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शनिवार, 27 जून 2020

बालकौतुकम्

                              बालकौतुकम्  

       जेसीईआरटी तथा एनसीईआरटी के कक्षा-12 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग 2 के  तृतीय: पाठ: सूक्तिसुधा  का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं।                                                                                                                                                                       प्रस्तुत पाठ करुण रस के अनुपम चितेरे महाकवि भवभूति विरचित "उत्तररामचरितम्" नामक प्रसिद्ध नाटक के चतुर्थ अंक से संकलित किया गया है। राजा राम द्वारा निर्वासिता भगवती सीता | के जुड़वाँ पुत्रों लव एवं कुश का महर्षि वाल्मीकि के द्वारा र एवं शास्त्रों की शिक्षा दी गयी तथा स्वरचित रामायण के सस्वर गान का अभ्यास कराया गया। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में अतिथि रूप में पधारे राजर्षि जनक, कौसल्या एवं अरुन्धती खेलते हुए बालकों के बीच एक बालक में राम एवं सीता की छाया देखते हैं। वे उन्हें बुलाकर गोद में बिठाकर वात्सल्य की वर्षा करते हैं। इतने में ही चन्द्रकेतु द्वारा रक्षित राजा राम का अश्वमेधीय अश्व आश्रम में प्रवेश करता है। नगरीय अश्व को देखकर आश्रम के बालकों में कौतूहल उत्पन्न होता है। वे उसे देखने के लिए लव को भी बुला लाते हैं। लव घोड़ का दखत है कि यह अश्वमेधीय घोडा है। रक्षकों की घोषणा सुनकर बालक लव घोड़े को आश्रम में ले जाकर बाँधने का आदेश देते हैं। इसका अत्यन्त मार्मिक चित्रण इस पाठ में हुआ है।इस पाठ का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://www.sanskritsight.in/2020/06/blog-post.html

(नेपथ्ये कलकलः। सर्वे आकर्णयन्ति)
 अर्थ-(नेपथ्य में कोलाहल होता है।सब सुनते हैं)
जनकः : अये, शिष्टानध्याय इत्यस्खलितं खेलतां बटूनां कोलाहलः।
 अर्थ-जनक- अरे, शिष्टजनों के आगमन से अवकाश होने के कारण बेरोक-टोक खेलते हुए बटुओं का यह कोलाहल है।
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
अये=अरे
शिष्टानध्यायशिष्टजनों के आगमन से
इत्यस्खलितं अवकाश होने के कारण
खेलतांबेरोक-टोक खेलते हुए
बटूनांबटुओं का
कोलाहलःयह कोलाहल है।
कौसल्या : सुलभसौख्यमिदानीं बालत्वं भवति। अहो, एतेषां मध्ये क एष रामभद्रस्य मुग्धललितैरङ्गैर्दारकोऽस्माकं लोचने शीतलयति?
 अर्थ-कौसल्या-बाल्यावस्था में सुख सुलभ होता है। ओह ! इनके (बालकों के) बीच में कौन बालक रामभद्र को शैशव-कालीन शोभा से सम्पन्न सुन्दर और सुकुमार अङ्गों से नेत्रों को ठण्डा कर रहा है ?
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
बालत्वंबाल्यावस्था
इदानींमें
सौख्यम्सुख
सुलभसुलभ
भवति होता है।
अहोओह !
एतेषांइन(बालकों) के
मध्येबीच में
क एषकौन यह
दारकः बालक
रामभद्रस्यरामभद्र के
मुग्धललितैःशैशव-कालीन शोभा से सम्पन्न सुन्दर
अङ्गैः(और) सुकुमार अङ्गों से
अस्माकं हमारे
लोचने नेत्रों को
शीतलयतिठण्डा कर रहा है ?
अरुन्धती:-
कुवलयदलस्निग्धश्यामः शिखण्डकमण्डनो
वटुपरिषदं पुण्यश्रीकः श्रियैव सभाजयन् ।
पुनरपि शिशु तो वत्सः स मे रघुनन्दनो
झटिति कुरुते दृष्टः कोऽयं दृशोरमृताञ्जनम् ॥1॥
 अर्थ-अरुन्धती-(प्रकाश में) नील-कमल-दल के समान चिकना और श्याम काकपक्षों(घुंघराले बालों) से सुशोभित अलौकिक शोभा से सम्पन्न शरीर को कान्ति से ही ब्रह्मचारियों की मण्डली को अलङ्कृत करने वाला यह कौन है ? जो कि देखने पर फिर से शिशु रूप धारी राम की भाँति मेरी आँखों में अमृत-मय अंंजन का लेप सा कर रहा है ?
अन्वय,शब्दार्थ और श्लोकार्थ-
कुवलयदलनील-कमल-दल के समान
स्निग्धश्यामः चिकने और श्याम
शिखण्डकघुंघराले बालों से
मण्डनो सुशोभित
पुण्यश्रीकःअलौकिक शोभा से सम्पन्न शरीर की
श्रियैव कान्ति से ही
वटुपरिषदंब्रह्मचारियों की मण्डली को
सभाजयन् अलङ्कृत करने वाला
कोऽयं यह कौन है? जो कि
पुनरपि फिर से
शिशु तो शिशु रूप धारी
स मे वह मेरे
वत्सः पुत्र
रघुनन्दनोराम की भाँति
झटिति शीघ्र ही
दृशोरमृताञ्जनम्मेरी आँखों में अमृत-मय अंंजन का लेप सा
कुरुते दृष्टः करते हुए दिखाई दे रहा है ?
जनकः(चिरं निर्वर्ण्य ) भोः किमप्येतत्।
 अर्थ-जनक-(बहुत देर तक देखकर) ओह ! यह क्या (अपूर्व सा अनुभव) है ?
महिम्नामेतस्मिन् विनयशिशिरो मौग्ध्यमसृणो
विदग्धैर्निर्ग्राह्यो न पुनरविदग्धैरतिशयः।
मनो मे संमोहस्थिरमपि हरत्येष बलवान्
अयोधातुं यद्वत्परिलघुरयस्कान्तशकलः ॥                                                                                                 अर्थ-इस बालक में विद्यमान विनय से शीतल तथा कोमल जो महत्ता का उत्कर्ष है, वह सूक्ष्ममति मनुष्यों द्वारा ही ग्राह्य है, (स्थूलमति) अविवेकियों के द्वारा नहीं । यह बलिष्ठ बालक जैसे 'चुम्बक' का छोटा-सा टुकड़ा लोहे को अपनी ओर खींच लेता है, वैसे ही मेरे सम्मोह (शोकाघात) से स्थिर हृदय को अपनी ओर आकृष्ट कर रहा है।
अन्वय,शब्दार्थ और श्लोकार्थ-
एतस्मिन् इस बालक में विद्यमान
विनयशिशिरो विनय से शीतल तथा
मौग्ध्यमसृणो कोमल और चिकने
महिम्नाम्जो महत्ता का
अतिशयःउत्कर्ष है,
विदग्धैःवह सूक्ष्ममति मनुष्यों द्वारा ही
र्निर्ग्राह्योग्राह्य है,
अविदग्धैःअविवेकियों के द्वारा
न पुनःनहीं।
एष बलवान्यह बलिष्ठ बालक
संमोहस्थिरमपिशोकाघात से स्थिर
मनो मेमेरे हृदय को
हरति(वैसे ही) आकृष्ट कर रहा है।
यद्वत् जैसे
त्रयस्कान्तशकलः चुम्बक का
परिलघुः छोटा-सा टुकड़ा
अयोधातुं लोहे को
(हरति)अपनी ओर खींच लेता है।
लवः:(प्रविश्य,स्वगतम्) क्रमौचित्यात् पूज्यानपि सतः कथमभिवादयिष्ये?,अविज्ञातवयः(विचिन्त्य) अयं पुनरविरुद्धप्रकार इति वृद्धेभ्यः श्रूयते। (सविनयमुपसृत्य) एष वो लवस्य शिरसा प्रणामपर्यायः।
 अर्थ-लव-(प्रवेश कर स्वयं ही) अवस्था, क्रम और औचित्य न जानने के कारण इन पूजनीयों को कैसे प्रणाम करू ? (इनमें कोन वयोवृद्ध है ? और किसे प्रथम प्रणाम करना चाहिये? मैं यह नहीं जानता (तो इन्हें कैसे प्रमाण करू?) (सोचकर) "यह प्रणाम की विरोध हीन पद्धति है" ऐसा गुरुजनों से सुना जाता है। (विनयपूर्वक पास जाकर) यह आपको 'लव' को (क्रमानुसार) प्रणाम-परम्परा है।
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
(प्रविश्य, स्वगतम्)(प्रवेश कर स्वयं ही)
वयः अवस्था
क्रमौचित्यात् क्रम और औचित्य
अविज्ञातम्न जानने के
सतः कारण
पूज्यानपि इन पूजनीयों को
कथम्कैसे
अभिवादयिष्ये?प्रणाम करूँ ?
(विचिन्त्य) (सोचकर)
अयं यह
पुनरविरुद्धप्रकारप्रणाम की विरोध हीन पद्धति है
इति वृद्धेभ्यःऐसा गुरुजनों से
श्रूयतेसुना जाता है।
(सविनयमुपसृत्य) (विनयपूर्वक पास जाकर)
एष वो यह आपको
लवस्य 'लव' का (क्रमानुसार)
शिरसा सिर झुकाकर
प्रणामपर्यायः प्रणाम-परम्परा है।
अरुन्धतीजनकौ : कल्याणिन्! आयुष्मान् भूयाः।
 अर्थ-अरुन्धती और जनक-कल्याण सम्पन्न ! चिरजीव हो!
कौसल्या : जात! चिरं जीव।
 अर्थ-कोसल्या-वत्स ! चिरञ्जीव !
अरुन्धती : एहि वत्स! (लवमुत्सङ्गे गृहीत्वा आत्मगतम्) दिष्ट्या न केवल-मुत्सङ्गश्चिरान्मनोरथोऽपि मे पूरितः।
 अर्थ-अरुन्धती-आओ बेटा ! (लव को गोदी में लेकर स्वयं ही) सौभाग्य से केवल मेरी गोदी ही नहीं अपितु मेरी बहुत दिनों की अभिलाषा भी पूर्ण हो गई।
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
एहि वत्स!आओ बेटा !
(लवमुत्सङ्गे गृहीत्वा आत्मगतम्)(लव को गोदी में लेकर स्वयं ही)
दिष्ट्या सौभाग्य से
केवलम्केवल
उत्सङ्गः न(मेरी) गोदी ही नहीं
मे चिरात्(अपितु)मेरी बहुत दिनों की
मनोरथोऽपिअभिलाषा भी
पूरितःपूर्ण हो गई।
कौसल्या : जात! इतोऽपि तावदेहि। (उत्सङ्गे गृहीत्वा) अहो, न केवलं
मांसलोज्ज्वलेन देहबन्धेन, कलहंसघोषघर्घरानुनादिना स्वरेण च रामभद्रमनुसरति। जात! पश्यामि ते मुखपुण्डरीकम्। (चिबुकमुन्नमय्य, निरूप्य, सवाष्पाकूतम्) राजर्षे! किं न पश्यसि? निपुणं निरूप्यमाणो वत्साया मे वध्वा मुखचन्द्रेणापि संवदत्येव।
 अर्थ-कौसल्या-बेटा इधर (मेरी गोद में) भी आओ ! (गोदी में लेकर) ओह ! यह केवल अर्धविकसित नोल-कमल के समान बलिष्ठ तथा तेजस्वी शरीर के गठन से ही नहीं अपितु कमल को केसर के खाने के कारण मधुर कण्ठ वाले हंस के घरघराते स्वर का अनुकरण करने ज्ञाले स्वर से भी राममद्र' का अनुसरण कर रहा है।ओह विकसित कमल के भीतरी भाग के समान सुकुमार इसके शरीर का स्पर्श भी वैसा ही है। बेटा! (जरा) तुम्हारा मुख-कमल (तो) देखूँ!(ठोडी को ऊँचाकर आँसू भरी आंखों से अभिप्राय-पूर्वक देखकर) राजर्षे।क्या आप नहीं देखते? कि ध्यान से देखने पर इस बालक का मुख मेरो प्रिय वधू सीता के मुख-चन्द्र से मिल रहा है।
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
जात! बेटा
इतोऽपिइधर (मेरी गोद में) भी
तावदेहिआओ !
(उत्सङ्गे गृहीत्वा)(गोदी में लेकर)
अहो,केवलं ओह ! यह केवल
मांसलोज्ज्वलेनबलिष्ठ तथा तेजस्वी
देहबन्धेन, शरीर के गठन से ही नहीं
कलहंसमधुर कण्ठ वाले हंस के
घोषघर्घर घरघराते स्वर का
अनुनादिना अनुकरण करने ज्ञाले
स्वरेण च स्वर से भी
रामभद्रम्राममद्र' का
अनुसरतिअनुसरण कर रहा है।
जात! बेटा!
ते (जरा) तुम्हारा
मुखपुण्डरीकम्मुख-कमल (तो)
पश्यामि देखूँ!
(चिबुकमुन्नमय्य, निरूप्य, सवाष्पाकूतम्)
(ठोडी को ऊँचाकर आँसू भरी आंखों से अभिप्राय-पूर्वक देखकर)
राजर्षे! राजर्षे!
किं न क्या आप नहीं
पश्यसि?देखते?
निपुणं कि ध्यान से
निरूप्यमाणो देखने पर
वत्साया इस बालक का मुख
मे वध्वा मेरी प्रिय वधू सीता के
मुखचन्द्रेणापि मुख-चन्द्र से भी
संवदत्येव मिल रहा है।                                                                                                                                जनक : पश्यामि, सखि! पश्यामि। (निरूप्य)
 अर्थ-जनक-देख रहा हूँ सखि देख रहा हूँ।(देखकर)
वत्सायाश्च रघूद्वहस्य च शिशावस्मिन्नभिव्यज्यते,
संवृत्तिः प्रतिबिम्बतेव निखिला सैवाकृतिः सा द्युतिः।
सा वाणी विनयः स एव सहजः पुण्यानुभावोऽप्यसौ
हा हा देवि किमुत्पथैर्मम मनः पारिप्लवं धावति ॥
 अर्थ-इस बालक में बेटी सीता एवं रघुकुल-श्रेष्ठ राम का (पावन) सम्बन्ध प्रतिबिम्बित हो रहा है और आकृति कान्ति, वाणी, स्वाभाविक विनय तथा पवित्र प्रभाव भी ठीक वैसा ही है । हा ! हा! देवि ! (इसको देख कर) मेरा मन चञ्चल होकर उन्मार्गों से क्यों दौड़ रहा है ? (सीता के पुत्र को कल्पना क्यों कर रहा है ?)
अन्वय,शब्दार्थ और श्लोकार्थ-
अस्मिन्इस
शिशौबालक में
वत्सायाश्चबेटी सीता एवं
रघूद्वहस्य चरघुकुल-श्रेष्ठ राम के
इव जैसा
संवृत्तिःसम्बन्ध
प्रतिबिम्बताप्रतिबिम्बित हो रहा है
सैवठीक वैसा ही
निखिलास्वाभाविक
आकृतिःआकृति
सा द्युतिःवही कान्ति
सा वाणी वही वाणी
स एव वही
सहजः सहज
विनयः विनय
पुण्यानुभावःपवित्र प्रभाव
अपिभी
असौ इसमें
अभिव्यज्यतेअभिव्यंजित हो रहा है
हा हा देविहा ! हा! देवि !
मम=मेरा
मनःमन
पारिप्लवं चञ्चल होकर
किमुत्पथैःउन्मार्गों से क्यों
धावतिदौड़ रहा है ?
कौसल्या : जात! अस्ति ते माता? स्मरसि वा तातम्?
 अर्थ-कौसल्या-वत्स ! तुम्हारी माता है ? क्या तुम अपने पिता को याद करते हो?
लवः:नहि।
 अर्थ-लव-नहीं।
कौसल्या:ततः कस्य त्वम्?
 अर्थ-कौसल्या-तब तुम किसके हो ?
लवः:भगवतः सुगृहीतनामधेयस्य वाल्मीकेः।
 अर्थ-लव: स्वनामधन्य भगवान् बाल्मीकि के।
कौसल्या:अयि जात! कथयितव्यं कथय।
 अर्थ-कौल्सया–प्यारे बेटे ! कहने योग्य बात कह ।
लवः : एतावदेव जानामि।
 अर्थ-लवः मैं तो इतना ही जानता हूँ।
(प्रविश्य सम्भ्रान्ताः)
 अर्थ-(प्रवेश कर घबराये हुए)
बटवः: कुमार! कुमार! अश्वोऽश्व इति कोऽपि भूतविशेषो जन
पदेष्वनुश्रूयते, सोऽयमधुनाऽस्माभिः स्वयं प्रत्यक्षीकृतः।
 अर्थ-बटुगण-कुमार ! कुमार ! जनपदों में जो 'घोड़ा-घोड़ा' नामक कोई प्राणी विशेष सुना जाता है, अब हमने उसे स्वयं प्रत्यक्ष कर लिया है ।
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
कुमार! कुमार!कुमार ! कुमार !
जनपदेषुजनपदों में जो
अयम्यह
अश्वोऽश्व इति'घोड़ा-घोड़ा' नामक
कोऽपिकोई
भूतविशेषोप्राणी विशेष
अनुश्रूयतेसुना जाता है
अधुनाअब
अस्माभिःहमने
सः उसे
स्वयं स्वयं
प्रत्यक्षीकृतःप्रत्यक्ष कर लिया है ।
लवः: 'अश्वोऽश्व' इति नाम पशुसमाम्नाये सांग्रामिके च पठ्यते, तद्
ब्रूत-कीदृशः?
 अर्थ-लव-'घोड़ा-घोड़ा' यह पशु-शास्त्र तथा संग्राम-शास्त्र में पढ़ा जाता है । तो बतलाओ-वह कैसा है ?
बटवः : अये, श्रूयताम्-
 अर्थ-बटुगण-अजी सुनिये !
पश्चात्पुच्छं वहति विपुलं तच्च धूनोत्यजस्त्रम्
दीर्घग्रीवः स भवति, खुरास्तस्य चत्वार एव ।
शष्पाण्यत्ति.प्रकिरति शकृत्पिण्डकानाम्रमात्रान्
किं व्याख्यानैर्ऋजति स पुनर्दूरमेह्येहि यामः ॥
 अर्थ-उसकी पिछली ओर बहुत लम्बी पूँछ लटकती है और वह उसे निरन्तर हिलाता रहता है । उसकी गर्दन लम्बी और खुर भी चार ही होते हैं। वह घास खाता है और आम्र-फलों जैसा मल-त्याग (लीद) करता है । अब अधिक वर्णन करने की आवश्यकता नहीं-वह घोड़ा दूर निकला जा रहा है। आओ ! आओ! चलें !
अन्वय,शब्दार्थ और श्लोकार्थ-
स्य उसकी
पश्चात्उसकी पिछली ओर
विपुलं बहुत लम्बी
पुच्छंपूँछ
वहतिलटकती है
तच्चऔर वह उसे
अजस्रम्निरन्तर
धूनोतिहिलाता रहता है।
दीर्घग्रीवः(उसकी) गर्दन लम्बी
भवतिहोती है।
खुराःऔर खुर भी
चत्वार एवचार ही होते हैं।
शष्पाण्यत्ति(वह) घास खाता है
आम्रमात्रान्और आम्र-फलों जैसा
शकृत्पिण्डकान्मल-त्याग (लीद)
प्रकिरति करता है ।
व्याख्यानैःअधिक वर्णन करने की
किं क्या आवश्यकता ?
वह घोड़ा
पुनर्दूरम्पुनः दूर
व्रजतिनिकला जा रहा है।
एह्येहिआओ ! आओ!
यामः चलें !
(इत्यजिने हस्तयोश्चाकर्षन्ति)
 अर्थ-ऐसा कहकर उसके हाथ और मगचर्म पकड़कर खींचते हैं।
लवः : (सकौतुकोपरोधविनयम्।) आर्याः! पश्यत। एभिर्नीतोऽस्मि।
 अर्थ-लव-(कौतूहल,बटुकों के आग्रह और विनय के साथ) आर्यगण !देखिये।इसके द्वारा ले जाया जा रहा हूँ।
(इतित्वरितं परिक्रामति।)
 अर्थ-(ऐसा कहकर शीघ्रता से घूमता है)
अरुन्धतीजनकौ: महत्कौतुकं वत्सस्य।
अरुन्धती और जनक-बालक को (घोड़ा देखने का) बड़ा कौतूहल है।
कौसल्या : अरण्यगर्भरूपालापै!यं तोषिता वयं च। भगवति! जानामि तं पश्यन्ती वञ्चितेव। तस्मादितोऽन्यतो भूत्वा प्रेक्षामहे तावत् पलायमानं दीर्घायुषम्।
 अर्थ-कौसल्या-बनवासी बालकों के रूप और बातचीत से आप और हम लोग बड़े सन्तुष्ट हुए हैं । भगवति ! मुझे तो ऐसा लगता है कि मानो मैं उसे देखती हुई ठगी-सी रह गई हूँ । इसलिये दूसरी ओर इस दीर्घायु को भागते हुए देखें।
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
अरण्यगर्भबनवासी बालकों के
रूपालापैरूप और बातचीत से
वयं चआप और हम लोग
यं तोषिताबड़े सन्तुष्ट हुए हैं ।
भगवति!भगवति !
जानामिमुझे तो ऐसा लगता है कि मानो मैं
तं उसे
पश्यन्तीदेखती हुई
वञ्चितेवठगी-सी रह गई हूँ ।
तस्मात्इसलिये
तावत् तब
इतोऽन्यतोदूसरी ओर
भूत्वा(एकान्त) होकर
दीर्घायुषम्इस दीर्घायु को
पलायमानंभागते हुए
प्रेक्षामहे देखें।
अरुन्धती : अतिजवेन दूरमतिक्रान्तः स चपलः कथं दृश्यते?
 अर्थ-अरुन्धती-अत्यन्त वेग से दूर निकलने वाला वह चंचल (बालक) कैसे देखा जा सकता है ?
(प्रविश्य)(प्रवेशकर)
बटवः : पश्यतु कुमारस्तावदाश्चर्यम्।
 अर्थ-बटवः-कुमार इस आश्चर्य को देखें।
लवः: दृष्टमवगतं च। नूनमाश्वमेधिकोऽयमश्वः।
 अर्थ-लव-देख लिया और समझ भी लिया ! निश्चय ही यह 'अश्वमेध' यज्ञ का घोड़ा है।
बटवः : कथं ज्ञायते?
 अर्थ-बटुगण-कैसे जानते हो ?
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
लवः : ननु मूर्खा:! पठितमेव हि युष्माभिरपि तत्काण्डम्। किं न पश्यथ?प्रत्येकं शतसंख्याः कवचिनो दण्डिनो निषङ्गिणश्च रक्षितारः। यदि च विप्रत्ययस्तत्पृच्छत।
 अर्थ-लव-अरे मूर्खों ! तुम लोगों ने भी वह 'काण्ड' (अश्मेध-प्रतिपादक वेद का अध्याय) पढ़ा ही है। फिर क्या तुम सैकड़ों की संख्या में कवच-दण्ड तथा तूणीरधारियों को नहीं देखते ? इसी प्रकार (सेना का) दूसरा भाग भी (सुसज्जित) दिखाई दे रहा है (अत: यह निश्चय ही 'मेध्याश्व' है ।) और यदि तुम्हें विश्वास नहीं होता तो (इन अनुयायी रक्षकों से पूछ लो ।)
लवः : ननु मूर्खा:!अरे मूर्खों !
युष्माभिरपि तुम लोगों ने भी
तत्काण्डम्वह 'काण्ड' (अश्मेध-प्रतिपादक वेद का अध्याय)
पठितमेव हिपढ़ा ही है।
किंफिर क्या तुम
शतसंख्याः सैकड़ों की संख्या में
प्रत्येकं प्रत्येक
कवचिनो कवच-
दण्डिनोदण्ड तथा
निषङ्गिणश्च तूणीरधारियों को
रक्षितारःरक्षा करते हुए
न पश्यथ?नहीं देखते ?
यदि च और यदि
विप्रत्ययः=(तुम्हें) संदेह होता है
तत् तो (इन अनुयायी रक्षकों से)
पृच्छतपूछ लो ।
बटवः : भो भोः! किंप्रयोजनोऽयमश्वः परिवृतः पर्यटति?
 अर्थ-बटुगण-अरे ! रक्षकों से घिरा हुआ यह घोड़ा क्यों घूम रहा है ?
लवः : (सस्पृहमात्मगतम्) अश्वमेध' इति नाम विश्वविजयिनां क्षत्रियाणामूर्जस्वलः सर्वक्षत्रपरिभावी महान् उत्कर्षनिकषः।
 अर्थ-लव-(अभिलाषापूर्वक, स्वयं ही ) 'अश्वमेध' यह विश्व-विजयी क्षत्रियों की समस्त (शत्रु) राजाओं को पराजित करने वाली अत्यन्त शक्तिशालिनी बड़ी भारी कसौटी है।
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
(सस्पृहमात्मगतम्)(अभिलाषापूर्वक, स्वयं ही )
'अश्वमेध''अश्वमेध'
इति नामयह
विश्वविजयिनांविश्व-विजयी
क्षत्रियाणाम्क्षत्रियों की
सर्वक्षत्रपरिभावीसमस्त (शत्रु) राजाओं को पराजित करने वाली
उर्जस्वलःअत्यन्त शक्तिशालिनी
महान् बड़ी
उत्कर्षनिकषःभारी कसौटी है।
(नेपथ्ये)(नेपथ्य में)
योऽयमश्वः पताकेयमथवा वीरघोषणा ।
सप्तलोकैकवीरस्य दशकण्ठकुलद्विषः ॥
 अर्थ-यह जो घोड़ा (दिखाई दे रहा है) वह सातों लोकों के एकमात्र वीर, रावण कुल के शत्रु (भगवान् राम) की विजय पताका अथवा वीर घोषणा है।
अन्वय,शब्दार्थ और श्लोकार्थ-
योऽयमश्वःयह जो घोड़ा(दिखाई दे रहा है)
सप्तलोकैकवीरस्यवह सातों लोकों के एकमात्र वीर,
दशकण्ठकुलद्विषःरावण कुल के शत्रु (भगवान् राम)
पताकेयमथवाकी विजय पताका अथवा
वीरघोषणावीर घोषणा है।
लवः : (सगर्वम्)। अहो! संदीपनान्यक्षराणि।
लव-(सगर्व) ओह! ये अक्षर बड़े कोधोत्पादक हैं ।
बटवः : किमुच्यते? प्राज्ञः खलु कुमारः।
 अर्थ-बटुगण-क्या कहते हो? (कि यह 'अश्वमेध-यज्ञ' का घोड़ा है ? तब तो 'कुमार' बड़े विज्ञ है ।(क्योंकि बिना पूछे हो समझ लिया था कि यह 'मेध्याश्व' है।)
लवः : भो भोः! तत्किमक्षत्रिया पृथिवी? यदेवमुद्घोष्यते? (नेपथ्ये)
 अर्थ-लव-अरे सैनिकों ! तो क्या पृथ्वी क्षत्रिय-शून्य है ! जो इस प्रकार घोषणा कर रहे हो।
(नेपथ्ये)(नेपथ्य में)
रे, रे, महाराजं प्रति कः क्षत्रियः?
 अर्थ-अरे ! रे! (महाराज के सामने) कौन क्षत्रिय हैं ? (ऐसा कौन-सा क्षत्रिय है जो कि भगवान राम की तुलना में आ सकता हो?)
लवः : धिग् जाल्मान्।
 अर्थ-लव-तुम नीचों को धिक्कार हैं।
यदि नो सन्ति सन्त्येव केयमद्य विभीषिका ।
किमुक्तैरेभिरधुना तां पताकां हरामि वः ॥
 अर्थ-यदि क्षत्रिय नहीं हैं,(ऐसा कहते हो तो मैं कहता हूँ कि) वे हैं ही। यह व्यर्थ का डर क्यों दिखा रहे हो इन बातों को कहने से क्या लाभ? मैं उस पताका का हरण कर रहा हूँ। (यदि तुममें शक्ति हो तो मुझे रोको ।)
अन्वय,शब्दार्थ और श्लोकार्थ-
यदि नो सन्ति यदि क्षत्रिय नहीं हैं,
(ऐसा कहते हो तो मैं कहता हूँ कि)
सन्त्येववे हैं ही।
इयमद्यआज यह
विभीषिका(व्यर्थ का) डर
काक्या है?
एभिरधुना इन बातों को इस समय
किमुक्तैःकहने से क्या लाभ?
तां पताकांउस पताका का
हरामि वः मैं हरण कर रहा हूँ।
हे बटवः! परिवृत्य लोष्ठैरभिजन्त उपनयतैनमश्वम्। एष रोहितानां मध्येचरो भवतु।
 अर्थ-अरे। बटुकों! इस घोडे को घेर कर ढेलों से मारते हुए (आश्रम में) ले आओ। यह भी मृगों के बीच विचरण करे ।(मगों के साथ ही यह भी घास खाया करे)
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
हे बटवः!अरे। बटुकों!
एनमश्वम्इस घोडे को
परिवृत्यघेर कर
लोष्ठैरभिजन्त ढेलों से मारते हुए
उपनयत(आश्रम में) ले आओ।
एष रोहितानांयह भी मृगों के
मध्येचरोबीच विचरण 
भवतु करे।
(प्रविश्य सक्रोधः)(प्रवेशकर क्रोध से)
पुरुषः : धिक् चपल! किमुक्तवानसि? तीक्ष्णतरा ह्यायुधश्रेणयः शिशोरपि दृप्तां वाचं न सहन्ते।
 अर्थ-पुरुष-चुप ! चपल! क्या कह रहा है ? 'तीखे शस्त्र वाले बच्चे  भी गर्वीली वाणी नहीं सहते ! '(शस्त्रधारी बालक को भी गर्व भरी वाणी नहीं सहन करते ।)
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
धिक् चपल!चुप ! चपल!
किमुक्तवानसि?क्या कह रहा है ?
तीक्ष्णतरा'तीखे
ह्यायुधश्रेणयःशस्त्र वाले
शिशोरपि बच्चे भी
दृप्तां वाचंगर्वीली वाणी
न सहन्तेनहीं सहते। '
राजपुत्रश्चन्द्रकेतुर्दुर्दान्तः, सोऽप्यपूर्वारण्यदर्शनाक्षिप्तहृदयो न यावदायाति , तावत् त्वरितमनेन तरुगहनेनापसर्पत।
 अर्थ-राजकुमार 'चन्द्रकेतु' बडे दुर्दमनीय है । अपूर्व (परम रमणीय) वन की शोभा देखने में उत्सुक जब तक वे नहीं आते हैं तब तक तुम इन सघन वृक्षों में छिपकर भाग जाओ।
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
राजपुत्रःराजकुमार
चन्द्रकेतु 'चन्द्रकेतु'
र्दुर्दान्तः बडे दुर्दमनीय है ।
सोऽपिवह भी
अपूर्वारण्यअपूर्व (परम रमणीय) वन की
दर्शनाक्षिप्तहृदयोदेखने में उत्सुक
न यावदायातिजब तक वे नहीं आते हैं
तावत्तब तक
त्वरितमनेनशीघ्र ही इस
तरुगहनेसघन वृक्षों में
नापसर्पतछिपकर भाग जाओ।
बटवः : कुमार! कृतं कृतमश्वेन। तर्जयन्ति विस्फारितशरासनाः कुमारमायुधीयश्रेणयः। दूरे चाश्रमपदम्। इतस्तदेहि। हरिणप्लुतैः पलायामहे।
 अर्थ-बटुगण-कुमार ! घोड़े को रहने दो ! धनुष ताने हुए शस्त्रधारियों के समूह तुम्हें धमका रहे हैं; और आश्रम यहाँ से दूर है । अतः आओ! हरिणों की मांति कूद-कूद कर भाग चले ।
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
कुमार!कुमार !
अश्वेनघोड़े को
कृतं रहने दो !
कृतम्रहने दो !
शरासनाःधनुष
विस्फारितताने हुए
कुमारम्कुमार
आयुधीयश्रेणयःशस्त्रधारियों के समूह
तर्जयन्तितुम्हें धमका रहे हैं;
चाश्रमपदम्और आश्रम
दूरेयहाँ से दूर है।
तदेहि अतः आओ!
हरिणप्लुतैःहरिणों की मांति कूद-कूद कर
इतःयहाँ से
पलायामहेभाग चलें।
लवः : किं नाम विस्फुरन्ति शस्त्राणि?
लव-क्या शस्त्र चमक रहे हैं ?
(इति धनुरारोपयति)
(धनुष सन्धान करता हुआ।)

प्रश्न 1.
संस्कृतभाषया उत्तराणि लिखत - 
(क) 'उत्तररामचरितम्' इति नाटकस्य रचयिता कः ? 
(ख) नेपथ्ये कोलाहलं श्रुत्वा जनक: किं कथयति ? 
(ग) लव: कौशल्यां रामभद्रं च कथमनुसरति ?
(घ) बटवः अश्वं कथं वर्णयन्ति ? 
(ङ) लवः कथं जानाति यत् अयम् आश्वमेधिकः अश्वः? 
(च) राजपुरुषस्य तीक्ष्णतरा आयुधश्रेण्यः किं न सहन्ते ? 
उत्तरम् :
(क) भवभूति: 'उत्तररामचरितम्' इति नाटकस्य रचयिता। 
(ख) नेपथ्ये कोलाहलं श्रुत्वा जनकः कथयति-"शिष्टानध्यायः इति क्रीडतां वटूनां कोलाहलः"। 
(ग) लवः कौशल्यां रामभद्रं च देहबन्धनेन स्वरेण च अनुसरति। 
(घ) बटवः अश्वं भूतविशेषं वर्णयन्ति।
(ङ) लवः अश्वमेध-काण्डेन जानाति यत् अयम् आश्वमेधिकः अश्वः। 
(च) राजपुरुषस्य तीक्ष्णतराः आयुधश्रेण्यः दृप्तां वाचं न सहन्ते। 
प्रश्न 2. 
रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत 
(क) अश्वमेध इति नाम क्षत्रियाणां महान् उत्कर्षनिकषः। 
(ख) हे बटवः! लोष्ठैः अभिघ्नन्तः उपनयत एनम् अश्वम्। 
(ग) रामभद्रस्य एषः दारकः अस्माकं लोचने शीतलयति। 
(घ) उत्पथैः मम मनः पारिप्लवं धावति। 
(ङ) अतिजवेन दूरमतिक्रान्तः स चपल: दृश्यते। 
(च) विस्फारितशरासनाः आयुधश्रेण्यः कुमारं तर्जयन्ति।
(छ) निपुणं निरूप्यमाणः लवः मुखचन्द्रेण सीतया संवदत्येव। 
उत्तरम् : 
(प्रश्ननिर्माणम्) 
(क) अश्वमेध इति नाम केषां महान् उत्कर्ष-निकषः ? 
(ख) हे बटवः ! कथं अभिघ्नन्तः उपनयत एनम् अश्वम् ? 
(ग) रामभद्रस्य एष दारकः अस्माकं किं शीतलयति ? 
(घ) उत्पथैः कस्य मनः पारिप्लवं धावति ? 
(ङ) अतिजवेन दूरम् अतिक्रान्तः सः कथं दृश्यते ?
(च) विस्फारित-शरासनाः आयुधश्रेण्यः कं तर्जयन्ति ? 
(छ) निपुणं निरुप्यमाणः लवः मुखचन्द्रेण कया संवदति एव ? 

प्रश्न 3. 
सप्रसङ्ग-व्याख्यां कुरुत - 
(क) सर्वक्षत्रपरिभावी महान् उत्कर्षनिकषः। 
(ख) किं व्याख्यानैव्रजति स पुन(रमेह्यहि याम। 
(ग) सुलभसौख्यमिदानी बालत्वं भवति 
(घ) झटिति कुरुते दृष्टः कोऽयं दृशोरमृताञ्जनम् ? 
उत्तरम् : 
(क) सर्वक्षत्रपरिभावी महान् उत्कर्षनिकषः। 
प्रसंग: - प्रस्तुत पंक्ति 'लवकौतुकम्' पाठ से संकलित है। वाल्मीकि आश्रम में 'लव' के साथ ब्रह्मचारी-सहपाठी खेल रहे हैं। इसी समय कुछ बटुगण आकर, लव को आश्रम के निकट अश्वमेध घोड़े की सूचना देते हैं। यह अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा रक्षकों से घिरा हुआ है। लव उस अश्वमेध यज्ञ के महत्त्व को अपने मन में विचार करता हुआ कहता है
व्याख्या - यह अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा है। यह क्षत्रियों की शक्ति का सूचक होता है। क्षत्रिय राजा, अपने बलवान् शत्रु राजा पर अपनी विजय की धाक जमाने के लिए इसे छोड़ता है। वास्तव में यह घोड़ा सभी शत्रुओं पर प्रभाव डालने वाले उत्कर्ष श्रेष्ठपन का सूचक होता है।
(ख) किं व्याख्यानैर्ऋजति स पुन(रमेयेहि यामः। 
प्रसंग: - प्रस्तुत पंक्ति 'लवकौतुकम्' पाठ से संकलित है। वाल्मीकि आश्रम के निकट राम के अश्वमेध का घोड़ा घूमते-घूमते आ गया है। वहाँ खेलते हुए ब्रह्मचारी उस विशेष प्राणी को देखकर भागते हुए आश्रम में आते हैं और 'लव' के सामने उसका वर्णन करते हैं
व्याख्या - यह प्राणिविशेष लम्बी पूँछ को बारबार हिला रहा है। घास खाता है, लीद करता है, लम्बी गर्दन है, चार खुरों वाला है। अधिक कहने का समय नहीं है, यह जन्तु तेजी से आश्रम से दूर भागा जा रहा है, चलो आओ हम भी उसे देखते हैं। भाव यह है कि उसे बताने की अपेक्षा उसे देखना अधिक आनन्ददायक होगा। 
(ग) सुलभं सौख्यम् इदानी बालत्वं भवति।। 
प्रसंग: - प्रस्तुत पंक्ति 'लवकौतुकम्' पाठ से उद्धृत है। वाल्मीकि आश्रम में अतिथि के रूप में जनक, कौशल्या और अरुन्धती आए हुए हैं। उनके आने से आश्रम में अवकाश कर दिया गया है और सभी छात्रगण खेलते हुए शोर मचा रहे हैं। इस शोर को सुनकर, कौशल्या जनक को बता रही हैं 
व्याख्या - बाल्यकाल में सुख के साधन सुलभ होते हैं। बच्चों को मजा लेने के लिए किसी खिलौने आदि की आवश्यकता नहीं होती। वे तो साधारण से खेल-कूद और हँसी-मजाक द्वारा ही सुख प्राप्त कर लेते हैं। सुख प्राप्ति के लिए उन्हें बड़े बहुमूल्य क्रीडा-साधनों की आवश्यकता नहीं होती। ये ब्रह्मचारी अपने बचपन का आनन्द ले रहे हैं। 
(घ) झटिति कुरुते दृष्टः कोऽयं दृशोः अमृताञ्जनम्। 
प्रसंगः - प्रस्तुत पंक्ति 'लवकौतुकम्' पाठ से संकलित है। वाल्मीकि आश्रम में, राम के पुत्र 'लव' को देखकर, अरुन्धती (वशिष्ठ की पत्नी) अत्यन्त प्रभावित है। वह उसके रूप सौन्दर्य को देखकर, राम के बचपन को स्मरण करती हुई जनक तथा कौशल्या से कहती है - 
व्याख्या - यह बालक मेरे हृदय में अत्यन्त स्नेहभाव पैदा कर रहा है। इसे देखकर मुझे ऐसा लग रहा है, जैसे कि बचपन के राम को देख रही हूँ। यह प्रिय बालक देखने पर मुझे इतना आकृष्ट कर रहा है, मानो मेरी आँखों में अमृत का अंजन लगा दिया है। इसे देखकर मुझे अत्यन्त तृप्ति मिल रही है। 
प्रश्न 4. 
अधोलिखितानि कथनानि कः कं कथयति ? 
उत्तरसहितम् -



 
प्रश्न 5. 
अधोलिखितवाक्यानां रिक्तस्थानपूर्ति निर्देशानुसारं कुरुत -
(क) क एषः ........ रामभद्रस्य मुग्धललितैरङ्गैर्दारकोऽस्माकं लोचने .......। (क्रियापदेन) 
(ख) एष ............. मे सम्मोहनस्थिरमपि मनः हरति। (कर्तृपदेन) 
(ग) ................! इतोऽपि तावदेहि ! (सम्बोधनेन) 
(घ) 'अश्वोऽश्व' .............. नाम पशुसमाम्नाये साङ्ग्रामिके च पठ्यते। (अव्ययेन) 
(ङ) युष्माभिरपि तत्काण्डं ..................... एव हि। (कृदन्तपदेन) 
(च) एष वो लवस्य ................. प्रणामपर्यायः। (करणपदेन) 
उत्तरम् :
(क) क एषः अनुसरति रामभद्रस्य मुग्धललितैरङ्गैर्दारकोऽस्माकं लोचने शीतलयति। 
(ख) एष बलवान् मे सम्मोहनस्थिरमपि मनः हरति।
(ग) जात! इतोऽपि तावदेहि ! 
(घ) 'अश्वोऽश्व' इति नाम पशुसमाम्नाये सानामिके च पठ्यते। 
(ङ) युष्माभिरपि तत्काण्डं पठितम् एव हि। 
(च) एष वो लवस्य शिरसा प्रणामपर्यायः। 
प्रश्न 6. 
अधः समस्तपदानां विग्रहाः दत्ताः। उदाहरणमनुसृत्य समस्तपदानि रचयत, समासनामापि च लिखत - 
उदाहरणम् - पशूनां समाम्नायः, तस्मिन् पशुसमाम्नाये - षष्ठीतत्पुरुषः
(क) विनयेन शिशिरः-विनशिशिरः-तृतीयातत्पुरुष
(ख) अयस्कान्तस्य शकलः-अयस्कान्तशकलः-षष्ठीतत्पुरुष
(ग) दीर्घा ग्रीवा यस्य सः-दीर्घाग्रीवा-कर्मधारयतत्पुरुष
(घ) मुखम् एव पुण्डरीकम्-मुखपुण्डरीकम्-कर्मधारयतत्पुरुष  
(ङ) पुण्यः चासौ अनुभावः-पुण्यानुभावः-कर्मधारयतत्पुरुष
(च) न स्खलितम्-अस्खलितम्-नञ् तत्पुरुष
प्रश्न 7. 
अधोलिखित पारिभाषिक शब्दानां समुचितार्थेन मेलनं कुरुत -
(क) नेपथ्ये                  (क) प्रकटरूप में
(ख) आत्मगतम्            (ख) देखकर
(ग) प्रकाशम्                (ग) पर्दे के पीछे
(घ) निरूप्य                  (घ) अपने मन में
(ङ) उत्सङ्गे गृहीत्वा       (ङ) प्रवेश करके
(च) प्रविश्य                  (च) अपने मन में
(छ) सगर्वम्                  (छ) गोद में बिठा कर
(ज) स्वगतम्                 (ज) गर्व के साथ 
प्रश्न 8. 
पाठमाश्रित्य हिन्दीभाषया लवस्य चारित्रिकवैशिष्ट्यं लिखत - 
उत्तरम् : 
(बालक लव का चरित्र चित्रण) 
लव महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पालित-पोषित, राजा राम द्वारा निर्वासित भगवती सीता के जुड़वा पुत्रों में से एक है। वह आकृति में बिल्कुल राम जैसा है, उसकी आँखों में राम की आँखों जैसी चमक है। यही कारण है कि जब महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में राजर्षि जनक, कौशल्या और अरुन्धती अतिथि के रूप में पधारते हैं; तब खेलते हुए बालकों के बीच कौशल्या बालक लव को देखकर राम के बचपन की याद में खो जाती है। तीनों की बातचीत से पता लगता है कि लव का मुख सीता के मुखचन्द्र की भाँति है। उसका मांसल और तेजस्वी शरीर राम के तुल्य है। उसका स्वर बिल्कुल राम से मिलता-जुलता है। 
       लव शिष्टाचार में कुशल है। वह गुरुजनों का आदर करना जानता है और जनक आदि के आश्रम में पधारने पर उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम करता है। लव ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा प्राप्त की है। इसीलिए जब चन्द्रकेतु द्वारा रक्षित राजा राम का अश्वमेधीय अश्व आश्रम में प्रवेश करता है; तब लव इस घोड़े को देखते ही पहचान जाता है कि यह अश्वमेधीय अश्व है, क्योंकि उसने युद्धशास्त्र तथा पशु-समाम्नाय में इस अश्व के बारे में पढ़ा हुआ है।
      लव स्वभाव से वीर है, उसका स्वाभिमान क्षत्रियोचित है। इसीलिए अश्व के रक्षक सैनिकों के द्वारा जब अश्व के सम्बन्ध में गर्वपूर्ण शब्दावली का प्रयोग किया जाता है; तब वह उन सैनिकों को ललकारता है और अपने साथी बालकों को आदेश करता है कि पत्थर मार मारकर इस घोड़े को पकड़ लो, यह भी हमारे हिरणों के बीच रहकर घास चर लिया करेगा। इतना ही नहीं वह विजयपताका को छीनने की घोषणा करता है। अन्य बालक युद्ध के लिए चमकते हुए अस्त्रों को देखकर आश्रम में भाग जाना चाहते हैं परन्तु लव उनका सामना करने के लिए धनुष पर बाण चढ़ा लेता है। इस प्रकार लव राम और सीता की आकृति से मेल रखता हुआ, गंभीर स्वर वाला, शिष्टाचार में निपुण, वीर, स्वाभिमानी, और तेजस्वी बालक है।
प्रश्न 9. 
अधोलिखितेषु श्लोकेषु छन्दोनिर्देशः क्रियताम् - 
(क) महिम्नामेतस्मिन् विनयशिशिरो मौग्ध्यमसृणो। 
(ख) वत्सायाश्च रघूद्वहस्य च शिशावमिस्मन्नभिव्यज्यते। 
(ग) पश्चात्पुच्छं वहति विपुलं तच्च धूनोत्यजस्त्रम्। 
उत्तरम् :
(क) शिखरिणी छन्दः। 
बालकौतुकम् 
(ख) शार्दूलविक्रीडितम् छन्दः। 
(ग) मन्दाक्रान्ता छन्दः। 
प्रश्न 10. 
पाठमाश्रित्य उत्प्रेक्षालङ्कारस्य उपमालङ्कारस्य च उदाहरणं लिखत - 
उत्तरम् : 
(क) उत्प्रेक्षालड्कारस्य उदाहरणम् - 
वत्सायाश्च रघूद्वहस्य च शिशावस्मिन्नभिव्यज्यते, 
संवृत्तिः प्रतिबिम्बितेव निखिला सैवाकृतिः सा द्युतिः। 
(ख) उपमालङ्कारस्य उदाहरणम् -
मनो मे संमोहस्थिरमपि हरत्येष बलवान्, 
अयोधातुर्यद्वत्परिलघुरयस्कान्तशकलः॥ 

बहुविकल्पीय-प्रश्नाः 
I. समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत -  
(i) 'उत्तररामचरितम्' इति नाटकस्य रचयिता कः ? 
(A) भासः 
(B) कालिदासः 
(C) भवभूतिः 
(D) अश्वघोषः। 
उत्तरम् :
(B) कालिदासः 
(ii) बटवः अश्वं कथं वर्णयन्ति ? 
(A) भूतविशेषम् 
(B) भूतम् 
(C) राजाश्वम् 
(D) विशेषम्।
उत्तरम् :
(A) भूतविशेषम् 
(ii) लवः कथं जानाति यत् अयम् आश्वमेधिकः अश्व: ? 
(A) उत्तरकाण्डेन 
(B) युद्धकाण्डेन 
(C) पूर्वकाण्डेन 
(D) अश्वमेधकाण्डेन। 
उत्तरम् :
(D) अश्वमेधकाण्डेन। 
(iv) राजपुरुषस्य तीक्ष्णतरा आयुधश्रेण्यः कीदृशीं वाचं न सहन्ते ? 
(A) दृप्ताम् 
(B) सुप्ताम्
(C) मधुराम् 
(D) असत्ययुक्ताम्। 
उत्तरम् :
(A) दृप्ताम् 
II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत 
(i) अश्वमेध इति नाम क्षत्रियाणां महान् उत्कर्षनिकषः। 
(A) कः 
(B) केषाम्
(C) कस्मै 
(D) कस्मात्। 
उत्तरम् :
(B) केषाम्
(ii) हे बटवः ! लोष्ठैः अभिनन्तः उपनयत एनम् अश्वम्। 
(A) काः 
(B) कस्मात् 
(C) कुत्र 
(D) कैः। 
उत्तरम् :
(D) कैः। 
(iii) रामभद्रस्य एषः दारकः अस्माकं लोचने शीतलयति। 
(A) के 
(B) कैः 
(C) कस्मिन् 
(D) कथम्। 
उत्तरम् :
(A) के 
(iv) उत्पथैः मम मनः पारिप्लवं धावति। 
(A) कस्य 
(B) कस्मै 
(C) कस्याम् 
(D) किम्। 
उत्तरम् :
(A) कस्य 
(v) अतिजवेन दूरमतिक्रान्तः स चपलः 
(A) केन 
(B) कम् 
(C) कः 
(D) काः। 
उत्तरम् :
(C) कः 
(vi) विस्फारितशरासनाः आयुधश्रेण्यः कुमारं तर्जयन्ति। 
(A) किम् 
(B) कथम् 
(C) केन 
(D) कम्। 
उत्तरम् :
(D) कम्।
(vi) निपुणं निरूप्यमाणः लव: मुखचन्द्रेण सीतया संवदत्येव। 
(A) कस्मात् 
(B) कस्याः 
(C) कया 
(D) कस्याम्। 
उत्तरम् :
(C) कया 

शनिवार, 2 मई 2020

रघुकौत्ससंवाद

 
रघुकौत्ससंवादः
      जेसीईआरटी तथा एनसीईआरटी के कक्षा-12 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग 2 के  द्वितीय: पाठ: कर्मगौरवम्  का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर  यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं।                                   
         प्रस्तुत पाठ महाकवि कालिदास द्वारा विरचित रघुवंश महाकाव्य के पञ्चम सर्ग से संकलित है। इसमें महाराज रघु एवं वरतन्तु ऋषि के शिष्य कौत्स नामक ब्रह्मचारी के मध्य साकेत नगरी में हुआ संवाद वर्णित है।कौत्स वेद, पुराण, वेदाङ्ग, दर्शन आदि 14 विद्याओं का अध्ययन समाप्त करके गुरुदक्षिणा देने की इच्छा से अपने गुरु वरतन्तु से बार-बार गुरुदक्षिणा लेने की प्रार्थना करता है।गुरु द्वारा गुरुभक्ति को ही गुरुदक्षिणा रूप में मानने पर भी कौत्स की निरन्तर प्रार्थना से रुष्ट होकर वरतन्तु उसे गुरुदक्षिणा के रूप में 14 करोड़ स्वर्णमुद्राएँ देने की आज्ञा देते हैं।कौत्स विश्वजित् नामक यज्ञ में सर्वस्व दान कर चुके महाराज रघु के पास गुरुदक्षिणा के लिए धन माँगने आता है। महाराज कक धनपति कुबेर पर आक्रमण करने की योजना बनाते हैं। भयभीत कुबेर रघु के कोषागार में सुवर्ण-वृष्टि कर देते हैं। रघु कौत्स को धन प्रदान कर सन्तुष्ट होते हैं और कौत्स भी गुरु को देने के लिए गुरुदक्षिणा प्राप्त कर सन्तुष्ट हो जाते हैं। इस पाठ का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://www.sanskritsight.in/2022/09/blog-post.html

पाठ के श्लोकों का अर्थ-

तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं
निःशेषविश्राणितकोषजातम्।
उपात्तविद्यो गुरुदक्षिणार्थी
कौत्सः प्रपेदे वरतन्तुशिष्यः॥1॥
विश्वजिति अध्वरे‘विश्वजित्’ नामक यज्ञ में
 कोशजातंअपनी सम्पूर्ण धनराशि  
नि:शेषविश्राणितदान कर चुके
तं क्षितीशं (रघुम्)उस राजा रघु के पास   
उपात्तविद्यःविद्या को प्राप्त किया हुआ,विद्यासम्पन्न 
वरतन्तुशिष्यःवरतन्तु ऋषि का  शिष्य 
कौत्सःकौत्स
गुरुदक्षिणार्थीगुरुदक्षिणा देने की इच्छा से 
प्रपेदे=(धनयाचना करने के लिए)पहुँचा।
भावार्थ:-प्राचीन काल में राजा लोग ‘विश्वजित्’ यज्ञ करते थे। राजा रघु ने भी यह यज्ञ किया और अपना सम्पूर्ण खजाना (राजकोष-धनधान्य) दान कर दिया। तभी वरतन्तु का शिष्य कौत्स भी राजा के पास इस आशा में पहुँचा कि वह अपने गुरु को गुरुदक्षिणा में देने के लिए चौदह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ राजा रघु से माँग लेगा।
स मृण्मये वीतहिरण्मयत्वात्
पात्रे निधायार्घ्यमनर्घशीलः।
श्रुतप्रकाशं यशसा प्रकाशः
प्रत्युजगामातिथिमातिथेयः॥2॥
सः अनर्घशीलःवह प्रशंसनीय स्वभाव वाला
यशसा प्रकाशःयश से प्रकाशवान
आतिथेयःअतिथि सत्कार करने वाला (राजा रघु)
वीतहिरण्मयत्वात्सोने के बने हुए पात्रों के न रहने से 
मृण्मये पात्रेमिट्टी के बने हुए पात्र में
अर्घ्यं निधाय अर्घ्य अर्थात् सत्कार के लिए जल आदि लेकर
श्रुतप्रकाशम्वेदज्ञान से प्रकाशमान 
अतिथिं (कौत्सम्)अतिथि कौत्स के 
 प्रति उज्जगामपास उठकर गया।
भावार्थ:-विश्वजित् यज्ञ में सम्पूर्ण धन-कोष दान कर देने के कारण राजा रघु निर्धन हो चुका था। अब उसके पास सोने के बर्तन नहीं थे। परन्तु अतिथि का सत्कार तो प्रत्येक दशा में करना ही चाहिए। इसी भाव से रघु मिट्टी के पात्र में सत्कार-सामग्री रखकर, अपने आसन से उठकर याचक ब्रह्मचारी कौत्स के पास पहुंचे।
तमर्चयित्वा विधिवद्विधिज्ञः
तपोधनं मानधनाग्रयायी।
विशांपतिर्विष्टरभाजमारात्
कृताञ्जलिः कृत्यविदित्युवाच॥३॥
विधिज्ञः=शास्त्रविधि को जानने वाले 
मानधनाग्रयायीस्वाभिमान को ही धन मानने वालों में अग्रगण्य 
कृत्यवित् अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व को समझने वाले
विशांपतिःप्रजा के स्वामी राजा 
विष्टरभाजं तं आसन/पीठ  पर बैठे हुए उस
तपोधनंतपस्वी (कौत्स का)
विधिवत्विधिपूर्वक 
अर्चयित्वासत्कार करके 
आरात्निकट ही 
कृताञ्जलिःसन्हाथ जोड़े हुए (रघु) ने
इति उवाच इस प्रकार कहा।
भावार्थ:-स्वाभिमानी राजा रघु ने तपस्वी कौत्स का पूजन करके आदरपूर्वक हाथ जोड़कर अगले पद्यों में कहे जाने वाले वचन कहे।
अप्यग्रणीमन्त्रकृतामृषीणां
कुशाग्रबुद्धे कुशली गुरुस्ते।
यतस्त्वया ज्ञानमशेषमाप्तं
लोकेन चैतन्यमिवोष्णरश्मेः॥ 4॥
राजा रघु ने कौत्स से विनयपूर्वक कहा-
(हे) कुशाग्रबुद्धे !हे तीव्रबुद्धि ! 
अपि मन्त्रकृताम्क्या मन्त्रद्रष्टा 
ऋषीणाम् अग्रणीःऋषियों में अग्रगण्य 
ते गुरुः कुशली ?आपके गुरु कुशलपूर्वक हैं ? 
यतः त्वयाक्योंकि आपने 
अशेषं ज्ञानंसमस्त ज्ञान
आप्तम्=(अपने गुरु से उसी प्रकार) प्राप्त किया है,
 लोकेन(जिस प्रकार संसार के) समस्त लोग 
उष्णरश्मेःसूर्य से 
चैतन्यम् इवऊर्जा प्राप्तकर चेतनावान् हो जाते हैं। 
भावार्थ:-वरतन्तु मन्त्रद्रष्टा श्रेष्ठ ऋषि हैं। राजा रघु उनके शिष्य से ऋषिश्रेष्ठ का कुशल समाचार पूछकर सज्जनोचित शिष्टाचार प्रकट कर रहे हैं। जैसे सूर्य से लोग ऊर्जा प्राप्तकर चेतनावान् हो जाते हैं, इसी प्रकार कौत्स वरतन्तु से समस्त 14 विद्याओं का ज्ञान प्राप्त कर विद्यावान् हुआ है।
विशेष:-यहाँ उपमा अलंकार है।
तवार्हतो नाभिगमेन तृप्तं मनो नियोगक्रिययोत्सुकं मे।
अप्याज्ञया शासितुरात्मना वाप्राप्तोऽसि सम्भावयितुं वनान्माम् ॥5॥
राजा रघु ने कौत्स से पुन: कहा-
अर्हतः तवआप पूजनीय के
अभिगमनेनआगमन से 
नियोगक्रिययाआज्ञापालन के लिए 
उत्सुकं उत्सुक  
मे मनःमेरा मन  
तृप्तम् प्रसन्न हो गया है। 
अपि शासितुःक्या आप गुरु की 
आज्ञयाआज्ञा से 
आत्मना वाअथवा अपने-आप से ही 
मां संभावयितुंमुझ पर कृपा करने के लिए 
वनात् वन (आश्रम) से 
प्राप्तः असियहाँ पधारे हैं?
भावार्थ:-राजा रघु स्वभाव से विनम्र एवं शिष्टाचार में निपुण हैं। वे तपस्वियों की याचना को भी अपने ऊपर तपस्वियों की कृपा ही मानते हैं। रघु के पूछने का तात्पर्य है कि वह अपने गुरुदेव के प्रयोजन से मेरे पास आया है अथवा उसका कोई अपना ही व्यक्तिगत प्रयोजन है ?
इत्यर्घ्यपात्रानुमितव्ययस्य
रघोरुदारामपि गां निशम्य।
स्वार्थोपपत्तिं प्रति दुर्बलाशः
तमित्यवोचद्वरतन्तुशिष्यः॥6॥
अर्घ्यपात्रेणअर्घ्यपात्र मिट्टी का बना हुआ होने से 
अनुमितव्ययस्यजिसके खर्च करने की सामर्थ्य का अनुमान किया जा सकता है,
 रघोः इतिऐसे उस राजा रघु की 
उदारांउदारतापूर्ण 
गाम् वाणी को 
निशम्य अपिसुनकर भी 
वरतन्तुशिष्यःवरतन्तु के शिष्य
स्वार्थोपपत्तिंअपने कार्य की सिद्धि के
प्रति दुर्बलाशःप्रति हताश होते हुए
तम् इतिराजा रघु से ये 
अवोचत्ये वचन कहे।
भावार्थ:-राजा रघु विश्वजित् यज्ञ में अपना सम्पूर्ण धन दान कर चुके हैं, अत: कौत्स का सत्कार करने के लिए आज उनके पास सोने का पात्र नहीं है; अपितु मिट्टी का पात्र है। इस मिट्टी के बर्तन से ही अब रघु की दान शक्ति का परिचय मिल जाता है। कौत्स को अपने उद्देश्य की सिद्धि पूर्ण होती हुई प्रतीत नहीं होती, इसीलिए वह हताश होकर अगले पद्यों में कहे गए वचन राजा रघु के सामने निवेदन करता है।
 सर्वत्र नो वार्तमवेहि राजन् !
नाथे कुतस्त्वय्यशुभं प्रजानाम्।
सूर्ये तपत्यावरणाय दृष्टे:
कल्पेत लोकस्य कथं तमिस्त्रा॥7॥
वरतन्तु के शिष्य कौत्स ने राजा रघु को सम्बोधन करते हुए कहा-
(हे) राजन् !-हे राजन् !
 सर्वत्र आप तो सभी जगह 
नः वार्तम्हमारी कुशलता को 
अवेहिजानते ही हैं।
त्वयि नाथेआप के राजा होते हुए 
प्रजानाम्प्रजाओं का 
अशुभं कुतःअशुभ कैसे हो सकता है ? अर्थात् नहीं।
 सूर्ये तपतिसूर्य के प्रकाशमान होने पर
तमिस्राअंधकार समूह (कृष्ण पक्ष की रात्रि) 
लोकस्य दृष्टेःसंसार के लोगों की दृष्टि को 
आवरणायढकने में 
कथं कल्पेतकैसे समर्थ हो सकता है ? .
भावार्थ:-कौत्स राजा रघु के राजा होने पर सन्तुष्ट है और राजा के समक्ष वह स्पष्ट कर रहा है कि उनके राजा रहते हुए उनके शासन में किसी भी प्रकार के अनिष्ट की कल्पना नहीं की जा सकती। समस्त प्रजा का केवल कल्याण ही होता है। सूर्य के रहते हुए अंधकार कैसे ठहर सकता है?
विशेषः-प्रस्तुत पद्य में पहले वाक्य की कही गई बात को दूसरे वाक्य की बात से पुष्ट किया गया है। अत: यहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार है।
शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठन्
आभासि तीर्थप्रतिपादितर्द्धिः।
आरण्यकोपात्तफलप्रसूतिः
स्तम्बेन नीवार इवावशिष्टः॥ 8॥
वरतन्तु के शिष्य कौत्स ने राजा रघु से कहा-
(हे) नरेन्द्र !हे राजन् ! 
तीर्थेसत्पात्रों को
प्रतिपादितार्द्धिःअपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दान. में देने वाले आप
अपि शरीरमात्रेणकेवल शरीर से 
तिष्ठन्उसी प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, 
आरण्यकाःजैसे वनों में रहने वाले मुनि लोगों को 
उपात्तफलप्रसूतिःअपने फल प्रदान कर देने वाले 
स्तम्बेनडंठल मात्र से 
अवशिष्टःशेष रहकर 
नीवारःनीवार के पौधे
इव आभासिसुशोभित होते हैं।
भावार्थ:-रघु सर्वस्व दान कर देने के पश्चात् भी सुशोभित हो रहे हैं, क्योंकि उन्होंने यह दान सदाचारी याचकों को दिया है। कवि कालिदास ने धन-सम्पत्ति से रहित होने के कारण शरीर मात्र से विद्यमान रघु को उसी प्रकार सुशोभित बताया है जिस प्रकार मुनियों द्वारा नीवार-अन्न (साँवकी) ग्रहण कर लेने पर नीवार का पौधा डंठल मात्र रहकर सुशोभित होता है।
तदन्यतस्तावदनन्यकार्यों
गुर्वर्थमाहर्तुमहं यतिष्ये।
स्वस्त्यस्तु ते निर्गलिताम्बुगर्भ
शरद्घनं नार्दति चातकोऽपि ॥ 9॥
कौत्स राजा रघु से कह रहा है-
तत् तावत् तब कोई
अनन्यकार्यःअन्य प्रयोजन न होने से 
अहम्मैं 
अन्यतःकिसी दूसरे राजा के पास
गुर्वर्थम्गुरुचरणों में दक्षिणा रूप में देने के लिए 
आहर्तुंधन-याचना करने का 
यतिष्येप्रयास करूंगा।
ते स्वस्तिआपका कल्याण हो।
 चातकः अपिचातक भी 
निर्गलिताम्बुगर्भजल वर्षा कर देने से रिक्त हुए 
शरद्-घनंशरद् ऋतु के बादलों से
 न अर्दतिजल की याचना नहीं करता
भावार्थ:-जिसके पास जो वस्तु हो, उससे वही वस्तु माँगनी चाहिए। कौत्स को धन की आवश्यकता है। राजा रघु पहले ही सम्पूर्ण धन का दान कर चुके हैं। कौत्स का धन याचना के अतिरिक्त कोई अन्य प्रयोजन भी नहीं है। अतः वह राजा रघु से कह रहा है कि मैं गुरुदक्षिणा के लिए धन प्राप्त करने हेतु किसी अन्य राजा से निवेदन करूँगा क्योंकि जल रहित बादलों से तो चातक पक्षी भी याचना नहीं करता। विशेष:-पहले वाक्यार्थ की पुष्टि दूसरे वाक्यार्थ से हो रही है। अतः यहाँ ‘अर्थान्तरन्यास’ अलंकार है।
एतावदुक्त्वा प्रतियातुकामं
शिष्यं महर्षेर्नृपतिर्निषिध्य।
किं वस्तु विद्वन् ! गुरवे प्रदेयं
त्वया कियद्वेति तमन्वयुक्तं ॥ 10॥
एतावद्इसप्रकार वचन 
उक्त्वाकहकर
महर्षेः शिष्यंजब महर्षि वरन्तु का शिष्य 
प्रतियातुकामंलौटने लगा तब  
नृपतिः (रघुः)महाराज रघु ने 
निषिध्य-उसे रोक कर 
इति तम्इस प्रकार उससे 
अन्वयुक्तपूछा-
(हे) विद्वन् !“हे विद्वान् ! 
त्वया गुरवेअपने गुरु को 
प्रदेयं वस्तुगुरुदक्षिणा में देने के लिए 
किम्, क्या वस्तु चाहिए
कियत् वाऔर कितनी चाहिए ?” 
भावार्थ:-कौत्स अपनी धन याचना पूर्ण न होते हुए देखकर वापस लौट जाना चाहता है। रघु उसे रोकते हैं क्योंकि महाराज रघु एक स्वाभिमानी राजा हैं और किसी याचक का खाली हाथ लौट जाना रघु को स्वीकार नहीं है। इसीलिए वे कौत्स से पूछते हैं कि उसे गुरुदक्षिणा में देने के लिए कितने परिमाण में किस वस्तु की आवश्यकता
ततो यथावद्विहिताध्वराय
तस्मै स्मयावेशविवर्जिताय।
वर्णाश्रमाणां गुरवे स वर्णी
विचक्षणः प्रस्तुतमाचचक्षे॥ 11 ॥
ततः यथावत्तब  विधिपूर्वक
विहिताध्वराययज्ञ अनुष्ठान कर लेने वाले
 स्मयावेशविर्जितायअभिमान से शून्य 
वर्णाश्रमाणांवर्ण तथा आश्रमों के 
गुरवेव्यवस्थापक
तस्मै स:उस राजा रघु को 
विचक्षणःविद्वान्
 वर्णी ब्रह्मचारी 
प्रस्तुतम्अपना उद्देश्य
आचचक्षेकहा-
भावार्थ:-राजा रघु धर्मवृत्ति हैं, उनमें नाममात्र को भी अभिमान नहीं है। वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों; ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास इन चारों आश्रमों पर नियन्त्रण करने वाले हैं। ऐसे प्रजापालक राजा के पूछने पर कौत्स ने अपना मनोरथ राजा के सामने प्रकट किया।
समाप्तविद्येन मया महर्षिर्
विज्ञापितोऽभूद्गुरुदक्षिणायै।
स मे चिरायास्खलितोपचारां
तां भक्तिमेवागणयत्पुरस्तात्॥ 12 ॥
कौत्स ने राजा रघु को सारा वृत्तान्त समझाते हुए कहा कि जब
मया मैंने
समाप्तविद्येनविद्या समाप्त कर ली तो 
 महर्षिःमहर्षि वरतन्तु से 
 गुरुदक्षिणायैमैंने गुरु दक्षिणा स्वीकार कर लेने के लिए
विज्ञापितःप्रार्थना की।
 अभूत्की तो 
स चिरायउन आदरणीय गुरु जी ने पहले तो
 अस्खलितोपचारांमेरी पूर्ण निष्ठापूर्वक की गई
 तां मे भक्तिम्उस भक्ति को ही 
एव पुरस्तात्बहुत दिनों तक 
अगणयत्गुरुदक्षिणा रूप में समझा
भावार्थ:-महर्षि वरतन्तु सच्चे गुरु थे, उन्हें धन की कोई इच्छा नहीं थी। इसीलिए वे कौत्स के सेवाभाव को ही बहुत दिनों तक गुरु दक्षिणा के रूप में मानते रहे।
 निर्बन्धसञ्जातरुषार्थकार्य
मचिन्तयित्वा गुरुणाहमुक्तः
वित्तस्य विद्यापरिसंख्यया मे
कोटीश्चतस्रो दश चाहरेति ॥ 13 ॥
कौत्स महाराज रघु से शेष वृत्तान्त निवेदन करते हुए कहता है-
निर्बन्धसञ्जातरुषामेरे बार-बार प्रार्थना (जिद्द) करने से क्रोधित हुए गुरु जी ने  
अर्थकार्यम्मेरी निर्धनता का 
अचिन्तयित्वाविचार किए बिना 
अहं मुझसे
विद्यापरिसंख्ययाविद्या की संख्या के अनुसार
चतस्रः दश चचौदह 
कोटीः वित्तस्यकरोड़ सुवर्ण मुद्राएँ 
आहर इतिले आओ।”ऐसा   
उक्तःकहा।
भावार्थ:-गुरुदेव वरतन्तु को न धन का लोभ था, न विद्या का अभिमान । परन्तु शिष्य कौत्स की बार-बार जिद्द ने उन्हें क्रोधित कर दिया और उन्होंने कौत्स को पढ़ाई गई चौदह विद्याओं के प्रतिफल में चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा में समर्पित करने का आदेश दे दिया। 
इत्थं द्विजेन द्विजराजकान्ति
रावेदितो वेदविदां वरेण।
एनोनिवृत्तेन्द्रियवृत्तिरेनं
जगाद भूयो जगदेकनाथः ॥ 14 ॥
वेदविदांवेद विद्या को जानने वालों में 
वरेणश्रेष्ठ 
 द्विजेनब्राह्मण से
इत्थम्इसप्रकार
 आवेदितःनिवेदन किए जाने पर
द्विजराजकान्तिःचन्द्रमा के समान कान्ति वाले,
 एनोनिवृत्तेन्द्रियवृत्तिःजितेन्द्रिय 
जगदेकनाथ:संसार के पालन करने वाले उस राजा रघु ने
 एनंयाचक कौत्स को 
भूयःफिर
जगादकहा
भावार्थ:-राजा रघु ने कौत्स द्वारा कहे गए सम्पूर्ण घटनाक्रम को सुनकर अगले पद्य में कहे जाने वाले वचन कौत्स से कहे।
गुर्वर्थमर्थी श्रुतपारदृश्वा
रघोः सकाशादनवाप्य कामम्।
गतो वदान्यान्तरमित्ययं मे
मा भूत्परीवादनवावतारः ॥ 15 ॥
श्रुतपारदृश्वाआप शास्त्रों को जानने वाले हैं 
गुर्वर्थम्गुरुदक्षिणा देने के लिए  
अर्थीधन याचना करने वाले हैं
रघोःरघु के
सकाशात्पास से
 कामम्मनोरथ 
अनवाप्यपूरा किए बिना 
वदान्यान्तरंकिसी दूसरे दानी के पास 
गतः इतिचले जाएं-इस प्रकार की 
अयंयह
 परीवादनवावतारःनिन्दा का नया प्रार्दुभाव 
मे माभूत्मुझमें न हो जाए
भावार्थ:-सम्मानित व्यक्तियों के लिए समाज में फैला हुआ अपयश मृत्यु से भी बढ़कर होता है, इसीलिए राजा रघु बिल्कुल नहीं चाहते कि समाज में यह निन्दा फैल जाए कि कोई वेद का विद्वान्, शास्त्रों का ज्ञाता ब्राह्मण अपने गुरु को गुरुदक्षिणा देना चाहता था और इसी उद्देश्य से धन याचना करने के लिए वह राजा रघु के पास आया और खाली हाथ लौट गया।
स त्वं प्रशस्ते महिते मदीये
वसंश्चतुर्थोऽग्निरिवाग्न्यगारे
द्वित्राण्यहान्यहसि सोढुमर्हन्
यावद्यते साधयितुं त्वदर्थम्॥ 16 ॥
स त्वंआप 
मदीयेमेरी  
 महितेविशाल तथा 
प्रशस्तेप्रशंसनीय
 अग्न्यगारेयज्ञशाला में  
चतुर्थःचतुर्थ 
 अग्निः इवअग्नि के समान
 द्वित्राणिदो-तीन 
 अहानिदिन
यावत्तक
वसन्रहते हुए 
 सोढुम्बिता 
अर्हसिसकते हैं।
(हे) अर्हन् !हे पूजनीय ब्रह्मचारी!
 त्वदर्थंमैं आपके प्रयोजन को 
साधयितुंसिद्ध करने के लिए   
यतेयत्न करूंगा।
भावार्थ:-दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि और आहवनीयाग्नि नाम से यज्ञ की अग्नि तीन प्रकार की होती है, ये तीनों अग्नियाँ याजकों के लिए अति श्रद्धेय होती हैं। रघु कौत्स को चतुर्थ अग्नि की भाँति पूजनीय समझते हैं और उससे निवेदन करते हैं की आप मेरी ही यज्ञशाला में दो-तीन दिन तक प्रतीक्षा करें, जिससे 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का प्रबन्ध किया जा सके।
तथेति तस्यावितथं प्रतीत:
प्रत्यग्रहीत्सङ्गरमग्रजन्मा।
गामात्तसारां रघुरप्यवेक्ष्य
निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्।। 17 ॥
अग्रजन्माब्राह्मण कौत्स ने
 प्रतीतःप्रसन्न होकर 
तस्यउस राजा रघु के 
अवितथंसत्यवचन
सङ्गरंप्रतिज्ञा को 
तथा इति ‘ठीक है’यह कहकर
प्रत्यग्रहीत्स्वीकार किया। 
रघुः अपिरघु ने भी 
गाम्पृथिवी को
 आत्तसाराम्प्राप्तधन वाली 
अवेक्ष्यदेखकर
कुबेरात्कुबेर से 
अर्थंधन 
निष्क्रष्टुंछीन लेने की 
चकमेइच्छा की।
भावार्थः-याचक कौत्स और दाता रघु दोनों को परस्पर विश्वास है। कौत्स ने रघु के वचनों को सत्य प्रतिज्ञा के रूप में ग्रहण किया। रघु ने कौत्स की याचना के पूर्ण करने हेतु धन के स्वामी कुबेर पर आक्रमण कर उसका धन हरण कर लेने की इच्छा की।
प्रातः प्रयाणाभिमुखाय तस्मै
सविस्मयाः कोषगृहे नियुक्ताः।
हिरण्मयी कोषगृहस्य मध्ये
वृष्टिं शशंसुः पतितां नभस्तः ॥ 18 ॥
प्रातःप्रात:काल (कुबेर की ओर)
 प्रयाणाभिमुखायप्रस्थान करने के लिए तैयार हुए
तस्मैउस रघु के
 कोषगृहेकोषगृह में
 नियुक्ताःनियुक्त अधिकारियों ने
 सविस्मयाःआश्चर्यचकित 
(सन्तः)होते हुए 
 कोषगृहस्य मध्येखजाने में 
 नभस्तःआकाश से 
 पतितांगिरने वाली 
हिरण्मयींसुवर्णमयी 
 वृष्टिं शशंसुःवर्षा के बारे में कहा।
भावार्थ:-राजा रघु जैसे ही प्रातःकाल कुबेर की ओर प्रस्थान करने के लिए तैयार हुआ, तभी रघु के कोशगृह के अधिकारियों ने देखा कि उस खजाने में सुवर्ण मुद्राओं की वर्षा हो चुकी है। अधिकारियों को यह सब देखकर आश्चर्य हुआ और उन्होंने राजा रघु को यह समाचार सुनाया।
शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
तं भूपतिर्भासुरहेमराशिं
लब्धं कुबेरादभियास्यमानात्।
दिदेश कौत्साय समस्तमेव
पादं सुमेरोरिव वज्रभिन्नम्॥ 19 ॥
भूपतिःराजा रघु ने  
अभियास्यमानात्आक्रमण किए जाने वाले
कुबेरात् कुबेर से 
लब्धंप्राप्त 
वज्रभिन्नंवज्र के द्वारा टुकड़े किए गए
 सुमेरोःसुमेरु 
पादम् इवचतुर्थ भाग के समान 
भासुरंचमकती हुई
 तं समस्तम् उन समस्त
एव हेमराशिंसुवर्ण मुद्राओं को 
कौत्सायकौत्स के लिए 
दिदेशदे दिया।
भावार्थ:-कुबेर ने रघु के आक्रमण के भय से उसके खजाने को सुवर्ण मुद्राओं से भर दिया। वे सुवर्ण मुद्राएँ परिमाण में इतनी अधिक थी कि ऐसा लगता था मानो सुमेरु पर्वत का ही वज्र से काटकर उसका चौथा हिस्सा खजाने में रख दिया। महाराज रघु ने कुबेर से प्राप्त हुई सभी सुवर्ण मुद्राएँ याचक कौत्स को प्रदान कर दी अर्थात् चौदह करोड़ ही न देकर पूरा खजाना ही कौत्स को सौंप दिया।
जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ
द्वावप्यभूतामभिनन्धसत्त्वौ।
गुरुप्रदेयाधिकानिःस्पृहोऽर्थी
नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च ॥ 20॥
तौ द्वौ अपिवे (महाराजा रघु और कौत्स) दोनों ही
 साकेतनिवासिनःअयोध्यावासी  
जनस्यलोगों के लिए 
अभिनन्द्यसत्त्वौप्रशंसनीय व्यवहार वाले
 अभूताम्गए।
 गुरुप्रदेयाद्क्योंकि गुरु को समर्पण करने योग्य धन से 
अधिकनिःस्पृहः अर्थीअधिक.धन लेने में  इच्छा न रखने वाला याचक कौत्स था
 अर्थिकामात्और याचक की याचना से  
अधिकप्रदःअधिक धन देने वाला  
नृपः चराजा रघु था। 
(आसीत्)था। 
भावार्थ:-कौत्स की निर्लोभता की सीमा नहीं थी और महाराज रघु की उदारता की सीमा नहीं थी। कौत्स गुरुदक्षिणा में देने योग्य चौदह करोड़ मुद्राओं से एक थी अधिक नहीं लेना चाहता और राजा सारा खजाना ही उसे दे देना चाहते थे-दोनों के इस अद्भुत व्यवहार से अयोध्यावासी धन्य हो गए और दोनों की ही अत्यधिक प्रशंसा करने लगे।

हिन्दीभाषया पाठस्य सारः

         प्रस्तुत पाठ ‘रघुकौत्ससंवादः’ महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंश-महाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग से सम्पादित है। इसमें महाराज रघु एवं वरतन्तु ऋषि के शिष्य कौत्स नामक ब्रह्मचारी के मध्य साकेत नगरी में हुआ संवाद वर्णित है।कौत्स अपने गुरु ऋषि वरतन्तु से वेद, पुराण, वेदाङ्ग, दर्शन आदि 14 विद्याओं का अध्ययन समाप्त करके अपने गुरु से बार-बार गुरुदक्षिणा लेने की प्रार्थना करता है। गुरु द्वारा गुरुभक्ति को ही गुरुदक्षिणा रूप में मानने पर भी कौत्स गुरुदक्षिणा स्वीकार करने की निरन्तर प्रार्थना करता है। इससे रुष्ट होकर वरतन्तु उसे गुरुदक्षिणा के रूप में 14 करोड़ स्वर्णमुद्राएँ देने की आज्ञा देते हैं।
         महाराज रघु विश्वजित् नामक यज्ञ में सर्वस्व दान कर चुके हैं। कौत्स उनके पास गुरुदक्षिणा के लिए धन माँगने आता है। कौत्स महाराज रघु की धनहीनता देखकर वापस लौटने लगता है। महाराज रघु उसे रोकते हैं और पूछते हैं कि वह अपने गुरु को गुरुदक्षिणा में क्या देना चाहता है ? वह बताता है कि गुरुदेव ने चौदह विद्याओं को पढ़ाने के प्रतिफल में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा के रूप में देने का आदेश दिया है। ब्रह्मचारी कौत्स की याचना पूर्ण करने के उद्देश्य से महाराज रघु धनपति कुबेर पर आक्रमण करने की योजना बनाते हैं। भयभीत कुबेर रघु के कोषागार में सुवर्ण-वृष्टि कर देते हैं। रघु कौत्स को सारा धन प्रदान कर सन्तुष्ट होते हैं परन्तु कौत्स उनमें से केवल 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ देने के लिए गुरुदक्षिणा प्राप्त कर सन्तुष्ट भाव से लौट जाते हैं।
       इस पाठ से यह सन्देश मिलता है कि महाराज रघु की भाँति शासक को सर्वसाधारण जन के प्रति उदार एवं कल्याणकारी होना चाहिए तथा याचक को कौत्स की भाँति अपनी आवश्यकता से अधिक धन प्राप्त करने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।
1. संस्कृतभाषया उत्तरं लिखत
(क) कौत्सः कस्य शिष्यः आसीत् ?
(ख) रघुः कम् अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म ?
(ग) कौत्सः किमर्थं रघु प्राप ?
(घ) मन्त्रकृताम् अग्रणीः कः आसीत् ?
(ङ) तीर्थप्रतिपादितद्धिः नरेन्द्रः कथमिव आभाति स्म ?
(च) चातकोऽपि कं न याचते ?
(छ) कौत्सस्य गुरुः गुरुदक्षिणात्वेन कियद्धनं देयमिति आदिदेश ?
(ज) रघुः कस्मात् परीवादात् भीतः आसीत् ?
(झ) कस्मात् अर्थं निष्क्रष्टुम् रघुः चकमे ?
(ञ) हिरण्मयीं वृष्टिं के शशंसुः ?
(ट) कौ अभिनन्द्यसत्वौ अभूताम् ?
उत्तरम्:
(क) कौत्सः महर्षेः वरतन्तोः शिष्यः आसीत्।
(ख) रघुः ‘विश्वजित्’-नामकम् अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म।
(ग) कौत्सः गुरुदक्षिणार्थं धनं याचितुं रघु प्राप।
(घ) मन्त्रकृताम् अग्रणी: महर्षिः वरतन्तुः आसीत्।
(ङ) तीर्थप्रतिपादितर्द्धिः नरेन्द्रः स्तम्बेन अवशिष्टः नीवारः इव आभाति स्म।
(च) चातकोऽपि निर्गलिताम्बुग) शरद्घनं न याचते।
(छ) कौत्सस्य गुरु: गुरुदक्षिणात्वेन चतुर्दशकोटी: सुवर्णमुद्राः प्रदेयाः इति आदिदेश।
(ज) ‘कश्चित् याचक: गुरुप्रदेयम् अर्थं रघोः अनवाप्य अन्यं दातारं गतः’ इति परीवादात् रघुः भीतः आसीत्।
(झ) कुबेरात् अर्थं निष्क्रष्टुम् रघुः चकमे।
(ञ) हिरण्मयीं वृष्टिं गृहकोषे नियुक्ताः अधिकारिणः शशंसुः ।
(ट) द्वौ रघुकौत्सौ अभिनन्द्यसत्त्वौ अभूताम्।
2. कोष्ठकात् समुचितं पदमादाय रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) यससा ………………… अतिथिं प्रत्युज्जगाम। (प्रकाशः, कृष्णः, आतिथेयः)
(ख) मानधनाग्रयायी ……………….. तपोधनम् उवाच। (विशाम्पतिः, अकृताञ्जलिः, कौत्सः)
(ग) कुशाग्रबुद्धे ! ………………… कुशली। (ते शिष्यः, ते गुरुः, अग्रणी:)
(घ) हे राजन् ! सर्वत्र ………………… अवेहि। (दुःखम्, वार्तम्, असुखम्)
(ङ) स्तम्बेन अवशिष्टः …………… इव आभासि। (धान्यम्, नीवारः, वृक्षः)
(च) हे विद्वन् ! ………………… गुरवे कियत् प्रदेयम्।। (त्वया, मया, लोकेन)
(छ) ………………… अचिन्तयित्वा गुरुणा अहमुक्तः। (शरीरक्लेशम्, अर्थकार्यम्, रोगक्लेशम्)
उत्तरम्:
(क) प्रकाशः
(ख) विशाम्पतिः
(ग) ते गुरुः
(घ) वार्तम्
(ङ) नीवारः
(च) त्वया
(छ) अर्थकार्यम्।
3. अधोलिखितानां सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या
(क) कोटीश्चतस्रो दश चाहर।
(ख) माभूत्परीवादनवावतारः।
(ग) द्वित्राण्यहान्यर्हसि सोढुमर्हन्।
(घ) निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्।
(ङ) दिदेश कौत्साय समस्तमेव।
उत्तरम्:
(क) कोटीश्चतस्रो दश चाहर।
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ से ‘रघुकौत्ससंवादः’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ कविकुलशिरोमणि महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशमहाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग में से सम्पादित किया गया है। इसमें महर्षि वरतन्तु के शिष्य कौत्स का गुरुदक्षिणा के लिए आग्रह, बार-बार के आग्रह से क्रोधित ऋषि द्वारा पढ़ाई गई चौदह विद्याओं की संख्या के अनुरूप चौदह करोड़ मुद्राएँ देने का आदेश, सर्वस्वदान कर चुके राजा रघु से कौत्स की धनयाचना ‘रघु के द्वार से’ याचक खाली हाथ लौट गया-इस अपकीर्ति के भय से रघु का कुबेर पर आक्रमण का विचार तथा भयभीत कुबेर द्वारा रघु के खजाने में धन वर्षा करने को संवाद रूप में वर्णित किया गया है।
व्याख्या-महर्षि वरतन्तु मन्त्रद्रष्टा ऋषि थे। न उनमें विद्या का अभिमान था, न गुरुदक्षिणा में धन का लोभ। कौत्स नामक एक शिष्य ने ऋषि से चौदह विद्याएँ अत्यन्त भक्ति भाव से ग्रहण की। विद्याप्राप्ति के पश्चात् कौत्स ने गुरुदक्षिणा स्वीकार करने का आग्रह किया। ऋषि ने कौत्स के भक्तिभाव को ही गुरुदक्षिणा मान लिया। परन्तु कौत्स गुरुदक्षिणा देने के लिए जिद्द करता रहता रहा और इस जिद्द से रुष्ट होकर कवि ने उसे पढ़ाई गई एक विद्या के लिए एक करोड़ सुवर्णमुद्राओं के हिसाब से चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ भेंट करने का आदेश दे दिया–’कोटीश्चतस्त्रो दश चाहर’।
(ख) मा भूत्परीवादनवावतारः।
(किसी निन्दा का नया प्रादुर्भाव न हो जाए।)
(ग) द्वित्राण्यहान्यर्हसि सोढमर्हन।
(हे पूजनीय ! दो-तीन तक आप मेरे पास ठहर जाएँ।)
(घ) निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्।
(रघु ने कुबेर से धन ग्रहण करने की इच्छा की।)
(ङ) दिदेश कौत्साय समस्तमेव ।
(रघु ने कुबेर से प्राप्त सारा धन कौत्स के लिए दे दिया।)
उत्तर:
(ख), (ग), (घ) तथा (ङ) के लिए संयुक्त प्रसंग एवं व्याख्या
प्रसंग-(क) वाला ही उपयोग करें।
व्याख्या-महर्षि वरतन्तु का शिष्य कौत्स राजा रघु के पास गुरुदक्षिणार्थ धन याचना के लिए आता है। रघु विश्वजित् यज्ञ में सर्वस्व दान कर चुके हैं, अतः वे सुवर्णपात्र के स्थान पर मिट्टी के पात्र में जल आदि लेकर कौत्स का स्वागत करते हैं। कौत्स मिट्टी का पात्र देखकर अपने मनोरथ की पूर्ति में हताश हो जाता है और वापस लौटने लगता है। राजा रघु खाली हाथ लौटते हुए कौत्स को रोकते हैं क्योंकि सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से बढ़कर होता है अत: उन्हें भय यह है कि कहीं प्रजा में यह निन्दा न फैल जाए कि कोई याचक रघु के पास आया था और खाली हाथ लौट गया था। वे कौत्स से उसका मनोरथ पूछते हैं। कौत्स सारा वृत्तान्त सुनाते हुए कहता है कि गुरु के आदेश के अनुसार चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा में भेंट करनी हैं। रघु कौत्स से दो-तीन के लिए
आदरणीय अतिथि के रूप में ठहरने का अग्रह करते हैं, जिससे उचित धन का प्रबन्ध किया जा सके। कौत्स राजा की प्रतिज्ञा को सत्य मानकर ठहर जाता है। रघु भी उसकी याचना पूर्ति के लिए धन के स्वामी कुबेर पर आक्रमण का विचार करते हैं। कुबेर रघु के पराक्रम से भयभीत होकर रघु के खजाने में सुवर्ण वृष्टि कर देते हैं। उदार रघु यह सारा धन कौत्स को दे देते हैं, परन्तु निर्लोभी कौत्स उनमें से केवल 14 करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ लेकर लौट जाता है।
दाता सम्पूर्ण धनराशि देकर अपनी उदारता प्रकट करते हैं और याचक आवश्यकता से अधिक एक कौड़ी भी ग्रहण न करके उत्तम याचक का आदर्श उपस्थित करते हैं। इस प्रकार दोनों ही यशस्वी हो जाते हैं।
4. अधोलिखितेषु रिक्तस्थानेषु विशेष्य विशेषणपदानि पाठ्यांशात् चित्वा लिखत
(क) ………………….. अध्वरे।
(ख) ………………….. कोषजातम्।
(ग) …………………… अनुमितव्ययस्य।
(घ) ………………….. फलप्रसूतिः।
(ङ) ………………….. विवर्जिताय।
उत्तरम्
(क) विश्वजिति अध्वरे।
(ख) निःशेष-विश्राणित-कोषजातम्।
(ग) अर्घ्यपात्र-अनुमितव्ययस्य ।
(घ) आरण्यकोपात्त-फलप्रसूतिः।
(ङ) स्मयावेश-विवर्जिताय।
5. विग्रहपूर्वकं समासनाम निर्दिशत
(क) उपात्तविद्यः
(ख) तपोधनः
(ग) वरतन्तुशिष्यः
(घ) महर्षिः
(ङ) विहिताध्वराय
(च) जगदेकनाथः
(छ) नृपतिः
(ज) अनवाप्य
उत्तरम्:
(क) उपात्तविद्यः = उपात्ता प्राप्ता विद्या येन सः। (बहुव्रीहिः समासः)
(ख) तपोधनः = तपः एव धनं यस्य सः। (बहुव्रीहिः समासः)
(ग) वरतन्तुशिष्यः = वरतन्तोः शिष्यः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(घ) महर्षिः = महान् ऋषिः (कर्मधारयः)
(ङ) विहिताध्वराय = विहितम् अध्वरं येन सः, तस्मै। (बहुव्रीहिः समासः)
(छ) नृपतिः = नृणां पतिः। (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ज) अनवाप्य = न अवाप्य।
6. अधोलिखितानां पदानां समुचितं योजनं कुरुत
(अ) –                                   (आ)
(क) ते                            (1) चतुर्दश
(ख) चतस्र: दश च           (2) गुरुदक्षिणार्थी
(ग) अस्खलितोपचाराम्    (3) अहानि
(घ) चैतन्यम्                   (4) स्वस्ति अस्तु
(ङ) कौत्स:                    (5) प्रबोध: प्रकाशो वा
(च) द्वित्राणि                    (6) भक्तिम्
उत्तरम-
(क) ते (4)  स्वस्ति अस्तु
(ख) चतस्र: दश च  (1)चतुर्दश
(ग) अस्खलितोपचारां (6)भक्तिम्
(घ) चैतन्यम्  (5)प्रबोधः प्रकाशो वा
(ङ) कौत्सः (2) गुरुदक्षिणार्थी
(च) द्वित्राणि  (3)अहानि
7. प्रकृतिप्रत्ययविभागः क्रियताम्
(क) अर्थी (ख) मृण्मयम् (ग) शासितुः (घ) अवशिष्टः (ङ) उक्त्वा(च) प्रस्तुतम् (छ) उक्तः (ज) अवाप्य (झ) लब्धम् (ब) अवेक्ष्य।
उत्तरम्:
(क) अर्थी = अर्थ + इनि > इन् (पुंल्लिङ्गम् प्रथमा-एकवचनम्)
(ख) मृण्मयम् = मृत् + मयट् (नपुं०, प्रथमा-एकवचनम्)
(ग) शासितुः = √शास् + तृच् (पुंल्लिङ्गम् षष्ठी-एकवचनम्)
(घ) अवशिष्टः = अव + √शास् + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(ङ) उक्त्वा = √वच् + क्त्वा (अव्ययपदम्)
(च) प्रस्तुतम् = प्र + √स्तु + क्त (नपुं०, प्रथमा-एकवचनम्)
(छ) उक्तः = √वच् + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(ज) अवाप्य = अव + √आप् + ल्यप् (अव्ययपदम्)
(झ) लब्धम् = √लभ् + क्त (नपुं, प्रथमा-एकवचनम्)
(ब) अवेक्ष्य = अव + √ईक्ष् + ल्यप् (अव्ययपदम्)
8. विभक्ति-लिङ्ग-वचनादिनिर्देशपूर्वकं पदपरिचयं कुरुत
(क) जनस्य (ख) द्वौ (ग) तौ (घ) सुमेरोः (ङ) प्रातः (च) सकाशात् (छ) मे (ज) भूयः (झ) वित्तस्य
(ब) गुरुणा
उत्तरम्:


9. अधोलिखितानां क्रियापदानाम् अन्येषु पुरुषवचनेषु रुपाणि लिखत
(क) अग्रहीत् (ख) दिदेश (ग) अभूत् (घ) जगाद (ङ) उत्सहते (च) अर्दति (छ) याचते (ज) अवोचत्।
उत्तरम्:


10.अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि लिखत
(क) नि:शेषम् (ख) असकृत् (ग) उदाराम् (घ) अशुभम् (ङ) समस्तम्
उत्तरम्:
(विलोमपदानि)
(क) नि:शेषम् – शेषम्
(ख) असकृत् – सकृत्
(ग) उदाराम् – अनुदाराम्
(घ) अशुभम् – शुभम्
(ङ) समस्तम् – असमस्तम्
11. अधोलिखितानां पदानां वाक्येषु प्रयोगं कुरुत
(क) नृपः (ख) अर्थी (ग) भासुरम् (घ) वृष्टिः (ङ) वित्तम् (च) वदान्यः (छ) द्विजराजः (ज) गर्वः
(झ) घनः (ब) वार्तम्
उत्तरम्:
(वाक्यप्रयोगाः)
(क) नृपः (राजा)-नृपः रघुः कौत्साय समस्तं धनम् अयच्छत्।
(ख) अर्थी (याचक:)-कौत्सः गुरुदक्षिणार्थम् अर्थस्य अर्थी आसीत्।
(ग) भासुरम् (भास्वरम्)-रघुः भासुरं सुवर्णराशिं कौत्साय अयच्छत् ।
(घ) वृष्टिः (वर्षा)-रघोः कोषगृहे सुवर्णमयी वृष्टिः अभवत्।
(ङ) वित्तमद् (धनम्)-मुनीनां तपः एव वित्तं भवति।।
(च) वदान्यः (दानी)-रघुः याचकेषु उदारः वदान्यः आसीत्।
(छ) द्विजराजः (चन्द्रमाः)-रात्रौ आकाशे द्विजराजः दीव्यति।
(ज) गर्वः (अहंकारः)-गर्वः उचितः न भवति।।
(झ) घनः (मेघ:)-वर्षौ घनः गर्जति वर्षति च।
(ञ) वार्तम् (कुशलताम्)-राजा प्रजायाः वार्तम् इच्छति।
12. अधोलिखितानाम् (श्लोकानाम्) अन्वयं कुरुत
(क) सः मृण्मये वीतहिरण्मयत्वात् …….. आतिथेयः।
(ख) समाप्तविद्येन मया महर्षिः ……………….. पुरस्तात्।
(ग) स त्वं प्रशस्ते महिते मदीये ………………….. त्वदर्थम्।
उत्तरम्:
उपुर्यक्त तीनों श्लोकों का अन्वय पाठ में देखें।
13. अधोलिखितेषु प्रयुक्तानाम् अलङ्काराणां निर्देशं कुरुत
(क) ‘यतस्त्वया ज्ञानमशेषमाप्तं लोकेन चैतन्यमिवोष्णरश्मेः’।
(ख) शरीरमात्रेण नरेन्द्र ! तिष्ठना भासि …………… इवावशिष्टः॥
(ग) तं भूपतिर्भासुरहेमराशिं ………………. वज्रभिन्नम्।
उत्तरम्:
(क) उपमा – अलङ्कारः।
(ख) उपमा – अलङ्कारः ।
(ग) अनुप्रासः, उपमा च अलङ्कारौ।
14. अधोलिखितेषु छन्दः निर्दिश्यताम्
(क) तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं ………….. वरतन्तुशिष्यः॥
(ख) गुर्वर्थमर्थी श्रुतपारदृश्वा …… नवावतारः॥
(ग) स त्वं प्रशस्ते महिते …………. त्वदर्थम्॥
उत्तरम्:
(क) उपजातिः छन्दः
(ख) उपजाति: छन्दः
(ग) उपजातिः छन्दः।
I. समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) रघुवंशस्य रचयिता कः ?
(A) भासः
(B) कालिदासः
(C) माघः
(D) अश्वघोषः
(ii) कौत्सः कस्य शिष्यः आसीत् ?
(A) रघोः
(B) महर्षेः
(C) महर्षिवरतन्तोः
(D) वसिष्ठस्य।
(ii) रघुः कम् अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म ?
(A) विश्वजित्-नामकम्
(B) पुत्रीयेष्टि-नामकम्
(C) पौर्णमास-नामकम्
(D) पाक्षिकम्।
(iv) मन्त्रकृताम् अग्रणीः कः आसीत् ?
(A) रघुः
(B) दिलीपः
(C) रामः
(D) वरतन्तुः
(v) कस्मात् अर्थं निष्क्रष्टुम् रघुः चकमे ?
(A) कृष्णात्
(B) इन्द्रात्
(C) कुबेरात्
(D) शिवात्।
(vi) हिरण्मयीं वृष्टिं के शशंसुः ?
(A) अधिकारिणः
(B) मित्राणि
(C) याचकाः
(D) प्रजाः।
(vii) कौ अभिनन्धसत्वौ अभूताम् ?
(A) गुरुशिष्यौ
(B) वरतन्तुकौत्सौ
(C) रघुकौत्सौ
(D) रघुवरतन्तू।
II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितम् पदं चित्त्वा लिखत
(i) मा भूत् परीवादनवावतारः।
(A) कस्य
(B) कस्मात्
(C) कस्मिन्
(D) कस्याम्।
उत्तरम्:
(A),कस्य
(ii) दिदेश कौत्साय समस्तमेव।
(A) कः
(B) कस्मिन्
(C) कस्मै
(D) कम्।
उत्तराणि:
(C) कस्मै
(ii) कौत्सः वरतन्तोः शिष्यः आसीत्।
(A) कम्
(B) कस्मै
(C) कस्मात्
(D) कस्य।
उत्तराणि:
(D) कस्य
(iv) रघुः विश्वजितम् अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म।
(A) कः
(B) कम्
(C) कस्मै
(D) कस्याः ।
उत्तराणि:
(B) कम्
(v) वरतन्तुः मन्त्रकृताम् अग्रणीः आसीत्।
(A) केषाम्
(B) कस्य
(C) कस्मिन्
(D) कस्याः ।
उत्तराणि:
(A) केषाम्।