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शनिवार, 4 जुलाई 2020

दीनबन्धुः श्रीनायारः

 

दीनबन्धुः श्रीनायारः

      जेसीईआरटी तथा  एनसीईआरटी के कक्षा-12 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग 2 के  दशमः पाठ: दीनबन्धुः श्रीनायारः  का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर सीबीएसई  के लिए यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं।                                                                                                                                    प्रस्तुत पाठ उड़िया भाषा के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदासवर्मा द्वारा विरचित 'पाषाणीकन्या' कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। इसके अनुवादक डॉ. नारायण दाश हैं। इस कथा के नायक श्रीनायार का पालन-पोषण एक अनाथाश्रम में हुआ है। श्रीनायार ने अपनी कर्मदक्षता, दाक्षिण्य और सेवामनोवृत्ति से समाज में आदर्श स्थापित किया है। वह प्रतिमास अपने वेतन का आधा से अधिक भाग केरल में स्थापित अनाथाश्रम को भेजते हैं। प्रस्तुत कथा में श्रीनायार का लोककल्याणकारी आदर्श चरित्र वर्णित है।

श्रीनायारः केन्द्रसर्वकारतः स्थानान्तरणेन आगत्य ओडिशासर्वकारस्य अधीने प्रायः वर्षत्रयेभ्यः कार्यं करोति। तथाप्यस्मिन् वर्षत्रयात्मके कालखण्डे एकवारमपि स्वराज्यं केरलं प्रति गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् । स स्वल्पभाषी, अतस्तस्य मनःकथा मनोव्यथा वा बोधगम्या नास्ति। सन्तुलितो वार्तालापः, साक्षात्समये आगमनम्, ततः सञ्चिकासु मनोनिवेशः, कार्यं समाप्य स्वगृहं प्रत्यागमनञ्च तस्य वैशिष्ट्यमासीत्। तस्य कर्मनैपुण्यं दृष्ट्वा एव ओडिशासर्वकारस्तं स्थानान्तरणेन स्वीकृत्य खाद्यापूर्तिविभागे सचिवपदे नियुक्तवान् । गतस्य वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यद् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्। खाद्ये अपमिश्रणं न्यूनीभूतम्। अत उपभोक्तृणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे। मन्त्रिणां मध्येऽपि तस्य सुख्यातिः वर्तते।

श्रीनायार केन्द्र सरकार से स्थानान्तरित होकर उड़ीसा सरकार के अधीन प्रायः तीन वर्ष तक कार्य करता है। तो भी (उसने) इस तीन वर्ष के कालखण्ड में एक बार भी अपने राज्य केरल की ओर जाने की इच्छा प्रकट नहीं की। वह बहुत कम बोलने वाला है, इसीलिए उसके मन की बात या मन की पीड़ा नहीं जानी जा सकती है। सन्तुलित वार्तालाप, ठीक समय पर पहुँचना, फिर रजिस्टरों में मन लगाए रखना और कार्य समाप्त कर अपने घर वापिस लौटना उसकी विशेषता थी। उसकी कार्यनिपुणता देखकर ही उड़ीसा सरकार ने उसका स्थानान्तरण स्वीकार कर उसे खाद्य-आपूर्ति विभाग में सचिव पद पर नियुक्त कर दिया था। पिछले तीन वर्ष के आकलन से पता चलता है कि विभाग की कार्यनिपुणता दस गुणा बढ़ गई है। खाद्य सामग्री में मिलावट कम हो गई है। अतः उपभोक्ताओं का भी विभाग के विरोध में (कोई) अभियोग (मुकदमा) नहीं है। मन्त्रियों के बीच में भी उसकी अच्छी ख्याति है।

श्रीनायारस्य दायित्वग्रहणस्य एकमासाभ्यन्तरे बहुदिनेभ्यः स्थगितानां विविध समस्यानामपि समाधानं जातम्। स्वकार्यं त्यक्त्वा अपरस्य सहकारस्तस्य परमधर्मः। सः प्रतिमासं प्रथमदिवसे स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं केरलं प्रेषयति स्म कश्चित् सम्पर्कः। तेनानुमीयते तस्य राज्येन सह अस्ति कश्चित् सम्पर्कः। कानिचन मलयालमभाषायाः संवादपत्राणि अतिरिच्य कदापि तस्य नाम्ना किमपि पत्रमागतमिति कोऽपि कदापि न जानाति।

श्रीनायार के दायित्व (पदभार) ग्रहण करने के एक महीने के अन्दर बहुत दिनों से स्थगित अनेक समस्याओं का भी समाधान हो गया। अपना कार्य छोड़कर दूसरों का सहयोग करना उसका परम धर्म है। वह प्रतिमास के पहले दिन अपने वेतन का आधे से अधिक भाग केरल भेज देता था। इसी से पता चलता है कि उसका राज्य के साथ कोई सम्पर्क है। कुछ मलियालम भाषा के संवाद पत्रों को छोड़कर कभी उसके नाम से कोई पत्र आया है, इसे कभी कोई नहीं जानता।

एकस्मिन् दिने श्रीनायारः पत्रमेकं धृत्वा मस्तकमवनमय्य पठन् आसीत्। नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा आर्दीकरोति स्म पत्रस्य अर्धाधिकं भागम् । तदानीमेव तस्य कार्यालयलिपिकः श्रीदासःप्रविशति। श्रीनायारः तमुक्तवान्-अधुना मम गमनसमयः समुपागत एव। मम दायित्वहस्तान्तरणपत्रकं सज्जीकुरु। अहमधुना द्वित्राणां दिवसानां सकारणावकाशं स्वीकरिष्यामि। पुनः तदनु स्वीकरिष्यामि दीर्घावकाशम् । यदि कस्मैचिद् अज्ञातेन मया रूक्षो व्यवहारः प्रदर्शितः स्यात्, तदर्थं ते मह्यमुदारचित्तेन क्षमा प्रदास्यन्ति इति सर्वेभ्यो निवेदयतु। अनन्तरं सर्वे अश्रुलहृदयैः सौप्रस्थानिद ज्ञापितवन्तः।

हिन्दी-अनुवादः - एक दिन श्रीनायार एक पत्र (हाथ में) पकड़कर मस्तक झुकाकर पढ़ रहा था। आँख के किनारे से गिरी हुई आश्रुधारा ने पत्र का आधे से भी अधिक भाग गीला कर दिया था। तभी उसके कार्यालय का लिपिक (क्लर्क) श्रीदास प्रवेश करता है। श्रीनायार ने उससे कहा-"अब मेरे जाने का समय समीप आ गया है। मेरा दायित्व-हस्तान्तरण पत्र (किसी दूसरे को पदभार सौंपने का पत्र) तैयार करो। अब मैं दो-तीन दिन का सकारण-अवकाश लूँगा (स्वीकार करूँगा)। फिर उसके बाद लम्बी छुट्टी लूँगा। यदि किसी के लिए अनजाने में मुझसे रूखा व्यवहार किया गया हो, तो उसके लिए वे मुझे उदारभाव से क्षमा देंगे-ऐसा सबसे निवेदन करो।" इसके बाद सभी ने आँसू भरे हृदय से विदाई दी। 

तस्य गमनस्य दिवसत्रयात्परं कार्यालये पत्रमेकमागतम्। कौतूहलवशात् श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान् । लेखिका आसीत् सुश्री मेरी यस्याः पार्वे सः प्रतिमासमर्धाधिक धनं धनादेशेन प्रेषयति स्म। पत्रे एवं लिखितमासीत्..... श्रीनायार!

उनके जाने के तीन दिन के पश्चात् कार्यालय में एक पत्र आया। जिज्ञासावश श्रीदास ने वह पत्र खोला। लेखिका थी सुश्री मेरी, जिसके पास वह प्रतिमास आधे से अधिक धन मनीआर्डर द्वारा भेजता था। पत्र में लिखा था -   श्रीनायार! 

भगवान् यीशुस्तव मङ्गलं वितनोतु । मम पूर्वतनं पत्रं त्वया प्राप्तं स्यात्। तव समीपे इदं मम शेषपत्रम्। यतो हि मम जीवनप्रदीपो निर्वापितो भवितुमिच्छति। प्रायस्तवागमनसमये अहं न स्थास्यामि। पूर्वपत्रे-अहमाश्रमस्य सर्वविधमायव्ययाकलनं प्रेषितवती। केवलं यीशोः समीपे गमनात्पूर्वं तव दर्शनमिच्छामि। प्रथमं त्वया निर्मितोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः। अधुनात्र शताधिका अनाथशिशवो लालिताः पालिताश्च भवन्ति । तव हस्तयोस्तव अनाथाश्रमं समर्प्य अहं सौप्रस्थानिकीमिच्छामि। अद्य समाजस्त्वत्तो बहु किमपि इच्छति। यौ कौ वां तव पितरौ भवतां नाम, तौ धन्यवादाौं। कदाचित्ताभ्यां त्वं विस्मृतः स्यात् त्वमवश्यमेतान् शिशून् संपोष्य उत्तममनुष्यान् कारयिष्यसीति मम कामना वर्तते। प्रभुः त्वत्त इमामेवाशां पोषयति। यो जन्म दत्तवान्, स जीवितुमधिकारमपि दत्तवान्। भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु । इति॥

तव शुभाकांक्षिणी

सुश्रीः मेरी

भगवान् यीशु तुम्हारा मंगल करें। मेरा पहला पत्र तुम्हें मिला होगा। तुम्हारे पास यह मेरा शेष पत्र है। क्योंकि मेरा जीवन-दीप बुझ जाना चाहता है। शायद तुम्हारे आने तक मैं न रहूँ। पिछले पत्र में मैंने आश्रम का सारा आय-व्यय चिट्ठा भेज दिया था। केवल यीशु के पास जाने से पहले तुम्हारा दर्शन करना चाहती हूँ। पहले तुम्हारे द्वारा निर्मित अनाथ आश्रम अब बड़े भारी वृक्ष में बदल गया है। अब यहाँ सौ से भी अधिक अनाथ शिशु लालित और पालित हो रहे हैं। तुम्हारे हाथों में तुम्हारा अनाथ आश्रम सौंपकर अब विदाई चाहती हूँ। आज समाज तुम से बहुत कुछ चाहता है। जो कोई भी तुम्हारे माता-पिता हैं, वे धन्यवाद के पात्र हैं। किसी कारणवश उन्होंने तुम्हें भुला दिया होगा, तुम अवश्य ही इन शिशुओं को पाल-पोसकर उत्तम मनुष्य बनाओगे, यह मेरा कामना है। प्रभु तुमसे यही आशा रखते हैं। जिसने जन्म दिया है, उसी ने जीने का अधिकार भी दिया है। भगवान् तुम्हें दीर्घजीवी करें। 

तुम्हारी शुभेच्छु, 
सुश्री मेरी 

प्रश्न 1. 
संस्कृतभाषया उत्तराणि लिखत - 
(क) श्रीनायारः कुत्र गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् ? 
(ख) विभागस्य विपक्षे केषाम् अभियोगो नास्ति ? 
(ग) श्रीनायारः स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं कुत्र प्रेषयति स्म ? 
(घ) श्रीनायारस्य नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा किम् अकरोत् ? 

(ङ) बहुदिनेभ्यः स्थगितानां समस्यानां समाधानं कदा जातम् ?
(च) श्रीनायारस्य पार्वे पत्रं कया प्रेषितम् ? 
(छ) आश्रमे के लालिताः पालिताश्च भवन्ति ? 
(ज) पत्रलेखिका कस्य हस्तयोः अनाथाश्रमं समर्प्य सौप्रस्थानिकीमिच्छति ? 
उत्तरम् :
(क) श्रीनायार: स्वराज्यं केरलं प्रति गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् ? 
(ख) विभागस्य विपक्षे उपभोक्तृणाम् अभियोगो नास्ति ? 
(ग) श्रीनायार: स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं केरलं प्रेषयति स्म ? 
(घ) श्रीनायारस्य नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा पत्रस्य अर्धाधिकं भागम् आर्द्रम् अकरोत् ? 
(ङ) श्रीनायारस्य दायित्वग्रहणस्य एकमासाभ्यन्तरे बहुदिनेभ्यः स्थगितानां समस्यानां समाधानं जातम् ? 
(च) श्रीनायारस्य पार्श्वे पत्रं सुश्री 'मेरी' प्रेषितवती। 
(छ) आश्रमे अनाथा: शिशवः लालिताः पालिताश्च भवन्ति ? 
(ज) पत्रलेखिका श्रीनायारस्य हस्तयोः अनाथाश्रमं समर्प्य सौप्रस्थानिकीमिच्छति ? 

प्रश्न 2. 
सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्यां कुरुत - 
(क) उपभोक्तणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे
(ख) सर्वे अश्रुलहृदयैः सौप्रस्थानिकों ज्ञापितवन्तः 
(ग) त्वया निर्मितोऽयं क्षुद्रोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः । 
उत्तरम् : 
(क) 'उपभोक्तृणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे'। 
प्रसंग: - प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती-द्वितीयो भागः' के 'दीनबन्धुःश्रीनायारः' नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित 'पाषाणीकन्या' नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है। 

व्याख्या - प्रस्तुत पंक्ति में दीनबन्धु श्रीनायार की सत्यनिष्ठा एवं कर्तव्यनिष्ठा के फलस्वरूप खाद्य-आपूर्ति विभाग के विरोध में उपभोक्ताओं की ओर से किसी प्रकार के अभियोग न होने का उल्लेख किया गया है। 

श्रीनायार एक सत्यनिष्ठ तथा मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी थे। उड़ीसा सरकार के खाद्य आपूर्ति विभाग के सचिव पद को सम्भालते ही इस विभाग का कायाकल्प हो गया। खाद्यान्न में मिलावट या हेरा-फेरी नाममात्र रह गई, अतः श्रीनायार के कार्यकाल में उपभोक्ताओं को विभाग पर किसी प्रकार का अभियोग चलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। श्रीनायार के आने से विभाग की न केवल सक्रियता बढ़ी अपितु ईमानदारी से काम करने का भी वातावरण बना। परिणामतः उपभोक्ता विभाग की कार्यप्रणाली से सन्तुष्ट हुए और कोर्ट-कचहरी के विवादों से विभाग मुक्त हो गया। इस पंक्ति से श्रीनायार की कर्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदारी का संकेत मिलता है। 

(ख) सर्वे अश्रुलहृदयैः सौप्रस्थानिकी ज्ञापितवन्तः। 
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती द्वितीयो भागः' के 'दीनबन्धुःश्रीनायार:' नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उडिया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित 'पाषाणीकन्या' नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है। 

व्याख्या - 'सभी ने आँसु भरे हृदय से श्रीनायार को विदाई दी' प्रस्तुतपंक्ति का सम्बन्ध श्रीनायार के जीवन के उस क्षण से है, जब केरल राज्य में श्रीनायार द्वारा स्थापित अनाथ आश्रम की संचालिका सुश्री मेरी ने श्रीनायार को एक पत्र लिखा कि अब उनका अन्तिम समय आ चुका है और उन्हें स्वयं यह आश्रम सँभाल लेना चाहिए। 

एक दिन श्रीनायार अपने कार्यालय में बैठे एक पत्र पढ़ रहे थे, उनकी आँखों से अश्रुधारा बह रह थी, जिससे पत्र भी भीग चुका था। उसी क्षण श्रीनायार के क्लर्क श्रीदास का प्रवेश हुआ और उन्होंने श्रीदास को कहा कि अब उनका छुट्टी लेकर चले जाने का समय आ गया है। यदि मुझसे कोई रूखा व्यवहार किसी के साथ अनजाने में हुआ हो तो उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ। श्रीनायार का व्यवहार विभाग के सभी सहकर्मियों के साथ पूर्णतया मानवीय, मित्रतापूर्ण तथा अत्यन्त मधुर था। 

विभाग के सभी लोग श्रीनायार के स्वभाव और व्यवहार से सन्तुष्ट थे। आज जब श्रीनायार केरल वापस जाने लगे,तो सहकर्मियों के हृदय को चोट पहुँची और न चाहते हुए भी उन्हें भीगी पलकों से विदाई की। इस पंक्ति से विभाग के लोगों का श्रीनायार के प्रति सच्चा आदर-भाव तथा श्रीनायार की सद्-व्यवहारशीलता प्रकट होती है। 

(ग) त्वया निर्मितोऽयं क्षुद्रोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः। 
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती द्वितीयो भागः' के 'दीनबन्धुःश्रीनायार:' नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित 'पाषाणीकन्या' नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।

व्याख्या - प्रस्तुत पंक्ति सुश्री मेरी के उस पत्र की है, जो श्रीनायार के केरल वापस चले जाने के बाद उनके क्लर्क श्रीदास ने खोलकर पढ़ा था। श्रीनायार ने एक अनाथ आश्रम की स्थापना केरल राज्य में की थी। जिसका संचालन सुश्री मेरी किया करती थी। मेरी अब मृत्यु के निकट थी, अतः उसने श्रीनायार को स्वयं यह अनाथ आश्रम सँभालने तथा अन्तिम क्षणों में श्रीनायार के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी। 

मेरी ने इस पत्र में यह भी बताया था कि यह आश्रम कभी बहुत छोटे रूप में था परन्तु आज यह बहुत बड़े वृक्ष का रूप धारण कर चुका है। अब इसमें सौ से भी अधिक अनाथ शिशु पल रहे हैं। श्रीनायार इसी आश्रम के संचालन के लिए अपने वेतन का आधे से भी अधिक भाग प्रतिमास की एक तारीख को ही मनीआर्डर द्वारा सुश्री मेरी के पास भेज दिया करते थे। इस घटना से श्रीनायार का दीनों के प्रति सच्चा दया-भाव प्रकट होता है। इसीलिए पाठ का नाम भी 'दीनबन्धु श्रीनायार' उचित ही दिया गया है। 

प्रश्न 3. 
अधः समस्तपदानां विग्रहाः दत्ताः तानाश्रित्य समस्तपदानि समासनामापि लिखत - 

प्रश्न 4. 
रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत - 
(क) श्रीनायारः स्वल्पभाषी आसीत्। 
(ख) वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम् । 
(ग) तस्य राज्येन सह कश्चित् सम्पर्कः नास्ति। 
(घ) पत्रस्य अर्धाधिकं भागं अश्रुधारा आर्दीकरोति स्म। 
(ङ) श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान्। 
(च) भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु। 
उत्तरम् : 
(प्रश्ननिर्माणम्) 
(क) श्रीनायारः कीदृग्भाषी आसीत् ? 
(ख) कस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम् ? 
(ग) तस्य केन सह कश्चित् सम्पर्कः नास्ति? 
(घ) पत्रस्य अर्धाधिकं भागं का आर्दीकरोति स्म? 
(ङ) कः तत्पत्रमुद्घाटितवान् ? 
(च) भगवान् कं दीर्घजीवनं कारयतु ? 

प्रश्न 5. 
विपरीतार्थकपदानि मेलयत - 
(क) आगत्य (क) विस्मृतः 
(ख) इच्छाम् (ख) गत्वा
(ग) स्वल्पभाषी (ग) न्यूनीभूतम् 
(घ) प्रारभ्य (घ) पक्षे 
(ङ) अधिकीभूतम् (ङ) बहुभाषी 
(च) विपक्षे (च) समाप्य 
(छ) स्मृतः (छ) लघुजीवनम् 
(ज) दीर्घजीवनम् (ज) अनिच्छाम् 
उत्तरम् :
विपरीतार्थकपदमेलनम् 
(क) आगत्य - गत्वा 
(ख) इच्छाम् - अनिच्छाम 
(ग) स्वल्पभाषी - बहुभाषी 
(घ) प्रारभ्य - समाप्य 
(ङ) अधिकीभूतम् - न्यूनीभूतम् 
(च) विपक्षे - पक्षे 
(छ) स्मृतः - विस्मृतः 
(ज) दीर्घजीवनम् - लघुजीवनम् 

प्रश्न 6. 
अधोलिखितानां विशेष्यपदानां विशेषणपदानि पाठात् चित्वा लिखत - 
वार्तालाप:, वर्षत्रयस्य, अश्रुधारा, समस्यानाम्, व्यवहारः, पत्रम्, शिशवः । 
उत्तरम् : 
विशेषणपदम् - विशेष्यपदम् 

  • सन्तुलितः - वार्तालापः 
  • गतस्य - वर्षत्रयस्य 
  • विगलिता - अश्रुधारा 
  • स्थगितानाम् - समस्यानाम् 
  • रूक्षः - व्यवहारः 
  • पूर्वतनम् - पत्रम् 
  • शताधिकाः - शिशवः 

प्रश्न 7. 
अधोलिखितेषु पदेषु प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत - 
समाप्य, जातम्, त्यक्त्वा, धृत्वा, पठन्, संपोष्य। 
उत्तरम् :

बहुविकल्पीया: प्रश्नाः

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत - 

(i) आश्रमे के लालिताः पालिताश्च भवन्ति ? 
(A) वृद्धाः 
(B) स्त्रियः 
(C) शिशवः 
(D) अनाथशिशवः। 
उत्तरम् : 
(D) अनाथशिशवः। 

(ii) पत्रलेखिका कस्य हस्तयोः अनाथाश्रमं समर्प्य सौप्रास्थानिकीमिच्छति ? 
(A) पुत्रस्य 
(B) श्रीदासस्य 
(C) श्रीनायारस्य 
(D) सर्वकारस्य। 
उत्तरम् : 
(C) श्रीनायारस्य 

(iii) श्रीनायार: कुत्र गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् ? 
(A) दिल्लीम् 
(B) केरलम् 
(C) कोलकातानगरम् 
(D) महाराष्ट्रम्। 
उत्तरम् : 
(B) केरलम् 

(iv) विभागस्य विपक्षे केषाम् अभियोगो नास्ति ? 
(A) उपभोक्तृणाम् 
(B) अधिकारिणाम् 
(C) कर्मचारिणाम् 
(D) मन्त्रिणाम्। 
उत्तरम् : 
(A) उपभोक्तृणाम् 

(v) श्रीनायार: स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं कुत्र प्रेषयति स्म ? 
(A) कानपुरम् 
(C) मद्रासम्
(B) पूनानगरम्  
(D) केरलम्। 
उत्तरम् : 
(A) कानपुरम् 

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत - 

(i) श्रीनायारः स्वल्पभाषी आसीत्। 
(A) कः 
(B) कीदृशः 
(C) कथम् 
(D) किया। 
उत्तरम् : 
(B) कीदृशः 

(ii) वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्। 
(A) कस्य 
(B) केन 
(C) कति 
(D) कस्मात्। 
उत्तरम् : 
(A) कस्य 

(iii) तस्य राज्येन सह कश्चित् सम्पर्क: नास्ति। 
(A) काः
(B) केन 
(C) कम् 
(D) कस्मै। 
उत्तरम् : 
(B) केन 

(iv) पत्रस्य अर्धाधिकं भागम् अश्रुधारा आर्दीकरोति स्म। 
(A) कया 
(B) कान् 
(C) कथम् 
(D) का। 
उत्तरम् : 
(D) का। 

(v) श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान्। 
(A) कः 
(B) काभ्याम् 
(C) कस्याः 
(D) कस्याम्। 
उत्तरम् : 
(A) कः 

(vi) भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु। 
(A) कः 
(B) कम् 
(C) कस्याः 
(D) कस्याम्। 
उत्तरम् : 
(B) कम् 


शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

 

कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

जेसीईआरटी तथा एनसीईआरटी के कक्षा-12 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग 2 के नवम: पाठ: कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर सीबीएसई के लिए यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं।
      प्रस्तुत पाठ अम्बिकादत्तव्यास द्वारा रचित 'शिवराजविजय' नामक ऐतिहासिक उपन्यास के प्रथम विराम के चतुर्थ निःश्वास से संकलित है। इसके रचयिता अम्बिकादत्तव्यास बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इन्होंने संस्कृत व हिन्दी में शताधिक ग्रन्थों की रचना की। इनकी कृतियों में अभिव्यक्त अद्भुत कल्पनाशक्ति एवं पात्रों के चरित्र में प्रदर्शित उच्च आदर्शों ने विद्वज्जनों को अपनी ओर आकृष्ट किया।
       प्रस्तुत पाठ में यह दर्शाया गया है कि जो वीर, विश्वासपात्र, कर्मठ व दृढसंकल्प वाले होते हैं, उन्हें मानवीय एवं प्राकृतिक किसी भी प्रकार की बाधाएँ अपने संकल्पित लक्ष्य को प्राप्त करने से नहीं रोक सकतीं, संकल्पित कार्य को पूरा करने में चाहे उनके प्राण भी क्यों न चले जाएँ। शिवाजी का विश्वासपात्र एवं कर्मठ दूत (गुप्तचर) अपने निर्दिष्ट कार्यों को पूरा करने के लिए सिंहदुर्ग से पत्र लेकर तोरणदुर्ग जाता है। रास्ते में अनेक प्रकार की भीषण प्राकृतिक बाधाओं के बाद भी वह तनिक भी विचलित नहीं होता है तथा अपने संकल्पित लक्ष्य की ओर बढ़ता ही जाता है। वह कहता है- 'कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्' अर्थात्- 'कार्य सिद्ध करूँगा या देह त्याग कर दूँगा'। यही भाव प्रस्तुत गद्यांश में वर्णित है।
मासोऽयमाषाढः, अस्ति च सायं समयः, अस्तं जिगमिषुर्भगवान् भास्करः सिन्दूर-द्रव-स्नातानामिवं वरुण-दिगवलम्बिनामरुण-वारिवाहानामभ्यन्तरं प्रविष्टः। कलविड्काश्चाटकैर-रुतैः परिपूर्णेषु नीडेषु प्रतिनिवर्तन्ते। वनानि प्रतिक्षणमधिकाधिका श्यामतां कलयन्ति। अथाकस्मात् परितो मेघमाला पर्वतश्रेणीव प्रादुरभूत्, क्षणं सूक्ष्मविस्तारा, परतः प्रकटित-शिखरि-शिखर-विडम्बना, अथ दर्शित-दीर्घ-शुण्डमण्डित-दिगन्त दन्तावल-भयानकाकारा ततः पारस्परिक-संश्लेष-विहित-महान्धकारा च समस्तं गगनतलं पर्यच्छदीत्।                         हिन्दी-अनुवादः -आषाढ़ का महीना है। सायं का समय है। अस्त होने की इच्छा वाला भगवान् भास्कर (सूर्य देव) सिन्दूर के घोल में स्नान-सा किए हुए, वरुण-दिशा (पश्चिम-दिशा) का आश्रय लिए हुए जलवाहक बादलों में प्रविष्ट हो रहा है। गौरैया पक्षी अपने शिशुओं की चहचहाचट से परिपूर्ण घोंसलों में वापस लौट रहे हैं। वन प्रतिक्षण अधिक और अधिक कालेपन को प्राप्त हो रहे हैं। तभी अकस्मात् चारों ओर मेघ माला पर्वत शृंखला की तरह प्रकट हो गई। क्षण भर में ही उन बादलों का सूक्ष्म विस्तार हो गया। मेघमाला ने किसी दूसरे ही पर्वत शिखर का सा रूप धारण कर लिया और वह मेघमाला लम्बी-लम्बी सैंडों से सुशोभित दिग्गजों की सुन्दर दन्तावली के समान भयानक आकार वाली हो गई। फिर बादलों के परस्पर मिल जाने से उत्पन्न घोर अन्धकार ने सम्पूर्ण आकाशमण्डल को पूरी तरह से ढक लिया।                                                   अस्मिन् समये एकः षोडशवर्ष-देशीयो गौरो युवा हयेन पर्वतश्रेणीरुपर्युपरि गच्छति स्म। एष सुघटितदृढशरीरः श्याम-श्यामैर्गुच्छ-गुच्छैः कुञ्चित-कुञ्चितैः कच-कलापैः कमनीय-कपोलपालि: दूरागमनायासवशेन सूक्ष्म मौक्तिक-पटलेनेव स्वेदबिन्दु-व्रजेन समाच्छादित-ललाट-कपोल-नासाग्रोत्तरोष्ठः प्रसन्न-वदनाम्भोज-प्रदर्शित दृढसिद्धान्त-महोत्साहः, राजतसूत्र-शिल्पकृत-बहुल-चाकचक्य-वक्र-हरितोष्णीष-शोभितः, हरितेनैव च कञ्चुकेन व्यूढगूढचरता-कार्यः, कोऽपि शिववीरस्य विश्वासपात्रं सिंहदुर्गात् तस्यैव पत्रमादाय तोरणदुर्गं प्रयाति।                     हिन्दी-अनुवादः इसी समय लगभग सोलह वर्ष की आयु वाला एक गोरा युवक घोड़े से पर्वत शृंखला के ऊपर-ऊपर जा रहा था। इसका अच्छा गठा हुआ शरीर था। काले-काले, गुच्छेदार, घुघराले केश समूह से उसकी गालें सुशोभित हो रही थी। दूर से आने के परिश्रम से छोटे-छोटे मोतियों के समूह की भाँति पसीने की बूंदों से उसका ललाट, कपोल, नासिक का अग्रभाग तथा ऊपरी होंठ व्याप्त था। प्रसन्न मुख कमल से जिसके दृढ़ सिद्धान्त का उत्साह प्रकट हो रहा था। वह चाँदी के तार की कढ़ाई के कारण अत्यधिक चमकने वाली एक टेढ़ी बँधी हुई हरी पगड़ी से सुशोभित था। हरे रंग के कुर्ते से ही जिसने गुप्तचर का कार्य स्वीकार हुआ था। इस प्रकार का कोई शिवाजी का विश्वासपात्र (सैनिक) सिंहदुर्ग से उसी (शिवाजी) का पत्र लेकर तोरणदुर्ग की ओर प्रस्थान कर गया।                                  तावदकस्मादुत्थितो महान् झञ्झावातः, एकः सायंसमयप्रयुक्तः स्वभाव-वृत्तोऽन्धकारः, स च द्विगुणितो मेघमालाभिः। झञ्झावातोद्भूतैः रेणुभिः शीर्णपत्रैः कुसुमपरागैः शुष्कपुष्पैश्च पुनरेष द्वैगुण्यं प्राप्तः। इह पर्वत श्रेणीत: पर्वतश्रेणी:, वनाद् वनानि, शिखराच्छिखराणि प्रपातात् प्रपातान्, अधित्यकातोऽधित्यकाः, उपत्यकात उपत्यकाः, न कोऽपि सरलो मार्गः, नानु दिनी भूमिः, पन्थाः अपि च नावलोक्यते।   हिन्दी-अनुवादः -तभी बड़ा भारी अचानक तूफान उठा। एक तो सांय के समय में होने वाला स्वाभाविक अन्धकार, वह भी बादलों के समूह के कारण दोगुणा हो गया। तूफान से उठी हुई धूलियों, पुराने पत्रों, पुष्पपरागों तथा सूखे पत्तों से (यह अन्धकार) फिर से दुगना हो गया। इधर एक पर्वत शृंखला के बाद दूसरी पर्वत शृंखला पर, एक वन के बाद दूसरे वन में, एक शिखर के बाद दूसरे शिखर पर, एक झरने बाद दूसरे झरने पर, एक अधित्यका (पर्वत के ऊपर की ऊँची भूमि) के बाद दूसरी अधित्यका पर, एक उपत्यका (पर्वत के पास वाली निचली भूमि) के बाद दूसरी उपत्यका पर (जहाँ) कोई सरल मार्ग नहीं, कोई समतल भूमि नहीं और रास्ता भी दिखाई नहीं पड़ रहा है।         क्षण-क्षणे हयस्य खुराश्चिक्कण-पाषाण-खण्डेषु प्रस्खलन्ति। पदे पदे दोधूयमानाः वृक्षशाखाः सम्मुखमानन्ति, परं दृढसड्कल्पोऽयं सादी (अश्वारोही) न स्वकार्याद् विरमति। परितः स-हडहडाशब्दं दोधूयमानानां परस्सहस्त्र-वृक्षाणां, वाताघात-संजात-पाषाण-पातानां प्रपातानाम्, महान्धतमसेन ग्रस्यमानानामिव सत्त्वानां क्रन्दनस्य च भयानकेन स्वनेन कवलीकृतमिव गगनतलम्। परं "देहं वा पातयेयं कार्यं वा साधयेयम्" इति कृतप्रतिज्ञोऽसौ शिववीरचरो निजकार्यान्न विरमति।                 
हिन्दी-अनुवादः -क्षण-क्षण भर में घोड़े के खुर चिकने पत्थर-खण्डों पर फिसल रहे हैं। पग-पग पर झूलती हुई वृक्ष-शाखाएँ सामने से आघात (प्रहार) करती हैं। परन्तु यह दृढ़ संकल्प वाला घुड़सवार अपने कार्य से रुक नहीं रहा है। चारों ओर हड़ हड़ शन के साथ बार-बार झूलते हुए हजारों वृक्षों तूफान की चोट से गिरने वाले पत्थरों से युक्त झरनों तथा घोर अन्धकार से ग्रसे जाते हुए से वन्यप्राणियों की चीख के भयानक शब्द से सम्पूर्ण आकाशमण्डल ही मानो ग्रस लिया गया था। परन्तु 'कार्य सिद्ध करूँगा यां शरीर को नष्ट कर दूंगा'-ऐसी प्रतिज्ञावाला वह शिवाजी सैनिक अपने कार्य से रुक नहीं रहा है। 

प्रश्न 1. 

संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् - 
(क) सायं समये भगवान् भास्कर: कुत्र जिगमिषुः भवति ? 
(ख) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्णः कीदृशः भवति ? 
(ग) नीडेषु के प्रतिनिवर्तन्ते ? 
(घ) शिववीरस्य विश्वासपात्रं किं स्थानं प्रयाति स्म ? 
(ङ) प्रतिक्षणमधिकाधिका श्यामतां कानि कलयन्ति ? 
(च) शिववीरविश्वासपात्रस्य उष्णीषम् कीदृशमासीत् ? 
(छ) मेघमाला कथं शोभते ? 
उत्तरम् : 
(क) सायं समये भगवान् भास्करः अस्तं जिगमिषुः भवति। 
(ख) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्णः अरुणः भवति।
(ग) नीडेषु कलविड्काः प्रतिनिवर्तन्ते। 
(घ) शिववीरस्य विश्वासपात्रं तोरणदुर्गं प्रयाति स्म।
(ङ) प्रतिक्षणमधिकाधिका श्यामतां वनानि कलयन्ति। 
(च) शिववीरविश्वासपात्रस्य उष्णीषं राजतसूत्रितम्, बहुल-चाकचक्यम्, वक्रम्, हरितवर्णं च आसीत्। 
(छ) मेघमाला दीर्घशुण्डमण्डितानां दिग्गजानां दन्तावलाः इव भयानकाकारा शोभते।

प्रश्न 2. 
समीचीनोत्तरसङ्ख्यां कोष्ठके लिखत - 
अ. शिवराजविजयस्य रचयिता कः अस्ति ? 
(क) बाणभट्टः 
(ख) श्रीहर्षः 
(ग) अम्बिकादत्तव्यासः 
(घ) माघः 
उत्तरम् : 
(ग) अम्बिकादत्तव्यासः 
आ. कतिवर्षदेशीयो युवा हयेन पर्वतश्रेणीरुपर्युपरि गच्छति स्म। 
(क) चतुर्दशवर्षदेशीयः 
(ख) द्वादशवर्षदेशीयः 
(ग) पञ्चदशवर्षदेशीयः 
(घ) षोडशवर्षदेशीयः 
उत्तरम् : 
(घ) षोडशवर्षदेशीयः।
इ. शिववीरस्य विश्वासपात्रं किम् आदाय तोरणदुर्गं प्रयाति ? 
(क) संवादम् आदाय 
उत्तर :
(ख) पत्रम् आदाय 
(ग) पुष्पगुच्छम् आदाय 
(घ) अश्वम् आदाय
उत्तरम् :
(ख) पत्रम् आदाय 

प्रश्न 3. 
रिक्तस्थानानि पूरयत। 
(क) अथाकस्मात् परितो मेघमाला ................ प्रादुरभूत्। 
(ख) क्षणे क्षणे ................खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति। 
(ग) पदे पदे ................ वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति। 
(घ) कृतप्रतिज्ञोऽसौ ................ निजकार्यान्न विरमति। 
उत्तरम् :
(क) अथाकस्मात् परितो मेघमाला पर्वतश्रेणी: इव प्रादुरभूत्। 
(ख) क्षणे क्षणे हयस्य खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति। 
(ग) पदे पदे दोधूयमानाः वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति। 
(घ) कृतप्रतिज्ञोऽसौ शिववीरचरः निजकार्यान्न विरमति। 

प्रश्न 4. 
अधोलिखितानां पदानाम् अर्थान् विलिख्य वाक्येषु प्रयुञ्जत 
भास्करः मेघमाला, वनानि, मार्गः वीरः, गगनतलम्, झञ्झावातः मासः, सायम्। 
उत्तरम् :
(वाक्यप्रयोगः)
(क) भास्करः (सूर्यः) - पूर्वदिशायां भास्करः उदयति।
(ख) मेघमाला (मेघसमूहः) - मेघमाला आकाशम् आच्छादयति। 
(ग) वनानि (अरण्यानि) - नगरं परितः वनानि सन्ति। 
(घ) मार्गः (पन्थाः) - महान्धकारे मार्गः न अवलोक्यते। 
(ङ) वीरः (वीर्यवान्) - युद्धे वीरः एव जयति। 
(च) गगनतलम् (आकाशतलम्) - रात्रौ अन्धकार: गगनतलम् आच्छादयति। 
(छ) झञ्झावातः (वात्याचक्रम्, 'तूफान' इति हिन्दीभाषायाम्) - सहसा झञ्झावातः प्रादुरभवत्। 
(ज) मासः ('महीना' इति हिन्दी भाषायाम्) - मासोऽयम् आषाढः। 
(झ) सायम् (सन्ध्यासमय:) - सायं समये भगवान् भास्करः अस्तं गच्छति। 

प्रश्न 5.
अधोलिखितानां पदानां सन्धिच्छेदं कृत्वा सन्धिनिर्देशं कुरुत 
तस्यैव, शिखराच्छिखराणि, कोऽपि, प्रादुरभूत्, अथाकस्मात्, कार्यान्न। 
(क) तस्यैव 
= न + एव 
(ख) शिखराच्छिखराणि = शिखरात् + शिखराणि 
(ग) कोऽपि = कः + अपि 
(घ) प्रादुरभूत् = प्रादुः + अभूत् 
(ङ) अथाकस्मात् = अथ + अकस्मात् 
(च) कार्यान्न = कार्यात् + न। 

प्रश्न 6. 
अधोलिखितानां पदानां प्रकृतिप्रत्ययविभागं प्रदर्शयत - 
प्रयुक्तः, उत्थितः, उत्प्लुत्य, रुतैः, उपत्यकातः, उत्थितः, ग्रस्यमानः। 
उत्तरम् : 
(क) प्रयुक्तः = प्र + √युज् + क्त (पुंल्लिङ्गम् प्रथमा-एकवचनम्) 
(ख) उत्थितः = उत् + √स्था + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्) 
(ग) उत्प्लुत्य = उत् + √प्लु + ल्यप् (अव्यय) 
(घ) रुतैः = रु + क्त। (नपुंसकलिङ्गम्, तृतीया-एकवचनम्) 
(ङ) उपत्यकातः = उपत्यका + तसिल > तस् (अव्ययपदम्) 
(च) 'ग्रस्यमानः = √ग्रस् (कर्मवाच्ये) + शानच् (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्) 

प्रश्न 7. 
अलङ्कारनिर्देशं कुरुत - 
(1) वदनाम्भोजेन 
(2) दिगन्तदन्तावल: 
(3) सिन्दूरद्रवस्नातानामिव वरुणदिगवलम्बिनाम्। 
उत्तरम् : 
(1) वदनाम्भोजेन - रुपकः अलङ्कारः 
(2) दिगन्तदन्तावल: - अनुप्रासः अलङ्कारः 
(3) सिन्दूरद्रवस्नातामिव वरुणदिगवलम्बिनाम् - उत्प्रेक्षा अलङ्कारः 

प्रश्न 8.
विग्रहवाक्यं विलिख्य समासनामानि निर्दिशत -
मेघमाला, महान्धकारः, पवर्तश्रेणी:, महोत्साहः, विश्वासपात्रम्, हरितोष्णीषशोभितः। 
उत्तरम् : 
(क) मेघमाला = मेघानां माला (षष्ठी-तत्पुरुषः) 
(ख) महान्धकारः = महान् अन्धकारः (कर्मधारयः)
(ग) पर्वतश्रेणी: = पर्वतानां श्रेणी: (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(घ) महोत्साहः = महान् उत्साहः (कर्मधारयः)
(ङ) विश्वासपात्रम् = विश्वासस्य पात्रम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(च) हरितोष्णीषशोभितः = हरितेन उष्णीषेण शोभितः (तृतीया-तत्पुरुषः)

प्रश्न 9. 
पाठ्यांशस्य सारं हिन्दीभाषया आङ्ग्लभाषया वा लिखत - 
उत्तरम् :
पाठ का सार पहले दिया जा चुका है, वहीं देखें। 

प्रश्न 10. 
पाठ्यांशे प्रयुक्तानि अव्ययानि चित्वा लिखत - 
उत्तरम् :
च (और) 
सायम् (सायंकाल) 
इव (की तरह, मानो) 
अथ (इसके बाद, फिर) 
अकस्मात् (अचानक) 
परितः (चारों ओर) 
परतः (दूसरी ओर)
ततः (उसके बाद) 
उपर्युपरि (ऊपर-ऊपर) 
एव (ही) 
अपि (भी) 
तावत् (तभी)
अकस्मात् (अचानक) 
पुनः (फिर) 
इह (यहाँ, इस विषय में) 
न (नहीं) 
परम् (परन्तु) 
वा (अथवा, या) 
इति (यह, इसप्रकार) 
प्रतिक्षणम् (पल-पल) 
आदाय (लेकर) 
पर्वतश्रेणीतः (पर्वतश्रेणी से) 
अधित्यकातः (अधित्यका से)
उपत्यकातः (उपत्यका से) 

बहुविकल्पीया: प्रश्नाः 

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत

(i) सायं समये भगवान् भास्करः कुत्र जिगमिषुः भवति ? 
(A) गङ्गायाम् 
(B) समुद्रम्
(C) अस्तम् 
(D) उदयम्। 
उत्तरम् :
(B) समुद्रम्

(ii) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्णः कीदृशः भवति ? 
(A) अरुणः 
(B) हरितः 
(C) श्वेतः 
(D) पीतः। 
उत्तरम् :
(A) अरुणः 

(iii) नीडेषु के प्रतिनिवर्तन्ते ? 
(A) गर्दभाः 
(B) अश्वाः 
(C) गजाः 
(D) कलविकाः। 
उत्तरम् :
(D) कलविकाः। 

(iv) शिववीरस्य विश्वासपात्रं किं स्थानं प्रयाति स्म ? 

(A) वनानि 
(B) चित्राणि 
(C) भवनानि 
(D) भुवनानि। 
उत्तरम् :
(A) वनानि 

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत - 

(i) अकस्मात् परितो मेघमाला पर्वतश्रेणी: इव प्रादुरभूत्। 
(A) कया। 
(B) केन 
(C) का 
(D) कम्। 
उत्तरम् :
(C) का 

(ii) क्षणे क्षणे हयस्य खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति। 
(A) कस्य 
(B) कया 
(C) कस्मात् 
(D) कस्मिन्। 
उत्तरम् :
(A) कस्य 

(iii) पदे पदे दोधूयमानाः वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति। 
(A) काः 
(B) कीदृश्यः
(C) कति 
(D) के। 
उत्तरम् :
(B) कीदृश्यः

(iv) कृतप्रतिज्ञोऽसौ शिववीरचरः निजकार्यान्न विरमति। 
(A) कस्मात् 
(B) कस्याः 
(C) कस्मिन् 
(D) कः। 
उत्तरम् :
(D) कः।


    




गुरुवार, 2 जुलाई 2020

भू-विभागाः

                            भू-विभागाः

        जेसीईआरटी तथा एनसीईआरटी के कक्षा-12 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग 2 के  अष्टम: पाठ: भू-विभागाः  का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर  यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं।                                                                                                                                         
       प्रस्तुत पाठ मुगलसम्राट शाहजहाँ के विद्वान् पुत्र दाराशिकोह द्वारा विरचित ग्रन्थ 'समुद्रसङ्गमः' से संकलित किया गया है। दाराशिकोह संस्कृत तथा अरबी भाषा के तत्कालीन विद्वानों में अग्रगण्य थे। 'समुद्रसङ्गमः' ग्रन्थ में 'पृथिवी निरूपण' के अन्तर्गत उन्होंने पर्वतों, द्वीपों, समुद्रों आदि का विशिष्ट शैली में वर्णन किया है। उसी वर्णन के अंश यहाँ “भू-विभागाः' शीर्षक के अन्तर्गत प्रस्तुत किये गये हैं। दाराशिकोह मुगलसम्राट शाहजहाँ के सबसे बड़े पुत्र थे। उनका जीवनकाल 1615 ई० से 1659 ई. तक है। शाहजहाँ उनको राजपद देना चाहते थे पर उत्तराधिकार के संघर्ष में उनके भाई औरंगजेब ने निर्ममता से उनकी हत्या कर दी। दाराशिकोह ने अपने समय के श्रेष्ठ संस्कृत पण्डितों, ज्ञानियों और सूफी सन्तों की सत्संगति में वेदान्त और इस्लाम के दर्शन का गहन अध्ययन किया और उन्होंने फारसी और संस्कृत में इन दोनों दर्शनों की समान विचारधारा को लेकर विपुल साहित्य लिखा। फारसी में उनके ग्रन्थ हैं- सारीनतुल् औलिया, सकीनतुल् औलिया, हसनातुल् आरफीन (सूफी सन्तों की जीवनियाँ), तरीकतुल् हकीकत, रिसाल-ए-हकनुमा, आलमे नासूत, आलमे मलकूत (सूफी दर्शन के प्रतिपादक ग्रन्थ), सिर्र-ए-अकबर (उपनिषदों का अनुवाद) उनके फारसी ग्रन्थ हैं। श्रीमद्भगवद्गीता और योगवासिष्ठ के भी फारसी भाषा में उन्होंने अनुवाद किये। 'मज्म-उल्-बहरैन्' फारसी में उनकी अमर कृति है, जिसमें उन्होंने इस्लाम और वेदान्त की अवधारणाओं में मूलभूत समानताएँ बतलायी हैं। इसी ग्रन्थ को दाराशिकोह ने 'समुद्रसङ्गमः' नाम से संस्कृत में लिखा।

अथ पृथिवीनिरूपणम्-पृथिव्याः सप्तभेदाः। ते च भेदाः सप्तपुटान्युच्यन्ते। तानि च पुटानि-अतल-वितल-सुतल-तलातल-रसातल-पातालाख्यानि। अस्मन्मतेऽपि सप्तभेदाः। यथाऽस्मद्वेदे श्रूयते परमेश्वरो यथा सप्तगगनानि तद्वत् पृथिव्याः सप्तविभागान् कृतवान्।

अब पृथिवी का निरूपण किया जाता है-पृथिवी के सात भेद हैं और उन्हें 'सप्तपुट' कहा जाता है। उन पुटों के नाम हैं-(1) अतल, (2) वितल, (3) सुतल, (4) प्रतल, (5) तलातल, (6) रसातल, (7) पाताल। हमारे मत में भी सात भेद हैं। जैसे कि हमारे वेद (कुरान शरीफ) में सुना जाता है; जैसे परमेश्वर ने सात प्रकार के आकाश बनाए हैं उसी प्रकार पृथिवी के सात भेद किए गए हैं। .. 

अथ पृथिव्याः विभागनिरूपणं यत्र लोकास्तिष्ठन्ति। तस्याः दार्शनिकैः सप्तधा विभागः कृतस्तान् विभागान् सप्त अअक्लिम इति वदन्ति। पौराणिकास्तु सप्त द्वीपानि वदन्ति। एतान् खण्डान् पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधो भावेन न ज्ञायन्ते, “किन्तु' निःश्रेणी सोपानवज्जानन्ति।

  अब पृथिवी के विभागों का निरूपण किया जाता है, जहाँ लोग रहते हैं। उस पृथिवी के दार्शनिकों ने सात विभाग किए हैं, उन विभागों को सात अअक्लिम = अकूलीन = खण्ड कहते हैं। पौराणिक उन्हें सात द्वीप कहते हैं। इन खण्डों को प्याज के छिलके की तरह ऊपर-नीचे के भाव से नहीं समझना चाहिए, परन्तु सीढ़ी में लगने वाले काष्ठ-दण्ड की भाँति समझ सकते हैं। 

सप्त पर्वतान् सप्त कुलाचलान् वदन्ति, तेषां पर्वतानां नामान्येतानि प्रथमः सुमेरुमध्ये, द्वितीयो हिमवान्, तृतीयो हेमकूटः, चतुर्थो निषधः एते सुमेरोरुत्तरतः। माल्यवान् पूर्वस्यां, गन्धमादनः पश्चिमायां कैलासश्च मर्यादापर्वतेभ्योऽतिरिक्तः। यथाऽस्मद्वेदे श्रूयते- “अस्माभिः पर्वताः शंकवः कृताः।

सात पर्वतों को सात कुलाचलन कहते हैं। उन पर्वतों के नाम ये हैं- पहला सुमेरु पर्वत (जो) मध्य में है। दूसरा हिमालय, तीसरा हेमकूट, चौथा निषध-ये सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में हैं। (पाँचवाँ) मूल्यवान् पूर्व दिशा में (छठा) गन्धमादन पश्चिम दिशा में और (सातवाँ) कैलास पर्वत मर्यादा पर्वतों से अलग है। जैसा हमारे वेद (कुरान शरीफ) में सुना जाता है-"हमने पर्वतों को शकु (कीलें) बना दिया।"

  एतेषां सप्तद्वीपानां प्रत्येकमावेष्टनरूपाः सप्तसमुद्राः। लवणो जम्बुद्वीपस्यावरकः। इक्षुरसः प्लक्षद्वीपस्य दधिसमुद्रः क्रौञ्चद्वीपस्य, क्षीरसमुद्रः शाकद्वीपस्य, स्वादुजलसमुद्रः पुष्करद्वीपस्यावरकः इति। समुद्राः सप्त अस्मद्वेदेऽपि प्रकटाः भवन्ति।

इन सात द्वीपों में प्रत्येक द्वीप के आवरण रूप सात समुद्र हैं। लवण (समुद्र) जम्बुद्वीप का आवरण है। इक्षुरस (सुरा) प्लक्षद्वीप का, दधिसमुद्र क्रौञ्चद्वीप का, क्षीर सागर शाकद्वीप का (और) स्वादु जल समुद्र पुष्कर द्वीप का आवरक है। हमारे वेद (कुरान शरीफ़) में भी सात समुद्र प्रकट होते हैं। 

वृक्षाः लेखनी भवेयुः समुद्रोऽपि मसी भवेत्, परं भगवद्वाक्यानि समाप्तानि न भवन्ति। प्रतिद्वीपं प्रतिपर्वतं प्रतिसमुद्र नानाजातयोऽनन्ता जन्तवस्तिष्ठन्ति। या पृथिवी ये पर्वताः ये समुद्रा सर्वाभ्यः पृथिवीभ्यः सर्वेभ्यः पर्वतेभ्यः सर्वेभ्यः समुद्रेभ्यः उपरि तिष्ठन्ति तान् ‘स्वर्ग' इति वदन्ति। या पृथिवी ये पर्वताः ये समुद्राः सर्वाभ्यः पृथिवीभ्यः सर्वेभ्यः पर्वतेभ्यः सर्वेभ्यः समुद्रेभ्योऽधो भागे तिष्ठन्ति स 'नरक' इति वदन्ति। निश्चितं किल सिधैः स्वर्गनरकादिकं सर्वं ब्रह्माण्डान्न किञ्चिबहिरस्तीति। ते सप्तगगनाश्रिताः सप्त ग्रहाः स्वर्गं परितो मेखलावत् परिभ्रमन्तीति वदन्ति; न स्वर्गस्योपरि। अथ स्वर्गस्य यदि 911 मन आकाशं जानन्ति अस्मदीयास्तमर्श इति वदन्ति। स्वर्गभूमिं कुर्शीति वदन्ति।"

सभी वृक्ष लेखनी बन जाएँ, समुद्र स्याही बन जाए, परन्तु भगवद्-वचन समाप्त नहीं होते (अर्थात् भगवान् की महिमा लिखने के लिए ये सब अपर्याप्त ही होते हैं)। प्रत्येक द्वीप में प्रत्येक पर्वत पर, प्रत्येक समुद्र में विविध जाति वाले अनन्त प्राणी रहते हैं। जो पृथिवी, जो पर्वत, जो समुद्र सभी पृथिवियों से, सभी पर्वतों से, सभी समुद्रों से ऊपर विद्यमान हैं उन्हें 'स्वर्ग' कहते हैं। जो पृथिवी, जो पर्वत, जो समुद्र सभी पृथिवियों से, सभी पर्वतों से तथा समुद्रों से निचले भाग में स्थित हैं उन्हें 'नरक' कहते हैं। सिद्ध पुरुषों ने निश्चित मत बनाया है कि स्वर्ग-नरक आदि (सब यहाँ पर ही हैं) ब्रहमाण्ड से कछ भी बाहर नहीं है। सात आकाशों के आश्रित रहने वाले (जो) सात ग्रह हैं, वे स्वर्ग के चारों ओर मेखला की भाँति भ्रमण करते हैं, स्वर्ग के ऊपर नहीं। अब यदि स्वर्ग का मन आकाश को समझते हैं (तो) हमारे लोग उसे 'अर्श' कहते हैं। स्वर्गभूमि को 'कुर्शी' कहते हैं। 

प्रश्न 1. 
संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् 
(क) पृथिव्याः कति भेदाः ? 
(ख) पृथिव्याः सप्तपुटानां नामानि कानि सन्ति ?
(ग) पर्वताः कति सन्ति ? 
(घ) समुद्राः कति सन्ति ? 
(ङ) दधिसमुद्रः कस्य द्वीपस्यावरकः ? 
(च) 'अर्श' इति पदं कस्मै प्रयुक्तम् ? 
(छ) 'कुर्शी' इति पदं कस्मिन्नर्थे प्रयुक्तम् ? 
(ज) 'अस्मद्वेद' इति शब्द: दाराशिकोहेन कस्य ग्रन्थस्य कृते प्रयुक्तः ? 
उत्तरम् :
(क) पृथिव्याः सप्त भेदाः ? 
(ख) पृथिव्याः सप्तपुटानां नामानि सन्ति 1. अतल: 2. वितलः, 3. सुतलः, 4. प्रतलः, 5. तलातलः, 6. रसातल, 7. पातालः। 
(ग) पर्वताः सप्त सन्ति ?
(घ) समुद्राः सप्त सन्ति ? 
(ङ) दधिसमुद्रः क्रौञ्च-द्वीपस्यावरकः ? 
(च) 'अर्श' इति पदम् आकाशाय प्रयुक्तम् ? 
(छ) 'कुर्शी' इति पदं परमेश्वस्य सिंहासने अर्थे प्रयुक्तम् ? 
(ज) 'अस्मद्वेद' इति शब्द: दाराशिकोहेन 'कुरानशरीफ़' ग्रन्थस्य कृते प्रयुक्तः ? 

प्रश्न 2. 
हिन्दीभाषया आशयं लिखत - 
एतान् खण्डान् पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधोभावेन न ज्ञायन्ते, किन्तु निःश्रेणी-सोपानवजानन्ति। सप्तपर्वतान् सप्तकुलाचलान् वदन्ति, तेषां पर्वतानां नामान्येतानि-प्रथमः सुमेरुमध्ये, द्वितीयो हिमवान्, तृतीयो हेमकूटः, चतुर्थो निषधः एते सुमेरोरुत्तरतः। 

प्रसंग: - प्रस्तुत गद्यांश 'शाश्वती-द्वितीयो भागः' के 'भू-विभागाः' नामक पाठ से उद्धृत है। यह पाठ दाराशिकोह रा रचित 'समुद्रसङ्गमः' नामक ग्रन्थ से लिया गया है। प्रस्तुत गद्यांश में भूलोक के सात विभागों तथा सप्त पर्वतों की चर्चा की है। 

व्याख्या - पृथिवी जिस पर सब लोगों का निवास है, दार्शनिकों ने उसके सात खण्ड माने हैं, इन्हें सप्तद्वीप भी कहा जाता है। ये खण्ड प्याज के छिलकों की तरह एक के नीचे एक-एक के नीचे एक नहीं होते, अपितु जैसे सीढ़ी में अलग-अलग समान दूरी पर लकड़ी/बाँस में डण्डे लगे होते हैं उसी प्रकार इन सप्तद्वीपों की स्थिति भी समझनी चाहिए। सप्तपर्वतों को 'सप्तकुलाचल' नाम से भी जाना जाता है। इन सात पर्वतों के नाम और उनकी स्थिति इस प्रकार है। पृथिवी के मध्य में सुमेरु नामक पहला पर्वत है। दूसरा हिमालय, तीसरा हेमकूट और चौथा निषध नामक पर्वत है ये तीनों सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में स्थित हैं। इन सबके अतिरिक्त माल्यवान्, गन्धमादन तथा कैलास पर्वत हैं। इन्हें जोड़कर ही सात समुद्रों की संख्या पूर्ण होती है। प्रस्तुत गद्यांश में इन तीनों का उल्लेख नहीं है।

प्रश्न 3. 
अधोलिखितानां पदानां स्वसंस्कृतवाक्येषु प्रयोगं कुरुत 
पुटानि, कृतवान्स, आवेष्टनरूपा, सर्वेभ्यः ब्रह्माण्डात्, परिभ्रमन्ति। 
उत्तरम् : 
(वाक्यप्रयोगः) 
(क) पुटानि-पृथिव्याः सप्त विभागाः ‘सप्तपुटानि' अपि कथ्यन्ते। 
(ख) कृतवान्–दाराशिकोहः श्रीमद्भगवद्गीतायाः अनुवादं फारसीभाषायां कृतवान्। 
(ग) आवेष्टनरूपा:-सप्तद्वीपाः सप्तसमुद्राणाम् आवेष्टनरूपाः सन्ति। 
(घ) सर्वेभ्य:-सर्वेभ्यः शिक्षकेभ्यः नमः। 
(ङ) ब्रहमाण्डात-स्वर्गनरकादिकं ब्रहमाण्डात बहिः नास्ति। 
(च) परिभ्रमन्ति-सप्त ग्रहाः गगने परिभ्रमन्ति। 

प्रश्न 4. 
अधोलिखितानां पदानां सन्धिच्छेदं कुरुत - 
पुटान्युच्यन्ते, अस्मन्मते, पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधोभावेन, सोपानवजानन्ति, सुमेरोरुत्तरतः, समुद्रोऽपि, किञ्चिद्वहिरस्तीति, अस्मदीयास्तमर्श। 
उत्तरम् : 
(क) पुटान्युच्यन्ते = पुटानि + उच्यन्ते। 
(ख) अस्मन्यते = अस्मत् + मते। 
(ग) पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधोभावेन = पलाण्डुत्वग्वत् + उपरि + अधः + भावेन। 
(घ) सोपानवज्जानन्ति = सोपानवत् + जानन्ति। 
(ङ) सुमेरोरुत्तरतः = सुमेरोः + उत् + तरतः। 
(च) समुद्रोऽपि = समुद्रः + अपि।
(छ) किञ्चिदहिरस्तीति = किञ्चित् + बहिः + अस्ति + इति। 

5. अधोलिखितानां पदानां पर्यायवाचिपदानि लिखत -  
पृथिवी, पर्वतः, समुद्रः, गगनम्, स्वर्ग: 
उत्तरम् : 
(पर्यायवाचिपदानि) 
(क) पृथिवी = भूमिः, भू, पृथ्वी, धरणी, धरा। 
(ख) पर्वतः = गिरिः, अचलः, भूधरः, धरणीधरः। 
(ग) समुद्रः = सागरः, जलधिः, वारिधिः, रत्नाकरः। 
(घ) गगनम् = आकाशः, खः, क्षितिजः, नभः। 
(ङ) स्वर्गः = दिवम्, 'अर्श' इति फारसीभाषायाम्। 

6. रिक्तस्थानानाम् पूर्तिः विधेया - 
(क) पौराणिकास्तु ............... द्वीपानि वदन्ति। 
(ख) सप्त ............... सप्त कुलाचलान् वदन्ति। 
(ग) ............. जम्बुद्वीपस्यावरकः। 
(घ) स्वर्गभूमिं ............... वदन्ति। 
उत्तरम् :
(क) पौराणिकास्तु सप्त द्वीपानि वदन्ति। 
(ख) सप्त पर्वतान् सप्त कुलाचलान् वदन्ति। 
(ग) लवण: जम्बुद्वीपस्यावरकः। 
(घ) स्वर्गभूमिम्: कुर्शी इति वदन्ति। 

बहुविकल्पीया प्रश्नाः

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत - 

(i) पृथिव्याः कति भेदा: ? 
(A) अष्ट 
(B) सप्त 
(C) षड् 
(D) नव। 
उत्तरम् :
(B) सप्त

(ii) पर्वता: कति सन्ति ? 
(A) नव 
(B) सहस्रम् 
(C) अष्ट 
(D) सप्त।
उत्तरम् :
(A) सप्त

(iii) समुद्राः कति सन्ति ? 
(A) सप्त 
(B) अष्ट 
(C) नव 
(D) चत्वारः। 
उत्तरम् :
(D) चत्वारः। 

(iv) दधिसमुद्रः कस्य द्वीपस्यावरक: ? 
(A) सुमेरुद्वीपस्य 
(B) मालद्वीपस्य 
(C) सिंहद्वीपस्य 
(D) क्रौञ्चद्वीपस्य। 
उत्तरम् :
(A) सुमेरुद्वीपस्य 

(v) 'अर्श' इति पदं कस्मै प्रयुक्तम् ? 

(A) आकाशाय 
(B) द्वीपाय 
(C) समुद्राय 
(D) पर्वताय। 
उत्तरम् :
(A) आकाशाय 

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत - 

(i) परमेश्वरः पृथिव्याः सप्तविभागान् कृतवान्। 
(A) किम् 
(B) कः 
(C) कस्याः 
(D) काः। 
उत्तरम् :
(C) कस्याः

(ii) पौराणिकाः सप्त द्वीपानि वदन्ति। 
(A) काम् 
(B) के 
(C) कः 
(D) कति। 
उत्तरम् :
(B) के 

(iii) सप्तद्वीपानाम् आवेष्टनरूपाः सप्त समुद्राः। 
(A) कः 
(B) कस्मात् 
(C) कति 
(D) केषाम्।
उत्तरम् :
(D) केषाम्।

(iv) सप्त ग्रहाः स्वर्गं परितः मेखलावत् परिभ्रमन्ति। 
(A) कथम् 
(B) कति 
(C) केन 
(D) कया। 
उत्तरम् :
(A) कथम् 


बुधवार, 1 जुलाई 2020

विक्रमस्यौदार्यम्

                           विक्रमस्यौदार्यम्

   जेसीईआरटी तथा एनसीईआरटी के कक्षा-12 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग 2 के  सप्तमः पाठ: विक्रमस्यौदार्यम्  का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर सीबीएसई सत्र-2023-2024 के लिए यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं।
  "सिंहासनद्वात्रिंशिका" बत्तीस मनोरञ्जक कथाओं का संग्रह है। इसके केवल गद्यमय, केवल पद्यमय, गद्य-पद्यमय, ये तीन पाठ पाये जाते हैं। संग्रह में स्थित प्रत्येक कथा धारा नगरी के राजा भोज को सुनायी गयी है। अतः इस ग्रन्थ का समय राजा भोज ( 1018-1063) के अनन्तर ही माना जाता है।
          एक टीले की खुदाई करने पर राजा भोज को एक सिंहासन मिला। वह सिंहासन राजा विक्रमादित्य का था। शुभ मुहूर्त में राजा भोज उस सिंहासन पर बैठना चाहता है तो सिंहासन में बनो 32 पुत्तलिकाओं में से प्रत्येक पुत्तलिका राजा विक्रमादित्य के गुणों तथा पराक्रम की एक-एक कथा सुनाकर राजा को सिंहासन पर बैठने से पुनःपुनः रोकती है। प्रत्येक पुत्तलिका ने राजा से यही प्रश्न किया कि 'क्या तुममें विक्रम जैसा गुण है? यदि है तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो अन्यथा नहीं।'
         प्रस्तुत पाठ उपर्युक्त ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका' से ही उद्धृत है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार राजा विक्रम को यह संसार असार प्रतीत होता है। अपने औदार्यवश वे सम्पूर्ण राजकोष को दान करना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने 'सर्वस्वदक्षिणयज्ञ' का अनुष्ठान किया। उस यज्ञ में सब कुछ परित्याग कर दिया । यहाँ तक कि समुद्र की ओर से प्रदान किये गये अद्वितीय चार रत्न भी ब्राह्मण को प्रदान कर दिये। इस प्रकार से विक्रम ने अत्यधिक उदारता का परिचय दिया।इस पाठ का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://www.sanskritsight.in/2020_07_01_archive.html
         पुनरपि राजा सिंहासने समुपवेष्टुं गच्छति । ततोऽन्या पुत्तलिका समवदत् “भो राजन्, एतत्सिंहासने तेनैव अध्यासितव्यं यस्य विक्रमतुल्यम् औदार्यमस्ति ।” भोजेनोक्तम् भो पुत्तलिके, कथय तस्यौदार्यम्।” सा वदति, “राजन् यस्त्वर्थिनां पूरयति, तस्येप्सितं देवः सम्पादयति ।" यच्चोक्तम्-
       हिन्दी अनुवादः –राजा फिर भी सिंहासन पर बैठने के लिए जाता है। तभी दूसरी पुत्तलिका कहती है-“हे राजन् ! इस सिंहासन पर उसे ही बैठना चाहिए, जिसकी उदारता राजा विक्रम के समान है।” भोज ने कहा- “हे पुत्तलिके ! उसकी उदारता के विषय में बताओ।” वह बोली-“राजन् ! जो याचकों की (याचना) पूर्ण करता है, देव (विक्रम) उसकी इच्छा पूर्ण करते हैं।” और जैसा कि कहा भी गया है।
    उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम् । 
    शूरं कृतज्ञं दृढनिश्चयं च लक्ष्मीः स्वयं वाञ्छति वासहेतोः॥
     हिन्दी अनुवादः –जो मनुष्य उत्साहयुक्त, निरर्थक लम्बी योजनाएँ न बनाने वाला, क्रियाविधि का ज्ञाता, व्यसनों से दूर, शूरवीर, कृतज्ञ तथा दृढनिश्चयी होता है-ऐसे मनुष्य के पास लक्ष्मी स्वयं निवास करना चाहती है।
एवं सकलगुणनिवासः स विक्रमो राजा एकदा स्वमनस्यचिन्तयत्- 'अहो असारोऽयं संसार:, कदा कस्य किं भविष्यतीति न ज्ञायते । यच्चोपार्जितानां वित्तं तदपि दानभोगैर्विना सफलं न भवति ।
हिन्दी अनुवादः –इस प्रकार सभी गुणों से सम्पन्न उस राजा विक्रम ने एक बार अपने मन में विचार किया-“अहो, यह संसार सारहीन है, कब किसका क्या होगा-यह पता ही नहीं चलता। और जो धनवानों का धन है, वह भी दान-भोग के बिना सफल नहीं होता। 
तथा चोक्तम्-
              उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् ।
                 तटाकोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥
 हिन्दी अनुवादः –और कहा भी है-”इकट्ठे किए गए धन की रक्षा उस धन का त्याग ही है। जिस प्रकार तालाब की गहराई में स्थित जल की रक्षा उसका निकास ही होता है।
अपि च
           दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये सञ्चयो न श्रखठ
कर्त्तव्यः ।
            पश्येह    मधुकरीणां   सञ्चितमर्थं   हरन्त्यन्ये ॥
  हिन्दी अनुवादः – और भी- धन का दान करना चाहिए, धन का भोग करना चाहिए, परन्तु धन का सञ्चय कदापि नहीं करना चाहिए। देखो, इस संसार में मधुमक्खियों द्वारा सञ्चित किए गए धन (मधु/शहद) को दूसरे लोग ही हर लेते हैं।
        इत्येवं विचार्य सर्वस्वदक्षिणं यज्ञं कर्त्तुमुपक्रान्तवान् । ततः शिल्पिभिरतीव मनोहरो मण्डपः कारितः। सर्वापि यज्ञसामग्री समहृता । देवमुनिगन्धर्वयक्षसिद्धादयश्च समाहूताः । तस्मिन्नवसरे समुद्राह्वानार्थं कश्चिद्ब्राह्मणः समुद्रतीरे प्रेषितः । सोऽपि समुद्रतीरं गत्वा गन्धपुष्पादिषोडशोपचारं विधायाब्रवीत् “भोः समुद्र ! विक्रमार्को राजा यज्ञं करोति । तेन प्रेषितोऽहं त्वामाह्वातुं समागतः ।" इति जलमध्ये पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा क्षणं स्थितः । कोऽपि तस्य प्रत्युत्तरं न ददौ । तत उज्जयिनीं यावत्प्रत्यागच्छति तावद्देदीप्यमानशरीरः समुद्रो ब्राह्मणरूपी सन् तमागत्यावदत् “भो ब्राह्मण, विक्रमेणास्मानाह्वातुं प्रेषितस्त्वं, तर्हि तेन यास्माकं सम्भावना कृता सा प्राप्तैव । एतदेव सुहृदो लक्षणं यत्समये दानमानादि क्रियते ।
 हिन्दी अनुवादः –यही विचार कर सर्वस्वदक्षिणा यज्ञ करना आरम्भ कर दिया। तब शिल्पियों से बहुत ही मनोहर मण्डप तैयार करवाया। सभी यज्ञसामग्री इकट्ठी की गई। देव, मुनि, गन्धर्व, यक्ष, सिद्ध आदि आमन्त्रित किए गए। उसी अवसर पर समुद्र को बुलाने के लिए किसी ब्राह्मण को समुद्र के तट पर भेजा गया। वह भी समुद्र तट पर जाकर गन्ध, पुष्प आदि षोडशोपचार (पूजा) करके कहने लगा- “हे समुद्र ! राजा विक्रमादित्य यज्ञ कर रहे हैं। उनके द्वारा भेजा गया मैं आपको बुलाने के लिए आया हूँ।” इस प्रकार जल के बीच पुष्पाञ्जलि समर्पित कर क्षण भर के लिए ठहर गया। उसके निवेदन का उत्तर किसी ने भी नहीं दिया। फिर जैसे ही वह उज्जयिनी की ओर लौट रहा था तभी देदीप्यमान शरीर वाला समुद्र ब्राह्मण का रूप धारण कर उसके पास आकर कहने लगा- “हे ब्राह्मण! राजा विक्रमादित्य ने हमें आमन्त्रित करने के लिए तुम्हें भेजा है। तो उन्होंने जो हमारा आदर-मान किया, वह प्राप्त हो गया। यही मित्र की पहचान होती है कि समय पर दान-मान आदि किया जाए।”
" उक्तं च-
             ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति ।
             भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् ॥
हिन्दी-अनुवादः- और कहा भी हैदेना, लेना, गोपनीय बात करना, गोपनीय बात पूछना, भोजन करना और भोजन करवाना–यह छः प्रकार का प्रीति का लक्षण होता है। .. 
दूरस्थितानां मैत्री नश्यति समीपस्थानां वर्धते इति न वाच्यम्।
हिन्दी-अनुवादः- दूर रहने वालों की मित्रता नष्ट हो जाती है और समीप रहने वालों की मित्रता बढ़ती है-यह बात कहने योग्य नहीं है अर्थात् उचित नहीं है।
            गिरौ कलापी गगने पयोदो लक्षान्तरेऽर्कश्च जले च पद्मम्।
            इन्दुर्द्विलक्षे कुमुदस्य बन्धुर्यो यस्य मित्रं न हि तस्य दूरम् ॥
हिन्दी-अनुवादः- पर्वत पर मयूर और आकाश में बादल, लाखों योजन दूर सूर्य और (सरोवर के) जल में कमल-एक दूसरे के मित्र हैं। बहुत दूरी होने पर भी चन्द्रमा कमलिनी का मित्र है। जो जिसका मित्र होता है, वह उससे दूर नहीं होता।
      तस्मै राज्ञे व्ययार्थं रत्नचतुष्टयं दास्यामि। एतेषां महात्म्यम् एकं रत्नं यद्वस्तु स्मर्यते तद्ददाति। द्वितीयरत्नेन भोजनादिकममृततुल्यमुत्पद्यते। तृतीयरत्नाच्चतुरङ्गबलं भवति । चतुर्थाद्रनाद्दिव्याभरणानि जायन्ते । तदेतानि रत्नानि गृहीत्वा राज्ञो हस्ते प्रयच्छेति । ततो ब्राह्मणस्तानि रत्नानि गृहीत्वा उज्जयिनीं यावदागतस्तावद्यज्ञसमाप्तिर्जाता। राजावभृथस्नानं कृत्वा सर्वानर्थिजनान् परिपूर्णमनोरथानकरोत्। ब्राह्मणो राजानं दृष्ट्वा रत्नान्यर्पयित्वा प्रत्येकं तेषां गुणकथनमकथयत् ।
हिन्दी-अनुवादः-(मैं समुद्र) उस राजा को खर्च करने के लिए चार रत्न समर्पित करूँगा। इन रत्नों का महात्म्य यह है-एक रत्न जो वस्तु याद की जाए वही प्रदान करता है। दूसरा अमृत के समान भोजन आदि पैदा करता है। तीसरे रत्न से चतुरंगिणी सेना पैदा हो जाती है। चौथे रत्न से दिव्य वस्त्र-आभूषण पैदा होते हैं। तो ये रत्न लेकर राजा के हाथ में दे देना। तत्पश्चात् ब्राह्मण उन रत्नों को लेकर जैसे ही उज्जयिनी आया तभी यज्ञ की समाप्ति हो गई। राजा ने अवभृथ स्नान करके सभी याचकों को पूर्ण मनोरथ वाला कर दिया। ब्राह्मण ने राजा का दर्शन कर रत्नों को समर्पित करके उनमें से प्रत्येक का गुणवर्णन किया।
ततो राजावदत्, “भो ब्राह्मण! भवान् यज्ञदक्षिणाकालं व्यतिक्रम्य समागतः । मया सर्वोऽपि ब्राह्मणसमूहो दक्षिणया तोषितः । तर्हि त्वमेतेषां रत्नानां मध्ये यत्तुभ्यं रोचते तद्गृहाणेति । ब्राह्मणेनोक्तम्, 'गृहं गत्वा गृहिणीं, पुत्रं, स्नुषां च पृष्ट्वा सर्वेभ्यो यद्रोचते तद्ग्रहीष्यामीति ।' राज्ञोक्तं 'तथा कुरु।' ब्राह्मणोऽपि स्वगृहमागत्य सर्वं वृत्तान्तं तेषामग्रेऽकथयत् । पुत्रेणोक्तं 'यद्रलं चतुरङ्गबलं ददाति तद्ग्रहीष्यामः । यतः सुखेन राज्यं कर्त्तुमर्हिष्यामः ।' पित्रोक्तं 'बुद्धिमताराज्यं न प्रार्थनीयम् ।' पुनः पिता वदति 'यस्माद्धनं लभते तद् गृहाण। धनेन सर्वमपि लभ्यते।' भार्ययोक्तं 'यद्रत्नं षड्रसान् सूते तद्गृह्यताम्। सर्वेषां प्राणिनामन्नेनैव प्राणधारणं भवति।' स्नुषयोक्तं 'यद्रत्नं रत्नाभरणादिकं सूते तद् ग्राह्यम्।'
हिन्दी-अनुवादः- तब राजा ने कहा- “हे ब्राह्मण! आप यज्ञ-दक्षिणा का समय निकल जाने पर आए हैं। मैंने समस्त ब्राह्मण समूह को दक्षिणा द्वारा सन्तुष्ट कर दिया। तो इन रत्नों में से जो तुम्हें अच्छा लगता है, वह ले लो। घर जाकर पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू से पूछकर सभी को जो अच्छा लगता है, वही ले लूँगा। राजा ने कहा-“ऐसा ही करो।” ब्राह्मण ने भी अपने घर आकर सब समाचार उनके सामने कहा। पुत्र ने कहा-“जो रत्न चतुरंगिणी सेना देता है, वही रत्न लेंगे। जिससे सुखपूर्वक राज्य करने में समर्थ होंगे।” पिता ने कहा-“बुद्धिमान् मनुष्य को राज्य की इच्छा नहीं करनी चाहिए।” फिर पिता ने कहा-“जिस रत्न से धन मिलता है, वही रत्न लो। धन से सब कुछ मिल जाता है।” पत्नी ने कहा-“जो रत्न छः रसों (वाले भोजन) को पैदा करता है, वही रत्न ले लो। सभी प्राणियों का प्राणधारण (जीवन) अन्न से ही चलता है।” पुत्रवधू ने कहा-“जो रत्न वस्त्र-गहने आदि पैदा करता है, वही रत्न लेना चाहिए।”
        एवं चतुर्णां परस्परं विवादो लग्नः । ततो ब्राह्मणो राजसमीपमागत्य चतुर्णां विवादवृत्तान्तमकथयत्। राजापि तच्छ्रुत्वा तस्मै ब्राह्मणाय चत्वार्यपि रत्नानि ददौ। इति कथा कथयित्वा पुत्तलिका राजानमवदत्, 'भो राजन्, त्वय्येवंविध- सहजमौदार्यं विद्यते चेदस्मिन् सिंहासने समुपविश।' तच्छ्रुत्वा राजा तूष्णीमासीत् ।
     हिन्दी-अनुवादः इस प्रकार चारों में झगड़ा हो गया। तब ब्राह्मण ने राजा के पास आकर चारों का विवाद-समाचार कह दिया। राजा ने भी उसे सुनकर उस ब्राह्मण को चारों ही रत्न प्रदान कर दिए। यह कथा कहकर पुत्तलिका ने राजा (भोज) को कहा-“हे राजन् आप में इस प्रकार की स्वाभाविक उदारता है तो इस सिंहासन पर बैठ जाओ।” यह सुनकर राजा (भोज) चुप हो गया।
1. संस्कृतभाषया उत्तरत
(क) विक्रमस्यौदार्यम् पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः ?
(ख) उपार्जितानां वित्तानां रक्षणं कथं भवति ?
(ग) धनविषये कीदृशः व्यवहारः कर्तव्यः ?
(घ) जलमध्ये पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा क्षणं कः स्थितः ?
(ङ) समुद्रः राज्ञे किमर्थं रत्नचतुष्टयं दत्तवान् ?
(च) द्वितीयरत्नेन किम् उत्पद्यते ?
(छ) प्रीतिलक्षणम् कतिविधं भवति ?
उत्तरम्
(क) ‘विक्रमस्यौदार्यम्’ पाठः ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ ग्रन्थात् सङ्कलितः।
(ख) उपार्जितानां वित्तानां रक्षणं त्यागेन भवति।
(ग) धनविषये दानभोगैः व्यवहारः कर्तव्यः।
(घ) जलमध्ये पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा क्षणं ब्राह्मणः स्थितः ।
(ङ) समुद्रः राज्ञे व्ययार्थं रत्नचतुष्टयं दत्तवान्।
(च) द्वितीयरत्नेन अमृततुल्यं भोजनादिकम् उत्पद्यते।
(छ) प्रीतिलक्षणं षड्विधं भवति।

2. रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) उपार्जितानां वित्तानां …………….. हि रक्षणम्।
(ख) दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये …………….. न कर्तव्यः ।
(ग) ततः शिल्पिभिरतीव …………….. मण्डपः कारितः ।
(घ) भो समुद्र ! …………….. यज्ञं करोति।
(ङ) तस्मै राज्ञे व्ययार्थं …………….. दास्यामि।
(च) यद्रत्नं चतुरङ्गबलं …………….. तद् ग्रहीष्यामः ।
(छ) सर्वेषां प्राणिनामनेनैव …………….. भवति।
उत्तरम्
(क) उपार्जितानां वित्तानां त्यागः हि रक्षणम्।
(ख) दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये सञ्चयः न कर्तव्यः ।
(ग) तत: शिल्पिभिरतीव मनोहरः मण्डपः कारितः।
(घ) भो समुद्र ! विक्रमार्कः राजा यज्ञं करोति।
(ङ) तस्मै राज्ञे व्ययार्थं रत्नचतुष्टयं दास्यामि।
(च) यद्रत्नं चतुरङ्गबलं ददाति तद् ग्रहीष्यामः ।
(छ) सर्वेषां प्राणिनामनेनैव प्राणधारणं भवति।

3. अधोलिखितानां पदानां वाक्येषु प्रयोगं कुरुत
वित्तानाम्, शिल्पिभिः, गिरौ, एतेषाम्, दातव्यम्, रोचते।
उत्तरम्:
(वाक्यप्रयोगः)
(क) वित्तानाम्-वित्तानां दानभोगै: रक्षणं कर्तव्यम्।
(ख) शिल्पिभिः-शिल्पिभिः मनोहर: मण्डपः कृतः।
(ग) गिरौ-गिरौ मयूरः नृत्यति।।
(घ) एतेषाम्-एतेषां याचना अवश्यं पूरणीया।
(ङ) दातव्यम्-यत् यस्मै रोचते तत् तस्मै दातव्यम्।
(च) रोचते-मह्यं पठनं रोचते।
4. प्रकृतिप्रत्ययविभागः क्रियताम्
उपक्रान्तवान्, विधाय, गत्वा, गृहीत्वा, स्थितः, व्यतिक्रम्य, दातव्यम्।
उत्तरम्-
उपसर्ग + प्रकृति + प्रत्यय
(क) उपक्रान्तवान् – उप + √क्रम् + क्तवतु (पुं०, प्रथमा एकवचनम्)
(ख) विधाय । -वि + √धा + ल्यप् (अव्ययपदम्)
(ग) गत्वा – √गम् + क्त्वा (अव्ययपदम्)
(घ) गृहीत्वा – √ग्रह् + क्त्वा (अव्ययपदम्)
(ङ) स्थितः – √स्था + क्त (पुं०, प्रथमा एकवचनम्)
(च) व्यतिक्रम्य – वि + अति + √क्रिम् + ल्यप् (अव्ययपदम्)
5. सन्धिच्छेदं कुरुत
तेनैव, यच्चोक्तम्, तस्येप्सितम्, चैव, यच्च, तदपि, सर्वापि, सोऽपि, प्राप्तैव, चेदस्मिन्, तच्छ्रुत्वा, त्वय्येवम्
उत्तरम्-
(क) तेनैव = तेन + एव
(ख) यच्चोक्तम् = यत् + च + उक्तम्
(ग) तस्येप्सितम् = तस्य + ईप्सितम्
(घ) चैव = च + एव
(ङ) यच्च = यत् + च
(च) तदपि = तत् + अपि
(छ) सर्वापि = सर्वा + अपि
(ज) सोऽपि = सः + अपि
(झ) प्राप्तैव = प्राप्ता + एव
(ब) चेदस्मिन् = चेद् + अस्मिन्
(ट) तच्छ्रुत्वा = तत् + श्रुत्वा
(ठ) त्वय्येवम् = त्वयि + एवम्
6. सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या
(क) उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तटाकोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्॥
उत्तरम्
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य विक्रमस्यौदार्यम् नामक पाठ से लिया गया है। यह कथा किसी अज्ञात लेखक द्वारा रचित ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ कथा संग्रह से संकलित है। प्रस्तुत पद्य में धन के दान को ही धन का सच्चा संरक्षण कहा गया है।
व्याख्या-मनुष्य जो भी धन अपने परिश्रम से इकट्ठा करता है। उसका संरक्षण खजाना भरकर नहीं हो सकता। अपितु असहायों की सहायता के लिए उस धन को दान कर देना ही उसकी सच्ची रक्षा है। तालाब में जल भरा होता है यदि वह जल तालाब में ही पड़ा रहे और किसी के काम न आएँ तो वह जल व्यर्थ है अपितु तालाब में ही पड़ेपड़े वह जल दुर्गन्धयुक्त हो जाता है, इसीलिए तालाब के जल को बाहर निकाल दिया जाता है, नया जल आ जाता है और उसका पानी उपयोगी बना रहता है। इसी प्रकार धन का दान करना ही धन का सच्चा उपयोग है।
(ख) ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति।
भडक्ते भोजयते चैव षविधं प्रीतिलक्षणम्॥
उत्तरम्:
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘विक्रमौदस्यौदार्यम्’ नामक पाठ से लिया गया है। यह कथा किसी अज्ञात लेखक द्वारा रचित ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ कथासंग्रह से संकलित है। प्रस्तुत पद्य में समुद्र ने ब्राह्मण को मित्रता का लक्षण बताया है।
व्याख्या-सच्ची मित्रता की पहचान के छह सूत्र हैं
1. मित्र मित्र को धन आदि प्रदान करता है।
2. मित्र मित्र से धन आदि स्वीकार करता है।
3. अपनी गोपनीय (छिपाने योग्य) बात मित्र को बताता है।
4. मित्र की गोपनीय बात उससे पूछता है।
5. मित्र के साथ बैठकर भोजन करता है।
6. मित्र को भोजन खिलाता है।
जिन दो मित्रों के बीच उक्त छ: प्रकार के आचरण बिना किसी औपचारिकता के सम्पन्न होते हैं उन्हीं में सच्ची मित्रता समझनी चाहिए।
7. अधोलिखितानां समस्तपदानां विग्रहं कुरुत
विक्रमतुल्यम्, क्रियाविधिज्ञम्, सकलगुणनिवासः, यज्ञसामग्री, समुद्रतीरम्, जलमध्ये, पुष्पाञ्जलिम्, देदीप्यमानशरीरः, यज्ञार्थम्, यज्ञसमाप्तिः, गुणकथनम्, ब्राह्मणसमूहः, प्राणधारणम्, राजसमीपम्।
(क) विक्रमतुल्यम्-विक्रमेण तुल्यम् (तृतीया-तत्पुरुषः)
(ख) क्रियाविधिज्ञम्-क्रियायाः विधिं जानाति इति क्रियाविधिज्ञः तम् (उपपद-तत्पुरुषः)
(ग) सकलगुणनिवासः-सकलानां गुणानां निवासः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(घ) यज्ञसामग्री-यज्ञाय सामग्री (चतुर्थी-तत्पुरुषः)
(ङ) समुद्रतीरम्-समुद्रस्य तीरम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(च) जलमध्ये-जलस्य मध्ये (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(छ) पुष्पाञ्जलिम्-पुष्पाणाम् अञ्जलिम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ज) देदीप्यमानशरीर:-देदीप्यमानः शरीर: (कर्मधारयः)
(झ) यज्ञार्थम्-यज्ञस्य अर्थम् (चतुर्थी-तत्पुरुषः)
(ञ) यज्ञसमाप्तिः-यज्ञस्य समाप्तिः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ट) गुणकथनम्-गुणस्य कथनम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ठ) ब्राह्मणसमूहः-ब्राह्मणानां समूहः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ड) प्राणधारणम्-प्राणानां धारणम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ढ) राजसमीपम्-राज्ञः समीपम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) विक्रमस्यौदार्यम् पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः ?
(A) विक्रमाकचरितात्
(B) विक्रमाङ्कदेवचरितात्
(C) सिंहासनद्वादशत्रिंशिकाग्रन्थात्
(D) आर्यासप्तशतीग्रन्थात्।
उत्तराणि
(C) सिंहासनद्वादशत्रिंशिकाग्रन्थात्
(ii) उपार्जितानां वित्तानां रक्षणं कथं भवति ?
(A) त्यागेन
(B) भोगेन
(C) सञ्चयेन
(D) लोभेन।
उत्तराणि
(A) त्यागेन
(iii) धनविषये कीदृशः व्यवहारः कर्तव्यः ?
(A) दानेन
(B) भोगेन
(C) रक्षणेन
(D) दानभोगैः।
उत्तराणि
(D) दानभौगैः
(iv) जलमध्ये पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा क्षणं कः स्थितः ?
(A) विक्रमः
(B) ब्राह्मणः
(C) पुत्तलिका
(D) राजा।
उत्तराणि
(B) ब्राह्मणः
(v) समुद्रः राज्ञे किमर्थं रत्नचतुष्टयं दत्तवान् ?
(A) व्ययार्थम्
(B) सञ्चयार्थम्
(C) दानार्थम्
(D) लोभनिवारणार्थम्।
उत्तराणि
(A) व्ययार्थम्
(vi) द्वितीयरत्नेन किम् उत्पद्यते ?
(A) वस्त्रादिकम्
(B) भूषणादिकम्
(C) भोजनादिकम्
(D) रत्नादिकम्।
उत्तराणि
(C) भोजनादिकम्
(vii) प्रीतिलक्षणम् कतिवधं भवति ?
(A) अष्टविधम्
(B) षड्विधम्
(C) पञ्चविधम्
(D) चतुर्विधम्।
उत्तराणि
(B) षड्विधम्।
II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) राजा सिंहासने समुपवेष्टुं गच्छति।
(A) कया
(B) कः
(C) केन
(D) कस्मिन्।
उत्तराणि:
(B) कः
(ii) उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव रक्षणम्।
(A) केषाम्
(B) कस्मिन्
(C) कः
(D) कस्मात्।
उत्तराणि:
(A) केषाम्
(iii) शिल्पिभिः अतीव मनोहरः मण्डपः कारितः ।
(A) कः
(B) केभ्यः
(C) कम्
(D) कैः।
उत्तराणि:
(D) कैः
(iv) राजा ब्राह्मणाय चत्वारि रत्नानि ददौ।
(A) कथम्
(B) किं
(C) कति
(D) कानि।
उत्तराणि:
(B) कति।




मंगलवार, 30 जून 2020

सुक्ति सुधा

षष्ठः पाठः - सूक्तिसुधा
पाठ-परिचयः
प्रस्तुत पाठ कक्षा-12 की संस्कृत पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती द्वितीय भाग' का षष्ठ अध्याय 'सूक्तिसुधा' है। सूक्ति का अर्थ है - 'सुन्दर वचन' तथा सुधा का अर्थ है - 'अमृत', अर्थात् 'सुन्दर वचन रूपी अमृत'। इस पाठ में पण्डितराज जगन्नाथ, महाकवि माघ, भवभूति, महाकवि भारवि तथा महाकवि भर्तृहरि की बहुमूल्य सूक्तियाँ संकलित हैं। ये सूक्तियाँ जीवन के लिए पथप्रदर्शक हैं।
1. श्लोकः (पण्डितराजजगन्नाथः)
अस्ति यद्यपि सर्वत्र नीरं नीरजराजितम्।
रमते न मरालस्य मानसं मानसं विना॥ 1 ॥
अन्वयः – यद्यपि सर्वत्र नीरजराजितं नीरम् अस्ति, (परन्तु) मरालस्य मानसं मानसं विना न रमते।
सरलार्थः – यद्यपि सभी स्थानों पर कमलों से सुशोभित जल (सरोवर) उपलब्ध होता है, परन्तु हंस का मन मानसरोवर के बिना कहीं नहीं रमता।
भावार्थः – सरोवरों में जल और कमलपुष्प दोनों होते हैं, किन्तु साधारण सरोवरों का जल वर्षा में गंदा हो जाता है, जबकि मानसरोवर का जल सदा निर्मल रहता है। यह एक अन्योक्ति है, जिसके माध्यम से कवि यह सन्देश देना चाहता है कि उच्च विचार वाले श्रेष्ठ पुरुष तुच्छ वस्तुओं या स्थानों में आनंद प्राप्त नहीं करते।
विशेषः – छन्द: 'अनुष्टुप्', अलङ्कार: 'अन्योक्ति' तथा 'यमक'।
2. श्लोकः (पण्डितराजजगन्नाथः)
नीरक्षीरविवेके हंसालस्यं त्वमेव तनुषे चेत्।
विश्वस्मिन्नधुनान्यः कुलव्रतं पालयिष्यति कः॥ 2 ॥
अन्वयः – (हे) हंस! चेत् त्वम् एव नीरक्षीरविवेके आलस्यं तनुषे (तर्हि) अधुना अस्मिन् विश्वस्मिन् अन्यः कः कुलव्रतं पालयिष्यति?
सरलार्थः – हे हंस! यदि दूध का दूध और पानी का पानी (विवेकपूर्वक गुण-दोष का चयन) करने में तुम ही आलस्य करोगे, तो इस संसार में अब दूसरा कौन अपनी कुल-परम्परा का पालन करेगा? अर्थात् कोई नहीं।
भावार्थः – हंस को सत्य-असत्य एवं गुण-दोष के निर्णय का प्रतीक (विद्वान् का प्रतीक) माना गया है। यदि बुद्धिमान और योग्य व्यक्ति ही अपने उत्तरदायित्व से विमुख होकर विवेकहीन आचरण करने लगेंगे, तो समाज का मार्गदर्शन कौन करेगा?
विशेषः – छन्द: 'आर्या', अलङ्कार: 'अन्योक्ति'।
3. श्लोकः (पण्डितराजजगन्नाथः)
तावत् कोकिल विरसान् यापय दिवसान् वनान्तरे निवसन्।
यावन्मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति॥ 3 ॥
अन्वयः – हे कोकिल! तावत् वनान्तरे निवसन् विरसान् दिवसान् यापय, यावत् मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति।
सरलार्थः – हे कोयल! जब तक भौंरों के समूह से युक्त कोई आम का वृक्ष आम्रमंजरी से सुशोभित नहीं होता, तब तक इस वन में रहते हुए अपने रसहीन/नीरस दिनों को धैर्यपूर्वक व्यतीत करो।
भावार्थः – मनुष्य में निहित गुणों के प्रकट होने और फलने-फूलने के लिए सही समय और उचित वातावरण की आवश्यकता होती है। जब तक अनुकूल समय न आए, तब तक मनुष्य को धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी चाहिए।
विशेषः – छन्द: 'आर्या', अलङ्कार: 'अन्योक्ति' एवं 'अनुप्रास'।
4. श्लोकः (महाकविमाघः - शिशुपालवधम्)
नालम्बते दैष्टिकतां न निषीदति पौरुषे।
शब्दार्थौ सत्कविरिव द्वयं विद्वानपेक्षते॥ 4 ॥
अन्वयः – विद्वान् दैष्टिकतां न आलम्बते, पौरुषे न निषीदति, (अपितु) सत्कविः शब्दार्थौ इव द्वयं अपेक्षते।
सरलार्थः – विद्वान् मनुष्य न तो केवल भाग्य का ही सहारा लेता है और न ही केवल पुरुषार्थ (कर्म) के भरोसे बैठा रहता है; बल्कि वह दोनों का आश्रय लेता है—ठीक उसी प्रकार जैसे एक श्रेष्ठ कवि सुंदर काव्य-रचना के लिए शब्द और अर्थ दोनों की अपेक्षा रखता है।
भावार्थः – जीवन में सफलता के लिए भाग्य और पुरुषार्थ दोनों का संतुलन आवश्यक है।
विशेषः – छन्द: 'अनुष्टुप्', अलङ्कार: 'उपमा'।
5. श्लोकः (भवभूतिः)
न किञ्चिदपि कुर्वाणः सौख्यैर्दुःखान्यपोहति।
तत्तस्य किमपि द्रव्यं यो हि यस्य प्रियो जनः॥ 5 ॥
अन्वयः – यः हि यस्य प्रियः जनः, तत् तस्य किमपि द्रव्यम्, (सः) किञ्चित् अपि न कुर्वाणः (अपि) सौख्यैः दुःखानि अपोहति।
सरलार्थः – जो जिसका प्रियजन होता है, वह उसके लिए कोई अनिर्वचनीय (बहुमूल्य) निधि होता है। वह विशेष कुछ न करता हुआ भी केवल अपनी उपस्थितिमात्र के सुख से सारे दुःखों को दूर कर देता है।
भावार्थः – प्रिय व्यक्ति की केवल उपस्थिति ही मन को शांति देती है और दुःखों का निवारण कर देती है।
6. श्लोकः (महाकविभारविः - किरातार्जुनीयम्)
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥ 6 ॥
अन्वयः – सहसा क्रियां न विदधीत, (यतः) अविवेकः परमापदां पदं (भवति)। गुणलुब्धाः सम्पदः स्वयमेव विमृश्यकारिणं वृणते।
सरलार्थः – मनुष्य को बिना सोचे-समझे अचानक कोई कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि अज्ञान/अविवेक घोर विपत्तियों का स्थान होता है। गुणों की लोभी संपत्तियाँ (लक्ष्मी) विचारपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्ति का स्वयं वरण करती हैं।
भावार्थः – सोच-समझकर विवेकपूर्वक किया गया कार्य ही सफलता और समृद्धि प्रदान करता है।
विशेषः – छन्द: 'भारविप्रणीत वंशस्थ/आर्या', अलङ्कार: 'अर्थान्तरन्यास'।
7. श्लोकः (भर्तृहरिः - नीतिशतकम्)
स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम्॥ 7 ॥
अन्वयः – विधात्रा अज्ञतायाः छादनम् स्वायत्तम् एकान्तगुणं मौनं विनिर्मितम्। विशेषतः सर्वविदां समाजे (एतत्) अपण्डितानां विभूषणम् (अस्ति)।
सरलार्थः – ब्रह्मा ने मूर्खता को ढकने के लिए स्वयं के अधीन रहने वाला अत्यंत गुणकारी 'मौन' रूपी साधन बनाया है। विशेष रूप से विद्वानों की सभा में यह मौन मूर्खों का आभूषण बन जाता है।
भावार्थः – विद्वानों के बीच मूर्ख व्यक्ति यदि शांत रहे, तो उसकी अज्ञानता प्रकट नहीं होती और उसका मौन ही उसकी शोभा बन जाता है।
विशेषः – छन्द: 'उपजाति'।
8. श्लोकः (भर्तृहरिः - नीतिशतकम्)
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥ 8 ॥
अन्वयः – विपदि धैर्यम्, अथ अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता, युधि विक्रमः, यशसि च अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनम्, इदं हि महात्मनां प्रकृतिसिद्धम्।
सरलार्थः – विपत्ति में धैर्य, समृद्धि होने पर क्षमाशीलता, सभा में वाक्पटुता (बोलने की चतुरता), युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि और शास्त्र-ज्ञान प्राप्त करने में व्यसन (लगन)—ये गुण महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होते हैं।
भावार्थः – महापुरुषों का आचरण स्वाभाविक रूप से महानता और विवेक से परिपूर्ण होता है।
विशेषः – छन्द: 'द्रुतविलम्बित'।
9. श्लोकः (भर्तृहरिः - नीतिशतकम्)
पापान्निवारयति योजयते हिताय गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥ 9 ॥
अन्वयः – (यः) पापात निवारयति, हिताय योजयते, गुह्यं निगूहति, गुणान् प्रकटीकरोति, आपद्गतं च न जहाति, काले ददाति, सन्तः इदं सन्मित्रलक्षणं प्रवदन्ति।
सरलार्थः – जो पाप से रोकता है, हितकारी कार्यों में लगाता है, गुप्त बातों को छिपाता है, गुणों को प्रकट करता है, विपत्ति में साथ नहीं छोड़ता और समय आने पर सहायता देता है—सज्जन पुरुष इसे ही श्रेष्ठ मित्र के लक्षण कहते हैं।
भावार्थः – सच्चा मित्र जीवन में सन्मार्ग दिखाता है और हर परिस्थिति में सम्बल प्रदान करता है।
विशेषः – छन्द: 'वसन्ततिलका'।
10. श्लोकः (भर्तृहरिः - नीतिशतकम्)
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः।
परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः॥ 10 ॥
अन्वयः – मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः, उपकारश्रेणिभिः त्रिभुवनं प्रीणयन्तः, परगुणपरमाणून् नित्यं पर्वतीकृत्य निजहृदि विकसन्तः सन्तः कियन्तः सन्ति?
सरलार्थः – मन, वाणी और शरीर में पुण्य रूपी अमृत से भरे हुए, अपने उपकारों से तीनों लोकों को प्रसन्न करने वाले तथा दूसरों के परमाणु जैसे सूक्ष्म गुणों को भी पर्वत के समान बड़ा मानकर अपने हृदय में प्रसन्न होने वाले सज्जन पुरुष इस संसार में कितने (अत्यंत विरले) हैं!
भावार्थः – निष्काम भाव से परोपकार करने वाले और दूसरों के छोटे से गुण का सम्मान करने वाले संत पुरुष दुर्लभ होते हैं।
विशेषः – छन्द: 'मालिनी'।
11. श्लोकः (भर्तृहरिः - नीतिशतकम्)
केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥ 11 ॥
अन्वयः – पुरुषं केयूराणि न भूषयन्ति, न चन्द्रोज्ज्वलाः हाराः, न स्नानम्, न विलेपनम्, न कुसुमम्, न अलंकृताः मूर्धजाः भूषयन्ति। एका वाणी (एव) पुरुषं समलङ्करोति या संस्कृता धार्यते। भूषणानि खलु सततं क्षीयन्ते, वाग्भूषणं (तु) सततं भूषणम्।
सरलार्थः – मनुष्य को न बाजूबंद विभूषित करते हैं, न चंद्रमा के समान उज्ज्वल हार, न स्नान, न सुगंधित लेपन, न पुष्प और न ही सजे हुए केश। केवल एक संस्कारयुक्त (सभ्य) वाणी ही मनुष्य को भली-भांति अलंकृत करती है। समस्त बाहरी आभूषण नष्ट हो जाते हैं, परन्तु वाणी रूपी आभूषण ही सच्चा और शाश्वत आभूषण है।
विशेषः – छन्द: 'शार्दूलविक्रीडित'।
12. श्लोकः (भर्तृहरिः - नीतिशतकम्)
यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान् प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः॥ 12 ॥
अन्वयः – यावत् इदं कलेवरगृहं स्वस्थम्, यावत् च जरा दूरे, यावत् च इन्द्रियशक्तिः अप्रतिहता, यावत् आयुषः क्षयः न, तावत् एव विदुषा आत्मश्रेयसि महान् प्रयत्नः कार्यः। भवने प्रोद्दीप्ते च कूपखननं प्रति उद्यमः कीदृशः?
सरलार्थः – जब तक यह शरीर रूपी घर स्वस्थ है, जब तक बुढ़ापा दूर है, जब तक इंद्रियों की शक्ति क्षीण नहीं हुई है और जब तक आयु समाप्त नहीं हुई है, तब तक ही बुद्धिमान मनुष्य को अपने कल्याण के लिए महान प्रयास कर लेना चाहिए। घर में आग लग जाने पर कुआँ खोदने का प्रयास भला कैसा? (अर्थात् व्यर्थ है)।
भावार्थः – विपत्ति या वृद्धावस्था आने से पूर्व ही मनुष्य को आत्मकल्याण एवं साधना के मार्ग पर अग्रसर हो जाना चाहिए।
विशेषः – छन्द: 'शार्दूलविक्रीडित'।
अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
1. संस्कृतभाषाया प्रश्नोत्तराणि लिखत (संस्कृत में उत्तर दीजिए):
(क) सर्वत्र कीदृशं नीरम् अस्ति?
उत्तरम् : सर्वत्र नीरजराजितम् नीरम् अस्ति।
(ख) मरालस्य मानसं कं विना न रमते?
उत्तरम् : मरालस्य मानसं मानसं (मानसरोवरम्) विना न रमते।
(ग) विद्वान् कम् अपेक्षते?
उत्तरम् : विद्वान् दैष्टिकतां पौरुषं च द्वयं अपेक्षते।
(घ) सत्कविः कौ द्वौ अपेक्षते?
उत्तरम् : सत्कविः शब्दार्थौ द्वौ अपेक्षते।
(ङ) यः यस्य प्रियः जनः सः तस्य कृते किं भवति?
उत्तरम् : यः यस्य प्रियः जनः सः तस्य कृते किमपि (अनिर्वचनीयम्) द्रव्यं भवति।
(च) सहसा किम् न विदधीत?
उत्तरम् : सहसा क्रियां न विदधीत।
(छ) विधात्रा अज्ञतायाः छादनं किं विनिर्मितम्?
उत्तरम् : विधात्रा अज्ञतायाः छादनं मौनं विनिर्मितम्।
(ज) अपण्डितानां विभूषणं किम्?
उत्तरम् : अपण्डितानां विभूषणं मौनम् अस्ति।
(झ) महात्मनां प्रकृतिसिद्धं किं भवति?
उत्तरम् : विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता, युधि विक्रमः, यशसि अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनम् च महात्मनाम् प्रकृतिसिद्धं भवति।
(ञ) पापात् कः निवारयति?
उत्तरम् : पापात् सन्मित्रम् निवारयति।
(ट) सन्तः कान् पर्वतीकुर्वन्ति?
उत्तरम् : सन्तः परगुणपरमाणून् पर्वतीकुर्वन्ति।
(ठ) कीदृशं भूषणं न क्षीयते?
उत्तरम् : वाग्भूषणं भूषणं न क्षीयते।
(ड) कूपखननं कदा न उचितम्?
उत्तरम् : भवने प्रोद्दीप्ते कूपखननं न उचितम्।
2. अधोलिखितपद्यांशानां सप्रसङ्गं हिन्दीभाषाया व्याख्या विधेया (सप्रसंग व्याख्या):
(क) "वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः।"
प्रसंगः – प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी संस्कृत पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती (भाग-2)' के 'सूक्तिसुधा' नामक पाठ से उद्धृत हैं। इसके मूल रचयिता महाकवि भारवि (किरातार्जुनीयम्) हैं।
व्याख्या – महाकवि भारवि कहते हैं कि जो व्यक्ति विचार-विमर्श करके, सोच-समझकर कार्य करता है, लक्ष्मी अथवा धन-संपत्तियाँ स्वयं उसका वरण करती हैं, क्योंकि संपत्तियाँ गुणों की भूखी होती हैं। बिना विचारे कार्य करने से विपत्ति आती है, जबकि विवेकपूर्वक कार्य करने से सफलता प्राप्त होती है।
(ख) "क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्।"
प्रसंगः – प्रस्तुत पंक्ति 'शाश्वती (भाग-2)' के 'सूक्तिसुधा' पाठ से उद्धृत है। इसके रचयिता महर्षि भर्तृहरि (नीतिशतकम्) हैं।
व्याख्या – यहाँ वाणी के महत्त्व को दर्शाया गया है। संसार के सभी बाह्य आभूषण (सोना, हार, आभूषण आदि) समय के साथ नष्ट हो जाते हैं, किन्तु मधुर और संस्कारयुक्त वाणी रूपी आभूषण सदैव स्थिर रहता है और मनुष्य की वास्तविक शोभा बढ़ाता है।
(ग) "प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः?"
प्रसंगः – प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक के 'सूक्तिसुधा' पाठ से ली गई है, जिसके रचयिता महाकवि भर्तृहरि हैं।
व्याख्या – कवि का कथन है कि मनुष्य को स्वस्थ शरीर एवं युवावस्था रहते ही आत्मकल्याण और धर्म के मार्ग पर प्रयत्न कर लेना चाहिए। घर में आग लग जाने के बाद कुआँ खोदने का प्रयास जिस प्रकार व्यर्थ है, उसी प्रकार वृद्धावस्था या संकट आने पर किया गया उपाय निष्फल सिद्ध होता है।
3. रिक्तस्थानपूर्तिः करणीया (रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए):
(क) सत्कविरिव विद्वान् शब्दार्थौ द्वयम् अपेक्षते।
(ख) सन्तः इदं सन्मित्रलक्षणं प्रवदन्ति।
4. अन्वयलेखनम् (अन्वय लिखिए):
(क) नीरक्षीरविवेके हंसालस्यं त्वमेव तनुषे चेत्।
विश्वस्मिन्नधुनान्यः कुलव्रतं पालयिष्यति कः॥
अन्वयः – (हे) हंस! चेत् त्वम् एव नीरक्षीरविवेके आलस्यं तनुषे, (तर्हि) अधुना अस्मिन् विश्वस्मिन् अन्यः कः कुलव्रतं पालयिष्यति?
(ख) विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥
अन्वयः – विपदि धैर्यम्, अथ अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता, युधि विक्रमः, यशसि च अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनम्, इदं हि महात्मनां प्रकृतिसिद्धम्।
5. अर्थं लिखित्वा वाक्यप्रयोगं कुरुत (अर्थ लिखकर वाक्य-प्रयोग कीजिए):
नीरजम् (कमल) – सरोवरे विकसितं नीरजम् अतीव सुन्दरं दृश्यते।
रसालः (आम का वृक्ष) – वसन्तर्तौ रसालः आम्रमञ्जर्या सुशोभते।
पौरुषम् (पुरुषार्थ/कर्म) – सफलतौ पौरुषम् आवश्यकम् अस्ति।
विमृश्यकारिणम् (सोच-विचार कर कार्य करने वाले को) – सम्पदः विमृश्यकारिणं स्वयमेव वृणते।
जरा (बुढ़ापा) – जरा आगते शरीरस्य शक्तिः क्षीणा भवति।
6. अधोलिखितशब्दानां सार्थकं मेलनम् (उचित मिलान):
स्तम्भ 'क'स्तम्भ 'ख'
मरालस्यहंसस्य
नालम्बतेनाश्रयते / न अवलम्बते
अधुनासाम्प्रतम्
विधात्राब्रह्मणा
पर्वतीकृत्यविशदीकृत्य (बढ़ा-चढ़ाकर)
नीरजम्कमलम्
रसालःआम्रः
सम्पदःविभूतयः
यशसिकीर्तौ

7. विलोमपदानि लिखत (विलोम शब्द लिखिए):
मूर्खः = विद्वान्
अप्रियः = प्रियः
पुण्यात् = पापात्
यौवनम् = जरा
उपेक्षते = अपेक्षते
8. सन्धिविच्छेदः क्रियताम् (संधि-विच्छेद कीजिए):
(क) नालम्बते = न + आलम्बते
(ख) विश्वस्मिन्नधुनान्यः = विश्वस्मिन् + अधुना + अन्यः
(ग) कोऽपि = कः + अपि
(घ) चाभिरुचिर्व्यसनम् = च + अभिरुचिः + व्यसनम्
(ङ) चन्द्रोज्ज्वलाः = चन्द्र + उज्ज्वलाः
9. समास-विग्रहः एवं समस्तपदानि:
(अ) समास-विग्रहः कार्यः (विग्रह कीजिए):
अलिमालः = अलीनाम् माला यस्मिन् सः (बहुव्रीहि समास)
वाक्पटुता = वाचि पटुता (सप्तमी तत्पुरुष समास)
चन्द्रोज्ज्वलाः = चन्द्र इव उज्ज्वलाः (कर्मधारय समास)
अप्रतिहता = न प्रतिहता (नञ् तत्पुरुष समास)
वाग्भूषणम् = वाग् एव भूषणम् (कर्मधारय समास)
(आ) समस्तपदानि रचयत (समस्त पद बनाइए):
कुलस्य व्रतम् = कुलव्रतम्
वनस्य अन्तरे = वनान्तरे
गुणानां लुब्धाः = गुणलुब्धाः
प्रकृत्या सिद्धम् = प्रकृतिसिद्धम्
उपकारस्य श्रेणिभिः = उपकारश्रेणिभिः
आत्मनः श्रेयसि = आत्मश्रेयसि
10. प्रकृति-प्रत्यय-विभागः (प्रकृति और प्रत्यय का विभाजन):
राजितम् = राज् + क्त
दैष्टिकताम् = दैष्टिक + तल् (द्वितीया एकवचन)
कुर्वाणः = कृ + शानच्
पटुता = पटु + तल्
सिद्धम् = सिध् + क्त
विमृश्य = वि + मृश् + ल्यप्
11. छन्दो-निर्देशः (छंद बताइए):
तावत कोकिल विरसान्... = आर्या छन्दः
स्वायत्तमेकान्तगुणम्... = उपजाति छन्दः
विपदि धैर्यमथाभ्युदये... = द्रुतविलम्बित छन्दः
पापान्निवारयति योजयते... = वसन्ततिलका छन्दः
केयूराणि न भूषयन्ति... = शार्दूलविक्रीडित छन्दः
12. अलङ्कार-निर्देशः (अलंकार पहचानिए):
(क) शब्दार्थौ सत्कविरिव द्वयं विद्वानपेक्षते = उपमा अलङ्कारः
(ख) वाग्भूषणं भूषणम् = रूपक अलङ्कारः
(ग) निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः = अनुप्रास अलङ्कारः
(घ) रमते न मरालस्य मानसं मानसं विना = यमक अलङ्कारः
(ङ) यावन्मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति = अनुप्रास अलङ्कारः

सोमवार, 29 जून 2020

शुकनासोपदेशः

                     शुकनासोपदेशः

         जेसीईआरटी तथा एनसीईआरटी के कक्षा-12 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग 2 के  पञ्चम: पाठ: शुकनासोपदेशः  का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर सीबीएसई सत्र 2022-2023 के लिए यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं।                                                                                                           महाकवि बाणभट्ट संस्कृत के सर्वाधिक प्रतिभाशाली गद्यकार हैं। इनकी दो रचनाएँ सुप्रसिद्ध हैं- हर्षचरित और कादम्बरी।कादम्बरी संस्कृत साहित्य का सर्वोत्कृष्ट गद्य काव्य है। यह 'कथा' श्रेणी का काव्य है। चन्द्रापीड-कादम्बरी तथा पुण्डरीक महाश्वेता के प्रणय का चित्रण करने वाली कथा 'कादम्बरी' के दो भाग हैं। इसका कथानक जटिल होते हुए भी मनोरम है। इसमें कथा का प्रारम्भ राजा शूद्रक के वर्णन से होता है। शूद्रक के यहाँ चाण्डालकन्या वैशम्पायन नामक शुक को लेकर पहुँचती है। शुक सभा में आत्म-वृत्तान्त सुनाता है। इस ग्रन्थ में तीन-तीन जन्मों की घटनाएँ गुम्फित हैं।                                                                                                                         प्रस्तुत पाठ इसी 'कादम्बरी' के शुकनासोपदेशः नामक गद्यांश से लिया गया है। इस अंश का नायक राजकुमार चन्द्रापीड है,जो सत्व, शौर्य और आर्जव भावों से युक्त है। शुकनास एक अनुभवी मन्त्री हैं.जो राजकुमार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्यभाव से उपदेश देते हैं। इसे युवावस्था में प्रवेश कर रहे समस्त युवकों को प्रदत्त 'दीक्षान्त भाषण' कहा जा सकता है।इस पाठ का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://www.sanskritsight.in/2020_06_29_archive.html

              
   धन और युवावस्था का आलोचना करनेवाला तथा  विश्व साहित्य का पहला उपन्यासकार और उनका उपन्यास
                                                           शुकनासोपदेश का सारांश
      धन मानव जीवन की महत्वपूर्ण आवश्यकता है तथा युवावस्था उसका स्वर्णिम काल है। धन के बिना मनुष्य का जीवन नरक के समान हो जाता है।परन्तु धन की अधिकता हानिकर भी सिद्ध होती है। भारतीय संस्कृति में धन का सम्बन्ध देवी लक्ष्मी जी से है।देवी लक्ष्मी जी को धन की देवी मानकर उनका पूजा-पाठ किया जाता है।शास्त्रों में उनकी स्तुति और प्रशंसा हुई है।प्रायः प्राचीन से लेकर अर्वाचीन काव्यों में लक्ष्मी जी की  स्तुति और प्रशंसा  हुई है।परन्तु संस्कृत साहित्य के कुछ ऐसे भी काव्य हैं,जिसमें लक्ष्मी जी की आलोचना भी की गयी है।उन्हीं मे एक गद्य काव्य ऐसा भी है,जिसे विश्व साहित्य का पहला उपन्यास माना जाता है।उस गद्य काव्य में लक्ष्मी जी की आलोचना की गयी है।
    उस गद्य काव्य में बताया गया है कि लक्ष्मी इन्द्रजाल जैसे सम्मोहन से विश्व को विमुग्ध करती है तथा भौतिक उन्नति के रूप में नीच स्वभाव का प्रवर्त्तन करती है।लक्ष्मी रुपी धन की गर्मी रहने पर भी यह शीत ऋतु के समान जडता अर्थात् आलस्य उत्पन्न करती है।जिस प्रकार शीतऋतु में मनुष्य अत्यधिक शीत के कारण कोई काम करने केलिए नहीं उठता है,उसीप्रकार अत्यधिक धन हो जाने पर भी मनुष्य कोई काम करने के लिए नहीं उठता है।इसप्रकार यह लक्ष्मी सम्प्रभुता को उपस्थित करती हुई भी जीवन में तुच्छता ला देती है।मनुष्य धन सम्पन्न होकर भी स्वयं अपना कार्य नहीं कर पाता,दूसरों पर निर्भर हो जाता है।यह लक्ष्मी सैन्य बल की वृद्धि करती हुई भी शक्तिहीन बना देती है।मनुष्य सैन्य बल पर भरोसा करके स्वयं की शक्ति का विकास नहीं कर पाता है।देवताओं और राक्षसों के द्वारा किेये गये समुन्द्र मंथन में अमृत के साथ उत्पन्न होकर भी यह विष जैसी कटुता उत्पन्न करती है।पुरुषोत्तम विष्णु जी की प्रिया होती हुई भी दीपक की लौ के समान कालिख उत्पन्न करती है।यह लक्ष्मी तृष्णा को जगाती है।इन्द्रियों को विषयों में लगाती है।निद्रा जैसी मोहिनी दशा, कालिमा जैसी अँधियारी तथा मधुशाला जैसी मतीली दशा को उत्पन्न करती है।यह लक्ष्मी दोष रुपी विषैले सर्पों के रहने की खोह है।शिष्टाचार को दूर हटाने वाली बेंत की छडी है।सद्गुण रुपी राजहंसों को हटाने के लिए बिना समय की वर्षा है।सज्जनता का फाँसी घर है।धर्म रुपी चन्द्रमण्डल के लिए राहु की जीभ है।
     लक्ष्मीजी के दोषों का वर्णन करते हुए इसमें युवावस्था के दोषों को भी नहीं छोडा गया है।युवावस्था की भी भरपूर आलोचना की गयी है।यौवन के प्रारम्भ में शास्त्ररुपी जल से धुली हुई निर्मल बुद्धि भी कलुषित हो जाती है।यौवन के उन्मादक परिणाम से शास्त्रज्ञान भी रक्षा नहीं कर पाते।तरुण व्यक्तियों के उज्ज्वल आँखों में प्रेम व्यापार की लालिमा सदैव छायी रहती है।रजोगुण का प्रभाव यौवन काल में इतनी प्रचण्डता प्राप्त कर लेता है कि वह युवक की बुद्धि को बवंडर में पडे तिनके की तरह विभ्रम में डाल दिया करता है।विषय-सुख भोगने की लालसा ्त्यन्त विषम हुआ करती है।युवावस्था में विषयों का वह सुख ही मधुर और हितकर प्रतीत होता है,जो अन्त में दुखों की सृष्टि करने वाला है।इससे मनुष्य कुमार्गगामी होकर विनाश को प्राप्त हो जाता है। लक्ष्मी और युवावस्था का आलोचना करने  के बाद इसमें यह भी बताया गया है कि ऐसे लोगों पर शिक्षा का प्रभाव नहीं के बराबर पडता है।इसप्रकार इस गद्य काव्य में बतायी गयी बातें आज के लिए  अत्यन्त प्रासंगिक है।
     यह गद्य काव्य  संस्कृत वाङ्मयमय का बहुत ही प्रसिद्ध  गद्य काव्य है।जिसका नाम है-कादम्बरी।जिसकी रचना आज से करीब 1300वर्ष पहले सातवीं शताब्दी में हुई थी।उस समय कन्नौज के राजा हर्षवर्द्धन का राज्य था।उन्हीं के दरबारी कवि थे-बाणभट्ट।इन्होने दो प्रमुख ग्रन्थों की रचना की-हर्षचरित्र और कादम्बरी।कादम्बरी को ही विश्व साहित्य का पहला उपन्यास माना जाता है,जिसे संस्कृत मे आख्यायिका कहा जाता है।कादम्बरी की कहानी काल्पनिक है।शुकनासोपदेश इसी कादम्बरी का एक अंश है।इसमें महाकवि ने राजा तारापीड के मन्त्री शुकनास के माध्यम से युवराज के पद पर अभिषिक्त होने वाले चन्द्रापीड को लक्ष्मी और युवावस्था की आलोचना करते हुए उपदेश दिलवाया है।
द्वादश वर्ग संस्कृत विषय के पाठ्य पुस्तक शाश्वती के पंचम् पाठ शुकनासोपदेश के मूल पाठ के पहले अनुच्छेद का सम्पादित अंश-
           एवं समतिक्रामत्सुदिवसेषु राजा चन्द्रापीडस्य यौवराज्याभिषेकं चिकीर्षुः प्रतिहारानुपकरण -सम्भारसंग्रहार्थमादिदेश।समुपस्थितयौवराज्याभिषेकं च तं कदाचित् दर्शनार्थमागतमारुढविनयमपि विनीततरमिच्छन् कर्तुं शुकनासः सविस्तरमुवाच-
अर्थात् इसप्रकार कुछ दिन बीत जाने पर राजा चन्द्रापीड का युवराज के पद पर अभिषेक करने के इच्छुक द्वारपालों को सभी सामग्री संग्रह करने के लिए आदेश दिया। और जिसका युवराज के पद पर अभिषेक होने वाला था, कभी दर्शन के लिए आया हुआ और विनयशील होने पर भी उसको और विनीत करने की इच्छा करते हुए विस्तार पूर्वक उपदेश दिया।
गद्यांश का अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
 एवं समतिक्रामत्सुदिवसेषु-इसप्रकार कुछ दिन बीत जाने पर
 राजा चन्द्रापीडस्य    -राजा चन्द्रापीड का
 यौवराज्याभिषेकं -युवराज के पद पर अभिषेक  चिकीर्षुः     -करने के इच्छुक
प्रतिहारानुपकरण -सम्भार -द्वारपालों को सभी सामग्री
 संग्रहार्थमादिदेश -संग्रह करने के लिए आदेश दिया।
 समुपस्थितयौवराज्याभिषेकं च तं  -और जिसका युवराज के पद पर अभिषेक होने वाला था,
 कदाचित्     -कभी
 दर्शनार्थमागतमारुढविनयमपि -दर्शन के लिए आया हुआ और विनयशील होने पर भी उसको
 विनीततरमिच्छन् कर्तुं    -और विनीत करने की
                                 इच्छा करते हुए
शुकनासः सविस्तरमुवाच--विस्तार पूर्वक उपदेश दिया।


     
तात चन्द्रापीड। विदितवेदितव्यस्याधीतसर्वशाश्त्रस्य ते नाल्पमप्युपदेष्टव्यमस्ति। केवलं च निसर्गत एवातिगहनं तमो यौवनप्रभवम्।अपरिणामोपशमो दारूणो लक्ष्मीमदः।अप्रबोधा घोरा च राज्यसुखसन्निपातनिद्रा भवति,इत्यतःविस्तरेणाभिधीयसे।
      अर्थात् वत्स चन्द्रापीड।जानने योग्य बातों को जानने वाले तथा समस्त शाश्त्रों का अध्ययन किये हुए तुझे कुछ भी उपदेश देना नहीं है। और केवल स्वभाव से ही अत्यन्त गहन अन्धकार यौवन से उत्पन्न होता है। अन्तिम अवस्था में भी शान्त न होने वाला  धन का अहंकार भयंकर होता है।राज्यसुख के समूह रुप निद्रा नहीं खुलती है और घोर होती है,इसलिए विस्तारपूर्वक तुझसे कहा जा रहा है।

                  गद्यांश का अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ- 

                
             विदितवेदितव्यस्य – जानने योग्य बातों को
                              जानने वाले
             अधीतसर्वशाश्त्रस्य-    तथा समस्त शाश्त्रों 
                              का अध्ययन किये हुए
      ते नाल्पमप्युपदेष्टव्यमस्ति-  तुझे कुछ भी उपदेश
                              देना नहीं है।
                     केवलं च-   और केवल
                  निसर्गत एव-  स्वभाव से ही
                अतिगहनं तमो-   अत्यन्त गहन अन्धकार
                  यौवनप्रभवम्-  यौवन से उत्पन्न होता है।
               अपरिणामोपशमो-   अन्तिम अवस्था में भी
                              शान्त न होने वाला
               लक्ष्मीमदःदारूणो-   धन का अहंकार
                               भयंकर होता है।
          राज्यसुखसन्निपातनिद्रा- राज्यसुख के समूह
                              रुप निद्रा
          अप्रबोधा घोरा च भवति,- नहीं खुलती है 
                              और घोर होती है,
          इत्यतःविस्तरेणाभिधीयसे- इसलिए विस्तारपूर्वक 
                               तुझसे कहा जा रहा है।

गर्भेश्वरत्वमभिनवयौवनत्वम्,अप्रतिमरुपत्वममानुषशक्तित्वञ्चेति महतीयं खल्वनर्थपरम्परा। यौवनारम्भे च प्रायःशास्त्रजलप्रक्षालन- निर्मला कालुष्यमुपयाति बुद्धिः।नाशयति च पुरुषमत्यासङ्गो विषयेषु। 
          अर्थोत् गर्भ से ही प्राप्त ऐश्वर्य नूतन यौवन निरुपम् सौन्दर्य अलौकिक शक्ति निश्चय ही महान् अनर्थों की परम्परा है।और यौवन के आरंभ में प्रायः शास्त्ररुपी जल से स्नान द्वारा निर्मल हुई बुद्धि भी मलिनता को प्राप्त होती है और विषयों में पुरुषों की अत्यासक्ति उसे नष्ट कर देती है।

गद्यांश का अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ- 

                                 गर्भेश्वरत्वम्-गर्भ से ही प्राप्त ऐश्वर्य
              अभिनवयौवनत्वम्,-नूतन यौवन
                  अप्रतिमरुपत्वम्-निरुपम् सौन्दर्य
         अमानुषशक्तित्वम् चेति-अलौकिक शक्ति
                       खलु महतीयं-निश्चय ही महान् 
               अनर्थपरम्परा-अनर्थों की
                                           परम्परा है।
                      यौवनारम्भे च-और यौवन के
                                           आरंभ में 
            प्रायःशास्त्रजलप्रक्षालन-प्रायः शास्त्ररुपी
                                             जल से स्नान द्वारा
                       निर्मलापि बुद्धिः-निर्मल हुई बुद्धि भी
                      कालुष्यमुपयाति-मलिनता को
                                             प्राप्त होती है।
                             विषयेषु च-और विषयों में 
                       पुरुषमत्यासङ्गो-पुरुषों की 
                                           अत्यासक्ति उसे 
                              नाशयति-नष्ट कर देती है


भवादृशा एव भवन्ति भाजनान्युपदेशानाम्।अपगतमले हि मनसि विशन्ति सुखेनोपदेशगुणाः।हरति अतिमलिनमपि दोषजातं गुरुपदेशःगुरुपदेशश्च नाम अखिलमलप्रक्षालनक्षमम् अजलं स्नानम्।विॆशेषेण तु राज्ञाम।विरला हि तेषामुपदेष्टारः।राजवचनमनुगच्छति जनो भयात्।उपदिश्यमानमपि ते न श्रृण्वन्ति।अवधीरयन्तःखेदयन्ति हितोपदेशदायिनो गुरुन्।
        अर्थात् आप जैसे  लोग ही उपदेशों के पात्र होते हैं।क्योंकि निर्मल मन में ही उपदेशों के गुण सुखपूर्वक प्रवेश करते हैं।गुरु का उपदेश अत्यन्त मलिन दोष को भी हर लेता है और गुरु का उपदेश समस्त दोषों को दूर करने में समर्थ बिना जल का स्नान है।विशेषकर तो राजा के लिए,क्योंकि उनको उपदेश देने वाले विरला ही होते हैं।लोग भय से राजा की आज्ञा का पालन करते हैं।उपदेश दिये जाने पर भी वेलोग नहीं सुनते हैं।तथा हितकर उपदेश देने वाले गुरुओं का अनादर करते हुए कष्ट पहुँचाते हैं।
गद्यांश का अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ- 
           भवादृशा एव-आप जैसे
                                 लोग ही
            उपदेशानाम्-उपदेशों के
                भाजनानि-पात्र
                    भवन्ति-होते हैं।
                          हि-क्योंकि
              अपगतमले-निर्मल
                हि मनसि-मन में ही
            उपदेशगुणाः-उपदेशों
                                के गुण
                     सुखेन-सुखपूर्वक
                  विशन्ति-प्रवेश
                               करते हैं।
                गुरुपदेशः-गुरु का
                               उपदेश
           अतिमलिनम्-अत्यन्त मलिन
       दोषजातम् अपि-दोष को भी
                      हरति-हर लेता है।
       गुरुपदेशश्च नाम-और गुरु
                                का उपदेश
              अखिलमल-समस्त
                                दोषों को
          प्रक्षालनक्षमम्-दूर करने में
                                समर्थ
                     अजलं-बिना जल का
                     स्नानम्-स्नान है।
               विॆशेषेण तु-विशेषकर तो
                     राज्ञाम्-राजा के
                                लिए,
           तेषामुपदेष्टारः-(क्योंकि) उनको
                                उपदेश देने
                                 वाले
                 विरला हि-विरला ही
                                 होते हैं।
               जनो भयात्-लोग भय से
               राजवचनम्-राजा की
                                 आज्ञा का
               अनुगच्छति-पालन
                                 करते हैं।
      उपदिश्यमानमपि-उपदेश दिये
                                 जाने पर भी
             ते न श्रृण्वन्ति-वेलोग नहीं
                                 सुनते है्ं।
      हितोपदेशदायिनो-(तथा)हितकर
                                 उपदेश देने
                                 वाले
                        गुरुन्-गुरुओं का
              अवधीरयन्तः-अनादर
                                  करते हुए
                   खेदयन्ति-कष्ट पहुँचाते हैं।

आलोकयतु तावत् कल्याणाभिनिवेशी लक्ष्मीमेव प्रथमम्।न ह्येवं विधमपरिचितमिह जगति किञ्चिदस्ति यथेयमनार्या। लब्धापि खलु दुःखेन परिपाल्यते।परिपालितापि प्रपलायते।न परिचयंं रक्षति।नाभिजनमीक्षते।न रुपमालोकयते।न कुलक्रममनुवर्तते।न शीलं पश्यति।न वैदग्ध्यं गणयति।न श्रुतमाकर्णयति।न धर्ममनुरुध्यते।न त्यागमाद्रियते।न विशेषज्ञतां विचारयति।नाचारं पालयति।नसत्यमवबुध्यते।पश्यत एव नश्यति।सरस्वती परिगृहीतं नालिङ्गति जनम्।गुणवन्तं न स्पृशति।सुजनं न पश्यति।शूरं कण्टकमिव परिहरति।दातारं दुस्वप्नमिव न स्मरति।विनीतं नोपसर्पति।तृष्णां संवर्धयति।लघिमानमापादयति।एवं विधयापि चानया कथमपि दैववशेन परिगृहीताः विक्लवाः भवन्ति राजानः,सर्वाविनयाधिष्ठानतां च गच्छति।
        अर्थात् तब कल्याण में आग्रह रखनेवाली लक्ष्मी को ही पहले देखो।क्योंकि इस जगत में ऐसी कोई अपरिचित वस्तु नहीं है,जैसी यह असभ्या।प्राप्त होने पर भी निश्चित रुप से दुःख से पाली जाती है।अच्छी तरह से रक्षा किेये जाने पर भी भाग जाती है।परिचय की परवाह नहीं करती है।न उच्च कुल को देखती है।न सौन्दर्य देखती है।न  कुलक्रम का अनुसरण करती है। न नम्रता देखती है।न विद्वता की गणना करती है। न वेदों को सुनती है।न धर्म का अनुरोध मानती है। न त्याग का आदर करती है।न विशेषज्ञता का विचार करती है।न आचार का पालन करती है। न सत्य को समझती है।देखते ही नष्ट हो जाती है। सरस्वती द्वारा स्वीकृत व्यक्तियों का आलिङ्गन नहीं करती है।गुणवानों को स्पर्श नहीं करती है।अच्छे व्यक्तियों को नहीं देखती है।वीर व्यक्तियों को काँटे के समान त्याग देती है। दानी व्यक्तियों को दुस्वप्न के समान स्मरण नहीं करती है। विनम्र व्यक्तियों के पास नहीं जाती है।तृष्णा को बढाती है।हल्कापन उत्पन्न करती है और इसप्रकार इस दुराचारिणी के द्वारा किसी तरह भी भाग्यवश स्वीकृत किए गए राजा लोग व्याकुल हो जाते हैं।और सभी क्रूरताओं का आधार बन जाते हैं।
गद्यांश का अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ- 
          तावत्-तब
      कल्याणे-कल्याण में
 अभिनिवेशी-आग्रह रखनेवाली
    लक्ष्मीमेव-लक्ष्मी को ही
       प्रथमम्-पहले
 आलोकयतु-देखो।
              हि-क्योंकि
   इह जगति- इस जगत में
 एवं किञ्चित्-ऐसी कोई
अपरिचितम्-अपरिचित
         विधम्-वस्तु
      न अस्ति- नहीं है,
 यथेयमनार्या-जैसी यह
                    असभ्या।
      लब्धापि-प्राप्त होने पर भी
           खलु-निश्चित रुप से
        दुःखेन-दुःख से
  परिपाल्यते-पाली जाती है।
परिपालिता-अच्छी तरह से रक्षा
                  किेये जाने पर भी
          अपि-भी
   प्रपलायते-भाग जाती है।
      परिचयंं-परिचय की
     न रक्षति-परवाह नहीं
                  करती है।
  नाभिजनम्-न उच्च कुल को
          ईक्षते-देखती है।
      न रुपम्-न सौन्दर्य
 आलोकयते-देखती है।
न कुलक्रमम्-न कुलक्रम का
      अनुवर्तते-अनुसरण करती है।
         न शीलं-न नम्रता
         पश्यति-देखती है।
      न वैदग्ध्यं-न विद्वता की
        गणयति-गणना करती है।
        न श्रुतम्-न वेदों को
   आकर्णयति-सुनती है।
        न धर्मम्-न धर्म का
     अनुरुध्यते-्अनुरोध मानती है।
      न त्यागम्-न त्याग का
       आद्रियते-आदर करती है।
 न विशेषज्ञतां-न विशेषज्ञता का
    विचारयति-विचार करती है।
          नाचारं-न आचार का
       पालयति-पालन करती है।
        नसत्यम्-न सत्य को
     अवबुध्यते-समझती है।
    पश्यत एव-देखते ही
         नश्यति-नष्ट हो जाती है।
      सरस्वत्या-सरस्वती द्वारा
      परिगृहीतं-स्वीकृत
           जनम्-व्यक्तियों का
    नालिङ्गति-आलिङ्गन
                    नहीं करती है।
       गुणवन्तं-गुणवानों को
    न स्पृशति-स्पर्श नहीं
                    करती है।
           सुजनं-अच्छे व्यक्तियों को
     न पश्यति-नहीं देखती है।
              शूरं-वीर व्यक्तियों को
  कण्टकमिव-काँटे के समान
      परिहरति-त्याग देती है।
          दातारं-दानी व्यक्तियों को
    दुस्वप्नमिव-दुस्वप्न के समान
      न स्मरति-स्मरण नहीं
                     करती है।
         विनीतं-विनम्र व्यक्तियों
                    के पास
   नोपसर्पति-नहीं जाती है।
          तृष्णां-तृष्णा को
    संवर्धयति-बढाती है।
   लघिमानम्-हल्कापन
  आपादयति-उत्पन्न करती है।
          एवं च-और इसप्रकार
         अनया-इस
     विधयापि-दुराचारिणी
                     के द्वारा
      कथमपि-किसी तरह भी
      दैववशेन-भाग्यवश
   परिगृहीताः-स्वीकृत किए गए
        राजानः-राजा लोग
      विक्लवाः-व्याकुल
        भवन्ति-हो जाते हैं।
 सर्वाविनयं च-और सभी
                      क्रूरताओं का
    अधिष्ठानतां-आधार
         गच्छति-बन जाते हैं।
        
अपरे तु स्वार्थनिष्पादनपरैःदोषानपि गुणपक्षमध्यारोपयद्भि प्रतारणकुशलैर्धूर्त्तैः प्रतार्यमाणा वित्तमदमत्तचित्ता सर्वजनोपहास्यतामुपयान्ति।न मानयन्ति मान्यान्,जरावैक्लव्यप्रलपितमिति पश्यन्ति वृद्धोपदेशम्।कुप्यन्ति हितवादिने।सर्वथा तमभिनन्दति,तं संवर्धयन्ति,तस्य वचनं श्रृण्वन्ति,तं बहु मन्यन्ते योsहर्निशम् अनवरतं विगतान्य कर्त्तव्यःस्तौति,यो वा माहात्म्यमुद्भावयति।
              अर्थात् अन्य राजा लोग तो स्वार्थ सिद्ध करने मेंं लगे हुए दोषों को भी गुणों की श्रेणी में आरोपित करने वाले छलने में चतुर ठगो द्वाराठगे जात हुए धन के अहंकार से भरे हुए चित्त वाले सभी लोगो  के द्वारा उपहास के पात्र बनते हैं।वेलोग सम्माननियों का सम्मान नहीं करते हैं,वृद्धों के उपदेश को बुढापे में सठियाने के कारण बकवाद के रुप में हित की बात कहने वाले पर क्रोध करते हैं।हमेशा उसी का अभिनन्दन करते हैं,उसी को बढाते हैं,उसी का वचन सुनते हैं,उसी को बहुत मानते है,जो दिन-रात निरन्तर अन्य कर्त्तव्यों को छोडकर उनकी स्तुति करता है अथवा जो उनकी महिमा को गाता है।
गद्यांश का अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ- 
             अपरे तु-अन्य(राजा लोग) तो

  स्वार्थनिष्पादनपरैः-स्वार्थ सिद्ध करने मेंं
                                 लगे हुए
             दोषानपि-दोषों को भी
             गुणपक्षम्-गुणों की श्रेणी में   
      अध्यारोपयद्भि-आरोपित करने
                             वाले
 प्रतारणकुशलैर्धूर्त्तैः-छलने में चतुर
                             ठगो द्वारा
         प्रतार्यमाणा-ठगे जात हुए
 वित्तमदमत्तचित्ता-धन के अहंकार
                           से भरे हुए चित्त वाले
            सर्वजनेन-सभी लोगो  के द्वारा
      उपहास्यताम्-उपहास के पात्र
            उपयान्ति-बनते हैं।
              मान्यान्,-(वेलोग)सम्माननियों
                            का
        न मानयन्ति-सम्मान नहीं करते हैं,
       वृद्धोपदेशम्-वृद्धों के उपदेश को
        जरावैक्लव्य-बुढापे में सठियाने
                            के कारण
      प्रलपितमिति-बकवाद के रुप में
             पश्यन्ति-देखते हैं।
         हितवादिने-हित की बात कहने
                           वाले पर
             कुप्यन्ति-क्रोध करते हैं।
                सर्वथा-हमेशा
      तमभिनन्दति,-उसी का
                           अभिनन्दन करते हैं,
      तं संवर्धयन्ति,-उसी को बढाते हैं,
          तस्य वचनं-उसी का वचन
             श्रृण्वन्ति,-सुनते हैं,
       तं बहु मन्यन्ते-उसी को बहुत
                           मानते है,
                     यो-जो
           अहर्निशम्-दिन-रात
            अनवरतं-निरन्तर
       अन्यकर्त्तव्यः-अन्य कर्त्तव्यों को
                विगत-छोडकर(उनकी)
               स्तौति,-स्तुति करता है
                यो वा-अथवा जो
         माहात्म्यम्-(उनकी) महिमा को
         उद्भावयति-गाता है। 
                  
 तदतिकुटिलचेष्टादारुणे राज्यतन्त्रे,अस्मिन् महामोहकारिणी च यौवने कुमार।तथा प्रयतेथाः यथा नोपहस्यसे जनैः न निन्द्यसे साधुभिः,न धिक्क्रियसे गुरुभिः,नोपालभ्यसेसुहृद्भिः,न वञ्च्यसे धूर्त्तैः,न विडम्ब्यसे लक्ष्म्या,नाक्षिप्यसे विषयैः, नापह्रियसे सुखेन।
              इदमेव च पुनः पुनरभिधीयसे-विद्वांसमपि सचेतसमपि ,महासत्त्वमपि, अभिजातमपि, धीरमपि, प्रयत्नवन्तमपि पुरुषं दुर्विनीता खलीकरोति लक्ष्मीरित्येतावदभिधायोपशशाम।
              चन्द्रापीडस्ताभिरुपदेशवाग्भिः प्रक्षालित इव,उन्मीलित इव, स्वच्छीकृत इव,पवित्रीकृत इव,उद्भासित इव,प्रीतहृदयो स्वभवनमाजगाम।
              अर्थात् तब अत्यन्त कुटिल चेष्टाओं से भयंकर राज्य व्यवहार और इस महामोह को उत्पन्न करने वाली युवावस्था में हे कुमार! वैसा ही प्रयत्न करना, जिससे लोग उपहास नहीं करे,सज्जन निन्दा नहीं करे,गुरुजन धिक्कारे नहीं,मित्र उलाहना न दे,चालाक लोगठगे नहीं,निकल न जाय,विषय फँसाये नहीं,सुख अपहरण न कर ले।
             और यही बार-बार कहता हूँ कि विद्वानों को भी सचेत को भी महाबलशाली को भी कुलीन को भी धैर्य धारण करने वाले को भी प्रयत्नप्रयत्नशील को भी हर प्रकार के पुरुषों को भीयह दुराचारिणी लक्ष्मी दुष्ट बना देती है।इतना कहकर शुकनास चुप हो गये।
              चन्द्रापीड उनके उपदेश वचनों से धुला हुआ सा,खिला हुआ सा,स्वच्छ किया हुआ सा,पवित्र किया हुआ सा,चमकाया  हुआ सा,प्रसन्न हृदय होकर अपने भवन को आया।

गद्यांश का अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ- 
             तद्-तब
 अतिकुटिल-अत्यन्त कुटिल
  चेष्टादारुणे-चेष्टाओं से भयंकर
    राज्यतन्त्रे,-राज्य व्यवहार
   च अस्मिन्-और इस
      महामोहं-महामोह को
       कारिणी -उत्पन्न करने वाली
          यौवने-युवावस्था में
         कुमार-हे कुमार
            तथा-वैसा ही
       प्रयतेथाः-प्रयत्न करना,
     यथा जनैः-जिससे लोग
   नोपहस्यसे-उपहास नहीं करे,
        साधुभिः-सज्जन
     न निन्द्यसे-निन्दा नहीं करे,
         गुरुभिः,-गुरुजन
न धिक्क्रियसे-धिक्कारे नहीं
        सुहृद्भिः-मित्र
  नोपालभ्यसे-उलाहना न दे,
             धूर्त्तैः-चालाक लोग
     न वञ्च्यसे-ठगे नहीं,
         लक्ष्म्या-लक्ष्मी
 न विडम्ब्यसे-निकल न जाय,
          विषयैः-विषय
     नाक्षिप्यसे-फँसाये नहीं,
          सुखेन-सुख
    नापह्रियसे-अपहरण न कर ले।
      च इदमेव-और यही
        पुनःपुनः-बार-बार
   अभिधीयसे-कहता हूँ(कि)
   विद्वांसमपि-विद्वानों को भी
  सचेतसमपि-सचेत को भी
महासत्त्वमपि-महाबलशाली को भी
अभिजातमपि-कुलीन को भी
        धीरमपि-धैर्य धारण करने वाले को भी
प्रयत्नवन्तमपि-प्रयत्नशील को भी
            पुरुषं-(हर प्रकार के)पुरुषों को भी
      दुर्विनीता -(यह)दुराचारिणी
          लक्ष्मी- लक्ष्मी
  खलीकरोति-दुष्ट बना देती है।
     इत्येतावद्-इतना
       अभिधाय-कहकर
     उपशशाम-(शुकनास)चुप हो गये।
      चन्द्रापीडः-चन्द्रापीड
            ताभिः-उनके
उपदेशवाग्भिः-उपदेश वचनों से
 प्रक्षालित इव-धुला हुआ सा,
उन्मीलित इव-खिला हुआ सा,
स्वच्छीकृत इव-स्वच्छ किया हुआ सा,
पवित्रीकृत इव,-पवित्र किया हुआ सा,,
उद्भासित इव-चमकाया  हुआ सा,
     प्रीतहृदयो-प्रसन्न हृदय होकर
     स्वभवनम्-्अपने भवन को
      आजगाम-आया।


प्रश्न 1. 
संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् - 
(क) लक्ष्मीमदः कीदृशः ? 
(ख) चन्द्रापीडं कः उपदिशति ? 
(ग) अनर्थपरम्परायाः किं कारणम् ? 
(घ) कीदृशे मनसि उपदेशगुणाः प्रविशन्ति ? 
(ङ) लब्धापि दुःखेन का परिपाल्यते ? 
(च) केषाम् उपदेष्टार: विरलाः सन्ति ? 
(छ) लक्ष्म्या परिगृहीताः राजानः कीदृशाः भवन्ति ? 
(ज) वृद्धोपदेशं ते राजानः किमिति पश्यन्ति ? 
उत्तरम्
(क)लक्ष्मीमदः अपरिणामोपशमः दारुणः अस्ति। 
(ख) चन्द्रापीडं मन्त्री शुकनासः उपदिशति ? 
(ग) अनर्थपरम्परायाः कारणानि-गर्भेश्वरत्वम्, अभिनवयौवनत्वम्, अप्रतिम-रूपत्वम्, अमानुषशक्तित्वं चेति। 
(घ) अपगतमले मनसि उपदेशगुणाः प्रविशन्ति । 
(ङ) लब्धापि दुःखेन लक्ष्मीः परिपाल्यते। 
(च) राज्ञाम् उपदेष्टारः विरलाः सन्ति ?
(छ) लक्ष्या परिगृहीताः राजानः विक्लवाः भवन्ति ? 
(ज) वृद्धोपदेशं ते राजानः जरावैक्लव्यप्रलपितम् इति पश्यन्ति ? 

प्रश्न 2. 
विशेषणानि विशेष्यैः सह योजयत - 
विशेषणम् - विशेष्यम् 
(क) समतिक्रामत्सु - 
(ख) अधीतशास्त्रस्य - विद्वांसम् 
(ग) दारुणो 
दिवसेषु 
(घ) गहनं तमः - दोषजातम् 
(ङ) अतिमलिनम् - लक्ष्मीमदः 
(च) सचेतसम् - यौवनप्रभवम् 
उत्तरम् : 
(क) समतिक्रामत्सु - दिवसेषु 
(ख) अधीतशास्त्रस्य - 
(ग) दारुणो - लक्ष्मीमदः 
(घ) गहनं तमः - यौवनप्रभवम् 
(ङ) अतिमलिनम् - दोषजातम् 
(च) सचेतसम - विद्वांसम् 

प्रश्न 3. 
अधोलिखितपदानि स्वरचित-संस्कृत-वाक्येषु प्रयुग्ध्वम् - 
संग्रहार्थम्, समुपस्थितम्, विनयम्, परिणमयति, शृण्वन्ति, स्पृशति। 
उत्तरम् : 
(वाक्यप्रयोगः) 
(क) संग्रहार्थम्-सद्गुणानां संग्रहणार्थं सदा यत्नः करणीयः।
(ख) समुपस्थितम्-राजा समुपस्थितं सेवकं शस्त्रम् आनेतुम् आदिशत्। 
(ग) विनयम्-विद्या विनयं ददाति। 
(घ) परिणमयति-लक्ष्मीमदः सज्जनम् अपि दुष्टभावेषु परिणमयति। 
(ङ) शृण्वन्ति-अहंकारिणः राजानः गुरूपदेशान् न शृण्वन्ति। 
(च) स्पृशति-लक्ष्मी: गुणवन्तं न स्पृशति। 

प्रश्न 4. 
अधोलिखितानां पदानां सन्धिच्छेदं कुरुत - 
उत्तरसहितम् : 
(क) एवातिगहनम् = एव + अतिगहनम् 
(ख) गर्भेश्वरत्वम् = गर्भ + ईश्वरत्वम् 
(ग) गुरूपदेश: = + उपदेशः 
(घ) येवम् = हि + एवम् 
(ङ) नाभिजनम् = न + अभिजनम् 
(च) नोपसर्पति = + उपसर्पति 

प्रश्न 5. 
प्रकृति-प्रत्ययविभागः क्रियताम् - 
उत्तरसहितम् :

प्रश्न 6. 
समासविग्रहं कुरुत - 
उत्तरसहितम् : 
(क) अमानुषशक्तित्वम् - न मानुषशक्तित्वम् (नञ्-तत्पुरुषः) 
(ख) अत्यासगः - अतिशयेन आसङ्गः (उपपद-तत्पुरुषः) 
(ग) अनार्या - न आर्या (नञ्-तत्पुरुषः) 
(घ) स्वार्थनिष्पादनपरैः . स्वार्थस्य निष्पादने परैः (तत्परैः) तत्पुरुषः
(ङ) अहर्निशम् - निशायां निशायाम् (अव्ययीभावः) 
(च) वृद्धोपदेशम् - वृद्धानाम् उपदेशम् (षष्ठी-तत्पुरुषः) 

प्रश्न 7. 
रिक्तस्थानानि पूरयत - 
(क) लक्ष्मीः .................................. न रक्षति। 
(ख) ..................... दुःस्वप्नमिव न स्मरति।
(ग) सरस्व तापारगृहात ..................... । 
(घ) उपदिश्यमानमपि ....... .............. न शृण्वन्ति। 
(ङ) अवधीरयन्तः ..................... हितोपदेशदायिनो गुरून्। 
(च) तथा प्रयतेथाः ..................... नोपहस्यसे जनैः। 
(छ) चन्द्रापीडः प्रीतहृदयो ........................ आजगाम। 
उत्तरम् :  
(क) परिचयम् 
(ख) दातारम् 
(ग) नालिङ्गति 
(घ) राजानः 
(ङ) खेदयन्ति 
(च) यथा 
(छ) स्वभवनम्। 

प्रश्न 8. 
सप्रसगं हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या - 
(क) गर्भेश्वरत्वभिनवयौवनत्वमप्रतिमरूपत्वममानुषशक्तित्वञ्चेति महतीयं खल्वनर्थपरम्परा। 
(ख) हरति अतिमलिनमपि दोषजातं गुरूपदेशः। 
(ग) विद्वांसमपि सचेतसमपि, महासत्त्वमपि, अभिजातमपि, धीरमपि, प्रयत्नवन्तमपि पुरुष दुर्विनीता खलीकरोति लक्ष्मीरिति। 
उत्तरम् :
(व्याख्या) 
(क) गर्भेश्वरत्वभिनवयौवनत्वमप्रतिमरूपत्वममानुषशक्तित्वज्येति महतीयं खल्वनर्थपरम्परा। 
व्याख्या-प्रस्तुत पंक्ति शुकनासोपदेश नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट द्वारा रचित कादम्बरी से लिया गया है। प्रस्तुत पंक्ति में मन्त्री शुकनास युवराज चन्द्रापीड को उपदेश करते हुए अनर्थ के चार 
कारणों की ओर ध्यान दिला रहे हैं। 
मन्त्री शुकनास कहते हैं कि अनर्थ की परम्परा के चार कारण हैं - 
(i) जन्म से ही प्रभुता 
(ii) नया यौवन 
(iii) अति सुन्दर रूप 
(iv) अमानुषी शक्ति। 

इन चारों में से मनुष्य का विनाश करने के लिए कोई एक कारण भी पर्याप्त होता है। जिसके जीवन में ये चारों ही कारण उपस्थित हों, उसके विनाश को कौन रोक सकता है ? इसीलिए प्रत्येक मनुष्य को घोर अनर्थ से बचने के लिए उक्त चारों वस्तुएँ पाकर भी कभी अहंकार नहीं करना चाहिए। 

(ख) हरति अतिमलिनमपि दोषजातं गरूपदेशः। 
व्याख्या - प्रस्तुत पंक्ति शुकनासोपदेश नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट द्वारा रचित कादम्बरी से लिया गया है। प्रस्तुत पंक्ति में शुकनास युवराज चन्द्रापीड को गुरु के उपदेश का महत्त्व समझा रहे हैं। मन्त्री शुकनास कहते हैं कि गुरु का उपदेश मनुष्य के जीवन में बहुत अधिक उपयोगी तथा हितकारी होता है। मनुष्य में यदि अत्यधिक गहरे दोषों का समूह हो तो गुरु का उपदेश उन गहरे से गहरे दोषों को भी दूर कर देता है और उन दोषों के स्थान पर अति उत्तम गुण प्रवेश कर जाते हैं। मनुष्य का जीवन उज्ज्वल हो जाता है। सब जगह ऐसे व्यक्ति का यश फैलता है, इसीलिए गुरु का उपदेश प्रत्येक मनुष्य के लिए परम कल्याणकारी तथा आवश्यक है। 

(ग) विद्वांसमपि सचेतसमपि, महासत्त्वमपि, अभिजातमपि, धीरमपि, प्रयत्न-वन्तमपि पुरुषं दुविनीता खलीकरोति लक्ष्मीरिति। 
व्याख्या - प्रस्तुत पंक्ति शुकनासोपदेश नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट द्वारा रचित कादम्बरी से लिया गया है। प्रस्तुत पंक्ति में मन्त्री शुकनास लक्ष्मी अर्थात् धन के गुणों पर प्रकाश डाल रहे हैं। मन्त्री शुकनास कहते हैं कि लक्ष्मी इतनी शक्तिशाली होती है कि अत्यन्त जागरूक रहने वाले विद्वान्, महान् बलशाली, उच्चकुल में उत्पन्न, धैर्यशील तथा अत्यन्त परिश्रमी मनुष्य को भी यह लक्ष्मी दुष्ट आचरण वाला बना देती है। शुकनास के कहने का तात्पर्य है कि जिस मनुष्य के पास धन होता है, वह धन के अहंकार में कर्तव्य-अकर्तव्य के विवेक को खो बैठता है और कुमार्गगामी हो जाता है। 

बहुविकल्पीय-प्रश्नाः -

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत - 

(i) लक्ष्मीमदः कीदृशः ?
(A) उपशमः 
(B) अपरिणामः 
(C) अपरिणामोपशमः 
(D) सुखावहः। 
उत्तरम् :
(B) अपरिणामः 

(ii) चन्द्रापीडं कः उपदिशति? 
(A) शुकनासः 
(B) शुकः 
(C) तारापीडः 
(D) बृहस्पतिः। 
उत्तरम् :
(A) शुकनासः

(iii) कीदृशे मनसि उपदेशगुणाः प्रविशन्ति। 
(A) मलिने 
(B) अपगतमले 
(C) छलयुक्ते 
(D) छलान्विते। 
उत्तरम् :
(B) अपगतमले 


(iv) लब्धापि दुःखेन का परिपाल्यते? 
(A) लक्ष्मीः 
(B) विद्या 
(C) गौः 
(D) स्त्री। 
उत्तरम् :
(A) लक्ष्मीः 

(v) केषाम् उपदेष्टारः विरलाः सन्ति? 
(A) गुरूणाम् 
(B) शठानाम् 
(C) राज्ञाम् 
(D) अल्पज्ञानाम्। 
उत्तरम् :
(C) राज्ञाम् 

(vi) लक्ष्म्या परिगृहीताः राजानः कीदृशाः भवन्ति ? 
(A) प्रसन्नाः 
(B) विक्लवाः 
(C) सुप्ताः 
(D) यशस्विनः।
उत्तरम् :
(B) विक्लवाः

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत -

(i) लक्ष्मी: लब्धाऽपि खलु दुःखेन परिपाल्यते। 
(A) कथम् 
(B) काः 
(C) कः 
(D) किम्। 
उत्तरम् :
(A) कथम् 

(ii) अधीतसर्वशास्त्रस्य नाल्पमपि उपदेष्टव्यम् अस्ति। 
(A) कम् 
(B) कस्मात्
(C) कस्य 
(D) कः।
उत्तरम् :
(C) कस्य 

(ii) अपरिणामोपशमः लक्ष्मीमदः। 
(A) कीदृशः 
(B) किम् 
(C) काः 
(D) कस्मैः 
उत्तरम् :
(A) कीदृशः

(iv) लक्ष्मीः शूरं कण्टकमिव परिहरति। 
(A) कः 
(B) कस्मै 
(C) कस्य 
(D) कम्। 
उत्तरम् :
(D) कम्। 

(v) राजानः कुप्यन्ति हितवादिने। 
(A) कस्य 
(B) कस्मै 
(C) कस्मात् 
(D) केषाम्। 
उत्तरम् :
(B) कस्मै