्ति,पंचीकरण, विवर्त, महावाक्य, जीवन्मुक्ति।
अन्नंभट्ट, तर्कसंग्रह / केशव मिश्र; तर्कभाषा-पदार्थ, कारण, प्रमाण (प्रत्यक्ष अनुमान, उपमान, शब्द),प्रामाण्यवाद, प्रमेय।
लौगाक्षिभास्कर अर्थसंग्रह।
पतंजलि योगसूत्र, (व्यासभाष्य)-चित्तभूमि, चित्तवृत्तियाँ,ईश्वर का स्वरूप, योगाङ्ग, समाधि, कैवल्य।
बादरायण ब्रह्मसूत्र 1.1 (शांकरभाष्य)।
विश्वनाथपंचानन, न्यायसिद्धान्तमुक्तावली।
सर्वदर्शनसंग्रह, जैनमत, बौद्धमत(अनुमानखण्ड)।
 *व्याकरण एवं भाषाविज्ञान-
व्याकरणम्-
(क) सामान्य परिचय-आचार्यों का परिचय,पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि, भर्तृहरि, वामनजयादित्य, भट्टोजिदीक्षित, नागेशभट्ट, जैनेन्द्र, कैय्यट, शाकटायन, हेमचन्द्रसूरि सारस्वतव्याकरणकार पाणिनीय शिक्षा।
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन-
संज्ञा प्रकरणम्-परिभाषाएँ संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि, प्रातिपदिक, नदी, घि,उपधा,अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य,सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा।
सन्धि प्रकरणम्-सन्धि अच् सन्धि, हल सन्धि, विसर्ग सन्धि(लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार) सुबन्त अजन्त राम, सर्व (तीनों लिंगों में), विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में), सखि, सुधी, गुरु, पितृ गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु । हलन्त लिहू विश्ववाहू, चतुर् (तीनों लिंगों में), इदम् (तीनों लिंगों में), किम् (तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगों में) राजन, मघवन् पथिन्, विद्वस्, अस्मद्, युष्मद्।
समास प्रकरणम्-अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि, द्वन्द्व, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार),तद्धित अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार),तिङत भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, घुञ, तुद्, तन्, कृ. रु. क्रीञ, चुर। प्रत्ययान्त णिजन्त, सन्नन्त, यडन्त, यङ्लुगन्त; नामधातु,कृदन्त तव्य /तव्यत्, अनीयर् यत् ण्यत् क्यप्: शतृ शानच् क्त्वा क्त क्तवतु तुमुन् णमुल्स्त्री,प्रत्यय लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार।
कारक प्रकरणम्- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार,परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार,महाभाष्य (पस्पशाहिक)-शब्दपरिभाषा शब्द एवं अर्थ सम्बन्ध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य,व्याकरण की परिभाषा,साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम,व्याकरण पद्धति, वाक्यपदीयम् (ब्रह्मकाण्ड) स्फोट का स्वरूप, शब्दब्रह्म का स्वरूप, शब्द ब्रह्म की शक्तियाँ,स्फोट एवं ध्वनि का सम्बन्ध, शब्द- अर्थ सम्बन्ध, ध्वनि के प्रकार, भाषा के स्तर।
भाषाविज्ञानम्-भाषा की परिभाषा, भाषा का वर्गीकरण (आकृतिमूलक एवं पारिवारिक), ध्वनियों का वर्गीकरण स्पर्श, संघर्षी, अर्धस्वर, स्वर (संस्कृत ध्वनियों के विशेष सन्दर्भ में), मानवीय ध्वनियन्त्र, ध्वनि परिवर्तन के कारण, ध्वनि नियम (ग्रिम, ग्रासमान, वर्नर) अर्थ परिवर्तन की दिशाएँ एवं कारण, वाक्य का लक्षण व भेद, भारोपीय परिवार का सामान्य परिचय, वैदिक संस्कृत एवं लौकिक संस्कृत में अन्तर, भाषा तथा वाक् में अन्तर, भाषा तथा बोली में अन्तर।
*संस्कृत साहित्य,काव्यशास्त्र एवं छन्दपरिचय-
(क)सामान्य परिचय-भास, अश्वघोष, कालिदास, शुद्रक, विशाखदत्त, भारवि, माघ, हर्ष, बाणभट्ट, दण्डी, भवभूति, भट्टनारायण, बिल्हण, श्रीहर्ष, अम्बिकादत्तव्यास पण्डिता क्षमाराव वी. राघवन,श्रीधरमास्कर वर्णेकर काव्यशास्त्र रससम्प्रदाय अलंकारसम्प्रदाय, रीतिसम्प्रदाय, ध्वनिसम्प्रदासय, कोक्तिसम्प्रदाय, औचित्यसम्प्रदाय,पाश्चात्य काव्यशास्त्रः अरस्तु, लांजाइनस, क्रोचे
(ख)विशिष्ट अध्ययन- गद्य दशकुमारचरितम् (अष्टम-उच्छ्वास), हर्षचरितम् (पञ्चम-उच्छ्वास), कादम्बरी (शुकनासोपदेश) पद्य बुद्धचरितम् (प्रथम) रघुवंशम् (प्रथमसर्ग), किरातार्जुनीयम् (प्रथमसर्ग),शिशुपालवधम् (प्रथमसर्ग),नैषधीयचरितम् प्रथमसर्ग नाट्य स्वप्नवासवदत्तम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम् वेणीसंहारम्,मुद्राराक्षसम्, उत्तररामचरितम्, रत्नावली, मृच्छकटिकम् चम्पूकाव्य नलचम्पू (प्रथम-उच्छ्वास)।
साहित्यदर्पण: काव्यपरिभाषा काव्य की अन्य परिभाषाओं का खण्डन, शब्दशक्ति- (संकेतग्रह, अमिधा, लक्षणा,
व्यंजना), काव्यभेद (चतुर्थ परिच्छेद) श्रव्यकाव्य (गद्य, पद्य,मिश्र काव्य-लक्षण)
काव्यप्रकाश-काव्यलक्षण, काव्यप्रयोजन काव्यहेतु काव्यमेद, शब्दशक्ति, अभिहितान्वयवाद,अन्विताभिधानवाद, रसस्वरूप एवं रससूत्र विमर्श, रसदोष, काव्यगुण,व्यंजनावृत्ति की स्थापना (पञ्चम उल्लास)
अलंकार-वक्रोक्ति, अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक उत्प्रेक्षा, समासोक्ति, अपह्नुति, निदर्शना, अर्थान्तरन्यास, दृष्टान्त, विभावना, विशेषोक्ति, स्वभावोक्ति, विरोधाभास, संकर, संसृष्टि।
ध्वन्यालोक (प्रथम उद्योत)
वक्रोक्तिजीवितम् (प्रथम उन्मेष)
भारत-नाट्यशास्त्रम् (द्वितीय एवं षष्ठ अध्याय)
दशरूपकम् (प्रथम तथा तृतीय प्रकाश)
छन्द परिचय-आर्या, अनुष्टुप, इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, वसन्ततिलका, उपजाति,वंशस्थ, द्रुतविलम्बित, शालिनी, मालिनी, शिखरिणी, मन्दाक्रान्ता,हरिणी, शादूलविक्रीडित, स्रग्धरा
पुराणेतिहास, धर्मशास्त्र एवं अभिलेखशास्त्र-
(क)सामान्य परिचय- रामायण विषय-वस्तु, काल,रामायणकालीन समाज, परवर्ती ग्रन्थों के लिए प्रेरणास्रोत, साहित्यिक महत्त्व, रामायण में आख्यान,महाभारत विषय-वस्तु, काल महाभारतकालीन समाज, परवर्ती ग्रन्थों के लिए प्रेरणा स्रोत, साहित्यिक महत्त्व, महाभारत में आख्यान,पुराण पुराण की परिभाषा, महापुराण-उपपुराण, पौराणिक,सृष्टि-विज्ञान,पौराणिक आख्यान,प्रमुख स्मृतियों का सामान्य परिचय। अर्थशास्त्र का सामान्य परिचय।
लिपि: ब्राह्मी लिपि का इतिहास एवं उत्पत्ति के सिद्धान्त। अभिलेख का सामान्य परिचय।
(ख) ग्रन्थों का विशिष्ट अध्ययन-कौटिल्य अर्थशास्त्रम् (प्रथम-विनयाधिकारिक),मनुस्मृति (प्रथम, द्वितीय तथा सप्तम अध्याय),याज्ञवल्क्यस्मृति (व्यवहाराध्याय)।
लिपि तथा अभिलेख-गुप्तकालीन तथा अशोककालीन ब्राह्मी लिपि अशोक के अभिलेख प्रमुख शिलालेख, प्रमुख स्तम्भलेख मौर्योत्तरकालीन अभिलेख-कनिष्क के शासन वर्ष 3 का सारनाथ बौद्ध प्रतिमा लेख, रुद्रदामन का गिरनार शिलालेख, खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख,गुप्तकालीन एवं गुप्तोत्तरकालीन अभिलेख-समुद्रगुप्त का इलाहाबाद स्तम्भलेख, यशोधर्मन् का मन्दसौर शिलालेख, हर्ष का बांसखेड़ा ताम्रपट अभिलेख, पुलकेशिन द्वितीय
का ऐहोल शिलालेख। 

गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

झारखंड अधिविद्या परिषद, वार्षिक परीक्षा-2025 उत्तरम्-

                              झारखंड अधिविद्या परिषद,वार्षिक परीक्षा-2025
                                          वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के उत्तर
1.(C) कल्पवृक्षः 
2.(B) जागरुका: 
3.(A) करोति
 4.(D) व्यापक: 
5.(C) कर्म
6.(C) मनोहरमण्डपः 
7.(A) समुद्रस्य 
8.(C) शिल्पिभिः
9.(D) गत्वा 
10.(A) ल्यप्
11.(B) अश्वः
12.(A)शष्पाणि 
13.(B) अजस्रम् 
14.(C) पश्चात् 
15.(A) लट् 
16.(A) सुगृहीतनामधेयस्य 
17.(D)अश्वः
18.(B)जनपदेषु
19.(A) बटवः
20.(C) तव्यत्
21.(B) कीदृश:
22.(C) केन
23.(A)कस्य
24.(A)कः
25.(D) काम्
26.(B)ईशावास्योपनिषदः
27.(A)रघुकौत्ससंवादः
28.(D) सिंहासनद्वत्रिंशिकायाः
29.(B) भवभूतेः
30.(C) 21 जून
                                               विषयनिष्ठ प्रश्नों के उत्तर
31.भारतम् एकः विशालः प्राचीनः च देशः अस्ति।
32. भारतस्य नागरिकेषु एकता वर्तते ।
33.भारते जना भेदभावं विना वसन्ति ।
34. यथानिर्देशम् उत्तरत -
(1) 'सन्ति' इति क्रियापदस्य कर्तृपदम् अस्ति-सर्वे नागरिका:।
(ii) 'प्राचीनः' इति विशेषणस्य विशेष्य:अस्ति-भारतम्
(iii) 'अन्योऽन्यम्' इत्ति अर्थ कि पदम् अत्र प्रयुक्तम् अस्ति-विभिन्नानाम्।
(iv)'परतन्वाः' इति पदस्य कि विलोमपदम् अत्र प्रयुक्तम् अस्ति-स्वतन्त्राः
पूर्णवाक्येन उत्तरत -
35. युवा हयेन पर्वतश्रेण्याः उपरि गच्छति स्म।
36. निर्देशानुसारम् उत्तरत :
(1)'गच्छति स्म' इति क्रियापदस्य कर्तृपदम्-एकः षोडशवर्ष-देशीयो गौरो युवा अस्ति।
(ii) 'स्थूल' इति पदस्य सूक्ष्म विलोमपदद्मत्र प्रयुक्तम्।
(iii)'केशसमूहैः' इति पदस्य किं पर्यावपदम् अत्र प्रयुक्तम्-कुञ्चितकुञ्चितैः।
(iv) 'तस्यैव पत्रम् आदाय इति वाक्ये 'तस्य' इति सर्वनामपदं षोडशवर्ष-देशीयो गौरो युवा कृते प्रयुक्तम् ?
37.पूर्णवाक्येन उत्तरत -
(1)कोषगृहस्य मध्ये वृष्टिं शशंसुः।
(ii) हिरण्मयीं वृष्टि शशंसुः।
38. यथानिर्देशम् उत्तरत -
(i) 'शशंसुः' अस्य कर्तृपदं रघुः अस्ति।
(ii) 'वृष्टिम्' अस्य विशेषणं हिरण्मयीम् अस्ति।
खण्ड -ब
(लघु उत्तरीय प्रश्नः)
39.श्लोकस्य अन्वये रित्तस्थानपूर्ति-जगत्यां यत् किम् च (1)ईशावास्यम् 
इदम् सर्वम् (ii)जगत् तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः,कस्यस्वित् धनं मा (iii)गृधः
40.वाक्यशुद्धि-
(क)मया पत्रं लिख्यते
(ख)त्वं कुत्र गच्छसि ?
(ग)राजा दशरथस्य चत्वारः पुत्राः आसन्
41. उचितरूपैः रिक्तस्थानं पूरयत -
(क)मुनयः यज्ञं कुर्वन्ति ।(मुनि)
(ख)तानि कमलानि विकसन्ति । (तत्)
(ग)छात्राः विद्यालयं गच्छन्ति । (विद्यालय)
42. प्रत्ययं संयोज्य लिखत
(क) गम्+क्त्वा-गत्वा
(ख) कृ+तव्यत्-कर्त्तव्यम्
(ग) नर्तक+ङीप्-नर्तकी
43. अधः समस्तपदानां विग्रहाः दत्ताः, तानाश्रित्य समस्तपदानि रचयत
(क) वनस्य अन्तरे-वनान्तरे
(ख) गुणानां लुब्धाः-गुणलुब्धाः
(ग) प्रकृत्या सिद्धम्-प्रकृतिसिद्धम्
44. शब्दार्थं लिखत-
(क)अस्तेयम्-चोरी न करना
(ख) शौचम्-शुद्धि
(ग) जुगुप्सा-निंदा 
45. रेखाङ्कितपदस्य विभक्ति तत् कारणं च लिखत -
(क)चतुर्थी-नमःस्वास्तिस्वाहास्वधाSलंवषट्योगाच्च
(ख)द्वितीया-पृथग्विनानानाभिस्तृतीयान्यतरस्याम्
(ग)सप्तमी-यतश्च निर्धारणे
46. अधोलिखितपदानां सन्धि विच्छेदं वा कुरुत-
(क)सु+आगतम्
(ख)काल+अंशः
(ग) अतीव
खण्ड -स
47.श्लोकमेलनंम् -
'अ''                                  आ'
कर्मण्येवाधिकारस्ते    मा फलेषु कदाचन।
ददाति प्रतिगृह्णाति      गुह्यमाख्याति पृच्छति।
ईशावास्यमिदं सर्व      यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
अस्ति यद्यपि सर्वत्र     नीरं नीरज-राजितम्।
पापान्निवारयति          योजयते हिताय।
48.विद्यालयशुल्कक्षमापनार्थ स्वप्राचार्य प्रति एक पत्रम्। 
49.चम्पूकाव्यस्य वैशिष्ट्यं तथा चम्पूकाव्यस्य उदाहरणम्। 
50.लेखकानां नामानि (केवलं पञ्चानाम्)
(क) रामायणम्-वाल्मिकी
(ख)पाषाणी कन्या-दीनबन्धु नायरः 
(ग) महाभारतम्-वेदव्यासः 
(घ)किरातार्जुनीयम्-भारवि
(ङ)उत्तररामचरितम्-भवभूति
(च)कादम्बरी-बाणभट्ट
51.चित्रं दृष्ट्वा पञ्च वाक्यरचना-
52.कथालेखनम्-
(1)असत्यवादनम्
(2)त्वमेव
(3)गर्वेण
(4)दास्यति
(5)सम्मानितवान्


झारखंड अधिविद्या परिषद,वार्षिक परीक्षा-2025

झारखंड अधिविद्य परिषद,
वार्षिक परीक्षा-2025
भाग-अ
(बहुविकल्पीय प्रश्नः )
प्रश्नसङ्ख्या १ तः ३० पर्यन्तं बहुविकल्पप्रकारः भवति।प्रत्येकस्य प्रश्नस्य चत्वारः विकल्पाः सन्ति । सम्यक् विकल्पं चित्वा उत्तरपत्रे लिखन्तु। प्रत्येकं प्रश्नः १ अङ्कस्य अस्ति। -1 x 30 = 30
प्रश्न संख्या 1-30 वस्तुनिष्ठप्रश्नाः सन्ति ।
सर्वे प्रश्नाः समानाङ्काः ।
सर्वे प्रश्नाः अनिवार्याः ।
प्रदत्तेषु विकल्पेषु समुचितम् उत्तरं चिनुत ।
अपठितांश-अवबोधनम्-
निर्देश-अधोलिखितं अनुच्छेदं पठित्वा प्रदत्तप्रश्नान् विकल्पेभ्यः उत्तरत-
अनुच्छेदः-
संगणकं तु विज्ञानस्य अत्यधिकं विकसितं बुद्धिमत् च यन्त्रस्ति। मुद्रण सञ्चार-सैन्य-चिकित्सा-विज्ञानादिक्षेत्रेषु अस्य व्यापकः प्रभावः दृश्यते । असाधारणी अस्ति गणनशक्तिः स्मरणशक्तिः च।अनलसम् अविरतं च कर्म करोति इदम्। आधुनिकयुगस्य तु कल्पवृक्षः अयम्। परमद्यतनीयाः जनाः अलसाः भूत्वा लघुकार्याय अपि सङ्गणकाश्रिताः भवन्ति। 'बुद्धेः विकासः अवरुद्धः न भवेत्' अतः जागरुकाः भूत्वा अस्य प्रयोगः कर्तव्यः। बाला: अपि दिनानुदिनम् क्रीडा-कारणेन अस्य वशीभूताः जायमानाः सन्ति। ते बहिः क्रीडितुं न इच्छन्ति येन शारीरिकविकासः सम्पक्त्या न जायमानो वर्तते।
प्रश्नाः
1.अद्यतनीयुगस्य कल्पवृक्ष: किं मन्यते?
(A) स्मरणशक्ति: 
(B) सड्गणकम् 
(C) कल्पवृक्षः 
(D) विकास: 
2. सड्गणकस्य स्मरणशक्ति: कीदृशी ?
 (A) अनलसम्
 (B) जागरुका:
 (C) असाधारणी
 (D) चिकित्सा
 3. 'अनलसम् अविरतं च कर्म करोति इदम् ।' अस्मिन् वाक्ये क्रियापदं किम् ?
 (A) करोति
 (B) अविरतं 
(C) अनलसम्
 (D) कर्म 
4. 'व्यापकः प्रभावः' अत्र विशेषणपदं किम् ? 
(A) पक: 
(B) भाव: 
(C) प्रभाव:
 (D) व्यापक:
 5. 'कार्यम्' इति पदस्य समानार्थकं पदम् अनुच्छेदात् चित्चा लिखत । 
(A) क्रीडितुं 
(B) अविरतं 
(C) कर्म 
(D) असाधारणी
पठितावबोधनम्- 
निर्देश : 
अधोलिखितं गद्यांशं, पद्यं, नाट्य च पठित्वा प्रदत्तप्रश्नान् विकल्पेभ्यः- 
गद्यांशः-
 'इत्येवं विचार्य सर्वस्वदक्षिणं यज्ञं कर्तुमुपक्रान्तवान् । ततः शिल्पिभिरतीव मनोहरो मण्डपः कारितः। सर्वापि यज्ञसामग्री समाहृता। देवमुनिगन्धर्वसिद्धाश्च समुद्राह्वानार्थं कश्चिद् ब्राह्यणः समुद्रतीरे प्रेषितः। गन्धपुष्पादिषोडशोपचारं विधायाSब्रवीत्।" 
6. शिल्पिभिः कः कारितः ? 
(A) गृहम् 
(B) मूर्ति:
(C) मनोहरमण्डपः 
(D) विद्यालय: 
7. कस्य आह्वानार्थं ब्राह्मणः प्रेषितः ?
 (A) समुद्रस्य
 (B) देवस्य 
(C) पुत्रस्य 
(D) असुरस्य 
8. 'कारुभिः' अस्य क: पर्याय: ?
 (A) लताभि: 
(B) मातृभिः 
(C) शिल्पिभि: 
(D) सर्वाभिः
9. 'आगत्य' अस्य विलोमपदं किम् ?
 (A) आगम्य 
(B) प्रणम्य 
(C) अवगम्य 
(D) गत्वा 
10. 'विचार्य' पदे कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
 (A) ल्यप् 
(B) अनीयर्
 (C) क्त्वा
 (D) शतृ 
पद्यम्-
 "पश्चात्पुच्छं वहति विपुलं तच्च धूनोत्यजस्रम, 
दीर्घग्रीव: स भवति, खुरास्तस्य चत्वार एव।
 शष्पाण्यत्ति प्रकिरति शकृत्पिण्डकानाप्रमात्रान्,
 किं व्याख्यानैव्रजति स पुनर्दूरमेहपेहि यामः ॥"
11. दीर्घग्रीवः क: भवति ? 
(A) अज:
(B) अश्व: 
(C) कपोतः 
(D) वराह:
12. अश्वः कानि अत्ति ? 
(A)शष्पाणि 
(B) आम्राणि 
(C)कमलानि 
(D) नेत्राणि 
13. 'सततम्' अस्य केः पर्यायः ? 
(A)सत्यम् 
(B) अजस्रम् 
(C) असत्यम् 
(D) खुराः 
14.'अग्रे' अस्य विलोमपदं किम् ? 
(A)विपुलम् 
(B) दीर्घग्रीवः 
(C) पश्चात् 
(D) तच्च 
15. 'भवति' पदे कः लकारः ? 
(A) लट् 
(B) लृट् 
(C) लोट् 
(D) लङ्
नाट्यांशः- 
"कौसल्या जात ! अस्ति ने माता ? स्मरसि वा तातम् ? 
लवः-नहि । 
कौसल्या-ततः कस्य त्वम् ? 
लवः-भगवतः सुगृहीतनामधेयस्य वाल्मीकेः. । 
कौसल्या-अयि जात । कथयितव्यं कथय। 
लवः-एतावदेव जानामि । (प्रविश्य सम्भ्रान्ताः) 
वटवः-कुमार! कुमार! अश्वोऽश्व इति कोऽपि भूतविशेषो जनपदेष्वनुश्रूयते,सोऽयमधुनाऽस्माभिः स्वयं प्रत्यक्षीकृतः।" 
16. 'वाल्मीकेः' अस्य किं विशेषणम् ? 
(A) सुगृहीतनामधेयस्य 
(B) कुमारः 
(C) भूतविशेषो 
(D) कोऽपि 
17. अस्माभिः कः भूतविशेषः प्रत्यक्षीकृतः ?
(A) अजः
(B) चित्रकः
(C)व्याघ्रः
(D)अश्वः
18. भूतविशेषोऽश्व कुत्र अनुश्रूयते ?
(A) ग्रामेषु
(B)जनपदेषु
(C) वनेषु
(D)गृहेषु
19. 'अनुश्रूयते' अस्य कर्तृपदं किम् ?
(A) बटवः
(B) लवः
(C) कौसल्या
(D) जनकः
20, 'कथयितव्यं' पदे कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(A) क्त्त्वा
(B) क्त
(C) तव्यत्
(D) ल्यप्
निर्देश: रेखांकित पदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत।
21. श्रीनायार: स्वल्पभाषी आसीत् ।
(A) कः
(B) कीदृश:
(C)केन
(D) कुत्र
22. तस्य राज्येन सह कश्चित् सम्पर्कः नास्ति ।
(A) कः
(B) कीदृशः
(C) केन
(D) कुत्र
23. पत्रस्य अर्घाधिकं भागं अनुधारा आर्द्राकरोति स्म ।
(A)कस्य
(B) कीदृशः
(C) केन
(D) कुत्र
24. श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान् ।
(A)कः
(B) कीदृशः
(C) केन
(D) कुत्र
25 भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु ।
(A) कः
(B) कीदृशः
(C) केन
(D) काम्
निर्देशः निर्देशानुसारम् उत्तरं चिनुत-
26. विद्ययाऽमृतमश्नुते' पाठः कस्मात् ग्रंथात् संकलितः ?
(A) तैत्तिरीयोपनिषदः
(B)ईशावास्योपनिषदः
(C) मुंडकोपनिषदः
(D) मांडूक्योपनिषदः
27. रघुवंशात् कः पाठः संकलितः ?
(A)रघुकौत्ससंवादः
(B) बालकौतुकम्
(C) सूक्ति-सुधा
(D) दीनबंधुश्रीनायारः
28. 'विक्रमस्यौदार्यम्' पाठः कस्मात् ग्रंथात् संकलितः ?
(A) रामायणात्
(B) मेघदूतात्
(C) महाभारतात्
(D) सिंहासनद्वत्रिंशिकायाः
29. 'बालकौतुकम्' इति पाठः कस्य रचना ?
(A)कालिदासस्य
(B) अवभूतेः
(C) बाणभट्टस्य
(D) सुश्रुतस्य
30. अन्तरराष्ट्रिययोगदिवसः कदा समायोज्यते ?
(A) 19 जून
(B) 20 जून
(C) 21 जून
(D) 22 जून
भाग-B
( विषयनिष्ठ प्रश्न)
खण्ड -अ
( अति लघु उत्तरीय प्रश्नः)
कस्यापि षट् प्रश्नस्य उत्तरं ददातु।
निर्देश: अधोलिखितम् अनुच्छेदं पठित्वा प्रदत्तान् प्रश्नान् निर्देशानुसारम् उत्तरत -2x6-12
भारतम् एकः विशालः प्राचीनः च देशः अस्ति। एतद् उत्तरे कश्मीरप्रदेशात् दक्षिणे कन्याकुमारी पर्यन्तम्, पूर्व असमप्रदेशात् पश्चिमे कच्छप्रदेशपर्यन्तं च विस्तृतम् अस्ति । अस्माकं भारते विभिन्नानां वर्णानां, जातीनां, धर्माणां च जनाः परस्परं मिलित्वा वसन्ति । भारते भाषा-परम्परा-धर्मवैभिन्ये अधि अत्रत्येषु नागरिकेषु एकता बर्तते । स्वतन्त्रता भारतीयनागरिकाणां मौलिक अधिकारः अस्ति। सर्वं नागरिकाः कमपि धर्म स्वीकर्तुं स्वतन्त्राः सन्ति । सर्वे धर्मा अस्मभ्यं नम्रता दया परोपकाराणाम् उपदेशं यच्छन्ति। अत एवभारते सर्वेषां धर्माणां जना भेदभावं विना निवसन्ति ।
प्रश्नाः
पूर्णवाक्येन उत्तरत -
31.भारतम् कीदृशः देशः अस्ति ?
32. भारतस्य नागरिकेषु का वर्तते ?
33.भारते जना कथं वसन्ति ?
34. यथानिर्देशम् उत्तरत -
(1) 'सन्ति' इति क्रियापदस्य कर्तृपद किम् ?
(ii) 'प्राचीनः' इति विशेषणस्य विशेष्य किम् ?
(iii) 'अन्योऽन्यम्' इत्ति अर्थ कि पदम् अत्र प्रयुक्तम् ?
(iv)'परतन्वाः' इति पदस्य कि विलोमपदम् अत्र प्रयुक्तम् ?
अधोलिखितं गद्यांश, पद्यं च पठित्वा प्रदत्तप्रश्नान् संस्कृतेन उत्तरत -
गद्यांशः-
"अस्मिन् समये एकः षोडशवर्ष-देशीयो गौरो युवा हयेन पर्वतश्रेणीरुपर्युपरि गच्छति स्म । एष सुगठितदृढशरीरः श्यामश्यामैर्गुच्छगुच्छः कुञ्चितकुञ्चितैः कचकलापैः दूरागमनायासवशेन सूक्ष्म-मौक्तिक-पटलेनेव स्वेदबिन्दु ब्रजेन समाच्छादितललाट-कपोल नासाग्रोत्तरोष्ठः कोऽपि शिववीरस्य विश्वासपात्रः सिंहदुर्गात् तस्यैव पत्रमादाय तोरणदुर्गं प्रयाति ।"
प्रश्नाः
पूर्णवाक्येन उत्तरत -
35. युवा केन पर्वतश्रेण्याः उपरि गच्छति स्म ?
36. निर्देशानुसारम् उत्तरत :
(1)'गच्छति स्म' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम् ?
(ii) 'स्थूल' इति पदस्य किम् विलोमपदद्मत्र प्रयुक्तम् ?
(iii)'केशसमूहैः' इति पदस्य किं पर्यावपदम् अत्र प्रयुक्तम् ?
(iv) 'तस्यैव पत्रम् आदाय इति वाक्ये 'तस्य' इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
पद्यम् -
प्रातः प्रयाणाभिमुखाय तस्मै
सविस्मयाः कोषगृहे नियुक्ताः।
हिरण्मयीं कोषगृहस्य मध्ये
वृष्टिं शशंसुः पतितां नभस्तः।।
37. पूर्णवाक्येन उत्तरत -
(1) कस्य मध्ये वृष्टिं शशंसुः ?
(ii) कीदृशीं वृष्टि शशंसुः ?
38. यथानिर्देशम् उत्तरत -
(i) 'शशंसुः' अस्य कर्तृपदं किम् ?
(ii) 'वृष्टिम्' अस्य विशेषणं किम् ?
खण्ड -ब
(लघु उत्तरीय प्रश्नः)
कस्यापि षट् प्रश्नस्य उत्तरं ददातु। प्रत्येकं प्रश्नस्य उत्तरं अधिकतमं १५० शब्देषु ददातु।
39. अधोलिखितस्य श्लोकस्य अन्वये रित्तस्थानपूर्ति कुरुत
ईशावास्यमिदं सर्व यत्किंच जगत्यां जगत् । 
तेन व्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद् धनम् ।।
जगत्यां यत् किम् च (1)..... इदम् सर्वम् (ii)....... तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः,कस्यस्वित् धनं मा (iii)...........।
40.वाक्यं शुद्ध कुरुत-
(क)मया पत्रं लिखामि ।
(ख)त्वं कुत्र गच्छति ?
(ग)राजा दशरथस्य चत्वारः पुत्राः आसीत् ।
41. उचितरूपैः रिक्तस्थानं पूरयत -
(क).......यज्ञं कुर्वन्ति ।(मुनि)
(ख).......कमलानि विकसन्ति । (तत्)
(4)छात्रा........ गच्छन्ति । (विद्यालय)
42. प्रत्ययं संयोज्य लिखत
(क) गम्+क्त्वा-
(ख) कृ+तव्यत् -
(ग) नर्तक+ङीप् -
43. अधः समस्तपदानां विग्रहाः दत्ताः, तानाश्रित्य समस्तपदानि रचयत
यथा-कुलस्य व्रतं कुलव्रतम् ।
(क) वनस्य अन्तरे-
(ख) गुणानां लुब्धाः-
(ग) प्रकृत्या सिद्धम्-
44. शब्दार्थं लिखत-
(क)अस्तेयम् -
(ख) शौचम् -
(ग) जुगुप्सा-
45. रेखाङ्कितपदस्य विभक्ति तत् कारणं च लिखत -
(क) गणेशाय नमः ।
(ख) जलं विना जीवनं शून्यः ।
(ग) कविषु कालिदासः श्रेष्ठः ।
46. अधोलिखितपदानां सन्धि विच्छेदं वा कुरुत-
(क) स्वागतम्-.............+................
(ख) कालांश-.............+.................
(ग) अति+इव-...............................
खण्ड -स
(दीर्घ उत्तरीय प्रश्नः)-5x4-20
चतुर्णां प्रश्नानाम् उत्तरं ददातु। प्रत्येकं प्रश्नस्य उत्तरं अधिकतमं २५० शब्देषु ददातु।
47.श्लोकमेलनं कुरुत -
'अ''                                  आ'
कर्मण्येवाधिकारस्ते    यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
ददाति प्रतिगृह्णाति      मा फलेषु कदाचन ।
ईशावास्यमिदं सर्व      गुह्यमाख्याति पृच्छति ।
अस्ति यद्यपि सर्वत्र     योजयते हिताय ।
पापान्निवारयति          नीरं नीरज-राजितम् ।
48.विद्यालयशुल्कक्षमापनार्थ स्वप्राचार्य प्रति एक पत्र लिखत ।
49.चम्पूकाव्यस्य वैशिष्ट्यं प्रतिपादयत । चम्पूकाव्यस्य उदाहरणम् अपि लिखत ।
50.अधोलिखित्तरचनानां लेखकानां नामानि लिखत । (केवलं पञ्चानाम् )
(क) रामायणम्-
(ख) पाषाणी कन्या-
(ग) महाभारतम्-
(घ)किरातार्जुनीयम्-
(ङ)उत्तररामचरितम्-
(च) कादम्बरी-
51. मञ्जूषासहायतया चित्रं दृष्ट्वा पञ्च चाक्यानि रचयत -

मन्जूषाः-पर्वताः,हरिताः,नदी,वृक्षाः,गृहाणि,वर्षाकाले,मेघा,सुन्दरम्,जलमग्नाः
52. मञ्जूषातः उचितसङ्केतान् गृहीत्या अधोलिखितां कथां पूरयित्वा पुनः लिखत-
मन्जूषाः-गर्वेण, दास्यति, त्वमेव, सम्मानितवान्, असत्यवादनम् ।
एकः अहङ्कारी राजा पण्डितान् आहूय अपृच्छत् । कः श्रेष्ठः अहं वा ईश्वरः वा ?" व्याकुलाः पण्डिताः अचिन्तयन् किं कुर्मः? इतः प्राणहानिः ततः,,,,,,,,,,,,,,,(1),,,,,,,,,,,,,,,।एकः वृद्धः प्रणम्य अवदत् "राजन् । निस्संदेह,,,,,,,,,,,,,,,(2),,,,,,,,,,,,,,,, श्रेष्ठः न ईश्वरः।राजा,,,,,,,,,,,,,,, (3),,,,,,,,,,,,,,, मस्तकम् उन्नयन् अपृच्छत् तत् कथम्?" वृद्धपण्डितः अवदत् -"राजन् । त्वम् अस्मान् राज्यात् निष्कासयितुं क्षमः न तु ईश्वरः । निष्कासयति चेत् कुत्र स्थानं,,,,,,,,,,,,,,, (4),,,,,,,,,,,,,,,?" राजा स्वमूर्खताम् अवगतवान् वृद्धं च,,,,,,,,,,,,,,, (5),,,,,,,,,,,,,,,।



शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

संस्कृत सामान्य अध्ययन

संस्कृत सामान्य अध्ययन
*महाकाव्यम्-
महाकाव्यं सर्गैः निबद्धं भवति । तत्र अष्टाधिकसर्गाः अवश्यमेव भवेयुः। महाकाव्ये धीरोदात्तादिगुणयुक्तं नायकं भवति । शृङ्गारवीरशान्तकरुणरसेषु एकः रसः मुख्यः भवति तथा अन्ये रसाः तस्य अङ्गभूताः भवन्ति । काव्यस्य उपजीव्यम् ऐतिहासिकम् अथवा सज्जनाश्रितं भवति । महाकाव्यस्य फलं चतुर्वर्गेषु एकं भवति । लज्जास्पदविषयस्य महाकाव्येषु वर्णनं न क्रियते । महाकाव्यस्य उदाहरणं यथा रघुवंशम्, कुमारसम्भवम् इत्यादि ।
*खण्ड काव्यम्-
 महाकाव्यस्य एकदेशानुसारि खण्डकाव्यं भवति। खण्डकाव्ये एकदेश एव चित्रितो भवति।खण्डकाव्यं हि वस्तुतो लघुकाव्यमेव।खण्डकाव्ये जीवनस्य एकस्यैव पक्षस्य चित्रितो भवति।खण्डकाव्ये जीवनस्य एक एव पक्षस्य अधिकतया प्रस्तूयते।खण्डकाव्यं लघुकलेवरं भवति।खण्डकाव्यं हि मुख्यतश्चतुर्विधं दृश्यते शार्ङ्गरिकम्, धार्मिकम्, नैतिकं साङ्ग्राहिकञ्च । 
* नाटकम्-
यः नाटयित्वा सहृदयानां संतोषः उत्पन्न: करोति सः नाटकम् अस्ति।अत्र दुःखजनकस्य सुखजनकस्य च वृत्तान्तस्य वर्णनं भवति । नाटके पञ्च सन्धय: सति- मुखम्, प्रतिमुखम्, गर्भः, विमर्शः, निर्वहणं च। अस्मिन् श्रङ्गारादि विशिष्टरसाः भविन्त । अस्मिन न्यूनतमः पञ्च अङ्का भवन्ति तथा अधिकतम,दश अङ्काः भवन्ति । उत्तररामचरिते सप्त  अङ्काः  सन्ति। मालविकाग्निमित्रम् नाटके सप्त अङ्काः सन्ति।वेणीसंहारे अभिज्ञानशाकुन्तले च षट् अङ्काः सन्ति।
*गद्यकाव्यम्-
छन्द रहित रचना गद्य काव्यम् अस्ति । कृष्णयजुर्वेदे गद्यः प्रयुक्तः अस्ति। गद्यकाव्यम लेखने सुविधा जनकं भवति ।अथर्ववेदे अपि गद्यः प्रयुक्तः अस्ति। आयुर्वेदे ज्योतिषे च अपि गद्यः प्रयुक्तः अस्ति। भाषणे अपि गद्यः सरलः भवति।
*पद्यकाव्यम्-
छन्द युक्त रचना पद्य काव्यम् अस्ति।वेदे,पुराणे च पद्यः प्रयुक्तःअस्ति।  यस्मिन् काव्ये केवलं पद्यानि एव विराजन्ते तत् पद्यकाव्यम् उच्यते । अत्र कविना श्लोकैः एव विषयस्य वर्णनम् क्रियते।संस्कृत साहित्ये पञ्च महाकाव्यानि सन्ति-रघुवंशम्, कुमारसम्भवम्, किरातार्जुनीयम्, शिशुपालवधम्, नैषधीयचरितम्। 
*चम्पूकाव्यम्-
गद्यपद्यमिश्रितं काव्यं चम्पूकाव्यं कथ्यते। चम्पूकाव्येषु तु गद्यपद्ययोः मात्रा प्रायेण समाः भवति।चम्पूकाव्यं वर्णनप्रधानम् भवति। इदम् अलङ्कारबहुलं एवं सरसं भवति।  पञ्चतन्त्रम् प्रसिद्धम् चम्पूकाव्यम् अस्ति।अन्य चम्पूकाव्यं अस्ति-नलचम्पूः,चम्पूरामायणम्,गङ्गावतरणचम्पूः तथा रामचन्द्रचम्पूः इत्यादिकम्।
  



गुरुवार, 17 नवंबर 2022

सन्धि-प्रकरणम्-सहायक

                                                          सन्धि-प्रकरणम्

     दो वर्णों के मिलने से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे सन्धि कहते हैं-द्वयोः वर्णयोः मेलनेन यःविकारः उत्पन्नः 
भवति, सः सन्धिः कथ्यते।यथा -गण+ईशः-गणेशः,दिक्+अम्बर-दिगम्बरः,निः+मलः-निर्मसंधि के तीन प्रकार हैं- (क).स्वर सन्धि  (ख).व्यञ्जन सन्धि   (ग).विसर्ग सन्धि।   
 (क).स्वर सन्धि-दो स्वर वर्णों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है,उसे स्वर संधि कहते हैं-द्वयोः स्वरवर्णयोः मेलनेन यः विकारः उत्पन्नः भवति,सः स्वर सन्धिः कथ्यते।जैसे- हिम+आलयः-हिमालयः,सूर्य+उदयः-सूर्योदयः,सदा+एव-सदैव,प्रति+एकः-प्रत्येकः, ने+अनम्-नयनम् इत्यादि। 
      स्वर सन्धि के मुख्यतः 5 प्रकार हैं- 1.दीर्घ सन्धि  2.गुण सन्धि  3.वृद्धि सन्धि  4.यण् सन्धि 5.अयादि सन्धि ।(ख).व्यञ्जन सन्धि-व्यञ्जन वर्ण का स्वर या व्यञ्जन वर्ण के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है,उसे व्यञ्जन सन्धि कहते हैं-व्यंजनेन सह  स्वरस्य व्यंजनस्य वा  मेलनेन यः विकारः उत्पन्नः भवति सः  व्यञ्जन सन्धिः कथ्यते। इस संधि में दो वर्णों में से एक वर्ण  व्यंजन या दोनों वर्ण व्यजन हो सकते  हैं, किन्तु दोनों वर्ण स्वर नहीं हो सकतेजैसे-दिक्+गजः=दिग्गजः,जगत्+आनन्दः=जगदानन्दः इत्यादि। 
(ग).विसर्ग सन्धि-विसर्ग का स्वर या व्यंजन वर्ण के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है उसे  विसर्ग संधि कहते हैं-
विसर्गेण सह स्वरस्य व्यंजनस्य वा  मेलनेन यः विकारः उत्पन्नः भवति सःविसर्ग सन्धिः कथ्यतेजैसे- नि: + संदेहः -निस्संदेहः, मनः + भाव:- मनोभावः इत्यादि
1.दीर्घ सन्धि-
दो स्वर वर्णों के मिलने से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं। संस्कृत में इसे अच् सन्धि भी कहा जाता है, क्योंकि माहेश्वर सूत्र के आधार पर इसमें अच् प्रत्याहार के वर्णों का प्रयोग किया जाता है। स्वर संधि के मुख्यतः पांच प्रकार हैं, जिनमें से एक प्रकार  दीर्घ सन्धि का यहां परिचय कराया जायेगा।दो समान स्वरों के मिलने से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे  दीर्घ संधि कहते हैं।माहेश्वर सूत्र के आधार पर इसकी परिभाषा या सूत्र है- अकः सवर्णः दीर्घः अर्थात् अक् प्रत्याहार के किसी स्वर के बाद उसी प्रत्याहार का समान स्वर आता है तो दोनों मिलकर दीर्घ स्वर बन जाते हैं अर्थात् अ, आ, इ, ई, उ,ऊ, ऋ वर्णों के बीच होने वाली संधि दीर्घ संधिकहलाती है। 
 नियम-1.जब दो शब्दों की संधि करते समय अ या आ के बाद अ या आ ही आता है तो ‘आ‘ बन  जाता है-अ +अ =आ,अ + आ = आ,आ + अ = आ,आ + आ = आ।
उदाहरण-
अ + अ = आ के आधार पर-सुर + अरि: = सुरारि:,स्व + अधीनः=स्वाधीनः,सर्व +अधिकः =सर्वाधिकः, परम + 
अर्थः = परमार्थः।अ + आ = आ के आधार पर- हिम + आलयः = हिमालयः,अंड + आकारः=अंडाकारः ,अल्प + आयुः=अल्पायुः।
आ + अ = आ के आधार पर-आत्मा+अवलंबनम् =आत्मावलंबनम्,विद्या + अर्थी = विद्यार्थी,विद्या + अभ्यासःविद्याभ्यासः,दया + अर्णव: = दयार्णव:।
आ + आ = आ के आधार पर-महा+आशयः=महाशयः,दुर्भगा+आभरणम्=दुर्भगाभरणम्,महा+आकारः=महाकारः।
नियम-2-जब दो शब्दों की संधि करते समय इ या ई के बाद इ या ई ही आता है तो ‘ई‘ बन जाता है- इ + इ = 
ई,इ + ई = ई,ई + इ = ई,ई + ई = ई ।
उदाहरण-
इ + इ = ई के आधार पर-रवि + इन्द्रः = रवीन्द्रः,मुनि + इन्द्रः = मुनीन्द्रः, गि‍रि + इन्‍द्र: = गिरीन्‍द्र:
इ + ई = ई के आधार पर-गिरि + ईशः = गिरीशः,मुनि + ईशः = मुनीशः , कवि + ईश्वरः = कवीश्वरः, हरि + ईशःहरीशः,क्षिति + ईश: = क्षितीश:।
ई + इ = ई के आधार पर-मही + इन्द्रः = महींद्रः,नारी + इन्दुः = नारीन्दुः,सुधी + इन्‍द्र: = सुधीन्‍द्रः ।
ई + ई = ई के आधार पर-नदी + ईशः = नदीशः,मही + ईशः = महीशः,श्री + ईश: = श्रीश: ।
नियम-3-जब दो शब्दों की संधि करते समय उ या ऊ के बाद उ या ऊ ही आता है तो ‘ऊ‘ बन जाता है- उ + उ =ऊ ,उ + ऊ = ऊ, ऊ + उ = ऊ,ऊ + उ = ऊ,ऊ + ऊ = ऊ। 
उदाहरण-
उ + उ = ऊ के आधार पर- भानु + उदयः = भानूदयः,विधु + उदयः = विधूदयः,लघु+उत्तर-लघूत्तर।
उ + ऊ = ऊ के आधार पर-लघु + ऊर्मिः = लघूर्मिः,सिंधु + ऊर्मिः = सिंधूर्मिः।
ऊ + उ = ऊ के आधार पर- वधू + उत्सवः = वधूत्सवः,वधू + उल्लेखः = वधूल्लेखः।
ऊ + ऊ = ऊ के आधार पर- भू + ऊर्ध्वः = भूर्ध्वः,वधू + ऊर्जा = वधूर्जा,भू + उत्तमम् = भूत्तमम्।
नियम-4-जब दो शब्दों की संधि करते समय ऋ या ऋृ के बाद ऋ या ऋृ  ही आता है तो ‘ऋृ‘ बन जाता है। 
उदाहरण- ऋ + ऋ = ऋृ के आधार पर-पितृ + ऋणम् = पितृृृणम्,होतृ+ऋकारः =होतृकारः।
 2. गुण सन्धि- 
 यदि अ या आ के बाद इ, ई, उ, ऊ,ऋ,ऋृ और लृ में से कोई एक स्वर आने से जो विकार उत्पन्न होता है,तो उसे गुण
 सन्धि कहते हैं-अदेङ्गुणः अथवा आद्गुणःगुण का अर्थ यहाँ पर ए, ओ, अर् और अल् से है।
नियम-1-अ या आ के बाद इ या ई आने से ए हो जाता है- अ+इ = ए,अ+ई = ए,आ+इ = ए, आ+ई = ए  ।
उदाहरण-
अ+इ = ए के आधार पर-देव+इन्द्रः = देवेन्द्रः,नर + इन्द्रः = नरेन्द्रः,नृप + इन्द्रः = नृपेन्द्रः। 
अ+ई = ए के आधार पर-गण+ईशः = गणेशः,धन + ईशः = धनेशः, परम + ईश्वरः=परमेश्वरः।
आ+इ = ए के आधार पर-महा + इन्द्रः = महेन्द्रः,यथा + इच्छा = यथेच्छा,यथा + इष्ठः = यथेष्ठः।
आ+ई = ए के आधार पर-महा+ईशः = महेशः,उमा + ईशः = उमेशः, रमा + ईशः = रमेशः।
नियम-2-अ या आ के बाद उ या ऊ आने से ओ हो जाता है-अ+उ = ओ,अ+ऊ = ओ,आ+उ = ओ,आ+ऊ = 
ओ।
अ+उ=ओ के आधार पर-सूर्य+उदयः=सूर्योदयः,नर+उत्तमः=नरोत्तमः,प्रश्न+उत्तरः=प्रश्नोत्तरः।
अ+ऊ=ओ के आधार पर-जल + ऊष्मा = जलोष्मा,समुद्र + ऊर्मिः = समुद्रोर्मिः, जल + ऊर्जा = जलोर्जा।
आ+उ = ओ के आधार पर-महा+उदयः=महोदयः,महा+उत्सवः=महोत्सवः,मया+उद्भाव्यः=मयोद्भाव्यः।
आ+ऊ = ओ के आधार पर-महा+ऊष्मा=महोष्मा,गंगा + ऊर्मिः=गंगोर्मिः, महा + ऊर्जा=महोर्जा।
नियम-3-अ या आ के बाद ऋ या ऋृ आने से अर् हो जाता है-अ+ऋ = अर्,आ+ऋ = अर् 
अ+ऋ = अर् के आधार पर-कण्व + ऋषिः=कण्वर्षिः,उत्तम + ऋणः=उत्तमर्णः,देव + ऋषिः=देवर्षिः।
आ+ऋ = अर् के आधार पर-महा + ऋषिः = महर्षिः, महा + ऋणः = महर्णः।
नियम-4-अ या आ के बाद लृ आने से अल्  हो जाता है-अ+लृ = अल्,आ+लृ = अल् ।
अ+लृ = अल् के आधार पर- तव+लृकारः=तवल्कारः।
आ+लृ = अल् के आधार पर-महा+लृकारः=महाल्कारः 
3.वृद्धि सन्धि-
वृद्धिरेचि अथवा वृद्धिरादैच्-यदि अ या आ के बाद ए,ऐ,ओ,और औ में से कोई एक स्वर आने से जो विकार उत्पन्न
होता है,तो उसे वृद्धि सन्धि कहते हैं।अंतिम स्वर में वृद्धि हो जाने के कारण ही इसे वृद्धि संधि कहते हैं ।
नियम 1-अ या आ के बाद ए या ऐ आता है तो ऐ हो जाता है-अ/आ+ए/ऐ=ऐ । 
अ+ए=ऐ के आधार पर-अद्य + एव = अद्यैव,एक + एकः = एकैकः,अनेक + एकः = अनेकैकः।
अ+ऐ=ऐ के आधार पर- मत + ऐक्यः = मतैक्यः,देव + ऐश्‍वर्यम् = देवैश्‍वर्यम्,राज + ऐश्वर्यम्‌= राजैश्वर्यम् ।
+ए=ऐ के आधार पर- तथा + एव = तथैव,सदा + एव = सदैव, सा + एषा= सैषा।
+ऐ-ऐ के आधार पर-  विद्या + ऐश्‍वर्यम् = विद्यैश्‍वर्यम्,महा + ऐश्र्वर्यम्=महैश्र्वर्यम् ,महा+ऐरावतः=महैरावतः।
नियम-2-अ या आ के बाद ओ या औ आता है तो औ हो जाता है-अ/आ+ओ/औ=औ।
 + ओ = औ के आधार पर- तण्‍डुल + ओदनम् = तण्‍डुलौदनम्,वन + ओषधिः = वनौषधिः,परम + ओजस्वी 
=परमौजस्वी।
आ + ओ = औ के आधार पर- महा + ओषधिः = महौषधिः,महा + ओजस्वी =महौजस्वी, महा + ओजः= महौज:   
अ + औ = औ के आधार पर-  परम + औषधः = परमौषधः,न + औघः= नौघः,परम+औदार्यः = परमौदार्यः।
आ + औ = औ के आधार पर-  महा + औषधः = महौषधः,महा+औदार्यः = महौदार्यः,तदा + औषधम् = तदौषधम्।
 4. यण् संधि-
 यदि इ, ई, उ, ऊ, ऋ,ऋृ,और लृ के आगे कोई भिन्न स्वर आने से जो विकार उत्पन्न होता है,तो उसे  यण् 
सन्धि कहते हैं-इकोयणचि 
यण् संधि के चार नियम होते हैं-
नियम-1. इ, ई के आगे कोई असमान स्वर होने पर इ, ई का 'य्' हो जाता है-इ, ई + भिन्न स्वर = य् ,
उदाहरण-
इ + अ = य के आधार पर-अति + अल्पम् = अत्यल्पम्,अति + अधिकम् = अत्यधिकम्,प्रति + अक्षम् = प्रत्यक्षम्,अति + अन्तम्= अत्यन्तम् ,यदि + अपि= यद्यपि
ई + अ = य् के आधार पर-देवी + अर्पणम् = देव्यर्पणम्। 
इ+आ=या के आधार पर-प्रति + आघातम् = प्रत्याघातम्,अति + आवश्यकम्= अत्यावश्यकम् ।
ई+आ=या के आधार पर-नदी+आगम्=नद्यागम्।
इ+उ= यु के आधार पर-अति+उत्तमम्= अत्युत्तमम्।
इ+ऊ=यू के आधार पर-अति+ऊष्मम्= अत्यूष्मम्।
इ+ए=ये के आधार पर-प्रति+एकम्= प्रत्येकम् इत्यादि
नियम-2. उ, ऊ के आगे किसी असमान स्वर के आने पर उ ऊ का 'व्' हो जाता है-उ,ऊ+भिन्न स्वर=व् । 
उदाहरण-
+अ=व के आधार पर-अनु+अयम्= अन्वयम्
उ+आ के आधार पर=वा-सु+आगतम् = स्वागतम्
+आ के आधार पर=वा-वधू+आगमनम्= वध्वागमनम्  
उ +इ के आधार पर=वि-अनु+इतम्= अन्वितम्
ऊ+इ के आधार पर=वि-वधू+इच्छा-वध्विच्छा
उ+ए के आधार पर=वे-अनु + एषणम्= अन्वेषणम्
उ+ओ के आधार पर=वो-गुरु + ओदनम्= गुर्वोदनम्
उ+औ के आधार पर=वौ-गुरु+औदार्यम्= गुरवौदार्यम् इत्यादि
नियम-3.ऋ,ऋृ के आगे किसी असमान स्वर के आने पर ऋ को 'र्' हो जाता है-ऋ,ऋृ + भिन्न स्वर = र् ।
उदाहरण-
+अ =र के आधार पर-पितृ+अर्थम्-पित्रर्थम्।
ऋ+आ के आधार पर=रा-पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा इत्यादि
नियम-4.लृ के आगे किसी असमान स्वर के आने पर लृ को 'ल्' हो जाता है-लृ+ भिन्न स्वर = ल्। 
उदाहरण- 
लृ+अ= के आधार पर-लृ+अर्थम्=लर्थम्।
लृ+आ=ला के आधार पर-लृ+आकृति= लाकृति इत्यादि।
5.अयादि संधि-
यदि ए, ऐ, ओ और औ के बाद दूसरा स्वर आता है तो  जो विकार उत्पन्न होता है, तो उसे अयादि संधि कहा जाता है।जब ए, ऐ, ओ और औ के बाद कोई भिन्न स्वर आता है तो ‘ए’ का अय, ‘ऐ’ का आय्, ‘ओ’ का अव् और ‘औ’ का  आव् हो जाता है- एचोऽयवायाव:।
इसके चार नियम हैं-
नियम-1.'' के आगे किसी असमान स्वर के आने पर '' को 'अय्' हो जाता है-ए + भिन्न स्वर=अय्।
उदाहरण-ने+अनम्=नयनम्,चे+अनम्=चयनम्,शे+अनम्=शयनम् इत्यादि।
नियम-2.'' के आगे किसी असमान स्वर के आने पर '' को 'आय्' हो जाता है-ऐ + भिन्न स्वर=आय् ।
उदाहरण-नै+अकः=नायकः,गै+अकः=गायकः,विधै+अकः=विधायक:इत्यादि।
नियम-3.'ओ' के आगे किसी असमान स्वर के आने पर 'ओ' को 'अव्' हो जाता है-ओ + भिन्न स्वर = अव्।
उदाहरण-पो+अनम्=पवनम्,भो+अनम्=भवनम् ,श्रो+अनम्-श्रवणम् इत्यादि।
नियम-4.'औ' के आगे किसी असमान स्वर के आने पर 'औ' को 'आव्' हो जाता है-औ+भिन्न स्वर = आव्।
उदाहरण-पौ + अकः=पावकः,भौ+उकः=भावुकः,शौ+अक:=शावकः इत्यादि।  
स्वर संधि के अन्य विविध प्रकार-
1.वैकल्पिक स्वर सन्धि- यह अयादि सन्धि का वैकल्पिक सन्धि या अपवाद है। महान् वैयाकरण महर्षि शाकल्य 
के मतानुसार  पहले पद के अंतिम वर्ण ए,ऐ,ओ,औ से पहले अवर्ण अर्थात् अ या आ हो तो यहां अयादि सन्धि 
नहीं होता है,परंतु महर्षि पाणिनि के मतानुसार यहां अयादि सन्धि होता है। इस प्रकार पहले पद के अंतिम वर्ण
ए,ऐ,ओ,औ से ठीक पहले  यदि अवर्ण अर्थात् अ या आ हो  तथा बाद में अश् प्रत्याहार अर्थात् स्वर वर्ण या किसी 
वर्ग का तीसरा,चौथा और पांचवां वर्ण अथवा ह,य,व,र,ल में से कोई वर्ण आता हो तो य् और व् का लोप हो जाता है। 
यह लोप शाकल्य के मतानुसार होता है- लोपः शाकल्यस्य। इस कारण इसे शाकल्य स्वर संधि कह सकते हैं।परंतु 
पाणिनि के मतानुसार यह लोप नहीं होता है। यथा-हरे+इह-हरयिह/हर इह,तस्यै+इमानि-तस्यायिमानी/
तस्याइमानि,रात्रौ+आगतः-रात्रावागतः/रात्रा आगतः,ऋतौ+अन्नम्-ऋतावन्नम्/ऋता अन्नम्,विष्णो+इह-विष्णविह/
विष्णइह इत्यादि।
2. पूर्व रूप सन्धि- यदि किसी पद के अन्त में स्थित  'ए या ओ' के बाद 'अ' आता है तो 'अʼ के स्थान 
पर लुप्ताकर या अवग्रह हो जाता है-एङःपदान्तादति।यथा-  सर्वे+अपि-सर्वेЅपि,वने+अत्र-वनेЅत्र,बालो+अवदत्-
बालोЅवदत्,लोको+अयम्-लोकोSयम्,ते+अपि = तेऽपि  इत्यादि।
3.पररूप सन्धि-यदि किसी उपसर्ग  अन्त में 'अ'हो तथा उसके बाद ए अथवा ओ से प्रारंभ होने वाली धातु से बनी 
कोई क्रिया आती हो तो पहले वाला 'अ' बाद वाले 'ए' या'ओ'के रूप में बदल जाता है। इस कारण इसे पररूप 
संधि कहते हैं।यथा- प्र+एजते-प्रेजते, उप+ओषति-उपोषति,मार्त+अण्डः-मार्तण्डः इत्यादि।
4.प्रगृह्य सन्धियदि द्बिवचन वाले शब्दों के अन्त में ई,ऊ अथवा ए हो तथा उसके बाद कोई भी स्वर हो तो दोनों में 
से कोई भी सन्धि  नहीं होती।इस कारण इसे संधि के नियमों से मुक्त अर्थात् प्रगृह्य सन्धि अथवा अपने रूप में ही 
रह जाने वाला प्रकृतिभाव सन्धि  कहते हैं।यथा- कवी + इच्‍छत:,विष्‍णू + इमौ,बालिके + आगच्‍छत: इत्यादि।
व्यंजन सन्धि-
व्यंजन वर्ण का स्वर या व्यंजन वर्ण के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है,उसे व्यंजन सन्धि कहते हैं। यथा-
अच्+अन्तः-अजन्तः,दिक्+गजः-दिग्गजः,सम्+कृतम्-संस्कृतम् इत्यादि।
सूत्र या नियम-
नियम-1.स्तोःश्चुना श्चुः-श्चुत्व सन्धि-'स्' वर्ण या तवर्ग के वर्णों के बाद में 'श्' वर्ण अथवा चवर्ग का 
कोई वर्ण आता है,तो 'स्' वर्ण 'श्' वर्ण में बदल जाता है तथा चवर्ग  का वर्ण क्रमशः तवर्ग के वर्ण में बदल 
जाता है। 
(ख). तवर्ग के किसी वर्ण के साथ में 'श' या चवर्ग का कोई वर्ण आता है, तो तवर्ग के वर्ण के स्थान पर 
क्रमशः चवर्ग का वर्ण हो जाता है। यथा-उत्+चारणम्=उच्चारणम्,सत्+चरित्रम्=सच्चरित्रम्,जगत्+जननी=जगज्जननी,सत्+चित्=सच्चित्, एतत्+जलम्=एत
ज्जलम्,बृहत्+झरः=बृहज्झरः,सत्+जनः=सज्जन:,उत्+ज्वलः=उज्ज्वलः,याच्+नायाञ्चा, सन्+जयः=सञ्जयः,सन्+श
म्भुः=सञ्शम्भुः,शार्ङ्गिन्+जय=शार्ङ्गिञ्जय इत्यादि।
नियम-2.ष्टुना ष्टुः-ष्टुत्व सन्धि- सवर्ण अथवा तवर्ण के बाद में षवर्ण अथवा टवर्ग का कोई वर्ण आता है तो 
सवर्ण, षवर्ण में तथा तवर्ग टवर्ग  में बदल जाता है। 
(क).'स्' या 'ष्' अथवा विसर्ग के बाद 'ष्' या तवर्ग का कोई वर्ण आता है तो 'स्' या 'ष्' के स्थान पर 'ष्' हो जाता है।
यथा-बालस्+षष्ठः-बालष्षष्ठः,बालः+षष्ठः-बालष्षष्ठः,रामस्+षष्ठः-रामष्षष्ठः,रामः+षष्ठः-रामष्षष्ठः,रामस्+टीकते-रामष्टीकते,रामः+टीकते-रामष्टीकते,इष्+तः-इष्टः,कृष्+नः-कृष्णः,विष्+नुः-विष्णुः,आकृष्+तः-आकृष्टः इत्यादि।
 (ख).तवर्ग के किसी वर्ण के बाद टवर्ग का कोई वर्ण आता है, तो तवर्ग का वर्ण  टवर्ग के वर्ण में बदल जाता है।यथा-
तत्+टीका-तट्टीका,तत्+ठकारः-तट्ठकारः,तत्+डमरुः-तड्डमरुः,उत्+डयनम्-उड्डयनम्.चक्रिन्+ढौकसे-चक्रिण्ढौकसे इत्यादि।    
नियम-3.झलां जशोSन्ते-जश्त्व सन्धि- झल् प्रत्याहार अर्थात् वर्गों के  पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे तथा श,ष,स,ह
 वर्ण  के बाद किसी भी वर्ग का पहला, तीसरा चौथा और पांचवां वर्ण या कोई स्वर वर्ण आता है, तो पहले 
झल् प्रत्याहार के वर्ण के स्थान पर जश् प्रत्याहार अर्थात् उसी वर्ग का तीसरा वर्ण अर्थात् ग्,ज्,ड्,द्,ब् हो जाता है।यथा-वाक्+ईशः-वागीशः,चौरात्+भयम्-चौराद्भयम्,अच्+अन्तः-अजन्तः,षट्+दर्शनम्-षड्दर्शनम्,जगत्+ईशः-
जगदीशः, दिक्+अम्बरः-दिगम्बरः इत्यादि।  
नियम-4.झलां जश झशि- झल् प्रत्याहार अर्थात् वर्गों के पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे तथा श,ष,स,ह वर्ण  के बाद
 झश् प्रत्याहार अर्थात्  किसी भी वर्ग का तीसरा या चौथा वर्ण आता है, तो झल् प्रत्याहार के वर्ण के स्थान पर जश्प्रत्याहार अर्थात् उसी वर्ग का तीसरा वर्ण अर्थात् ग्,ज्,ड्,द्,ब्  हो जाता है। यथा-धनात्+धर्मः-धनाद्धर्मः, तिर्यक्+
 गच्छति- तिर्यग्गच्छति, लभ्+धः-लब्धः,सिध्+धिः-सिद्धिः,अप्+जः-अब्जः,आरभ्+धम्-आरब्धम् इत्यादि।  नियम-5.तोर्लिः-यदि तवर्ग के किसी वर्ण के बाद 'ल्' आता है, तो तवर्ग के स्थान पर 'ल्' हो जाता है तथा यदि 
'न्' वर्ण के बाद 'ल्' आता है, तो तवर्ग के स्थान पर अनुनासिक 'ल्ँ' हो जाता है।यथा-उत्+लंघनम्-उल्लंघनम्, तत्+लीनम्-तल्लीनम्,घृत्+लेपनम्-घृल्लेपनम्,बलवान्+लोके-बलवाँल्लोके,भवान्+लुब्धः-भवाँल्लुब्धः इत्यादि।             
नियम-6.यरोSनुनासिकेSनुनासिको वा- यदि पहले यर् अर्थात् ह को छोड़कर किसी भी व्यंजन वर्ण के बाद
अनुनासिक अर्थात् सभी वर्गों के अंतिम वर्ण ङ,ञ,ण,न,म आता है, तो पहले वाला वर्ण अपने वर्ग का पांचवा वर्ण हो
 जाता है।यथा-दिक्+नागः-दिङ्नागः,सत्+मतिः-सन्मतिः,तत्+न-तन्न,चेत्+न-चेन्न,पद्+नगः-पन्नगः इत्यादि। नियम-7.शश्छोSटि-यदि झय् प्रत्याहार अर्थात् किसी वर्ग के पहले.दूसरे,तीसरे और चौथे वर्ण के बाद 'श' हो तथा
 'श' के बाद कोई स्वर वर्ण अथवा ह्,य्,व्,र् वर्ण हो तो 'श' के स्थान पर विकल्प से 'छ्' हो जाता है अर्थात् 'छ्' होता भी है और नहीं भी होता है। यथा-तत्+शिव-तच्छिवः/तच्शिवः,तत्+शिला-तच्छिला/तच्शिला,सत्+शीलः-सच्छीलः/सच्शीलः,तत्+शिरः-तच्छिरः/तच्शिरः,तत्+शरणम्-तच्छरणम्/तच्शरणम् इत्यादि।       नियम-8.मोSनुस्वारः-यदि 'म्' के बाद कोई हल् या व्यंजन वर्ण आता है,तो 'म्' क्या स्थान पर अनुस्वार हो जाता
 है।यथा-सम्+न्यासी-संन्यासी,सम्+योगः-संयोगः,यशान्+शि-यशांसि,चेतान्+शि-चेतांसि,हरिम्+वन्दे-हरिं वन्दे, दुःखम्+सहते-दुःखं सहते,धनम्+यच्छ-धनं यच्छ इत्यादि।
नियम-9.नश्चापदान्तस्य झलि-यदि 'न्' अथवा 'म्' के बाद झल् प्रत्याहार अर्थात् किसी भी वर्ग का पहला,दूसरा,तीसरा और चौथा अथवा श,ष,स आता है, तो 'न्' अथवा 'म्' के स्थान पर अनुस्वार हो जाता हैयथा-पयान्+सि-पयांसि,नम्+स्यति-नंस्यति,यशान्+सि-यशांसि,चेतान्+सि-चेतांसि,आक्रम्+स्यते-आक्रंस्यते इत्यादि।
नियम-10.अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः-यदि 'न्' अथवा 'म्' या अनुस्वार के बाद ही यय् प्रत्याहार अर्थात्
श,ष,स,ह को छोड़कर कोई दूसरा व्यंजन वर्ण हो तो अनुस्वार के अस्थान पर परसवर्ण अर्थात् अगले वर्ण कापांचवां वर्ण हो जाता हैयथा-अन्/अं+कितः-अङ्कितः,अन्/अं+चितः-अञ्चितः,कुन्/कुं+ठितः-कुण्ठितः,शम्/शं+भूः-
शम्भूः,दन्/दं+तः-दन्तः,अहम्/अहं+कारः-अहंकारः,शाम्/शां+तः-शान्तः  इत्यादि।          
नियम-11.वा पदान्तस्य-किसी पद के अन्त में यदि 'न्' अथवा 'म्' या अनुस्वार के बाद यय् प्रत्याहार अर्थात्
श,ष,स,ह को छोड़कर कोई दूसरा व्यंजन वर्ण हो तो अनुस्वार का परसवर्ण अर्थात् अगले वर्ण का पांचवा वर्ण
 विकल्प से होता है अर्थात् परसवर्ण होता भी है और नहीं भी होता हैयथा-त्वम्/त्वं+करोषि-त्वंङ्करोषि/त्वं करोषि,
 ग्रामम्/ग्रामं+गच्छति-ग्रामङ्गच्छति/ग्रामं गच्छति,तृणम्/तृणं+चरति-तृणञ्चरति/तृणं चरति  इत्यादि।नियम-12.नश्छव्य प्रशान्- यदि 'न्' के बाद छव् प्रत्याहार अर्थात् च्,छ्,ट्,ठ्,त्,थ् आता है तो 'न्' के स्थान पर
अनुस्वार या चंद्रबिंदु तथा च् या छ् रहने पर 'श्', ट् या ठ् रहने पर  'ष्', त् या थ् रहने पर 'स्'  हो जाता हैयथा-कस्मिन्+चित्-कस्मिंश्चित्,हसन्+चलति-हसंश्चलति,भवान्+चलति-भवाँश्चलति,चलन्+टिट्टिभिः-चलष्टिट्टिभिः,
 महान्+टङ्कारः-महांष्टङ्कारः,हसन्+ठक्कुरः-हसंष्ठक्कुरः,महान्+छिद्रः-महांश्छिद्रः,तस्मिन्+तरौ-तस्मिंस्तरौ,
चक्रिन्+त्रायस्व-चक्रिंस्त्रायस्व  इत्यादि।
अपवाद-प्रशान्+तनोति-प्रशान्तनोति।                   
नियम-13.समः सुटि-सम् उपसर्ग के बाद कृ धातु से बना कोई शब्द आता हो तो दोनों के बीच में 'स्' नहीं रहने पर
 सुट् अर्थात् 'स्' का आगमन हो जाता है तथा 'म्' का अनुस्वार या चंद्रबिंदु हो जाता हैयथा-सम्+कृतिः-संस्कृतिः, सम्+कारः-संस्कारः, सम्+कृतम्-संस्कृतम्, सम्+करणम्-संस्करणम्,सम्+कर्त्ता-संस्कर्त्ता  इत्यादि।
नियम-14.झयो होSन्यतरस्याम्-झय् प्रत्याहार अर्थात किसी वर्ग के पहले दूसरे तीसरे और चौथे वर्ण के बाद 'ह्' होतो पहले वर्ण के स्थान पर उसी वर्ग का तीसरा वर्ग तथा  'ह्' के स्थान पर उसी वर्ग का चौथा वर्ण विकल्प से होता है अर्थात् चौथा वर्ण होता भी है और नहीं भी होता हैयथा-वाक्+हरिः-वाग्घरिः/वाग्हरिः,तत्+हितः-तद्धितः/तद्हितः,उत्+हारः-उद्धारः/उद्हारः,उत्+हृतम्-उद्धृतम्/उद्हृतम्,अप्+हरणम्-अब्भरणम्/अब्हरणम्,तत्+हानिः-तद्धानिः/तद्हानिः,अच्+ह्रस्व-अज्ह्रस्वः  इत्यादि।     
 नियम-15.खरि च-झल् प्रत्याहार अर्थात् अनुनासिक व्यंजन-ञ्,म्,ङ्,ण्,न् तथा अंतस्थ व्यंजन -य्,र्,ल्,व् को
छोड़कर किसी भी व्यंजन के बाद यदि खर् प्रत्याहार अर्थात् क्,ख्,च्,छ्,ट्,ठ्,त्,थ्,प्,फ् में से कोई वर्ण आता है तोपहले वर्ण के स्थान पर उसी वर्ग का पहला वर्ण  हो जाता हैयथा-विपद्+कालः-विपत्कालः/तज्+शिवः-तच्शिवः,
 दिग्+पालः-दिक्पालः,सद्+कारः-सत्कारः,शरद्+सदृशः-शरत्सदृशः इत्यादि।
नियम-16.वावसाने- झल् प्रत्याहार अर्थात् अनुनासिक व्यंजन-ञ्,म्,ङ्,ण्,न् तथा अंतस्थ व्यंजन -य्,र्,ल्,व् को
 छोड़कर किसी व्यंजन के बाद कोई भी वर्ण नहीं हो तो वह तीसरे वर्ण में बदल जाता हैयथा-रामात्-रामाद्,वाक्-वाग्  इत्यादि। 
 नियम-17.छे च-यदि ह्रस्व स्वर के बाद 'छ्' आता है, तो 'छ्' के पहले 'च्' जुड जाता है अर्थात् 'च्' का आगमनहोजाता है।यथा-वृक्ष+छाया-वृक्षच्छाया,शिव+छाया-शिवच्छाया,तरु+छाया-तरुच्छाया,वि+छेदः-विच्छेदः,अनु+छेदः-अनुच्छेदः,परि+छेदः-परिच्छेदः,स्व+छन्दः-स्वच्छन्दः  इत्यादि।
नियम-18.पदान्तात् वा- यदि किसी पद के अंतिम दीर्घ स्वर के बाद 'छ्' आता है, तो 'छ्' के पहले विकल्प से
 'च्' आगम हो जाता है अर्थातं 'च्' का आगमन होता भी है तथा नहीं भी होता है।यथा-लक्ष्मी+छाया-लक्ष्मीच्छाया/लक्ष्मी छाया,श्री+छत्रम्-श्रीच्छत्रम्/श्री छत्रम् इत्यादि। 

विसर्ग सन्धि-
विसर्ग का स्वर अथवा व्यञ्जन वर्ण के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है तो उसे  विसर्ग सन्धि कहते हैं।यथा-मनः+जः-
मनोजः,निः+अक्षरः-निरक्षरः,कुत:+ अत्र=कुतोऽत्र,यश:+दा=यशोदा  इत्यादि।
प्रमुख नियम-
(1) विसर्जनीयस्य सः–यदि विसर्ग के बाद खर् प्रत्याहार का वर्ण 'च्'या' छ्' आता है तो  विसर्ग के स्थान पर 'श्',
'ट्'या 'ठ्' के रहने पर 'ष' तथा 'त' या 'थ' रहने पर 'स्' हो जाता है-
(क) यदि विसर्ग के बाद 'च्' या' छ्' आता है तो  विसर्ग के स्थान पर  'श्',हो जाता है।यथा-बाल:+चलति=बालश्चति, 
कः + चित्-कश्चित्,हरिः + चन्द्र:- हरिश्चन्द्रः।निः+छल:-निश्छल:,वेणुः+चन्दनायते=वेणुश्चन्दनायते  इत्यादि।
(ख) यदि विसर्ग के बाद 'ट्'या 'ठ्' आता है तो  विसर्ग के स्थान पर  'ष',हो जाता है।यथा-धनु: + टङ्कारः =धनुष्टङ्कारः, 
चतुरः +ठक्कुर:=चतुरष्ठक्कुरः इत्यादि।
(ग) यदि विसर्ग के बाद 'त' या 'थ आता है तो  विसर्ग के स्थान पर 'स्' हो जाता है।यथा-तः+था-तस्था,सरः+तीरे-
सरस्तीरे,अधिकार:+ते-अधिकारस्ते,विष्णुः,त्रायते-विष्णुस्त्रायते,हरिः + त्राता-हरिस्त्राता,ततः+तम्-ततस्तम् ।
(घ)यदि विसर्ग के बाद 'क्' या 'ख्' अथवा 'प्' या 'फ्' आता है, तो विसर्ग में कोई परिवर्तन नहीं होता है। यथा-
कः+कथयति-कः कथयति,सः+खनति-सः खनति,छात्र:+पठति-छात्रः पठति।वृक्षः+फलति-वृक्षः फलति इत्यादि।
(2)वा शरि-यदि विसर्ग के बाद शर् प्रत्याहार के वर्ण श्, ष्, स्  वर्ण हों तो विसर्ग के स्थान पर विसर्ग विकल्प         
से  वही वर्ण हो जाता है। यहाँ 'स्तोः शचुना शत्रु' एवं ''टुना ष्टुः' सूत्र के व्याधार पर विसर्ग के स्थान पर विकल्प से 
क्रमश: 'श्', 'ष्', 'स्' हो जाते हैं।यथा-,निः+सन्देहः -निःसन्देहः निस्संदेहः,राम: + षष्ठः- रामष्षष्ठः/रामः 
षष्ठः,बाल:+स्वपिति-बाल:स्वपिति/बालस्स्वपिति,निः+सार:-निःसार/ निस्सारः,हरि:+शेते- हरि: शेते/
हरिश्शेते,राम:+शेते- रामः शेते/रामश्शेते इत्यादि ।
(3)अतोरोरप्लुतादप्लुते- यदि विसर्ग के आगे-पीछे 'अ' हो तो विसर्ग के स्थान पर 'उ' तथा यह 'उ' पहले के 'अ' 
मिलकर गुण सन्धि का नियमानुसार 'ओ' हो जाता है तथा बाद वाले  'अ' के स्थान पर अवग्रह (S) हो जाता है।यथा-
सः+अहम्-सोऽहम्,प्रथमः+ अध्यायः-प्रथमोऽध्यायः, कः+अस्ति-कोऽस्ति,नृपः+अवदत् - नृपोऽवदत्, कः + अयम्- 
कोऽयम् इत्यादि।
(4)हशि च-यदि विसर्ग के पहले 'अ' हो और बाद में हश् प्रत्याहार अर्थात् किसी  भी वर्ग का तीसरा,चौथा तथा 
पाँचवाँ वर्ण अथवा 'य्. र्, ल्. व्, ह्' वर्ण हो तो विसर्ग के स्थान पर 'उ' हो जाता है। वही 'उ' अपने पूर्व वर्ण 'अ' से 
मिलकर गुण-सन्धि के नियम के अनुसार 'ओ' में बदल जाता है। यथा-मनः + रमम्- मनोरमम्,मनः + रञ्जनम्- 
मनोरञ्जनम्,रामः+वदति-रामोवदति,सर:+वर:-सरोवरः,मनः+रथः-मनोरथः,यशः+बलम्-यशोबलम्,शोभन:+ग्रन्थः-
शोभनोग्रन्थः,मनः+भाव:-मनोभावः,मनः+हरः-मनोहरः इत्यादि।
(5)ससजुषो रुः–यदि विसर्ग के पहले 'अ' या 'आ' को छोड़कर कोई दूसरा स्वर हो तथा बाद में कोई भी स्वर वर्ण 
या हश् प्रत्याहार अर्थात् किसी  भी वर्ग का तीसरा,चौथा तथा पाँचवाँ वर्ण अथवा 'य्. र्, ल्. व्, ह्' वर्ण हो तो विसर्ग के 
स्थान पर 'र्' हो जाता है। यथा-पितुः+इच्छा-पितुरिच्छा,बधूः+एषा-बधूरेषा, निः+उपाय:-निरुपायः,बन्धुः+वयः-
बन्धुर्वयः,दु:+आचार:-दुराचारः,वपुः+आख्याति-वपुराख्याति,पुनः+अपि-पुनरपि,दुः+गत:-दुर्गतः इत्यादि।
         यदि पदान्त 'स्' अथवा 'सजुष्' शब्द का 'ष्' हो तो 'स्' अथवा 'ष्' का 'रु' होकर 'र्' शेष रह जाता है,जो विसर्ग 
में बदल जाता है। यथा-रामस्-रामरु -रामः,सजुष्-सजुरु- सजुर्-सजुः । 
(6)रोरि/ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽण:- यदि 'र्' या विसर्ग के बाद 'र्' आता है  तो पहले वाले 'र्' का लोप हो जाता है। 
इसी प्रकार 'ढ्' के बाद  'ढ्' आता है,तो पहले वाले 'ढ्' का लोप हो जाता है तथा इसके  पहले स्थित अण् अर्थात् ह्रस्व 
स्वर-'अ', 'इ', 'उ' का दीर्घ हो जाता है।ये दोनों सूत्र एक-दूसरे के पूरक हैं। यथा-अन्तः-अन्तर्-राष्ट्रिय:-
अन्ताराष्ट्रिय:,नि:-निर्- रोग:- नीरोगः,गुरुः-गुरुर् +रुष्टः-गुरुरुष्टः,हरिः-हरिर्+रम्य:- हरी रम्यः,पुनः-पुनर्+रमते, 
पुनारमते,शम्भु:-शम्भुर्+राजते- शम्भू राजते,नि:-निर्+रस:-नीरसः,लिढ्+ढः:- लीढः,उढ्+ढा-ऊढा इत्यादि।
         अपवाद-1.यदि 'र' अथवा 'ढ्' के पहले अ, इ, उ  स्वर को छोड़कर 'ऋ' स्वर हो तो उसका दीर्घ नहीं होता तथा 'र' अथवा  'ढ्' का  पूर्ववत् लोप हो जाता है। यथा-दृढ्+ढः-दृढः,तृढ्+ढः-तृढः, वृढ्+ढः-वृढः इत्यादि।
         2.यदि 'पुनारमते' को छोड़कर अन्य दूसरे शब्दों में  'र्' के पूर्व 'अ' हो तो पूर्वोक्त नियम नहीं लगता।यथा-मनर् रथ:- मनोरथः । 
        3.यदि विसर्ग का 'र्' हो तथा उसके पहले 'अ' हो तो भी दीर्घ नहीं होता।यथा-रामः-रामर्+राजते-रामो राजते।  
(7) इदुदुपधस्य चाप्रत्ययः- इत् उत्+उपधस्य+च+अप्रत्ययः-विसर्ग के पहले अगर 'इ' या 'उ' हो और बाद में 'क्', 
'ख्','प्','फ्' में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग के स्थान पर 'ष' हो जाता है।यथा-आविः+कृतम-आविष्कृतम्,निः+क्रान्त:-
निष्क्रान्तः,दुः+कृतम् +दुष्कृतम्, निः+ कारणम्-निष्कारणम्,धनु:+खण्डम्-धनुष्खण्डम्,निः+फलम्-निष्फलम्, 
दुः+प्रापणम्-दुष्प्रापणम्,दुः+पच:- दुष्पच: इत्यादि।   
(8)खरावसानयो विसर्जनीय:- यदि 'र्' के बाद खर् प्रत्याहार अर्थात् किसी भी  वर्ग भी का प्हला या दूसरा वर्ण
अथवा 'श्', 'ष्', 'स्' वर्ण हों अथवा नहीं भी हों तो 'र्' का विसर्ग हो जाता है।यथा-प्रातर्+काल:-प्रातः कालः 
प्रातर्+पठति-प्रातः पठति,प्रातर्+खादति-प्रातः खादति,वृक्षर्+ फलति-वृक्षः फलति,पुनर्+पृच्छति-पुनः 
पृच्छति,राम+स्-रामः,कृष्ण+स्-कृष्णः, इत्यादि।
(9)भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि /हलि सर्वेषाम्- पहले सूत्र के अनुसार यदि भो, भगो:, अघो:, अ: अथवा आः 
के बाद अश् प्रत्याहार अर्थात् स्वर वर्ण या किसी भी वर्ग का तीसरा,चौथा तथा पाँचवाँ वर्ण अथवा 'य्. र्, ल्. व्, ह्' 
वर्ण हो तो  विसर्ग के स्थान पर सकार (स्) होकर 'य्' में बदल जाता है। पुनः दूसरे सूत्र के अनुसार  'य्' का लोप हो 
जाता है।ये दोनों सूत्र परस्पर पूरक हैं। 'लोपः शाकल्यस्य' सूत्र भी इसी लोप की ओर संकेत करता है।यथा-
भगो:+नमस्ते-भगो नमस्ते,अघो:+याहि-अघो याहि,बाल:+एव-बाल एव,देवा:+आगच्छन्ति-देवा आगच्छन्ति, नरा:+ 
यान्ति-नरा यान्ति,भोः+मित्र-भो मित्र,देवा:+इह-देवा इह,सुतः+आगच्छन्ति-सुत आगच्छन्ति इत्यादि।
(10)कुप्वो≍क≍पौ च-यदि कवर्ग या पवर्ग के पहले विसर्ग हो तो विसर्ग के स्थान पर जिह्वामूलीय अथवा 
उपध्मानीय हो जाता है अन्यथा विसर्ग ही रह जाता है। यथा-रामः+कथयति-रामकथयति/रामः कथयति ।
कृष्ण:+खादति-कृष्णखादति/कृष्ण: खादति,पय+पानम्प-यपानम्/पय: पानम्,वृक्ष:+फलति-वृक्षफलति/वृक्षः फलति इत्यादि।
(11)नमस्पुरसोर्गत्यो:- 'कृ' धातु के साथ 'नम:' का समास होने पर 'नमः' गतिसंज्ञक कहलाता है ।'पुर:' भी ‘नम:' की तरह अव्यय होने के कारण नित्य गतिसंज्ञक है।गतिसंज्ञक 'नमः' और 'पुरः' शब्द की सन्धि 'कृ' धातु के साथ हो तो विसर्ग के स्थान पर 'स्' हो जाता है।यथा-नमः+करोति-नमस्करोति,पुरः+करोति-पुरस्करोति,नमः+कृत्यम्-नमस्कृत्यम्,नमः+ कारः-नमस्कारः,पुरः+कारः-पुरस्कारः इत्यादि।
(12)सोऽपदादी/पाशकल्पक काम्येष्विति वाच्यम्-यदि विसर्ग के साथ पानम्, कल्पम् तथा काम्यम् इत्यादि 
शब्दों की सन्धि  हो तो विसर्ग के स्थान पर 'स्' हो जाता है।यथा-यशः+ काम्यति-यशस्काम्यति,यश:+कम्-
यशस्कम् ,पयः+पानम्-पयस्पानम्,यशः+कल्पम्-यशस्कल्पम् इत्यादि।
(13)तिरसोऽन्यतरस्याम्—यदि 'तिरः' के बाद यदि  क, ख, प, फ आता है,तो विसर्ग  के स्थान पर विकल्प से 'स्' 
हो जाता है।यथा-तिरः+पाश:-तिरस्पाशः,तिर:+फलम्-तिरस्फलम्,तिरः+करोति-तिरस्करोति,तिरः+खण्डिनी-
तिरस्खण्डिनी, इत्यादि।
(14)अतः कृकमिकंसकुंभपात्रकुशाकर्णीष्वनव्ययस्य अधः शिरसी पदे-यदि विसर्ग के साथ कार, कर, 
काम,कान्त, कंस, कुम्भ, पात्र, कुशा,कर्णी इत्यादि शब्दों की सन्धि  हो तो विसर्ग के स्थान पर 'स्' हो जाता है।इसी 
प्रकार अधः,शिर: आदि शब्दों की सन्धि हो तो भी के स्थान पर 'स्' हो जाता है तथा यदि 'सर्पि:' शब्द के साथ सन्धि 
हो तो विसर्ग का 'ष्' हो जाता है। यथा-अय:+कार:-अयस्कार:(लोहार) श्रेय:+कर:- श्रेयस्करः । अय:+काम:-
अयस्कामः (लोहे का इच्छुक) अयः+कान्त-अयस्कान्तः (चुम्बक) ,पय:+कुम्भः-पयस्कुम्भः (दूध का बर्तन) 
अय:+कुशा-अयस्कुशा (लोहे का एक पात्र)।अयः+कर्णा-अयस्कर्णी (लोहे का बर्तन) ,अध:+पदम्-अधस्पदम् (नीचे 
का पैर),सर्पिः+पाशम्-सर्पिष्पाशम् (खराब घी) सर्पिः+कल्पम्-सर्पिष्कल्पम् (थोड़ा खराब घी) इत्यादि।