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मंगलवार, 13 सितंबर 2022

परोपकाराय सतां विभूतयः

 

 परोपकाराय सतां विभूतयः

            जेसीईआरटी तथा एनसीईआरटी के कक्षा-11 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग-1 के द्वितीय: पाठ: परोपकाराय सतां विभूतयः  का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं।
         संस्कृत साहित्य में जातक कथाओं का अपना विशेष महत्त्व है। ये कथाएँ मूलतः पालि में हैं, जिनकी संख्या 547 है। बोधिसत्त्व के कर्म दिव्य और अद्भुत हैं। उनका जीवन अलौकिक और आदर्श है। इसी से प्रेरणा लेकर आर्यशूर ने जातकमाला ग्रन्थ की रचना की । यह ग्रन्थ गद्य-पद्य मिश्रित संस्कृत में है। प्रस्तुत पाठ इसी ग्रन्थ के पन्द्रहवें जातक ‘मत्स्यजातकम्' का संक्षेप है।
        इसमें बताया गया है कि सत्य तपोबल के आधार पर किस प्रकार मत्स्याधिपति के रूप में बोधिसत्त्व अपने साथी मत्स्यों की प्राण रक्षा करने में समर्थ होते हैं। वस्तुतः सत्त्वगुण से परिपूर्ण आचरण देवताओं को भी वश में कर सकता है।इस पाठ का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://www.sanskritsight.in/2022/09/blog-post_28.html
        बोधिसत्त्वः किल कस्मिंश्चित् नातिमहति कमलकुवलयादि- विभूषितसलिले हंसचक्रवाकादिशोभिते तीरान्ततरुकुसुमावकीर्णे सरसि मत्स्याधिपतिः बभूव । बहुषु जन्मान्तरेषु परोपकाराभ्यासवशात् तत्रस्थः अपि परहितसुखसाधने व्यापृतः अभवत्। इष्टानामिव च स्वेषाम् अपत्यानाम् उपरि सौहार्दत्वाद् महासत्त्वः तेषां मीनानां दानप्रिय- वचनादिक्रमैः परमनुग्रहं चकार ।
 अर्थ-निश्चित रूप से बोधिसत्व किसी छोटे, कमलों, नील कमलों आदि से सुशोभित जल वाले, हंस, चकवा आदि पक्षियों से शोभित, जिसके किनारे के प्रान्तों पर वृक्षों एवं पुष्पों से परिपूर्ण तालाब में मत्स्याधिपति  के रूप में अवतीर्ण हुए बहुत से जन्म-जन्मान्तरों में परोपकार करने के अभ्यासवश, वहाँ, उस जन्म में स्थित होते हुये भी दूसरों की भलाई एवं सुख साधने में वे तल्लीन हुये। अपने इष्ट लोगों की भाँति अपनी सन्तानों के ऊपर सौहार्द भाव के कारण महान् उदार प्राणी के रूप में उन मछलियों पर दान, प्रिय वचन आदि के क्रम में अत्यन्त कृपा की।
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
 किल= निश्चित रूप से
बोधिसत्त्वः=बोधिसत्व 
कस्मिंश्चित्=किसी  
नातिमहति=छोटे,
कमलकुवलयादि-=कमलों,नील कमलों आदि से  
विभूषितसलिले=सुशोभित जल वाले, 
हंसचक्रवाकादिशोभिते=हंस चक्रवाक आदि पक्षियों से सुशोभित,
तीरान्ततरु=किनारे के प्रान्तों पर वृक्षों
कुसुमावकीर्णे= एवं पुष्पों से परिपूर्ण, 
सरसि= तालाब में 
मत्स्याधिपतिः=मछलियों के स्वामी के रूप में 
बभूव=अवतीर्ण हुए। 
बहुषु जन्मान्तरेषु=बहुत से जन्म-जन्मान्तरों में 
परोपकाराभ्यासवशात्=परोपकार करने के अभ्यासवश 
तत्रस्थः अपि=वहाँ,उस जन्म में स्थित होते हुये भी 
परहितसुखसाधने=दूसरों की भलाई एवं सुख साधने में 
व्यापृतः अभवत्=वे तल्लीन हुये।
 इष्टानामिव च=तथा अपने इष्ट लोगों की भाँति  
स्वेषाम्=अपनी 
अपत्यानाम्=सन्तानों के 
उपरि=ऊपर 
सौहार्दत्वाद्=सौहार्द भाव के कारण 
महासत्त्वः =महान् उदार प्राणी के रूप में
तेषां मीनानां=उन मछलियों पर 
दानप्रियवचनादिक्रमैः=दान,प्रिय वचन आदि के क्रम में 
परमनुग्रहं=अत्यन्त कृपा  
चकार=की। 
अथ कदाचित् सत्त्वानां भाग्यवैकल्यात् प्रमादाच्च सम्यग् देवो न ववर्ष। वृष्टेः अभावे तत् सरः कदम्बकुसुमगौरेण नवसलिलेन यथापूर्वं न परिपूर्णम् जातम्। क्रमेण च उपगते निदाघकाले दिनकरकिरणैः अभितप्तया धरण्या, ज्वालानुगतेनेव मारुतेन पिपासावशादिव प्रत्यहम् आपीयमानं तत् सरः लघुपल्वलमिवाभवत्। तत्रस्थिताः मीनाश्च जलाभावात् मृतप्रायाः इव सञ्जाताः।
अर्थ- इसके बाद कभी प्राणियों के भाग्य के अनकल न होने के कारण तथा लापरवाही के कारण देवता ने अच्छी तरह वर्षा नहीं की अर्थात् अच्छी वर्षा नहीं हुई। वर्षा के न होने पर वह तालाब कदम्ब के पुष्यों के समान गौरवर्ण (श्वेत) नये पानी से पहले की तरह परिपूर्ण नहीं हुआ अर्थात् वर्षा के अभाव में तालाब में स्वच्छ नवीन, जल का आगमन नहीं हुआ। इसके बाद क्रमश: गर्मी की ऋतु आने पर सूर्य की तेज किरणों से तपी हुई धरती से, ज्वाला से परिपूर्ण वायु से प्यास के कारण प्रतिदिन चारों ओर से पीया जाता हुआ वह तालाब एक छोटे तालाब (पोखर) के समान हो गया और वहाँ स्थित मछलियाँ जल की कमी के कारण मानो मृतप्राय हो गई। 
शब्दार्थ और वाक्यार्थ- 
अथ कदाचित्=इसके बाद कभी 
सत्त्वानां= प्राणियों के
भाग्यवैकल्यात्=भाग्य के अनुकूल न होने के कारण, 
प्रमादाच्च=तथा लापरवाही के कारण,
 देवो=देवता ने 
सम्यग्=अच्छी तरह
न ववर्ष=नहीं वृष्टि की 
वृष्टेः अभावे=वर्षा के न होने पर  
तत् सरः=वह तालाब
कदम्बकुसुमगौरेण= कदम्ब के पुष्यों के समान गौरवर्ण (श्वेत) 
नवसलिलेन=नये (ताजे) पानी से 
यथापूर्वं=पहले की तरह  
न परिपूर्णम् जातम्=परिपूर्ण नहीं हुआ।
 क्रमेण च=इसके बाद क्रमश: 
 निदाघकाले=ग्रीष्म ऋतु के
उपगते=समीप होने पर 
दिनकरकिरणैः=सूर्य की किरणों से 
अभितप्तया=तपी हुई 
धरण्या=पृथ्वी से, 
ज्वालानुगतेनेव=ज्वाला से परिपूर्ण
मारुतेन=वायु से,  
पिपासावशादिव=प्यास के कारण 
 प्रत्यहम्=प्रतिदिन 
आपीयमानं=चारों ओर से पीया जाता हुआ
 तत् सरः= वह तालाब
लघुपल्वलमिवाभवत्=छोटे तालाब के समान हो गया
जलाभावात्=तथा जल के अभाव से
तत्रस्थिताः मीनाश्च=उसमें स्थित मछलियाँ  
मृतप्रायाः इव=मृतप्राय के समान
सञ्जाताः=हो गयीं। 
 सलिलतीरवासिनः पक्षिणः वायसगणाः च यावत् तान् मत्स्यान् भक्षयितुं चिन्तयन्ति स्म तावद् विषाददैन्यवशगं मीनकुलमवेक्ष्य बोधिसत्त्वः करुणायमानः चिन्तामापेदे । कष्टा व्रत इयम् आपद् आपतिता मीनानाम्।
अर्थ- जल के किनारे पर रहने वाले पक्षी एवं कौए जब तक उन मछलियों को खाने के लिए विचार कर रहे थे, तब तक दुःख एवं दीनता के वशीभूत मछलियों के समूह को देखकर बोधिसत्त्व करुणायुक्त होकर चिन्ता को प्राप्त हो गये अर्थात् अत्यन्त चिन्तित हो गये। (वे विचार करने लगे) हाय! यह आपत्ति जो मछलियों पर आ पड़ी है, वह अत्यन्त कष्टप्रद है।
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
सलिलतीरवासिनः=जल के किनारे पर रहने वाले
 पक्षिणः=पक्षी 
वायसगणाः च=तथा कौओं के समूह
 यावत् तान्=जब तक उन 
मत्स्यान्=मछलियों को  
भक्षयितुं=खाने के लिए 
चिन्तयन्ति स्म=विचार कर रहे थे 
तावद्=तब तक 
विषाददैन्यवशगं=विषाद एवं दीनता के वशीभूत
 मीनकुलमवेक्ष्य=मछलियों के समुह को देखकर
 बोधिसत्त्वः=बोधिसत्त्व 
करुणायमानः=दयाभाव से युक्त होकर 
चिन्तामापेदे=चिन्ता को प्राप्त हो गये
(वे विचार करने लगे हाय!)   
मीनानाम्=जो मछलियों पर
इयम् आपद्=यह आपत्ति
आपतिता=आ पड़ी है,
कष्टा व्रत=अत्यन्त कष्टप्रद है।  
                  अद्यापि च   चिरेणैव लक्ष्यते    जलदागमः ॥ 
                 अपयानक्रमो नास्ति  नेताप्यन्यत्र को   भवेत्।
                 अस्मद्व्यसनसङ्कृष्टाः समायान्ति च नो द्विषः॥
                   प्रत्यहं   क्षीयते    तोयं स्पर्धमानमिवायुषा । 
 अर्थ- प्रतिदिन आयु से स्पर्धा करता हुआ मानो जल (आयु की तरह) क्षीण हो रहा है। (क्रमशः घट रहा है) तथा आज भी बादलों का आगमन दूर ही दिखाई देता है अर्थात् बादलों के आगमन की निकट भविष्य में संभावना नहीं है। बाहर जाने का भी मार्ग नहीं है। दूसरे स्थान पर नेता भी कौन बने? साथ ही हमारे दुःखों से खिंचे हुये हमारे शत्रुगण भी आ रहे हैं। भाव यह है कि इस बड़ी मुसीबत में कोई भी मार्ग दिखाई नहीं दे रहा है।   
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
 प्रत्यहम्=प्रतिदिन 
आयुषा= आयु से
स्पर्धमानम् इव=स्पर्धा करता हुआ 
तोयम्=जल 
क्षीयते=कम हो रहा है।
अद्य अपि च=तथा आज भी  
चिरेण =विलम्ब से 
जलद-आगमः=बादलों का आगमन 
एव लक्ष्यते=ही दिखाई देता है।
अस्मद्व्यसनसकृष्टाः=हमारे दुःखों से खिंचे हुए 
च न द्विषः=शत्रुगण
समायान्ति=आ रहे हैं।  
अपयानक्रमः=बाहर जाने का मार्ग 
न अस्ति=नहीं है। 
अन्यत्र नेता=दूसरे स्थान पर नेता  
अपि कः भवेत्=भी कौन बने?
 तत्किमत्र प्राप्तकालं स्यादिति विमृशन् स महात्मा स्वकीय- सत्यतपोबलमेव तेषां रक्षणोपायम् अमन्यत । करुणया समापीड्यमानहृदयो दीर्घं निःश्वस्य नभः समुल्लोकयन् उवाच -
अर्थ- तो इस विषय में समयोचित क्या हो? इस प्रकार विचार करते हुये उस महात्मा (बोधिसत्व) ने अपनी सत्यता एवं तपस्या के बल को ही उन मछलियों की रक्षा का उपाय माना। करुणा से संवेदनशील हृदय वाले वे लम्बी साँस लेकर आकाश की ओर देखते हुये बोले।  
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
तत्किमत्र=तो इस विषय में 
 प्राप्तकालं=समयोचित
 स्यादिति= क्या हो?
विमृशन् स= इस प्रकार विचार करते हुये उस 
महात्मा=महात्मा (बोधिसत्व) ने   
स्वकीय-=अपनी   
सत्यतपोबलमेव=सत्यता एवं तपस्या के बल को ही  
तेषां रक्षणोपायम्=उन मछलियों की रक्षा का 
अमन्यत=उपाय माना। 
करुणया=करुणा से 
समापीड्यमानहृदयो= संवेदनशील हृदय वाले वे 
दीर्घं निःश्वस्य नभः=लम्बी साँस लेकर आकाश की ओर
समुल्लोकयन्= देखते हुये बोले।  
उवाच -= बोले-
स्मरामि न प्राणिवधं यथाहं सञ्चिन्त्य कृच्छ्रे परमेऽपि कर्तुम् । 
अनेन      सत्येन   सरांसि    तोयैरापूरयन्   वर्षतु देवराजः ॥
अर्थ-जैसे मैं बड़े कष्ट के समय में भी (किसी) प्राणी का वध करने की बात स्मरण नहीं करता अर्थात् मैंने अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में भी आज तक किसी प्राणी का वध नहीं किया। मेरे इस सत्य के सन्दर्भ में सोचकर देवराज इन्द्र तालाबों को पानी से भरने के लिए वर्षा करें। 
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
यथा अहम्= जैसे मैं 
परमे कृच्छ्रे अपि=बड़े कष्ट के समय में भी 
 प्राणिवधम्=(किसी) प्राणी का वध करने की बात
स्मरामि=स्मरण 
कर्तुम् न= नहीं करता। 
 अनेन सत्येन=मेरे इस सत्य के सन्दर्भ में  
 सञ्चिन्त्य=सोचकर 
देवराजः=देवराज इन्द्र  
सरांसि=तालाबों को पानी से भरने के लिए वर्षा करें।
तोयैः=पानी से 
 आपूरयन्=भरने के लिए    
वर्षतु=वर्षा करें।  
अथ तस्य महात्मनः पुण्योपचयात् सत्याधिष्ठानबलात् च समन्ततः तोयपरिपूर्णाः गम्भीरमधुरनिर्घोषा अकाला अपि कालमेघाः विद्युल्लताऽलङ्कृताः प्रादुरभवन् । बोधिसत्त्वः समन्ततोऽभिप्रसृतैः सलिलप्रवाहैरापूर्यमाणे सरसि, धारानिपातसमकालेन विद्रुतवाया पक्षिगणे, लब्धजीविताशे च प्रमुदिते मीनगणे प्रीत्याभिसार्यमाणहृदयो वर्षानिवृत्तिसाशङ्कः पुनः पुनः पर्जन्यमाबभाषे -
 अर्थ-इसके बाद उस महात्मा के पुण्यों की वृद्धि से तथा सत्य पर दृढ़ रहने की शक्ति से चारों ओर जल से परिपूर्ण गंभीर तथा मधुर ध्वनि करने वाले, असमय प्रकट होने वाले होते हुये भी प्रलयकाल के समान बादल बिजली रुपी लता से अलंकृत होकर प्रकट हो गये। बोधिसत्त्व, चारों ओर फैले पानी के प्रवाह से परिपूर्ण तालाब के होने पर, मूसलाधार वर्षा पड़ने के समय के साथ ही कौए आदि पक्षियों के वहाँ से भाग जाने पर तथा जीवन की आशा प्राप्त होने पर, मछलियों के प्रसन्न हो जाने पर, प्रसन्नता से प्रसन्न किये जाते हुये हृदय वाले वर्षा की समाप्ति की आशंका वाले (बोधिसत्त्व) बार-बार बादल से बोले (कहने लगे)।
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
अथ तस्य=इसके बाद उस
 महात्मनः= महात्मा के
पुण्योपचयात्=पुण्यों की वृद्धि से 
सत्याधिष्ठानबलात् च =तथा सत्य पर दृढ़ रहने की शक्ति से 
समन्ततः=चारों ओर
तोयपरिपूर्णाः=जल से परिपूर्ण 
गम्भीरमधुरनिर्घोषा=गंभीर तथा मधुर ध्वनि करने वाले 
अकाला अपि=असमय प्रकट होने वाले होते हुये भी 
कालमेघाः=प्रलयकाल के समान बादल  
विद्युल्लताऽलङ्कृताः=बिजली रुपी लता से अलंकृत 
प्रादुरभवन्=प्रकट हो गये। 
बोधिसत्त्वः= बोधिसत्त्व, 
समन्ततोऽभिप्रसृतैः=चारों ओर फैले
 सलिलप्रवाहैरापूर्यमाणे=पानी के प्रवाह से परिपूर्ण 
सरसि=तालाब के होने पर,
धारानिपातसमकालेन=मूसलाधार वर्षा पड़ने के समय के साथ ही 
विद्रुतवाया पक्षिगणे=कौए आदि पक्षियों के वहाँ से भाग जाने पर 
लब्धजीविताशे च=तथा जीवन की आशा प्राप्त होने पर,
 प्रमुदिते मीनगणे=मछलियों के प्रसन्न हो जाने पर,
 प्रीत्याभिसार्यमाणहृदयो=प्रसन्नता से प्रसन्न किये जाते हुये हृदय वाले 
वर्षानिवृत्तिसाशङ्कः=वर्षा की समाप्ति की आशंका वाले (बोधिसत्त्व) 
पुनः पुनः=बार-बार 
पर्जन्यमाबभाषे =बादल से बोले-                                                                                                                        उद्गर्ज    पर्जन्य    गभीरधीरं     प्रमोदमुद्वासय वायसानाम्। 
रत्नायमानानि पयांसि वर्षन् संसक्तविद्युज्ज्वलितद्युतीनि ॥
अर्थ-हे मेघ ! निरन्तर चमकती हुई बिजली के प्रकाश से युक्त होने के कारण रत्नों के समान दिखाई पड़ने वाले जल की वर्षा करते हुये (तुम) कौओं की प्रसन्नता को समाप्त करो तथा गंभीर धीर आवाज में गर्जना करो। 
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ- 
 पर्जन्य=हे मेघ !  
संसक्त=निरन्तर चमकती हुई 
विद्युत-ज्वलित,=बिजली के प्रकाश से युक्त होने के कारण  
द्युतीनि रत्नायमानानि =रत्नों के समान दिखाई पड़ने वाले
पयांसि वर्षन्,=जल की वर्षा करते हुये (तुम) 
वायसानाम् =कौओं की 
प्रमोदम्=प्रसन्नता को तथा गंभीर धीर आवाज में गर्जना करो।  
उद्वासय = समाप्त करो 
गंभीर धीरं (च) =तथा गंभीर धीर आवाज में
उद्गर्ज=गर्जना करो। 
 तदुपश्रुत्य देवानाम् इन्द्रः शक्रः परमविस्मितमनाः साक्षात् अभिगम्यैनम् अभिसंराधयन् उवाच-
अर्थ-यह (बात) सुनकर देवताओं के अधिपति इन्द्र अत्यन्त आश्चर्यचकित मन वाले साक्षात् बोधिसत्त्व के पास आकर उनकी स्तुति करते हुये कहने लगे।
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
तदुपश्रुत्य= यह (बात) सुनकर
देवानाम्=देवताओं के अधिपति
इन्द्रःशक्रः=इन्द्र 
परमविस्मितमनाः=अत्यन्त आश्चर्यचकित मन वाले 
साक्षात्=साक्षात्    
अभिगम्यैनम्=बोधिसत्त्व के पास आकर 
अभिसंराधयन्=उनकी स्तुति करते हुये 
उवाच=कहने लगे।
आवर्जिता यत्कलशा इवेमे क्षरन्ति रम्यस्तनिताः पयोदाः ॥
अर्थ-हे महापुरुष! मत्स्याधिपति! निश्चय ही यह आपके सत्य का अत्यधिक प्रभाव है कि उंडेले गये घड़ों के समान ये सुन्दर ध्वनि वाले मेघ बरस रहे हैं। 
   इत्येवं प्रियवचनैः संराध्य तत्रैवान्तर्दधे। तच्च सरः तोयसमृद्धिमवाप । तदेवं शीलवताम् इह एव कल्याणा: अभिप्रायाः वृद्धिम् आप्नुवन्ति प्रागेव परत्र च । अतः शीलविशुद्धौ प्रयतितव्यम्।
अर्थ-इस प्रकार प्रिय वचनों से स्तुति करके इन्द्र वहीं पर अन्तर्ध्यान हो गये तथा वह तालाब जल से परिपूर्ण हो गया। तो इस प्रकार चरित्रवान् इस लोक में ही तथा परलोक में भी कल्याणकारी मनोरथों को बढ़ाते रहते हैं। इसलिए शील (चरित्र) की विशुद्धि का प्रयास करना चाहिए। अर्थात् चरित्रवान बनने का सदैव प्रयास करना चाहिए। 
शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
इत्येवं=इस प्रकार 
प्रियवचनैः=प्रिय वचनों से
संराध्य= स्तुति करके इन्द्र   
तत्रैवान्तर्दधे=वहीं पर अन्तर्ध्यान हो गये 
तच्च सरः=तथा वह तालाब 
तोयसमृद्धिमवाप=जल से परिपूर्ण हो गया। 
तदेवं शीलवताम्=तो इस प्रकार चरित्रवान्   
इह एव कल्याणा:=इस लोक में ही तथा परलोक में भी कल्याणकारी
अभिप्रायाः= मनोरथों को  
वृद्धिम्=बढ़ाते 
आप्नुवन्ति=रहते हैं    
प्रागेव परत्र च=पहले तथा बाद में। 
तवैव खल्वेष महानुभाव ! मत्स्येन्द्र ! सत्यातिशयप्रभावः । 
अतः शीलविशुद्धौ=इसलिए शील (चरित्र) की विशुद्धि का 
प्रयतितव्यम्=प्रयास करना चाहिए। 
अन्वय,शब्दार्थ और वाक्यार्थ-
महानुभाव!=हे महापुरुष!
 मत्स्येन्द्र != मत्स्याधिपति!
खलु एषः= निश्चय ही यह 
तव एव= आपके ही 
सत्यातिशय=सत्य का अत्यधिक 
प्रभावः (वर्तते)=प्रभाव है
यत् आवर्जिताः= कि उंडेले गये 
कलशाः इव=घड़ों के समान
इमे रम्यस्तनिताः= ये सुन्दर ध्वनि वाले 
पयोदाः=मेघ 
क्षरन्ति= बरस रहे हैं। 
  अभ्यास
प्रश्न: 1. संस्कृतभाषया उत्तरत - 
(क) जातकमालायाः लेखकः कः? 
उत्तरम्-जातकमालायाः लेखकः आर्यशूरः वर्तते।
(ख) कथायां वर्णिते जन्मनि बोधिसत्त्वः कः बभूव ?
उत्तरम् : कथायां वर्णिते जन्मनि बोधिसत्त्वः मत्स्याधिपतिः बभूव।
(ग) महासत्त्वः मीनानां कैः परमनुग्रहम् अकरोत् ?
उत्तरम् : महासत्त्वः मीनानाम् स्वकीय सत्य तपोबलेन परमनुग्रहम् अकरोत्।
(घ) सरः लघुपल्वलमिव कथमभवत् ?
उत्तरम् : उपगते निदाघकाले दिनकरकिरणैः अभितप्तया धरित्र्या, ज्वालानुगतेनेव मारुतेन पिपासा वशादिव प्रत्यहम् आपीयमानः तद् सरः लघुपल्वलमिवाभवत्। 
(ङ) बोधिसत्त्वः किमर्थं चिन्तामकरोत् ?
उत्तरम् : विषाददैन्यवशगं मीनकुलमवेक्ष्य बोधिसत्त्वः करुणायमानः चिन्तामापेदे।
(च) तोयं प्रतिदिनं केन स्पर्धमानं क्षीयते स्म?
उत्तरम् : तोयं आयुषा स्पर्धमानभिव प्रत्यहं क्षीयते स्म।
(छ) आकाशे अकाला अपि के प्रादुरभवन् ?  
उत्तरम् : आकाशे अकाला अपि कालमेघाः प्रादुर्भवन्।
(ज) कया आशङ्कया बोधिसत्त्वः पुनः पुनः पर्जन्यं प्रार्थितवान्?
उत्तरम् : वर्षानिवृत्ति आशंकया बोधिसत्त्वः पुनः पुनः पर्जन्यं प्रार्थितवान्।
(झ) शक्रः केषां राजा आसीत्?
उत्तरम् : शक्रः देवानाम् राजा आसीत्।
(ञ) अस्माभिः कुत्र प्रयतितव्यम् ?  
उत्तरम् : अस्माभिः शीलविशुद्धौ प्रयतितव्यम्। 
2.रिक्त स्थानानि पूरयत- 
(क) बोधिसत्त्वः परहितसुखसाधने.......अभवत्। 
उत्तरम् :  व्याप्तः
(ख).तत्रस्थिताः मीनाः जलाभावात् .................. इव संजाताः। 
उत्तरम् :मृतप्रायाः 
(ग)विषाददैन्यवशगं मीनकुलमवेक्ष्य बोधिसत्त्वः करुणायमानम् .................... आपेदे। 
उत्तरम् : चिन्ताम्
(घ)स महात्मा स्वकीय सत्यतपोबलमेव तेषां..................अमन्यत।
उत्तरम् : रक्षणोपायम्  
सप्रसङ्ग व्याख्या कार्या- 
(ङ) तत्...............................तोयसमृद्धिमवाप।
उत्तरम् :सरः
3.सप्रसङ्ग व्याख्या कार्याः
 (क)बहुषु जन्मान्तरेषु परोपकार-अभ्यासवशात् तत्रस्थः अपि परहितसुखसाधने व्यापृतः अभवत्। 
उत्तरम् : 
प्रसङ्गः - पंक्तिरियं अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य 'परोपकाराय सतां विभूतयः' इति पाठात् उद्धृतः। मूलतः अयं पाठः आर्यशूर विरचितात् 'जातकमाला' इति कथाग्रन्थात् संकलितः। अत्र लेखकः बोधिसत्त्वस्य परहित दयार्द्रतां वर्णयति 
(यह पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक के 'परोपकाराय सतां विभूतयः' पाठ से ली गई है। मूलतः यह पाठ आर्यशूर विरचित 'जातकमाला' कथाग्रन्थ से संकलित किया गया है। यहाँ लेखक बोधिसत्त्व की परहित दयार्द्रता का वर्णन करता है -
(अनेक पूर्व जन्मों में परहित कार्य अनवरत रूप से सम्पादित करने के कारण अभ्यस्त हुये ये बोधिसत्त्व, उस जन्म में अर्थात् मत्स्याधिपति के जन्म में रहकर परोपकाररत हो गये तथा उनके (मछलियों के) सुख साधन जुटने में संलग्न हो गये।) 
(ख)अस्मद् व्यसनसकृष्टाः समायान्ति नो द्विषः।। 
उत्तरम् : 
प्रसङ्गः - पंक्तिरियं अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य 'परोपकाराय सतां विभूतयः' पाठात् अवतरितः। मूलतोऽयं पाठः आर्यशूर विरचितात् 'जातकमाला' इति कथाग्रन्थात् संकलितः। अस्मिन् वाक्ये बोधिसत्त्वः कथयति यत् मानवः स्वकर्मणां फलं अवश्यमेव भुङ्क्ते। 
(यह पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक के 'परोपकाराय सतां विभूतयः' पाठ से ली गई है। मूल रूप से यह पाठ आर्यशूर विरचित 'जातकमाला' कथाग्रन्थ से संकलित है। इस वाक्य में बोधिसत्व कहता है कि मनुष्य अपने कर्मों के फल अवश्य भोगता है।) 
(हमारे पापकर्मों से ही खींचे हुये हमारे शत्रु इति भीति आदि (दु:ख) सभी ओर से आते हैं। अर्थात् मानव अपने किये हुये कर्मों का फल अवश्य भोगता है।)
 (ग)शीलवताम् इह एव कल्याणा: अभिप्रायाः वृद्धिम् आप्नुवन्ति। 
उत्तरम् : 
प्रसङ्गः - इयं पंक्तिः अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य 'परोपकाराय सतां विभूतयः' पाठात् अवतरिता। अस्यां पंक्तौ बोधिसत्वः मानवेभ्यः उपदिशति 
(यह पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक के 'परोपकाराय सतां विभूतयः' पाठ से ली गई है। इस पंक्ति में बोधिसत्त्व मनुष्यों को उपदेश दे रहे हैं।) 
(जो मनुष्य चरित्रवान् हैं, सदाचारशील हैं, वे इस संसार में ही कल्याणकारी मनोरथों की वृद्धि को प्राप्त करते हैं। भाव यह है कि मानव अपने कर्मों का फल यहीं पर इसी जन्म में तथा इसी लोक में प्राप्त करता है।) 
4.अधोलिखित शब्दानां ल्यबन्तेषु शतृ प्रत्ययान्तेषु शानच प्रत्ययान्तेषु च विभज्य लिखत 
आपीयमानम्, अवेक्ष्य, स्पर्धमानम्, समापीड्यमानम्, नि:श्वस्य, रत्नायमानानि, अभिगम्य, संराधयन्, विमृशन्, समुल्लोकयन्।
उत्तरम् : 
ल्यबन्त -अवेक्ष्य = अव + ईक्ष् + ल्यप् निःश्वस्य 
निः + श्वस् + ल्यप् 
अभिगम्य = अभि + गम् + ल्यप्। 
संराधयन् = सम् + राध् + शतृ 
विमृशन् = वि + मृश् + शतृ 
समुल्लोकयन् = सम् + उत् + लोक् + शतृ 
आपीयमानम् = आ + पा + शानच्। 
स्पर्धमानम् = स्पर्ध + शानच्। 
समापीड्यमानम् = सम् + आङ् + पीड् + शानच्। 
रत्नायमानानि = रत्नाय + शानच्। 
5.विशेषणानि विशेष्यै सह योजयत 
(क) सरसि - इष्टानाम् 
(ख) धरण्या - कदम्बकुसुमभारेण 
(ग) अपत्यानाम् - हंसचक्रवाकादि शोभिते 
(घ) नवसलिलेन - अभितप्तया 
(ङ) पक्षिणः - ज्वालानुगतेन
(च) बोधिसत्त्वः - तत्रस्थाः 
(छ) मीनाः - सलिलतीरवासिनः 
(ज) मारुतेन - करुणायमानः 
उत्तरम् :  
(क) सरसि - हंसचक्रवाकादि शोभिते 
(ख) धरण्या - अभितप्तया 
(ग) अपत्यानाम् - इष्टानाम् 
(घ) नवसलिलेन - कदम्बकुसुमगौरेण 
(ङ) पक्षिणः - सलिलतीरवासिनः 
(च) बोधिसत्त्वः - करुणायमानः 
(छ) मीनाः - तत्रस्थाः 
(ज) मारुतेन - ज्वालानुगतेन 
6.अधोलिखित पदानि संस्कृत वाक्येषु प्रयुध्वम् - 
कस्मिंश्चित्, भाग्यवैकल्यात्, आपीयमानम्, लक्ष्यते, विमृशन्, अभिगम्य, प्रयतितव्यम्। 
उत्तरम् : 
 कस्मिंश्चित् वने एकः सिंहः वसति स्म।
 प्राणिनाम् भाग्यवैकल्यात् देवो न ववर्ष।
 प्रत्यहम् आपीयमानम् तत् सरः शुष्कमभवत्। 
अस्मात् स्थानात् तत् चित्रं न लक्ष्यते। 
अस्मिन् विषये विमृशन् सः सुप्तः। 
देवराजः साक्षात् अभिगम्य बोधिसत्त्वं उवाच। 
अस्माभिः अस्मिन् विषये प्रयतितव्यम्।
प्रश्न: 4. 
शतृ प्रत्ययान्त -
शानच् प्रत्ययान्त -
प्रश्नः 5. 
प्रश्नः 6. 
प्रश्नः 7. पर्यायवाचकं लिखत 
मीनः, पक्षी, प्रत्यहम्, आपद्, पजेन्यः।
उत्तरम् :  
शब्द - पर्याय 
  • मीनः = मत्स्यः, झषः। 
  • पक्षी = खगः, शकुन्तः। 
  • प्रत्यहम् = प्रतिदिनम्। 
  • आपद् = विपद्, विपत्तिः। 
  • पर्जन्यः = मेघः, वारिधरः, वारिदः। 

प्रश्नः 8. 
अधोलिखित वाक्येषु उपमानानि योजयत -
(क) .......... इव मीनानां परमानुग्रहं चकार। 
(ख) ........... इव तोयं प्रत्यहं क्षीयते। 
(ग) ............. इव इमे पयोदाः क्षरन्ति। 
(घ) .......... इव नवसलिलेन सरः प जातम्। 
(ङ) सरः ग्रीष्मकाले ............... इव सञ्जातम्। 
उत्तरम् : 
(क) इष्टानाम् 
(ख) आयुषा 
(ग) आवर्जिताः कलशाः 
(घ) कदम्बकुसुमगौरेण 

(ङ) लघुपल्वलम्।
संस्कृतभाषया उत्तरम् दीयताम् -
प्रश्न: 1. जातककथाः मूलतः कस्यां भाषायां सन्ति? 
उत्तरम् : जातककथा: मूलतः पालिभाषायां सन्ति। 
प्रश्नः 2. 'परोपकाराय सतां विभूतयः पाठः कस्य जातकस्य संक्षेपः वर्तते? 
उत्तरम् :'परोपकाराय सतां विभूतयः पाठः 'मत्स्यजातकस्य' संक्षेपः वर्तते। 

प्रश्न: 3. 
बोधिसत्त्वस्य जीवनं कीदृशं अस्ति? 
उत्तरम् : 
बोधिसत्त्वस्य जीवनं अलौकिकं आदर्शश्चास्ति। 

प्रश्न: 4. 
सत्त्वानां भाग्यवैकल्यात् किं अभवत्? 
उत्तरम् : 
सत्त्वानां भाग्यवैकल्यात् प्रमादाच्च देवो सम्यक् न ववर्ष। 

प्रश्नः 5. 
जलाभावात् तत्रस्थिताः मीनाः कथं संजाता? 
उत्तरम् : 
जलाभावात् तत्रस्थिताः मीनाः मृतप्रायाः इव संजाताः। 

प्रश्नः 6.
सः महात्मा तेषां मीनानां रक्षणोपायं किं अमन्यत? 
उत्तरम् : 
सः महात्मा तेषां मीनानां रक्षणोपायं स्वकीयसत्यतपोबलमेव अमन्यत। 

प्रश्नः 7. 
सत्त्वगुणैः परिपूर्णं आचरणं कान् अपि वशीकर्तुम् शक्यते? 
उत्तरम् : 
सत्त्वगुणैः परिपूर्णं आचरणं देवान् अपि वशीकर्तुं शक्यते। 

प्रश्न: 8. 
बोधिसत्त्वस्य प्रार्थनां श्रुत्वा तत्र को आगतवान्? 
उत्तरम् : 
बोधिसत्त्वस्य प्रार्थनां श्रुत्वा तत्र देवानां इन्द्रः शक्रः आगतवान्। 

प्रश्नः 9. 
प्रियवचनैः संराध्य तत्रैव को अन्तर्दधे? 
उत्तरम् : 
प्रियवचनैः संराध्य तत्रैव इन्द्रः अन्तर्दधे। 

प्रश्न: 10.
केषां इह एव कल्याणा: अभिप्रायाः वृद्धिम् आप्नुवन्ति? 
उत्तरम् : 
शीलवताम् इह एव कल्याणा: अभिप्रायाः वृद्धिम् आप्नुवन्ति। 

प्रश्न: 11. 
विषाद दैन्यवशगं मीनकुलमवेक्ष्य कः चिन्तामापेदे? 
उत्तरम् : 
विषाद दैन्यवशगं मीनकुलमवेक्ष्य बोधिसत्त्वः करुणायमानः चिन्तामापेदे। 

प्रश्न: 12. 
संस्कृतसाहित्ये कासां विशेषमहत्त्वमस्ति? 
उत्तरम् : 
संस्कृतसाहित्ये जातककथानां विशेषमहत्त्वमस्ति। 


ऋतुचित्रणम्

                                                                                                              ऋतुचित्रणम्

          प्रस्तुत पाठ आदिकवि महर्षि वाल्मीकिकृत रामायण के किष्किन्धा, अरण्य तथा सुन्दर काण्डों से संकलित है। रामायण संस्कृत साहित्य का आदि महाकाव्य माना जाता है। इस ग्रन्थ का सांस्कृतिक महत्त्व बहुत अधिक है। इसमें महर्षि वाल्मीकि ने जीवन के आदर्शभूत और शाश्वत मूल्यों का निर्देश किया है। इसमें राजा, प्रजा, पुत्र, माता, पत्नी, पति, सेवक आदि के पारस्परिक संबन्धों का एक आदर्श स्वरूप प्रस्तुत किया गया है। इस महाकाव्य में वाल्मीकि का प्रकृति-चित्रण अत्यन्त मनोरम एवं हृदयाकर्षक है।
       इस पाठ में 1-3 श्लोकों में वसन्त ऋतु का, 4-6 श्लोकों में वर्षा ऋतु का, 7वें एवं 8वें श्लोक में शरद् ऋतु का, नवम में हेमन्त तथा दशम में शिशिर ऋतु का और एकादश में चन्द्रोदय का विशद एवं मनोहारी वर्णन किया गया है।
वाल्मीकिरामायणकिष्किन्धाकाण्डः - 1.10, 9, 13-
1.सुखानिलोऽयं सौमित्रे! कालः प्रचुरमन्मथः ।
 गन्धवान् सुरभिर्मासो जातपुष्पफलद्रुमः ॥1॥ 
अन्वयः - सौमित्रे! सुखानिलः गन्धवान् जातपुष्पफलद्रुमः प्रचुरमन्मथः अयं कालः सुरभिः मासः॥1॥
अर्थ एवं शब्दार्थ-
सौमित्रे!=सुमित्रा के पुत्र हे लक्ष्मण !  
सुखानिलः=सुख देने वाली हवा  
गन्धवान्=सुगन्ध से युक्त  
जातपुष्पफलद्रुमः=उत्पन्न हुये फूलों,फलों तथा वृक्षों वाला,  
प्रचुरमन्मथः=सुन्दरता की अधिकता वाला,  
अयं कालः= यह समय 
सुरभिः=वसन्त ऋतु का  
मासः=मास है। 
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - हे सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण! सुख प्रदान करने वाली हवा को देने वाला, सुगन्ध प्रदान करने वाला, उत्पन्न हुए फूलों, फलों वाले वृक्षों वाला, कामदेव के आधिक्य को व्यक्त करने वाला, यह वसन्त ऋतु का समय है। फलों से परिपूर्ण, कामदेव की अधिकता-ये सभी विशेषण वसन्त ऋतु के द्योतक हैं। 
विशेष - यहाँ वसन्त ऋतु का मनोहारी चित्रण किया गया है। वसन्त ऋतु में सुख देने वाली एवं सुगन्धित वायु बहती है, कामभाव में वृद्धि होती है तथा वृक्षों पर पुष्प एवं फल उत्पन्न होते हैं। सभी जगह सुगन्धित एवं रमणीय वातावरण हो जाता है। 
पुष्पभारसमृद्धानि शिखराणि समन्ततः।
 लताभिः पुष्पिताग्राभिरुपगूढानि सर्वतः ॥2॥ 
अन्वयः - समन्ततः पुष्पभार समृद्धानि सर्वतः पुष्पिताग्राभिः लताभिः उपगूढानि शिखराणि (सन्ति) ॥2॥
अर्थ एवं शब्दार्थ-
समन्ततः=चारों ओर
 पुष्पभार= फलों के भार से 
 समृद्धानि=समृद्ध
 सर्वतः= सब ओर से
पुष्पिताग्राभिः=खिले हुए फूलों वाली
 लताभिः=लताओं से
 उपगूढानि=भरी हुई 
शिखराणि=पहाड़ों की चोटियाँ
 (सन्ति)=(दिखाई दे रही) हैं।  
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - इस वसन्त ऋतु में चारों ओर से फूलों के भार से समृद्ध (परिपूर्ण), सब ओर से खिले हुए फूलों वाली लताओं से भरी हुई पहाड़ों की चोटियाँ दिखाई दे रही हैं। 
विशेष - यहाँ वसन्तकालीन पर्वतों की शोभा का यथार्थ व सुन्दर चित्रण किया गया है। 
3.पतितैः पतमानैश्च पादपस्थैश्च मारुतः । 
कुसुमैः पश्य सौमित्रे! क्रीडन्निव समन्ततः ॥3॥ 
अन्वयः - सौमित्रे! पश्य, समन्ततः पतितैः पतमानैः च पादपस्थै च कुसुमैः क्रीडन् इव मारुतः (अस्ति)॥3॥
अर्थ एवं शब्दार्थ- 
सौमित्रे!=हे लक्ष्मण! 
 पश्य= देखो,
समन्ततः=चारों ओर से 
पतितैः= गिरे हुए 
पतमानैः च=गिरते हुये 
पादपस्थै च=पेड़ों पर स्थित
 कुसुमैः=पुष्पों से 
क्रीडन् इव=मानो खेलता हुआ सा 
मारुतः (अस्ति)=वायु है।
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - हे लक्ष्मण! देखो, (इस वसन्त ऋतु में) चारों ओर से गिरे हुए तथा गिरते हुए एवं पेड़ों पर विद्यमान फूलों से मानो क्रीड़ा करता हुआ पवन विद्यमान है। 
विशेष - यहाँ पम्पासरोवर पर वसन्तकालीन वायु का रमणीय वर्णन किया गया है।
रामायणकिष्किन्धाकाण्ड:- 28.17, 22, 26  
4. क्वचित्प्रकाशं क्वचिदप्रकाशं नभः प्रकीर्णाम्बुधरं विभाति।
 क्वचित्क्वचित्पर्वतसन्निरुद्धं रूपं यथा शान्तमहार्णवस्य ॥4॥
अन्वयः - क्वचित् प्रकाशम् क्वचित् अप्रकाशम् प्रकीर्ण अम्बुधरम् नभः विभाति। क्वचित्-क्वचित् शान्तमहार्णवस्य यथा पर्वतसन्निरुद्धं रूपम् (विभाति)॥4॥
अर्थ एवं शब्दार्थ-
(वर्षा ऋतु में)
क्वचित्=कहीं पर 
प्रकाशम्=उजाला (तथा) 
क्वचित्=कहीं पर 
अप्रकाशम्= अंधेरा 
प्रकीर्ण=फैले हुए हैं। 
अम्बुधरम्=बादल 
नभः=आकाश (को) 
विभाति=शोभा दे रहा है। (तथा)
क्वचित्-क्वचित्=कहीं-कहीं पर 
शान्तमहार्णवस्य=महासमुद्र के 
यथा=जैसा 
पर्वतसन्निरुद्धं=पर्वतों से घिरे हुए 
रूपम्=रूप को 
(विभाति)=धारण किये हुए है। । 
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - (वर्षा ऋतु में) कहीं पर प्रकाश (उजाला) है तो कहीं पर अप्रकाश (अन्धेरा) है। जिसमें सर्वत्र बादल फैले हुए हैं, ऐसा आकाश शोभा दे रहा है। कहीं-कहीं पर शान्त महासागर के समान पर्वतों से घिरे हुए रूप को धारण किये हुए है। भाव यह है कि समुद्र का स्वरूप वर्षा ऋतु में ऐसा हो जाता है, जैसे कि वह पहाड़ों से घिरा हुआ हो। 
5.समुद्वहन्तः सलिलाऽतिभारं बलाकिनो वारिधरा नदन्तः ।
 महत्सु शृङ्गेषु महीधराणां विश्रम्य विश्रम्य पुनः प्रयान्ति ॥5॥
अन्वयः - सलिल अतिभारं सम् उद्वहन्तः बलाकिनः वारिधराः नदन्तः महीधराणाम् महत्सु शृङ्गेषु विश्रम्य विश्रम्य पुनः प्रयान्ति॥5॥ 
अर्थ एवं शब्दार्थ-
 सलिल= जल के
अतिभारं=अत्यधिक भार को 
सम् उद्वहन्तः=धारण करते हुए
बलाकिनः=बगुलों से युक्त
 वारिधराः=बादल 
नदन्तः=गर्जना करते हुए 
महीधराणाम्=पर्वतों की 
महत्सु=बड़ी-बड़ी 
शृङ्गेषु=चोटियों पर 
विश्रम्य=विश्राम करके 
विश्रम्य=कर-करके  
पुनः= पुनः
प्रयान्ति=चल पड़ते हैं।
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - पानी के अत्यधिक भार को वहन करते हुए बगुलों से युक्त बादल, गर्जना करते हुए पर्वतों की बड़ी-बड़ी चोटियों पर विश्राम कर-करके (पुनः) (आकाश की ओर) चल पड़ते हैं। 
विशेष - यहाँ वर्षाकाल में आकाश में उमड़ते हुए बादलों की शोभा का सुन्दर एवं यथार्थ वर्णन किया गया है। 
6.वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति भान्ति ध्यायन्ति नृत्यन्ति समाश्वसन्ति ।
नद्यो घना मत्तगजा वनान्ताः प्रियाविहीनाः शिखिनः प्लवङ्गाः॥6॥ 
अन्वयः - नद्यः वहन्ति, घनाः वर्षन्ति, मत्तगजाः नदन्ति, वनान्ताः भान्ति, प्रियाविहीनाः ध्यायन्ति, शिखिनः नृत्यन्ति, प्लवङ्गाः समाश्वसन्ति ॥ 6॥
अर्थ एवं शब्दार्थ-
(वर्षा ऋतु में)
नद्यः=नदियाँ 
वहन्ति=बहती हैं,
 घनाः=बादल
 वर्षन्ति=वर्षा करते हैं,
 मत्तगजाः=मतवाले हाथी 
नदन्ति=चिंघाड़ते हैं,
वनान्ताः=वन प्रदेश के भाग
भान्ति=शोभित हो रहे हैं,
प्रियाविहीनाः=अपनी प्रियाओं से वियुक्त जन
 ध्यायन्ति=ध्यान करके उन्हें याद करते हैं,
 शिखिनः=मोर
 नृत्यन्ति=नाचते हैं तथा
 प्लवङ्गाः=मेंढक 
समाश्वसन्ति=प्रसन्न होते हैं।  
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - वर्षा ऋतु में नदियाँ बहती हैं। बादल वर्षा करते हैं। मदमस्त हाथी चिंघाड़ते हैं। वन प्रदेश के भाग सुशोभित होते हैं। अपनी प्रियाओं से वियुक्त जन ध्यान करके उन्हें याद करते हैं। मोर नाचते हैं। मेंढक प्रसन्न होते हैं। 
विशेष - यहाँ वर्षाकाल में प्रसन्नचित्त पशु-पक्षी, प्रकृति व मानव-हृदय का दृश्य उपस्थित किया गया है।
7. जलं प्रसन्नं कुसुमप्रहासं क्रौञ्चस्वनं शालिवनं विपक्वम् । 
मृदुश्च वायुर्विमलश्च चन्द्रः शंसन्ति वर्षव्यपनीतकालम् ॥7॥ 
अन्वयः - कुसुमप्रहासम् प्रसन्नम् जलम्, क्रौञ्चस्वनम्, विपक्वम् शालिवनम्, मृदुः वायुः च विमलः चन्द्रः च वर्षव्यपनीतकालं शंसन्ति ॥7॥
अर्थ एवं शब्दार्थ- 
कुसुमप्रहासम्=खिले हुए फूलों से युक्त 
प्रसन्नम्=स्वच्छ 
जलम्= जल, 
क्रौञ्चस्वनम्=क्रौञ्च पक्षी की आवाज,
विपक्वम्=पका हुआ 
शालिवनम्=धान का खेत एवं
मृदुः वायुः च=कोमल पवन तथा
विमलः चन्द्रः च=स्वच्छ चन्द्रमा 
वर्षव्यपनीतकालं=वर्षा ऋतु व्यतीत होने के समय को 
शंसन्ति=बतला रहे हैं।
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - खिले हुए फूलों से युक्त स्वच्छ जल, क्रौञ्च पक्षी की आवाज, पका हुआ धान का खेत, कोमल शीतल पवन एवं स्वच्छ चन्द्रमा-वर्षा ऋतु व्यतीत होने के बाद आने वाली शरद् ऋतु की सूचना दे रहे हैं अर्थात् ये सभी दृश्य शरद् ऋतु के आगमन के सूचक हैं। 
विशेष - यहाँ कवि ने वर्षाकाल के समाप्त होने के बाद शरद् ऋतु के आगमन पर प्रकृति के स्वरूप का सुन्दर एवं यथार्थ चित्रण किया है। 
लोकं सुवृष्ट्या परितोषयित्वा नदीस्तटाकानि च पूरयित्वा । 
निष्पन्नशस्यां वसुधां च कृत्वा त्यक्त्वा नभस्तोयधराः प्रयाताः ॥8॥
अन्वयः - तोयधराः सुवृष्ट्या लोकं परितोषयित्वा, नदीः तटाकानि च पूरयित्वा, वसुधाम् च निष्पन्नशस्याम् कृत्वा, नभः त्यक्त्वा प्रयाताः॥8॥
अर्थ एवं शब्दार्थ-
तोयधराः= बादल 
सुवृष्ट्या=अच्छी वर्षा से 
लोकं=संसार के प्राणियों को 
परितोषयित्वा=सन्तष्ट करके
नदीः=नदियों एवं  
तटाकानि =तालाबों को 
पूरयित्वा=भरकर
वसुधाम् च=पृथ्वी को 
निष्पन्नशस्याम्=खेती-बाड़ी का कार्य सम्पन्न होने वाली  
कृत्वा=बनाकर
नभः=आकाश को 
त्यक्त्वा= छोड़कर 
प्रयाताः=चले गये हैं।
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - बादल अच्छी वर्षा से संसार के प्राणियों को संतुष्ट करके, नदियों एवं तालाबों को भरकर तथा पृथ्वी को खेती-बाड़ी का कार्य सम्पन्न होने वाली बनाकर, आकाश को छोड़कर चले गये हैं। अर्थात् वर्षा ऋतु की समाप्ति हो गई है तथा शरद् का आगमन हो गया है। 
वाल्मीकिरामायणकिष्किन्धाकाण्डः - 30, 53, 57
9. रविसङ्क्रान्तसौभाग्यस्तुषारारुणमण्डलः ।
निःश्वासान्ध इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते ॥9॥
अन्वयः - रविसङ्क्रान्तसौभाग्यः तुषार अरुणमण्डल: निःश्वास-अन्ध: आदर्श इव चन्द्रमा न प्रकाशते॥
अर्थ एवं शब्दार्थ-
रविसङ्क्रान्तसौभाग्यः=सर्य के द्वारा जिसका प्रकाश मलिन कर दिया गया है
 तुषार=तुषार से 
अरुणमण्डल:=जिसका मण्डल अरुण वर्ण का कर दिया गया है(तथा) 
निःश्वास-अन्ध:=श्वास से मलिन किये गये
 आदर्श इव=दर्पण के समान 
चन्द्रमा =चन्द्रमा 
न प्रकाशते=प्रकाशित नहीं हो रहा है। 
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - सूर्य के द्वारा जिसका प्रकाश मलिन कर दिया गया है, तुषार से जिसका मण्डल (घेरा) अरुण वर्ण का कर दिया गया है (इस प्रकार का) तथा श्वास से मलिन किये गये दर्पण के समान चन्द्रमा प्रकाशित नहीं हो रहा है अर्थात् हेमन्त ऋतु में चन्द्रमा की कान्ति फीकी पड़ गई है।
वाल्मीकिरामायणम्, अरण्यकाण्ड: - 16, 9,13,24  
10.वाष्पसञ्छन्नसलिला रुतविज्ञेयसारसाः ।
हिमाईबालुकास्तीरैः सरितो भान्ति साम्प्रतम् ॥10॥
अन्वयः - साम्प्रतम् वाष्पसञ्छन्नसलिला: रुतविज्ञेयसारसाः हिमाद्रबालुकाः सरितः तीरैः भान्ति।
अर्थ एवं शब्दार्थ-
साम्प्रतम्=इस समय (अर्थात् शिशिर ऋतु में)
 वाष्पसञ्छन्नसलिला:=भाप से ढके हुए जल वाली
सारसाः=सारसों की 
रुत=ध्वनि से
विज्ञेय=विशेष रूप से जानने योग्य 
हिमाद्रबालुकाः=बर्फ से शीतल गीली रेत वाली  
सरितः=नदियाँ 
तीरैः=(अपने) किनारों से 
भान्ति=प्रतीत हो रही हैं।
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - इस समय अर्थात् शिशिर ऋतु में भाप से ढके हुए जल वाली, सारसों की आवाज से विशेष रूप से जानने योग्य, बर्फ से शीतल गीली रेत वाली नदियाँ (अपने) किनारों से प्रतीत हो रही हैं।
विशेष - यहाँ नदियों पर शिशिर ऋतु के प्रभाव का सुन्दर एवं स्वाभाविक चित्रण हुआ है। नदियों में जल दिखलाई नहीं देता है, अपितु बर्फ से उठती हुई भाप ही दिखाई देती है।
वाल्मीकिरामायणसुन्दरकाण्ड:-5,4 
11.हंसो यथा राजतपञ्जरस्थः
सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः।
वीरो यथा गर्वितकुञ्जरस्थ-
श्चन्द्रोऽपि बभ्राज तथाम्बरस्थः ॥11॥
अन्वयः - यथा हंसः राजतपञ्जरस्थः, यथा सिंहः मन्दरकन्दरस्थः, यथा वीरः गर्वितकुञ्जरस्थः च, तथा अम्बरस्थ: चन्द्रः अपि बभ्राज॥ 
अर्थ एवं शब्दार्थ-
यथा हंसः=जिस प्रकार हंस
राजतपञ्जरस्थः=चाँदी के पिंजरे में स्थित (होकर शोभित होता है), 
यथा सिंहः=जिस प्रकार सिंह
मन्दरकन्दरस्थः=मन्दराचल की कन्दरा में स्थित (होकर शोभित होता है)
यथा वीरः=जिस प्रकार
 गर्वितकुञ्जरस्थः च=गर्व से युक्त हाथियों में स्थित (होकर शोभित होता है)
 तथा अम्बरस्थ:=उसी प्रकार आकाश में स्थित
 चन्द्रः अपि=चन्द्रमा भी
 बभ्राज=सुशोभित हो रहा था।
हिन्दी अनुवाद/व्याख्या - जिस प्रकार चाँदी के पिंजरे में स्थित हंस शोभित होता है, जिस तरह मन्दर पर्वत की कन्दरा (गुफा) में स्थित शेर शोभित होता है और जिस प्रकार गर्व से परिपूर्ण हाथी की पीठ पर वीर स्थिर होकर शोभित होता है, उसी प्रकार (उदित होता हुआ) चन्द्रमा आकाश के मध्य में शोभित हो रहा था। .
 विशेष - यहाँ शिशिर ऋतु में आकाश में स्थित धवल चन्द्रमा की शोभा का विविध उपमानों से सुन्दर चित्रण किया गया है। 
अभ्यासः
उत्तरम्-
प्रश्न: 1.
संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् - 
(क) अयं पाठः कस्मात् ग्रन्थात् संकलितः? 
उत्तरम्- 
अयं पाठः महर्षिः वाल्मीके: रामायणात् संकलितः।
(ख) वसन्ते समन्ततः गिरिशिखराणि कीदृशानि भवन्ति? 
उत्तरम्-  
वसन्ते समन्ततः गिरिशिखराणि पुष्पभारसमृद्धानि भवन्ति। 
ऋतुचित्रणम्
(ग) मारुतः कीदृशैः कुसुमैः क्रीडन्निव अवलोक्यते? 
उत्तरम्-: 
मारुतः पतितैः पतमानैश्च पादपस्थैश्च कुसुमैः क्रीडन्निव अवलोक्यते। 
(घ) प्रकीर्णाम्बुधरं नभः कथं विभाति? 
उत्तरम्- 
प्रकीर्णाम्बुधरं नभः क्वचित् प्रकाशं क्वचिद प्रकाशं विभाति। 
(ङ) कस्यातिभारं समुद्वहन्तः वारिधराः प्रयान्ति? 
उत्तरम्-
सलिलातिभारं समुद्वहन्तः वारिधराः प्रयान्ति। 
(च) वर्षर्तौ मत्तगजाः किं कुर्वन्ति?
उत्तरम्-
वर्षों मत्तगजाः नदन्ति। 
(छ) शरदृतौ चन्द्रः कीदृशो भवति? 
उत्तरम्-
शरदृतौ चन्द्रः विमल: भवति। 
(ज) कानि पूरयित्वा तोयधराः प्रयाताः? 
उत्तरम्-
नदी: तटाकानि च पूरयित्वा तोयधराः प्रयाताः। 
(झ) अस्मिन् पाठे 'तोयधराः' इत्यस्य के के पर्यायाः प्रयुक्ताः? 
उत्तरम्-
अस्मिन् पाठे 'तोयधराः' इत्यस्य अंबुधराः, वारिधराः, घनाः च एते पर्यायाः प्रयुक्ताः।
(ञ) कीदृशः आदर्शः न प्रकाशते? 
उत्तरम्- 
निःश्वासान्धः आदर्श: न प्रकाशते। 
(ट) शिशिरौ सरितः कैः भान्ति? 
उत्तरम्- 
शिशिरौ सरितः हिमाद्रबालुकास्तीरैः भान्ति। 
प्रश्नः 2. 
रिक्तस्थानानि पुरयत - 
(क) समन्ततः .............. शिखराणि सन्ति। 
उत्तरम्-
समन्ततः पुष्यभारसमृद्धानि शिखराणि सन्ति।
(ख) नभः ......................"विभाति। 
उत्तरम्-
नभः प्रकीर्णाम्बुधरम् विभाति। 
(ग) वारिधराः महीधराणां शृङ्गेषु. प्रयान्ति। 
उत्तरम्- 
वारिधराः महीधराणां शृङ्गेषु विश्रम्य पुनः प्रयान्ति।
(घ) तोयधरा:..........प्रयाताः। 
उत्तरम्- 
तोयधराः नभः त्यक्त्वा प्रयाताः।
(ङ) नि:श्वासान्धः आदर्श इव ....................... 'न प्रकाशते। 
उत्तरम्-
निःश्वासान्धः आदर्श इव चन्द्रमा न प्रकाशते। 
प्रश्न: 3. 
अधोलिखितानां सप्रसङ्ग व्याख्या कार्या - 
(क) मारुतः कुसुमैः पश्य सौमित्रे ! क्रीडन्निव समन्ततः। 
अन्वयः - श्लोकांशोऽयं अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य 'ऋतुचित्रणम्' इति पाठात् उद्धृतः। मूलतः एषः पाठः वाल्मीकि विरचितात् रामायण महाकाव्यात् संकलितोऽस्ति। अस्यां पंक्तौ सीता वियुक्तः श्रीरामः लक्ष्मणं वसन्तऋतोः दृश्यं वर्णयन् कथयति 
व्याख्या - सौमित्रे! = हे सुमित्रानन्दन! पश्य = इत:वीक्ष मारुतः = अयं वायुः, समन्ततः = सर्वतः, कुसुमैः = पुष्पैः सह, क्रीडन् इव = क्रीडति यथा प्रतीयते। इदं दृश्य इत्थं शोभते यत् पवनः पुष्पैः सार्द्ध क्रीडतीव। 
(हे लक्ष्मण! इधर देखो, यह वायु सभी ओर से फूलों के साथ जैसे खेल रही है, ऐसा प्रतीत होता है। यह दृश्य ऐसा सुशोभित हो रहा है कि हवा पुष्पों के साथ मानो खेल खेल रही है।) 
विशेषः - क्रीडन्निव-इत्यत्र उपमाऽलंकारः। 
(ख) निःश्वासान्धः इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते। 
अन्वयः - अयं श्लोकांशः अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य 'ऋतुचित्रणम्' इति पाठात् उद्धृतः। अस्यां पंक्तौ गोदावरी रीति नद्यास्तरे पञ्चवट्यां रामानुजः लक्ष्मणः स्वाग्रज हेमन्त ऋतोः वर्णनं करोति -
व्याख्या - नि:श्वासान्धः दीर्घ निःश्वासेन, अन्धः = मलिनः, आदर्श इव = दर्पणवत्, चन्द्रमा = शशिः, न प्रकाशते = न शोभते। भावोऽयं यत् यथा दीर्घ निःश्वासेन निसतेन वाष्पेण अन्धः मलिनः दर्पणः न शोभते तथैव शशिः अपि सूर्येण आक्रान्तः हिमकणैः च मलिनः न शोभते। 
(दीर्घ निःश्वास से मलीन दर्पण के समान चन्द्रमा सुशोभित नहीं हो रहा है। भाव यह है कि जैसे लम्बी साँस से निकली हुई भाप से अन्धा (मलिन) हुआ दर्पण शोभा नहीं देता, उसी प्रकार सूर्य द्वारा आक्रान्त हुआ तथा हिमकणों से मलिन हुआ चन्द्रमा शोभा नहीं देता।)। 
प्रश्न: 4. 
प्रकृतिं प्रत्ययं च योजयित्वा पदरचनां कुरुत - 
कृ + क्त्वा (त्वा), क्रीड्+शतृ, गन्ध+मतुप्, सम्+नि+रुध् क्त। 
उत्तरम् : 
कृ + क्त्वा = कृत्वा। भोजनं कृत्वा अहं आपणं गमिष्यामि।
 क्रीड् + शतृ = क्रीडन्। क्रीडन् बालकः अपतत्। 
गन्ध + मतुप् = गन्धवान्। गन्धवान् अयं काल: वसन्त मासः वर्तते। 
सम् + नि + रुध् + क्त = सन्निरुद्धम्। 
शान्तमहार्णवस्य इव पर्वत - सन्निरुद्धं रूपं शोभते। 
प्रश्नः 5. 
प्रकृतिप्रत्ययविभागः क्रियताम् - 
त्यक्त्वा, विश्रम्य, समुद्वहन्तः, पतमानः, हिमवान्। 
उत्तरम्-
प्रश्नः 6. 
अधोलिखितान् शब्दान् आश्रित्य वाक्यरचनां कुरुत - 
क्रीडन्, गन्धवान्, विश्रम्य, पूरयित्वा, नभः, नदन्तः, त्यक्त्वा, साम्प्रतम्, शिखिनः, प्रयाति। 
उत्तरम्-
पवनः पुष्पैः क्रीडन् अस्ति। 
गन्धवान् वायुः वाति। 
अत्र विश्रम्य अहं ग्रामं गमिष्यामि।
तव मनोरथं पूरयित्वा सा गता। 
अद्य नभः विमलं वर्तते। 
नदन्तः मेघाः भयं जनयन्ति। 
बालकः स्वजनकं त्यक्त्वा न गमिष्यति। 
साम्प्रतम् अहं अध्ययनं करिष्यामि। 
शिखिनः वर्षाकाले नृत्यन्ति। 
रमा पाठशाला प्रयाति।
प्रश्नः 7. 
सन्धिं/सन्धिविच्छेदं वा कुरुत -
(क) सुख + अनिलः + अयम् = ....................
(ख) प्रकीर्णाम्बुधरम् = .............. + ............
(ग) क्रीडन् + इव = ................
(घ) चन्द्रोऽपि = .................. + .............
(ङ) नि:श्वास + अन्धः = ..............
उत्तरम्- 
(क) सुखानिलोऽयम्। 
(ख) प्रकीर्ण + अम्बुधरम्।
(ग) क्रीडन्निव। 
(घ) चन्द्रः + अपि। 
(ङ) निःश्वासान्धः। 
प्रश्न: 8. 
अधोलिखितानां कर्तृक्रियापदानां समुचितं मेलनं कुरुत - 
(क) प्लवङ्गाः - नदन्ति 
(ख) वनान्ताः - समाश्वसन्ति 
(ग) शिखिनः - भान्ति 
(घ) नद्यः - ध्यायन्ति 
(ङ) मत्तगजाः - वर्षन्ति 
(च) प्रियाविहीनाः - नृत्यन्ति 
(छ) घनाः - वहन्ति। 
उत्तरम्- 
(क) प्लवङ्गाः - समाश्वसन्ति 
(ख) वनान्ताः - भान्ति 
(ग) शिखिनः - नृत्यन्ति 
(घ) नद्यः - वहन्ति 
(ङ) मत्तगजाः - नदन्ति 
(च) प्रियाविहीनाः - ध्यायन्ति 
(छ) घनाः - वर्षन्ति।
प्रश्नः 9.
अधोलिखितयोः श्लोकयोः अन्वयं प्रदर्शयत - 
(क) समुद्वहन्तः सलिलातिभारं .......... प्रयान्ति। 
(ख) हंसो यथा ............ तथाम्बरस्थः। 
उत्तरम्-
(क) उत्तर के लिए पाठ के पाँचवें श्लोक का अन्वय देखिये। 
(ख) उत्तर के लिए पाठ के ग्यारहवें श्लोक का अन्वय देखिये। 
प्रश्नः 10. 
अधोलिखितेषु श्लोकेषु प्रयुक्तालङ्काराणां निर्देशं कुरुत - 
(क) पतितैः पतमानैश्च .......... क्रीडन्निव समन्ततः। 
(ख) वहन्ति वर्षन्ति ............. प्लवङ्गाः। 
(ग) रविसङ्क्रान्तः सौभाग्य: ............... चन्द्रमा न प्रकाशते। 
उत्तरम्-
(क) 'प वर्ण' की आवृत्ति होने से इस श्लोक में अनुप्रास अलंकार है। 'क्रीडन्निव' में उत्प्रेक्षा अलंकार 
(ख) इस श्लोक में अनुप्रास तथा यथासंख्य अलंकार हैं। 
(ग) इस श्लोक में उपमा तथा अनुप्रास अलंकार हैं। 
प्रश्नः 11. 
अधोलिखित श्लोकेषु छन्दो निर्देशः कार्य: - 
(क) क्वचित्प्रकाशम् ......... शान्तमहार्णवस्य। 
(ख) हंसो यथा ................ तथाम्बरस्थः। 
(ग) रविसङ्क्रान्त सौभाग्य: ............... न प्रकाशते। 
उत्तरम्- 
(क) इस श्लोक में 'उपजाति' छन्द है।
(ख) इस श्लोक में 'इन्द्रवज्रा' छन्द है। 
(ग) इस श्लोक में 'अनुष्टुप् छन्द है।
संस्कृतभाषया उत्तरम् दीयताम् -
प्रश्न: 1. 
रामायणस्य रचयिता कः? 
उत्तरम् :
रामायणस्य रचयिता वाल्मीकिः अस्ति। 
प्रश्न: 2. 
संस्कृत साहित्यस्य आदि महाकाव्यं किं मन्यते? 
उत्तरम् : 
संस्कृत साहित्यस्य आदि महाकाव्यं रामायणं मन्यते। 
प्रश्न: 3. 
रामायणे प्रकृतिचित्रणं कीदृशं वर्तते? 
उत्तरम् : 
रामायणे प्रकृतिचित्रणं अतिमनोरम हृदयाकर्षकं चास्ति। 
प्रश्न: 4. 
प्रचुरमन्मथः को मास:? 
उत्तरम् : 
प्रचुरमन्मथः वसन्तमासः अस्ति। 
प्रश्नः 5. 
महीधराणाम् महत्सु शृङ्गेषु विश्रम्य विश्रम्य के प्रयान्ति? 
उत्तरम् :
वारिधराः महीधराणां महत्सु शृङ्गेषु विश्रम्य पुनः प्रयान्ति।
प्रश्नः 6. 
वर्षौ प्रियाविहीनाः किं कुर्वन्ति? 
उत्तरम् : 
वर्षौ प्रियाविहीनाः ध्यायन्ति।
प्रश्नः 7. 
कं परिपोषयित्वा तोयधराः प्रयाता? 
उत्तरम् : 
लोकं सुवृष्ट्या परिपोषयित्वा तोयधराः प्रयाताः। 
प्रश्नः 8. 
चन्द्रोदयस्य मनोहारी वर्णनं कस्मिन् श्लोके कृतम्? 
उत्तरम् :
चन्द्रोदयस्य मनोहारी वर्णनं एकादश श्लोके कृतम्। 
प्रश्न: 9. 
साम्प्रतम् सरितो कथं कैः भान्ति? 
उत्तरम् : 
साम्प्रतम् हिमाबालुकास्तीरैः सरितो भान्ति। 
प्रश्न: 10. 
सिंहो कथं राजते? 
उत्तरम् :
सिंहो मन्दरकन्दरस्य: राजते। 
प्रश्न: 11.
कविषु आदिकविः कः कथ्यते? 
उत्तरम् : 
कविषु आदिकविः वाल्मीकिः कथ्यते। 
प्रश्न: 12. 
वीरो कथं राजते? 
उत्तरम् : 
वीरो गर्वितकुञ्जरस्थः राजते। 
योग्यता विस्तार पर आधारित प्रश्न -
प्रश्नः 1. 
महाकवि कालिदासेन कस्मिन् काव्ये षड् ऋतूनां वर्णनं कृतम्? 
उत्तरम् : 
महाकवि कालिदासेन 'ऋतुसंहार' काव्ये षण्णाम् ऋतूनां वर्णनं कृतम्। 
प्रश्नः 2. 
षण्णाम् ऋतूनां क्रमेण नामानि लिखत? 
उत्तरम् : 
ग्रीष्म-वर्षा-शरद्-हेमन्त-शिशिर-वसन्ताश्च इमे षड् ऋतवः सन्ति। 
प्रश्न: 3. 
कस्मिन् ऋतौ सूर्यः प्रचण्डः जायते? 
उत्तरम् : 
ग्रीष्म ऋतौ सूर्यः प्रचण्डः जायते। 
प्रश्नः 4.
कास्मन् ऋता शालिः परिपक्व भवति? 
उत्तरम् : 
हेमन्त ऋतौ शालिः परिपक्व भवति। 
प्रश्नः 5. 
कस्मिन् ऋतौ सर्वं चारुतरं प्रतीयते? 
उत्तरम् : 
वसन्तौ सर्वं चारुतरं प्रतीयते।

वेदामृतम्

                           वेदामृतम्

       भारतीय वैदिक वाङ्मय संपूर्ण विश्व का प्राचीनतम वाङ्मय होने के साथ मनुष्य की अंतश्चेतना से फूटी उदात्त कविता का भी प्रथम निदर्शन है। वैदिक काव्य में विश्वशान्ति, विश्वबन्धुत्व, लोकतान्त्रिक मूल्य, निर्भयता तथा राष्ट्रप्रेम का सन्देश भरा पड़ा है जो आज के वातावरण में पहले से भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।
        प्रस्तुत पाठ में वैदिक काव्य का अमृततत्व ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद से संकलित किया गया है। इन कविताओं में अत्यन्त उदात्त एवं अनुकरणीय आदर्श विद्यमान है।
सङ्गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो॒ मनांसि जानताम्। 
दे॒वा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।1।। (ऋग्वेदः 10-191-2)                                           अन्वयः-सम् गच्छध्वम्,सम् वदध्वम्, वः मनांसि सम् जानताम्। यथा पूर्वे देवाः सञ्जानानाः भागम् उपासते।
अर्थ एवं शब्दार्थ-
सम् गच्छध्वम्=(हमसब)एक साथ चलें,
सम् वदध्वम्=एक साथ बोलें,
 वः= तुम्हारे 
मनांसि=मन
 सम् जानताम्=समान रूप से अर्थ को समझें
 यथा=जैसे  
 पूर्वे=प्राचीन काल के 
देवाः=देवगण
 सञ्जानानाः= एकमत होकर
भागम्=अपने-अपने हवि के भाग को
 उपासते=ग्रहण करते हैं।
भावार्थ–हे स्तोताओ ! जिसप्रकार प्राचीन काल में देवता लोग एकमत होकर अपने-अपने हवि के भाग को ग्रहण करते रहे हैं।उसीप्रकार हम सब साथ-साथ मिलकर चलों, साथ-साथ मिलकर बोलें अर्थात् हम सब लोगों की वाणी एक जैसी हो, कथनों में परस्पर विरोध न हो तथा तुम्हारे मन समान रूप से वस्तुस्थिति को समझें।  
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः । 
समानमस्तु वो मनो यथा॑ वः सुसहासति॥2॥ (ऋग्वेदः 10-191-4)
अन्वयः- वः आकूतिः समानी, वः हृदयानि समाना, वः मनः समानमस्तु। यथा वः सुसह असति।
अर्थ एवं शब्दार्थ- 
 वः=तुम्हारे 
आकूतिः=संकल्प या वचन
 समानी=समान हों
 वः=तुम्हारे
हृदयानि= हृदय  
समाना=समान हों
 वः=तुम्हारे 
मनः= मन
समानमस्तु=समान हों
यथा= जिससे
वः=तुम्हारे 
सुसह=संगठन 
असति=अच्छा हो सके। 
भावार्थ–हे सुख समृद्धि और उन्नति के इच्छुक मनुष्यों, तुम्हारे संकल्प एक सा होना चाहिए, तुम्हारे हृदय के अन्तर्भाव समान होने चाहिए,तुम्हारा चिन्तन तथा विचार समान होने चाहिए एवं तुम्हारे लक्ष्य समान होने चाहिए।ऐसा करने से तुम्हारे संगठन अच्छा होगा तथा तुम सभी का कल्याण होगा।
मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । 
माध्वीर्नः स॒न्त्वोषधीः॥3॥                          (ऋग्वेद: 1-90-7)
अन्वयः-ऋतायते वाताः मधु (सन्तु), सिन्धवः मधु क्षरन्ति। नः ओषधीः माध्वीः सन्तु।
अर्थ एवं शब्दार्थ-
(अपने लिए यज्ञ की कामना करने वाले) 
ऋतायते=यजमान के लिए 
वाताः=वायु 
मधु (सन्तु)= माधुर्ययुक्त हों,
 सिन्धवः=समुद्र अथवा नदियाँ
 मधु=  (मीठे) जल
क्षरन्ति=बहायें
(तथा)
 नः= हमारी
ओषधीः=औषधियाँ
माध्वीः=मधुरता से भरी हुई 
सन्तु=हों।
भावार्थ–अपने लिए यज्ञ की कामना करने वाले यजमान के लिए सभी हवायें मधुरता से युक्त हो जाएँ। सभी नदियाँ अथवा समुद्र मीठे जल को प्रवाहित करें। हमारी सभी औषधियाँ मधुरता से युक्त हो जाएँ।।मना करोगे ।
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरङ्गमञ्ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शि॒वसङ्कल्पमस्तु ॥4॥  (यजुर्वेद: 34.1)
अन्वयः- जाग्रतः यत् (मनः) दूरम् उदैति। तथा एव सुप्तस्य तदु दैवम् (मनः) इति। (यत्) ज्योतिषाम् दूरम् गमम् एकं ज्योतिः। मे तत् मनः शिवसंकल्पम् अस्तु 
अर्थ एवं शब्दार्थ-
जाग्रतः= जागते हुए (प्राणी) का
यत् (मनः)= जो मन
दूरम्=दूर 
उदैति=भाग जाता है
तथा एव=यत् (मनः)= जो मन
 सुप्तस्य=सोये हुए (प्राणी) की भी 
तदु=वही दशा होती है। 
(परन्तु वही) 
दैवम् (मनः) इति=दिव्य विज्ञान युक्त  (मन)
 (यत्)=जो  
ज्योतिषाम्=विषयों का प्रकाशन करने वाली इन्द्रियों में
 दूरम्=सर्वाधिक दूर तक
 गमम्=पहुँचने वाली 
एकं=एक 
ज्योतिः=ज्योति है,
 मे तत्=मेरा वह
मनः=मन 
शिवसंकल्पम्= कल्याणकारी विचार वाला 
अस्तु= बने। 
भावार्थ–जागते हुए प्राणी का जो मन दूर भाग जाता है, वैसे ही सोये हुए प्राणी की भी वही दशा होती है। परन्तु वही दिव्य विज्ञान युक्त मन जो विषयों का प्रकाशन करने वाली इन्द्रियों में सर्वाधिक दूरी तक पहुँचाने वाला एक ज्योति है, मेरा वह मन कल्याणकारी, शुभ विचार वाला बने।
तच्चक्षुर्देवहितं पु॒रस्ताच्छुक्रमुच्चरत्
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम् ।
शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतम्
अदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च श॒रदः शतात् ॥5॥  (यजुर्वेद 36-24)                                                     अन्वयः- देवहितं शुक्रं तत् चक्षुः पुरस्तात् उच्चरत्। शतम् शरदः पश्येम, शतम् शरदः जीवेम, शतम् शरदः शृणुयाम, शतम् शरदः प्रब्रवाम, शतम् शरदः अदीनाः स्याम, भूयः च शतात् शरदः।
अर्थ एवं शब्दार्थ-
देवहितम् = देवताओं के हितकारक,
 शुक्रम् = दिव्य तथा चमकीला
तत्=उस(परमब्रह्म)का
 चक्षुः = नेत्र रुपी सूर्य
पुरस्तात् = पूर्व दिशा में 
उच्चरत् = उदित हुआ है।
(उस परमब्रह्म को हम लोग)
 शतम् = सौ
 शरदः = वर्ष तक
पश्येम=देखें,
(हम लोग)
शतम्=सौ
 शरदः=  वर्ष तक
जीवेम=जीवें,
 शतम्=सौ 
शरदः= वर्ष तक 
शृणुयाम = सुनें,
शतम्= सौ
शरदः= वर्ष तक
 प्रब्रवाम = बोलें। 
(तथा) 
शतम्=सौ
शरदः= वर्ष तक
अदीनाः = दीनता से रहित
 स्याम = होवें।
 भूयश्च = पुनः, बार-बार।
शतात्= सौ
शरदः= वर्ष के बाद भी
(हम लोग देखें,जीवें,सुनें तथा दीनता से रहित होवें।)
भावार्थ-जो परमब्रह्म देवताओं के हितकारक दिव्य तथा चमकीला,उस परमब्रह्म का नेत्र रुपी सूर्य पूर्व दिशा में  उदित हुआ है। उसी ब्रह्म को हम लोग सौ वर्ष पर्यन्त देखें, जीवें, सुनें, उसी ब्रह्म का उपदेश करें तथा  उनकी कृपा से सौ वर्ष तक दीनता से रहित होवें।. उसी परमेश्वर की आज्ञा पालन व कृपा से सौ वर्षो के उपरान्त भीहम लोग देखें,जीवें,सुनें तथा दीनता से रहित होवें।
जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसम् नाना॑धर्माणं पृथिवी यथौकसम्।
सहस्रं   धारा   द्रविणस्य   मे   दुहां   ध्रुवेव॑ धेनुरनुपस्फुरन्ती ॥6॥(अथर्ववेदः पृथिवीसूक्तम् 12.1.45)  
अन्वयः-बहुधा विवाचसम् यथौकसम् नानाधर्माणं जनम् बिभ्रती पृथिवी ध्रुवा अनुपस्फुरन्ती धेनुः इव मे द्रविणस्य सहस्रम् धाराः दुहाम् ।
अर्थ एवं शब्दार्थ-
बहुधा = प्रायः 
विवाचसम् = विभिन्न भाषा वाले, 
यथौकसम् = धारण करने वाले घर के समान
 नानाधर्माणं = अनेक धर्मों वाले 
जनम् =लोगों को
बिभ्रती = धारण करती हुई 
पृथिवी = पृथ्वी 
अनुपस्फुरन्ती = न काँपती हुई (तथा)
धुवा = निश्चिल
धेनुः इव मे =खड़ी गाय की तरह
द्रविणस्य = (मेरे लिए )धन की
सहस्रम् धाराः =हजारों धाराओं से
दुहाम् =दुहे गये (दूध की तरह है।)
भावार्थ – विभिन्न भाषा वाले तथा धारण करने वाले घर के समान अनेक धर्मों वाले लोगों को धारण करती हुई पृथ्वी न काँपती हुई तथा निश्चल खड़ी गाय की तरह मेरे लिए धन की हजारों धाराओं से दुहे गये दूध की तरह है। जिस प्रकार अचल होकर खड़ी एक धेनु से हजारों धाराओं वाला दूध निकाला जा सकता है,उसी प्रकार यह पृथ्वी भी अपार सम्पदा को धारण करती हुई भी उसी तरह अटल, स्थिर तथा कम्पन रहित होकर खड़ी है। यह हमारी मातृभूमि नाना भाषा-भाषी तथा नाना कर्तव्य करने वाले मनुष्यों को एक घर के समान धारण करती है, वह लात न मारने वाली गाय के समान प्रसन्न होकर मेरे लिये धन की हजारों धाराओं को दुहे।
अभ्यासः
1. संस्कृतभाषया उत्तरत ।
(क) सङ्गच्छध्वम् इति मन्त्रः कस्मात् वेदात् सङ्कलित: ?
(ख) अस्माकम् आकूतिः कीदृशी स्यात् ?
(ग) अत्र मन्त्रे 'यजमानाय' इति शब्दस्य स्थाने कः शब्दः प्रयुक्तः ?
(घ) अस्मभ्यम् इति कस्य शब्दस्य अर्थः ?
(ङ) ज्योतिषां ज्योतिः कः कथ्यते ?
(च) माध्वी: काः सन्तु ?
(छ) पृथिवीसूक्तं कस्मिन् वेदे विद्यते ?
उत्तरम्-(क)ऋग्वेदात्  (ख)समानी (ग)ऋतायते (घ) नः (ङ)दैवम्(मनः) (च)ओषधीः(छ)अथर्ववेदे
2. अधोलिखितक्रियापदैः सह कर्तृपदानि योजयत ।
(क)......................... सञ्जानानाः उपासते ।
(ख)......................... मधु क्षरन्ति ।
(ग) मे...................... शिवसङ्कल्पम् अस्तु।
(घ)...........................शतं शरद: शृणुयाम ।
उत्तरम्-
(क) देवाः
(ख)सिन्धवः
(ग) मनः
(घ)वयं 
3. शुद्धं विलोमपदं योजयत ।
जाग्रतः                                 वः
नः                                       अदीनाः
दीना:                                  सुप्तस्य
उत्तरम्-
जाग्रतः                                सुप्तस्य
नः                                        वः
दीना:                                  अदीनाः
4. अधोलिखितपदानाम् आशयं हिन्दी-भाषया स्पष्टीकुरुत । 
उपासते, सिन्धवः, सवितः, जाग्रतः, पश्येम।
5.(क) वेदे प्रकल्पितस्य समाजस्य आदर्शस्वरूपम् पञ्चवाक्येषु चित्रयत।
उत्तरम् —
वैदिके समाजे सर्वे जनाः परस्परं प्रेम्णा सह जीवन्ति।सर्वे सत्यं वदन्ति धर्मं च आचरन्ति।
समाजे स्त्री-पुरुषयोः समानः आदरः भवति।
सर्वे जनाः परस्परं सहयोगं कुर्वन्ति।लोककल्याणाय च प्रयतन्ते।एवं वैदिकसमाजः शान्तिमयः, समृद्धः, धर्मप्रधानः च भवति।
(ख) मनसः किं वैशिष्ट्यम्?
 मनः अतीव वेगवान् अस्ति।तत् क्षणमात्रेण सर्वत्र गन्तुं समर्थम् अस्ति।मनः चिन्तनस्य संकल्पस्य च कारणम् अस्ति।मनसा एव ज्ञानस्य ग्रहणं भवति।अतः मनसः संयमः मनुष्यस्य जीवने अत्यन्तम् आवश्यकः अस्ति।
6. पश्येम, शृणुयाम, प्रब्रवाम, इति क्रियापदानि केन इन्द्रियेण सम्बद्धानि ?
उत्तरम्—
पश्येम — चक्षुरिन्द्रियेण (नेत्रेण) सम्बद्धम्।
शृणुयाम — श्रोत्रेन्द्रियेण (कर्णेन) सम्बद्धम्।
प्रब्रवाम — वागिन्द्रियेण (मुखेन / जिह्वया) सम्बद्धम्।
7. अधोलिखितवैदिकक्रियापदानां स्थाने लौकिकक्रियापदानि लिखत ।
 असति, उच्चरत्, दुहाम्।
उत्तरम्—
असति — अस्ति
उच्चरत् — उच्चरति
दुहाम् — दुहाव

बुधवार, 8 जुलाई 2020

कथं शब्दानुशासनं कर्तव्यम्

चतुथर्वशः पाठः

कथं शब्दानुशासनं कर्तव्यम्
जेसीईआरटी तथा एनसीईआरटी के कक्षा-12 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग 2 के चतुर्दशः पाठ: कथं शब्दानुशासनं कर्तव्यम्  का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर सीबीएसई सत्र-2022-2023 के लिए यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं।
यह पाठ महर्षि पतञ्जलि विरचित महाभाष्य से उद्धृत है। इसमें शब्दों के अनुशासन का वर्णन किया गया है। इस पाठ में वर्णन किया गया है कि हमें कैसे शब्दों का उपदेश करना चाहिये। अर्थात् केवल शब्दों का उपदेश करना चाहिये, अथवा अपशब्दों का अथवा दोनों का। इसी का समाधान प्रस्तुत पाठ में पौराणिक आख्यानक के माध्यम से किया गया है।
शब्दानुशासनमिदानीं कर्तव्यम्। किं शब्दोपदेशः कर्तव्यः, आहोस्विदपशब्दोपदेशः, आहोस्विदुभयोपदेश इति ? अन्यतरोपदेशेन कृतं स्यात्। तद्यथा-भक्ष्यनियमेनाभक्ष्यप्रतिषेधो गम्यते । 'पश्च पश्चनखा भक्ष्याः' इत्युक्ते गम्यत एतत्- अतोऽन्येऽभक्ष्या इति ॥
अभक्ष्यप्रतिषेधेन च भक्ष्यनियमः। तद्यथा- 'अभक्ष्यो ग्राम्यकुक्कुट अभक्ष्यो प्राम्यसूकर: ' इत्युक्ते गम्यत एतत्-आरण्यो भक्ष्य इति ।। एवमिहापि।
यदि तावच्छब्दोपदेशः क्रियते, गौरित्येतस्मिन्नुपविष्टे गम्यत एतत् गाव्यादयोऽपशब्दा इति। अथाप्यपशब्दोपदेशः क्रियेत, एतत् गौरित्येष शब्द इति ॥
किं पुनरत्र ज्यायः ?
लघुत्वाच्छबदोपदेशः । लघीयाच्छब्दोपदेशः। 
गरीयानपशब्दोपदेशः। एकैकस्य शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशाः । तद्यथा-गौरित्यस्य शब्दस्य गावी गोणी गोता गोपोतलिका-इत्येवमादयोऽपभ्रंशाः ।
इष्टान्वाख्यानं खल्वपि भवति ॥ अथैतस्मिन्शब्दोपदेशे सति किं शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः कर्तव्यः- गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मण इत्येवमादयः शब्दाः पठितव्या?
नेत्याह। अनभ्युपाय एष शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः। एवं हि श्रूयते-“बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दानां शब्दपारायणं प्रोवाच नान्तं जगाम "॥ बृहस्पतिश्च प्रवक्ता, इन्द्रश्चाध्येता, दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकाल:, न चान्तं जगाम । किं पुनरद्यत्वे? यः सर्वथा चिरं जीवति वर्षशतं जीवति ।
चतुर्भिश्च प्रकारैर्विद्योपयुक्ता भवति-आगमकालेन, स्वाध्यायकालेन, प्रवचनकालेन, व्यवहारकालेनेति। तत्र चास्यागमकालेनैवायुः पर्युपयुक्तं स्यात् । तस्मादनभ्युपायः शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः ॥
कथं तमे शब्दाः प्रतिपत्तव्या: ?
किश्चित्सामान्यविशेषवल्लक्षणं प्रवर्त्यम् । येनाल्पेन यत्नेन महतो महतः शब्दौघान् प्रतिपद्येरन् ॥
किं पुनस्तत्?
उत्सर्गापवादौ । कश्चिदुत्सर्गः कर्तव्यः, कश्चिदपवादः ॥ कथञ्जातीयकः पुनरुत्सर्गः कर्तव्यः कथञ्जातीयको ऽपवादः ? | सामान्येनोत्सर्गः कर्तव्यः । तद्यथा-"कर्मण्यण्" । तस्य विशेषेणापवादः । तद्यथा-' -"आतोऽनुपसर्गे कः "
1. संस्कृतभाषायाम् उत्तरत ।
(क) मनुष्यस्य आयुः कति वर्षाणि मन्यते?
(ख) कस्य नियमेन अभक्ष्यप्रतिषेधो गम्यते?
(ग) गाम्यकुक्कुटः मक्ष्यः अमक्ष्यः वा?
(घ) कः ज्यायः अस्ति?
(ङ) कः गरीयान् अस्ति ?
2. रेखाङ्कितपदानि आवृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत |
(क) एकैकस्य शब्दस्य बहव: अपभ्रंशाः सन्ति ।
(ख) शब्दानां प्रतिपत्ती प्रतिपदपाठः कर्तव्यः।
(ग) बृहस्पतिः इन्द्राय प्रतिपदशब्दान् उक्तवान्।
(घ) चतुर्भिश्च प्रकारैर्विद्योपयुक्ता भवति ।
 (ङ) सामान्येन उत्सर्गः कर्तव्यः ।
3 विपरीतार्थैः सह मेलनं कुरुत ।
(क) भक्ष्यम्            -तदानीम्
(ख) लघीयान्         -अनिष्टान् 
 (ग) एकः               -अभक्ष्यम्
(घ) इष्टान् -            -गरीयान्
(ङ) इदानीम्          -बहव:
4. अधोलिखितवाक्यानि पठित्वा शुद्धं वा अशुद्धं समक्षं लिखत ।
(क) अन्यतरोपदेशेन कृतं स्यात् ।
(ख) इष्टान्वाख्यानं खल्वपि भवति । 
(ग) यः सर्वथा चिरं जीवति वर्षशतं न जीवति ।
(घ) चतुर्भिश्च प्रकारैर्विद्योपयुक्ता न भवति ।
(ङ) आगमकालेनैवायुः कृत्स्नं पर्युपयुक्तं स्यात् ।
5. शब्दानाम् अर्थ लिखित्वा वाक्येषु प्रयोगं कुरुत ।
(क) शब्दानुशासनम्
(ख) भक्ष्यम्
(ग) इदानीम्
(घ) चिरम्
(ङ) प्रवक्ता
(क) इदानी-
(च) कृत्स्नम्
6. रिक्तस्थानानि पूरयत ।
प्रतिपदपाठः कर्तव्यः, शब्दोपदेशाः, अपभ्रंशाः, अपशब्दोपदेशाः, अभक्ष्यप्रतिषेधः, शब्दानुशासनम्
(क)इदानीं-------------------कर्त्तव्यम्।

(ख) भक्ष्यनियमेन--------------------गम्यते ।

(ग) गरीयान्--------------------------।

(घ) एकैकशब्दस्य बहवः----------------भवन्ति।

(ङ) लघुत्वात्----------------------।

(च) शब्दोपदेशे सति शब्दानां प्रतिपत्तौ----------------------।



मंगलवार, 7 जुलाई 2020

योगस्य वैशिष्ट्यम्

योगस्य वैशिष्ट्यम्

 जेसीईआरटी तथा एनसीईआरटी के कक्षा-12 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग 2 के त्रयोदशः पाठ: योगस्य वैशिष्ट्यम्  का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर सीबीएसई सत्र-2022-2023 के लिए यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं।
परिचित योगसूत्र पर आधारित है। जिसमें योगाभ्यास के माध्यम से जीवन को संयमित बनाने के लिए शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक रूप से विशिष्ट उपायों का उल्लेख किया गया है तथा योग के विभिन्न स्वरूपों का लक्षण वर्णन किया गया है। प्रस्तुत पाठ का संवाद के माध्यम से रोचक रूप में विवेचन किया गया है। पाठ में निहित विषयवस्तु छात्रों के बहुमुखी विकास के लिए अत्यंत उपयोगी है।
(कक्षायाः दृश्यम् अद्य कक्षा विशेषरूपेण सुसज्जिता अस्ति। भित्तिषु योगविषयस्य विविध चित्राणि जितानि सन्ति।)
स्वप्निल:-बलराम!अद्य कक्षायां कोऽपि विशिष्ट कार्यक्रमः ?
बलराम:- अरे मित्रा त्वं न जानासि ? इदानीं तु योगशिक्षायाः कालांश: ।
मोहिनी:- एषः तु नूतन विषयः किं प्रतिदिनम् ईदृशी कक्षा प्रचलिष्यति ?
बलराम:-आम्, अधुना तु अस्माकं कृते योगशिक्षा अतीव उपयोगिनी अस्ति।
सागरिका:-अहो सुखदमाश्चर्यम् । अहमपि गृहे मातुः मुखाद् योगशिक्षायाः विषये
श्रुतवती तथा उक्तम्- 'योग: स्वास्थ्यकरः।'
सागर:-कि विद्याध्ययनेऽपि अस्योपयोगः वर्तते ?
मोहिनी:-आम्,अस्मिन् विषये योगशिक्षकः, विशेषरूपेण वदिष्यति।
(योगशिक्षक कक्षायां प्रविशति ) 
छात्रा:-नमो नमः आचार्य। स्वागतम् अत्र भवतां कक्षायाम्।
योगाचार्य:-छात्राः भवन्तः सम्प्रति समुत्सुकाः दृश्यन्ते। काऽपि विशिष्टा जिज्ञासा
अस्ति किम्?
सागर:- भो आचार्यः वयं सर्वे योगस्य उपयोगितायाः विषये सम्यग्रूपेण ज्ञातुम्
उत्सुकाः स्मः।
योगाचार्य:-प्रियच्छात्राः किं भवन्तः जानन्ति यत् योगशास्त्रे शरीरस्य मनसः च नियमन प्रतिपादितं वर्तते। अस्य ज्ञानेन अभ्यासेन च भवन्तः स्वाध्यायेऽपि एकाग्रता वर्धयितुम् सक्षमाः भविष्यन्ति ।
मनीष:-अस्माभिः समाचारपत्रेषु पठितम् यत् विश्वेऽपि योगदिवसः सोत्साहम् मान्यते।
योगाचार्य:-साधूक्तम्। जूनमासस्य एकविंशतितमः दिवसः अन्तराष्ट्रिययोगदिवसरूपेण तु सर्वत्र मान्यते
मोहिनी:-आचार्य ! सम्प्रति वयं योगविषये सविस्तरं ज्ञातुम् इच्छामः । (योगाचार्यः पाठमाध्यमेन योगशिक्षा शिक्षयति)
योगाचार्य:-प्रियच्छात्राः ध्यानेन शृणुत।
                योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः
मोहन:-चित्तवृत्तिनिरोधः । अथ किं तात्पर्यम् अस्य ?
योगाचार्य:-चित्तवृत्तीनां भेदः लक्षणम् चावगच्छन्तु प्रथम, ततः विस्तरेण योधयामि'प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः' इति।
 प्रमाणम् अर्थात् प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि।
विपर्ययः अर्थात् विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतरूपप्रतिष्ठम्।
विकल्पः अर्थात् शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ।
निद्रा-अभावप्रत्ययालम्बनावृत्तिर्निद्रा । 
स्मृति:-अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः ।
(सर्वं श्यामपट्टे योगाचार्यः लिखति अवबोधयति च छात्राः च प्रसन्नमनसा अवगच्छन्ति,स्वपुस्तिकासु चाऽपि लिखन्ति)
सागर:-आचार्य ! अन्यदपि ज्ञातुमुत्सुकाः वयं विस्तरेण। 
योगाचार्य:-अधुना योगाङ्गानां नामानि लक्षणानि चावबोधयामि-
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहार-धारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि '
सागरिका:-कः तात्पर्यः अस्य एतादृशस्य दीर्घवाक्यस्य ? किञ्चिदपि नावगम्यते....
योगाचार्य:-अलं चिन्तया,एकैकं कृत्वा बोधयामि।
यमः-अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः यमाः।
 नियमः-शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ।
आसनम्-स्थिरसुखमासनम्।
प्राणायामः-तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ।
प्रत्याहारः-स्वविषयसम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ।
धारणा-देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।
ध्यानम्- तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।
समाधिः-तदेवार्थमात्रनिर्भास स्वरूपशून्यमिव समाधिः।
एतत्सर्वमपि योगाचार्य श्यामपट्टे लिखित्वा बोधयति छात्राश्च स्वस्वपुस्तिकासु लिखन्ति, अवबुध्यन्ति च। 
स्वप्निल:-आचार्य। योगाङ्गानां नामानि तु अस्माभिः सुष्ठु ज्ञातानि अवबुद्धानि चाऽपि । साम्प्रतं योगाङ्गानां फलमपि ज्ञातुं महती उत्कण्ठा वर्तते ।
योगाचार्यः-आम् आम् तदपि बोधयामि शृण्वन्तु, लिखन्तु, अवबुध्यन्तु च तावत्-
यम:
अहिंसा-अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ।
सत्यम्-सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ।
अस्तेयम्-अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ।
 ब्रह्मचर्यम्-ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः |
अपरिग्रहः-अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः।
बलराम:-अतीव ज्ञानवर्धिका एषा कक्षा पुस्तकालयं गत्वाऽपि एतावत् ज्ञान
प्राप्तुमशक्यमासीत् वादृशम् अद्य अस्यां कक्षायां प्राप्तम्।
नियमः-
शौचम्-शौचास्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः सत्त्वशुद्धिसौमनस्य ऐका ग्रेन्द्रियजयात् आत्मदर्शनयोग्यत्वानि च।
सन्तोष:-सन्तोषादनुत्तमसुखलाभः ।
तपः - कार्येन्द्रियसिद्धिः अशुद्धिाक्षयात्तपः ।
स्वाध्यायः-स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ।
ईश्वरप्रणिधानम् - समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्।
(तदैव घण्टावादनम् भवति)
सर्वे छात्राः-आचार्य! कृपया आसन-प्राणायामेत्यादिकं स्पष्टीकृत्य एव कक्षां समापयतु। अर्धे मा त्यजतु ।
योगाचार्यः-आम् आम् बोधयामि अग्रे अपि।
आसनम्-ततो द्वन्द्वानभिघातः
प्राणायामः- ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्। धारणासु च योग्यता मनसः ।
प्रत्याहारः-ततः परमावश्यतेन्द्रियाणाम्।
धारणा ध्यान-समाधिः- त्रयमेकत्र संयमः । तज्जयात्प्रज्ञालोकः ।
योगाचार्यः-शोभनम्। श्वः प्रायोगिकं व्यवहारं करिष्यामः, येन भवन्तः यमनियमेत्यादीनां प्रत्यक्षमनुभवं विधास्यन्ति।
(एवं कथयित्वा कक्षातः प्रस्थानं करोति आचार्यः। छात्राः अपि हृष्टमनसा परस्परं योगचर्चा कुर्वाणः सन्ति ।) 
1. अधोलिखितप्रश्नानां उत्तराणि संस्कृतेन लिखत
(क) योगः कः कथ्यते ?
(ख) मातुः मुखाद् योगशिक्षायाः विषये का श्रुतवती ?
(ग) छात्राः कस्मिन् विषये ज्ञातुम् उत्सुकाः सन्ति?
(घ) प्रमाणानि कानि ?
(ङ) स्मृतिः का कथ्यते? 
(च) निद्रा का भवति ?
(छ) योगाङ्गानि कानि ?
(ज) अहिंसा का कथ्यते?
(झ) अपरिग्रहः कः भवति ?
(ञ) के नियमाः ?
2. वाक्यांशानाम् आशयं स्पष्टीकुरुत ।
(क) स्थिरसुखमासनम् ।
(ख) देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ।
(ग) ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः।
(घ) सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः। 
(ङ) स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ।
(ब)

'अ' स्तम्भस्य वाक्यांशैः सह 'ब' स्तम्भस्य वाक्यांशान् मेलयत ।

(अ)                                                                                 (ब)

(क) शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यः                                      धारणा
(ख) स्थिरसुखम्                                                             वीर्यलाभः
(ग) देशबन्ध चित्तस्य                                                      सर्वरत्नोपस्थानम्
(घ) अस्तेयप्रतिष्ठायाम्                                                    विकल्पः
(ङ) ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायाम्                                                   ध्यानम्
(च) प्रत्येकतानता                                                            आसनम्
4. रिक्तस्थानानां पूर्ति कुरुत ।
(क) योगशास्त्रे शरीरस्य मनसः.................................प्रतिपादनं वर्तते।
मान्यते।
(ख) अन्ताराष्ट्रिययोगदिवसः जूनमासस्य "प्रणिधानानि नियमाः.........................मान्यते।
(ग) शौचसन्तोषतपः.......................................क्रियाफलाश्रयत्वम्।
(ङ).......................................मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ।
5. अधोलिखितपदानां सन्धिं विच्छेदं वा कुरुत ।
(क) स्वागतम्
(ख) कालांश:
(ग) अति+इव
(घ) विद्याध्ययनेऽपि
(ङ) स+उत्साहम्
(च) सम्यग्रूपेण
(छ) सन्निधिः
6. अधोलिखितपदानां मूलशब्दं विभक्तिं वचनं लिङ्गम् च लिखत ।
(क) अस्माकम्
(ख) मनसः
(ग) चिन्तया
(घ) अङ्गानि
(ङ) तस्मिन्
(च) महती
(छ) प्रतिष्ठायाम्
7. पाठमाधृत्य योगस्य महत्तां स्वशब्देषु वर्णयत ।



सोमवार, 6 जुलाई 2020

किन्तोः कुटिलता

 

 

किन्तोः कुटिलता

   जेसीईआरटी तथा  एनसीईआरटी के कक्षा-12 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग 2 के  द्वादशः पाठ: किन्तोः कुटिलता  का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर सीबीएसई सत्र-2022-2023 के लिए यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं।
यह पाठ देवर्षि श्रीकलानाथ शास्त्री द्वारा सम्पादित पं. श्री भट्ट मथुरानाथ शास्त्री के निबन्धसंग्रह 'प्रबन्ध - पारिजातः' से संकलित किया गया है।
पं. भट्ट मथुरानाथ शास्त्री के पिता पं. भट्ट द्वारकानाथ जयपुर निवासी थे। पं. भट्ट मथुरानाथ का जन्म जयपुर में सन् 1889 ई. में हुआ और निधन भी वहीं 4 जून, 1964 ई. को हुआ। आपकी पूर्वज परम्परा अत्यन्त प्रतिभा सम्पन्न रही। इन्होंने महाराजा संस्कृत कॉलेज से साहित्याचार्य की उपाधि प्राप्त की और वहीं व्याख्याता बन गए। आप जयपुर से प्रकाशित 'संस्कृतरत्नाकर' पत्रिका के सम्पादक रहे। भट्ट मथुरानाथ शास्त्री प्रणीत संस्कृत की रचनाओं में ‘जयपुरवैभवम्’, ‘गोविन्दवैभवम्', 'संस्कृतगाथासप्तशती' और 'साहित्यवैभवम्' विशेष उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने चालीस कथाएँ और सौ से भी अधिक निबन्ध संस्कृत में लिखे । इनकी ‘सुरभारती', 'सुजन - दुर्जन- सन्दर्भ:' और 'युद्धमुद्धतम्' नामक पद्य रचनाएँ भी उल्लेखनीय हैं। यहाँ संकलित पाठ में श्री भट्ट जी ने दिखाया है कि जब कभी किसी कथन के साथं 'किन्तु' लग जाता है, तब बहुधा वह पहले कथन के अच्छे भाव को समाप्त कर उसे दोषपूर्ण और सम्बोधित व्यक्ति के लिए दुःख पैदा करने वाला, उसके उत्साह का नाशक और शत्रुरूप बना देता है। ऐसे अवसर विरल होते हैं जहाँ 'किन्तु' सम्बोधित व्यक्ति के लिए सुखदायक सिद्ध होता है।

कुटिलेनामुना 'किन्तु'-ना कियत्कालात् क्लेशितोऽस्मि। यत्र यत्राहं गच्छामि तत्र तत्रैवास्य शत्रुता सम्मुखस्थिता भवति। अस्य 'किन्तोः' कारणात् कस्मिन्नपि कार्ये सफलता दुर्घटास्ति। बहून् वारान् दृष्टवानस्मि यत्कार्यं सर्वथा सज्जं सम्पद्यते, सर्वप्रकारैः सिद्धिहस्तगता भवति, यथैव सफलताया मूर्तिः सम्मुखमागच्छन्ती विलोक्यते तथैव क्रूरोऽयं किन्तुर्मध्ये प्रविश्य सर्वं विनाशयति।                              हिन्दी-अनुवादः-इस कुटिल 'किन्तु' शब्द से मैं कितने ही समय से पीड़ित हूँ। मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ-वहाँ ही इसकी शत्रुता सामने आ खड़ी होती है। इस 'किन्तु' के कारण किसी भी कार्य में सफलता अति-कठिन है। मैंने बहुत बार देखा है कि जो काम पूरी तरह से तैयार होता है, सब प्रकार से सफलता हाथ में आने वाली होती है, जैसे ही सफलता की मूर्ति सामने आती हुई दिखाई पड़ती है, वैसे ही यह क्रूर 'किन्तु' बीच में घुसकर सब नष्ट-भ्रष्ट कर देता है।                                                                                                                                  राज्यतो लब्धाया भूमेरभियोगो बहोः कालान्यायालये चलति स्म। अस्मिन्नभियोगे प्राविवाकमहोदयो निर्णयं श्रावयन् अवोचत् ....'वयं पश्यामो यदभियोक्तुः पक्षादावश्यकानि सर्वाण्येव प्रमाणान्युपस्थितानि सन्ति। राज्यतो लब्धाया भूमेर्दानपत्रमप्युपस्थापितमस्ति। न्यायालयेन परिज्ञातं यत् इयं भूमिरभियोक्तुरधि कारभुक्ताऽस्ति........।'                                                                                                                      हिन्दी-अनुवादः-राज्य से प्राप्त भूमि का अभियोग बहुत समय से न्यायालय में चल रहा था। इस अभियोग में जज महोदय ने निर्णय सुनाते हुए कहा-'हम देखते हैं कि अभियोक्ता के पक्ष की ओर से सभी आवश्यक प्रमाण उपस्थित कर दिए गए हैं। राज्य से प्राप्त भूमि का दानपत्र भी उपस्थित कर दिया गया है। न्यायालय ने अच्छी तरह जान लिया है कि यह भूमि अभियोक्ता के अधिकार वाली है.............।'                                                     अहं निश्चिन्तताया एकं शान्तं निःश्वासममुचम्। मया सर्वथा स्थिरीकृतं यद्भाग्य-लक्ष्मीरनुपदमेव मे कन्धरायां विजयमाल्यं प्रददातीति। परं प्राड्विवाकमहोदयः पुनरग्रे प्रावोचत्- .... किन्तु राजस्व-विभागस्य प्रधानः किलैकोऽधिकारी एतद्विरोधे एक पत्रं प्रेषितवानस्ति। एतदुपर्यपि लक्ष्यदानमावश्यकं मन्यामहे।' मम सर्वोऽप्युत्साहः पलायाञ्चक्रे। 'किन्तु'-कुन्तो ममान्त:-करणं समन्तात् कृन्तति स्म। निजहृदयमवष्टभ्य न्यायं प्रशंसन् गृहमागमम्।                                                                                                                  हिन्दी-अनुवादः-मैंने निश्चिन्तता से एक शान्त श्वास छोड़ी। मैंने पूरी तरह से निश्चय कर लिया कि भाग्यलक्ष्मी तुरन्त ही मेरे गले में विजयमाला पहनाने वाली है। परन्तु जज महोदय ने फिर आगे कहा-'............किन्तु राजस्व विभाग के एक मुख्य अधिकारी ने इसके विरोध में एक पत्र भेजा है। इस पर भी एक नज़र डालना मैं आवश्यक समझता हूँ।' मेरा सारा उत्साह फुर्र हो गया (गायब हो गया)। किन्तु' रूपी भाला मेरे चित्त को चारों तरफ से काट रहा था। मैं अपने हृदय को सान्त्वना । देकर न्याय की प्रशंसा करते हुए घर वापस आ गया।                                       दृष्टं मया यदेष 'किन्तुः' दयाधर्मादिष्वपि अनधिकारचेष्टातो न विरतो भवति। प्रातः कालस्यैव कथास्ति.... धर्मव्यवस्थापकमहोदयस्य समीपे एको दीन: करुणक्रन्दनपुरःसरं न्यवेदयत्-"महाराज! नववार्षिकी मे कन्या। जातस्य तस्या विवाहस्य अद्य तृतीयो दिवसः। नाद्यापि चतुर्थीकर्म सम्पन्नं येन विवाहः पूर्णः परिगण्येत। तस्याः पतिः सहसाऽम्रियत। हा हन्त! तस्या अबोधबालिकाया अग्रे किं भावि? अस्तकर्मसंख्यावृद्धौ किं ममोच्चकुलमपि सहायकं भविष्यति? आज्ञापयन्तु श्रीमन्तः किं मया साम्प्रतं कर्तव्यम्।" डतमहोदयो गभीरतममद्रयाऽवोचत...."अवश्यमिदं दयास्थानम। वर्तमानकाले समाजस्य भीषणपरिस्थिते: पर्यालोचन इदमेवोचितं प्रतीयते यत् एवं विधस्थले पुनर्विवाहस्य व्यवस्था दीयेत.... 'किन्तु' वयं मुखेन कथमेतत् कथयितुं शक्नुमः। प्राचीनमर्यादापि तु रक्षितव्या स्यात्।"                                          हिन्दी-अनुवादः-मैंने देखा है कि यह 'किन्तु' दया धर्म आदि में भी अपनी अनधिकार चेष्टा से रुकता नहीं है। प्रात: काल की ही बात है....... धर्मव्यवस्थापक महोदय के पास एक गरीब ने करुणक्रन्दन पूर्वक निवेदन किया-"महाराज! नौ वर्ष की मेरी कन्या है। उसका विवाह हुए तीन दिन बीत गए। आज भी 'चतुर्थी कर्म' पूरा नहीं हुआ, जिससे विवाह पूर्ण गिना जाए। उसका पति अचानक मर गया। हाय! उस अबोध बालिका का अब आगे क्या होगा? 'अस्तकर्म' की संख्या बढ़ाने में क्या मेरा उच्च कुल भी सहायक होगा ? आप आज्ञा कीजिए कि मुझे क्या करना है?" पण्डित महोदय ने गम्भीरतम मुद्रा में कहा-"यह तो अवश्य ही दयनीय स्थिति है। वर्तमान समय में समाज की किन्तोः कुटिलता भीषण परिस्थिति को देखते हुए यही उचित प्रतीत होता है कि ऐसी दशा में पुनर्विवाह की व्यवस्था दे दी जाए (नियम बना दिया जाए)। 'किन्तु हम अपने मुख से यह बात कैसे कह सकते हैं? प्राचीन मर्यादा की रक्षा भी तो की जानी चाहिए।"                                                                                             कुत्रचित् सोऽयं 'किन्तुः' नितान्तमनुतापं जनयति। अनेकवर्षाणां परिश्रमस्य फलस्वरूपं मन्निर्मितमेकं नवीनसंस्कृतपुस्तकमादाय साहित्यमर्मज्ञस्य एकस्य देशनेतुः समीपेऽगच्छम्। 'नेतृ'-महोदयः पुस्तकस्य गुणान् सम्यक् परीक्ष्य प्रसन्नः सन्नवोचत्... "पुस्तकं वास्तव एव अद्भुतं निर्मितमस्ति बहुकालानान्तरं संस्कृते एवंविधा नवीनता दृष्टिगताऽभवत्।... 'किन्तु' मत्सम्मत्यां तदिदं पुस्तकं भवान् संस्कृते न विलिख्य यदि हिन्दीभाषायामलिखिष्यत् तर्हि सम्यगभविष्यत्।"                                                                    हिन्दी-अनुवादः-कहीं पर तो यह 'किन्तु' अत्यधिक दुःख पैदा करता है। अनेक वर्षों के परिश्रम के फलस्वरूप अपने द्वारा रचित एक नवीन संस्कृत पुस्तक लेकर एक साहित्य-मर्मज्ञ देश के नेता के समीप पहँचा। नेता जी ने पुस्तक के गणों की उचित परीक्षा करके प्रसन्न होते हुए कहा-"पुस्तक तो वास्तव में अद्भुत लिखी गई है। बहुत समय के पश्चात् संस्कृत में इस प्रकार की नवीनता देखी गई है।........ किन्तु मेरी सम्मति में आप इस पुस्तक को संस्कृत में न लिखकर यदि हिन्दी भाषा में लिखते तो बहुत अच्छा होता।"                                                      गृहं प्रति निवर्तमानोऽहं किन्तु'-कृताया अस्या मर्मवेधकशिक्षाया उपरि समस्तेऽपि गृहमार्गे कर्णं मर्दयन्नगच्छम्। अनेन 'किन्तु'-ना मह्यं सा शिक्षा दत्तास्ति यद्यहं सत्पुरुषः स्यां तर्हि पुनरस्मिन् मार्गे पदनिक्षेपस्य नामापि न गृह्णीयाम्।                                                                                              हिन्दी-अनुवादः- घर वापस लौटते हुए मैं 'किन्तु' द्वारा दी गई इस मर्मवेधक शिक्षा पर, घर के पूरे रास्ते कान मसलता हुआ चला गया। इस 'किन्तु' ने मुझे वह शिक्षा दी थी कि यदि मैं सत्पुरुष हूँ तो फिर इस रास्ते पर पाँव रखने का नाम भी न लूँ।                                                                                                            कदाचित् कदाचित्त्वयं क्रूरः 'किन्तुः' मुखस्य कवलमप्याच्छिनत्ति। स्वल्प-दिनानामेव वार्तास्ति। आयुर्वेदमार्तण्डस्य श्रीमतः स्वामिमहाभागस्य औषधिं निषेव्य अधुनैवाहं नीरोगोऽभवम्। अस्मिन्नेव समये मित्रगोष्ठ्या निमन्त्रणं प्राप्नवम्। भोजनगोष्ठ्यां समवेतुं ममापीच्छाशक्तौ प्राबल्यस्य प्रवाहः पूर्णमात्रायां प्रवर्द्धमान आसीत्। अहं स्वामिमहोदयमप्राक्षम्... 'किमहं तत्र गन्तुं शक्नोमि।' उत्तरमलभ्यत... ‘तादृशी हानिस्तु नास्ति। 'किन्तु' गरिष्ठवस्तुनो भोजने अवधानमत्यावश्यकम् अधुनापि दौर्बल्यमस्ति।'                     हिन्दी-अनुवादः -कभी-कभी तो यह क्रूर किन्तु मुख के कवल (ग्रास) को भी छीन लेता है। थोड़े ही दिनों की बात है। आयुर्वेद मार्तण्ड श्री स्वामी जी महाराज की औषधि का सेवन करके अब मैं स्वस्थ हो गया हूँ। इसी समय मित्र मण्डली की ओर से निमन्त्रण प्राप्त हुआ। भोजनगोष्ठी (पार्टी) में सम्मिलित होने के लिए मेरी इच्छा शक्ति की प्रबलता का प्रवाह पूरी तरह से बढ़ रहा था। मैंने स्वामी जी महाराज से पूछा-"क्या मैं वहाँ जा सकता हूँ।" उत्तर मिला-"वैसे तो कोई हानि नहीं है, 'किन्तु' गरिष्ठ पदार्थों के सेवन में बड़ी सावधानी की आवश्यकता है, अभी भी कमजोरी है।"                                                                                                                                    उत्साहस्य ज्वाला या पर्वं प्रचण्डतमा आसीत् अर्द्धमात्रायां तु तत्रैव निर्वाणाभवत्। अस्तु येन केनापि प्रकारेण भोजनगोष्ठ्याविशेषाधिवेशनेऽस्मिन् सम्मिलितस्त्वभवमेव। भोजनपीठे अधिकारं कुर्वन्नेवाहमपश्यं यत् सर्वाङ्गपूर्णा एका भोज्य-व्यञ्जनानां प्रदर्शनी सम्मुखे वर्तत इति। धीरगम्भीरक्रमेणाहं भोजनकाण्डस्यारम्भमकरवम्। अहं मोदकस्यैकं ग्रासमगृह्णम्। तस्य स्वादसूत्रेण सन्दानितोऽहं यथैव द्वितीय ग्रासमगृणं तथैव 'स्वामिमहोदयस्य 'किन्तुः' मम कण्ठनलिकामरुधत्। मुखस्य ग्रासो मुख एवाऽभ्राम्यत् अग्रे गन्तुं नाशक्नोत्। 'किन्तोः' भीषण विभीषिका प्रत्येकवस्तुनि गरिष्ठतां सम्पाद्य भोजनं तत्रैव समाप्तमकरोत्।'                                                                                                                       हिन्दी-अनुवादः-उत्साह की जो ज्वाला पहले अत्यधिक प्रचण्ड हो रही थी, आधे ही मिनट में वहीं बुझ गई। भोजन के आसन पर अधिकार जमाते हुए मैंने देखा कि एक सर्वांगपूर्ण भोज्य व्यंजनों की प्रदर्शनी सामने लगी हुई है। धीर-गम्भीर क्रम से मैंने भोजनकाण्ड की शुरुआत कर दी। मैंने लड्डू का एक ग्रास लिया। उसके स्वाद सूत्र से बँधे हुए मैंने जैसे ही दूसरा ग्रास ग्रहण किया तभी स्वामी महोदय की 'किन्तु' से मेरी कण्ठनली ही रुंध गई। मुख का ग्रास मुख में ही घूम गया, आगे जा ही न सका। 'किन्तु' के भीषण भय ने प्रत्येक वस्तु में गरिष्ठता बता कर भोजन वहीं समाप्त कर दिया।"                                                                                                              अहं देशसेवां कर्तुं गृहाद् बहिरभवम्। मया निश्चितमासीत् 'एतावन्ति दिनानि स्वोदरसेवायै क्लिष्टोऽभवम्। इदानीं कियन्तं कालं देशसेवायामपि लक्ष्यं ददामि। यथैवाहं मार्गेऽग्रेसरो भवामि, तथैव मम बाल्याध्यापकमहोदयः सम्मुखोऽभवत्। मास्टरमहोदयेन प्रस्थानहेतौ पृष्टे सति सम्पूर्णसमाचारनिवेदनं ममाऽऽवश्यकमभूत्। अध्यापकमहोदयः प्रावोचत्... "तात, सर्वमिदं सम्यक्। किन्तु स्वगृहाभिमुखमपि किञ्चिद्विलोकनीयं भवेत्। येषां भरणपोषणं भवत्येवायत्तम् तान् किं भवान् निराधारमेव निर्मुच्य स्वैरं गन्तुमर्हेत्।"                                                                                                                              हिन्दी-अनुवादः-मैं देशसेवा करने के लिए घर से बाहर हुआ। मैंने निश्चय किया था कि इतने दिनों तक अपनी पेट-पूजा के लिए कष्ट उठाया है। अब कुछ समय देशसेवा में भी लगाता हूँ। जैसे ही मैं रास्ते में आगे-आगे हुआ, तभी मेरे बचपन के अध्यापक मेरे सामने आ गए। मास्टर महोदय द्वारा प्रस्थान का कारण पूछने पर मेरे लिए सारा समाचार निवेदन करना आवश्यक हो गया था। अध्यापक महोदय ने कहा-"पुत्र, यह सब तो ठीक है। 'किन्तु' अपने घर की तरफ भी थोड़ा ध्यान देना चाहिए। जिनके भरण-पोषण की आपने ज़िम्मेदारी ली है, क्या आप उन्हें बेसहारा छोड़कर अपनी इच्छानुसार जा सकते हो?"                                                                                पुनः किमासीत्।अत्रैव परोपकारविचाराणाम् इतिश्रीरभूत्। किन्तु'-महोदयेन देशसेवायाः सर्वापि विचारपरम्परा परपारे परावर्त्यत गृहाभिमुखं मुखं कुर्वन् तस्मात् स्थानादेव परावर्तिषि।                      हिन्दी-अनुवादः-फिर क्या था, यहीं पर परोपकार के विचार की इतिश्री हो गई। 'किन्तु' जी महाराज ने देशसेवा की सारी विचार परम्परा को परले पार कर (लौटा) दिया। घर की ओर मुँह करते हुए उसी स्थान से वापस लौट गया।  मयानुभूतमस्ति यदयं कुटिलः 'किन्तुः' नानादेशेषु नानारूपाणि सन्धार्य गुप्तं विचरति। यथैव लोकानां कार्यसिद्धेरवसरः समुपतिष्ठते तथैवायं प्रकटीभूय लोकानां कार्याणि यथावस्थितमवरुणद्धि। अहमेतस्य 'किन्तु' कुठारस्य कठोरतया नितान्तमेव तान्तोऽस्मि। अहं वाञ्छामि यदेतस्याक्रमणात् सुरक्षितो भवेयम्। परं नायं मां त्यक्तुमिच्छति। बहवो मार्मिका मामबोधयन् यत् त्वम् एतं सम्मुखमायान्तं दृष्ट्वैव कथं वित्रस्यसि, कुतश्च एनमपसारयितुं प्रयतसे ? किमेनं सर्वथा अहितकारिणमेव निश्चितवानसि ? नेदं सम्यक् । पशुघातकस्य छुरिकापि पाश-पतितस्य गलबन्धनं छित्त्वा समये प्राणरक्षां कुर्वती दृष्टा।' अहमपि सत्यस्यैकान्ततोऽपलापं न करिष्यामि। एतस्य कथनस्य सत्यताया मयापि परिचयः कदाचित् कदाचित् प्राप्तोऽस्ति।                                                                                                                               हिन्दी-अनुवादः- मैंने अनुभव किया कि यह कुटिल 'किन्तु' अनेक स्थानों पर अनेक रूप धारण करके गुप्त रूप से कि है। जैसे ही लोगों की कार्य सिद्धि का अवसर समीप होता है, तभी यह प्रकट होकर लोगों के कार्यों को उसी स्थिति में रोक देता है। मैं इस 'किन्तु' के कुल्हाड़े की कठोरता से बुरी तरह पीड़ित हूँ। मैं चाहता हूँ कि इसके आक्रमण से बच जाऊँ। परन्तु यह मुझे छोड़ना ही नहीं चाहता। बहुत से मर्मज्ञों ने मुझे समझाया कि तुम इसे सामने आता हुआ देखकर ही क्यों डर जाते हो और क्यों इसे दूर करने के लिए यत्नशील रहते हो ? क्यों इसे सर्वथा अहितकर ही मानते हो ? यह ठीक नहीं। पशुघातक की छुरी भी जाल में बँधे हुए के गले का बन्धन काटकर, अवसर आने पर प्राण रक्षा करती हुई देखी गई है। मैं भी सच्चाई को पूरी तरह से नहीं झुठलाऊँगा। इस कथन की सत्यता का परिचय मुझे भी कभी कभी प्राप्त हुआ है।                                                                     'शब्दैः प्रतीयते यद् गृहे चौरः प्रविष्टोऽस्ति' इति सभयमनुलपन्ती गृहिणी रात्रौ मामबोधयत्। अहं निजशौर्य प्रकाशयन् महता वीरदर्पण लगुडमात्रमादाय अन्धकार एव चौरनिग्रहाय प्रचलितोऽभवम्। गृहिणी कर्णसमीप आगत्य शरवदत्... "अन्धकार-ऽस्मिन् यासि त्वमवश्यम्, 'किन्तु दृश्यताम् स शस्त्रं न प्रहरेत्।" पुनः किमासीत्। मम वीरदर्पस्य शौर्यस्य च प्रज्ज्वलितं ज्योतिस्तत्रैव निर्वाणमभूत। चौरनिग्रहः कीदृशः, निजप्राणपरित्राणमेव मे अन्वेषणीयमभवत्। लगुडं प्रक्षिप्य कोष्ठके निलीनोऽभवम्। तत एव च कम्पित-कण्ठेन चीत्कारमकरवम्-"लोकाः ! आगच्छत, चौरः प्रविष्टोऽस्ति।"                                                 हिन्दी-अनुवादः- 'आवाज़ों से प्रतीत होता है कि घर में चोर घुस आया है'-इस प्रकार भयपूर्वक कहती हुई मेरी घरवाली ने रात्री में मुझे जगाया। मैं अपनी शूरवीरता प्रकट करते हुए बड़े घमण्ड से लाठी मात्र लेकर अन्धकार में ही चोर को पकड़ने के लिए चल पड़ा। पत्नी ने कान के पास आकर धीरे से कहा-“अन्धकार में तुम जाना ज़रूर, 'किन्तु' देखना, कहीं वह शस्त्रप्रहार न कर दे।" फिर क्या था। मेरे वीरोचित घमण्ड और शूरता की जली हुई ज्योति वहीं बुझ गई। चोर का पकड़ना कैसा, मैं अपनी प्राणरक्षा ही खोजने लगा। लाठी फेंक कर कोठे (कमरे) में छिप गया। तभी काँपते हुए स्वर से मैं चीखा-"लोगो ! आओ, चोर घुस आया है।"                                                    एकेन अमुना 'किन्तु'-ना चौरस्य चपेटाभ्योऽवमुच्य सौख्यस्य सुरक्षिते प्रकोष्ठकेऽहं प्रवेशितः। अनेन किन्तुना कस्मिन्नपि संकटसमये कदाचित् किञ्चित्कार्यं कामं कृतं स्यात् परं भूयसा तु अस्माद् भयमेव भवति। अस्य हि सार्वदिकः स्वभाव एव यत् वार्ता काममुत्तमास्तु अधमा वा परमयं मध्ये प्रविश्य तस्याः कथाया विच्छेदमवश्यं करिष्यति। एतएव कस्मिन्नपि समये कार्यसाधकत्वेऽपिलोका अस्माद वित्रस्यन्त्येव वैरिणां भा हिताधराऽपि करवालधारा क्रूराकारा प्रखरप्रकारा एव प्रसिद्धा लोकेषु। विगुणः कार्षापणः, कुत्सितश्च पुत्रः संकटे कदाचिदुपयुक्तो भवेत् परन्तु जनसमाजे द्वयोरुपर्येव नासा-भूसड्कोचो जातो जनिष्यते च। इदमेव कारणं यत् यस्यां वार्तायां 'किन्तुः' उत्पद्यते तां वार्ता लोका विगुणां गणयन्ति।               हिन्दी-अनुवादः- इस एक किन्तु ने चोर की चपेटों से छुड़वाकर मुझे सुख के सुरक्षित कोठे (कमरे) में प्रविष्ट करवा दिया। इस किन्तु ने किसी संकट के समय कभी कोई कार्य शायद किया हो, परन्तु अधिकतर तो इससे भय ही होता है। इसका सदा-सदा रहने वाला स्वभाव ही है कि चाहे बात अच्छी हो बुरी परन्तु यह बीच में प्रविष्ट होकर उस बात को अवश्य ही काट देगा। इसीलिए किसी भी समय कार्य सिद्धि में लोग इससे डरते ही हैं। वैरियों का भार उतारने के लिए शायद हितकारक तलवार की धार भी क्रूर आकार तथा तीखे रूप वाली ही संसार में प्रसिद्ध होती है। खोटा सिक्का तथा निन्दित पुत्र संकट में कभी काम भले ही आ जाए, परन्तु जनसमाज में तो दोनों के ऊपर ही नाक-भौंह सिकोड़ी जाती रही है और आगे भी सिकोड़ी जाती रहेगी। यही कारण है कि जिस किसी बात में 'किन्तु' लग लग जाता है, उस बात को लोग खटाई में पड़ी हुई बात ही समझते हैं। 

प्रश्न 1. 
संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् - 
(क) भूमिविषयके अभियोगे 'किन्तु'-ना का बाधा उपस्थापिता ?
(ख) वाक्यमध्ये प्रविश्य सर्वं कार्यं केन विनाश्यते ? 
(ग) लेखकस्य देशसेवायाः विचारस्य कथम् इतिश्रीरभूत् ? 
(घ) नेतृमहोदयः पुस्तकप्रशंसां कुर्वन् 'किन्तु' प्रयोगेन कं परामर्शम् अददात् ? 
(ङ) भोजन-गोष्ठीस्थले कीदृशी प्रदर्शनी समायोजिता आसीत् ? 
(च) भोजनगोष्ठ्यां लेखकस्य कण्ठनलिकां कः अरुधत् ? 
(छ) धर्मव्यवस्थापक: विधवायाः पुनर्विवाहमुचितं मन्यमानोऽपि व्यवस्थां किमर्थं न ददौ ?
(ज) गृहिणी पत्युः कर्णसमीपे आगत्य शनैः किम् अवदत् ? 
(झ) लोकाः किन्तु-युक्तां वार्ता केन कारणेन विगुणां गणयन्ति ? 
(ब) किन्तोः सार्वदिकः प्रभाव: कः ? 
उत्तरम् :
(क) 'राजस्वविभागस्य प्रधानः अधिकारी तद्-विरोधे एकं पत्रं प्रेषितवान्'- इति बाधा किन्तुना उपस्थापिता। 
(ख) वाक्यमध्ये प्रविश्य सर्वं कार्यं किन्तुना विनाश्यते। 
(ग) 'किन्तु किञ्चित् स्वगृहाभिमुखं विलोकनीयम्' इति अध्यापकवचनेन लेखकस्य देशसेवायाः विचारस्य इति श्रीः अभूत्। 
(घ) नेतृमहोदयः परामर्शम् अददात्- "यदि इदं पुस्तकं हिन्दीभाषायाम् अलिखिष्यत् तर्हि सम्यग् अभविष्यत्।" 
(ङ) भोजन-गोष्ठीस्थले भोज्य-व्यञ्जनानां प्रदर्शनी समायोजिता आसीत्। 
(च) लेखकमहोदयस्य कण्ठनलिकां स्वामिमहोदयस्य 'किन्तुः' अरुधत्। 
(छ) यतः धर्मव्यवस्थापक: प्राचीनमर्यादाम् अपि रक्षितुम् इच्छति स्म, अतः सः पुनर्विवाहस्य व्यवस्थां न ददौ। 
(ज) सा अवदत्-“अन्धकारेऽस्मिन् त्वम् अवश्यं यासि, 'किन्तु' दृश्यताम्, स शस्त्रं न प्रहरेत्।" 
(झ) यतः किन्तुयुक्तायाः वार्तायाः सिद्धौ किन्तुना बाधा अवश्यमेव स्थाप्यते, अतः लोकाः किन्तुयुक्तां वार्ता विगुणां गणयन्ति। 
(ञ) एषः किन्तुः सर्वासां वार्तानां मध्ये प्रविश्य वार्तायाः विच्छेदम् अवश्यं करोति इत्येव किन्तोः सार्वदिकः प्रभावः । 

प्रश्न 2. 
उपयुक्तशब्दान् चित्वा रिक्तस्थानानां पूर्तिः विधेया -
(दुर्घटा, अवधानम्, सन्दानितः, स्वामिमहोदयम्, संस्कृते, विवाहस्य, शान्तम्, पलायांचक्रे, कालात्, संकटे) 
(क) अहं................. अप्राक्षं किमहं तत्र गन्तुं शक्नोमि। 
(ख) अस्य 'किन्तोः' कारणात् कस्मिन्नपि कार्ये सफलता............. अस्ति। 
(ग) तस्य स्वादसूत्रेण ...............अहं यथैव द्वितीयं ग्रासमगृहणम्, तथैव 'किन्तुः' मम कण्ठनलिकामरुधत्। 
(घ) गरिष्ठवस्तुनो भोजने.................अत्यावश्यकम्। 
(ङ) विगुणः कार्षापणः कुत्सितश्च पुत्रः.................कदाचिदुपयुक्तो भवेत्। 
(च) राज्यतो लब्धाया भूमेरभियोगो बहोः.................न्यायालये चलति स्म। 
(छ) मम सर्वोऽप्युत्साहः................ ।
(ज) अहं निश्चिन्तताया एकं.................नि:श्वासममुचम्। 
(झ) जातस्य तस्या ................. अद्य तृतीयो दिवसः। 
(ञ) बहुकालानन्तरं................. एवं विधा नवीनता दृष्टिगताऽभवत्। 
उत्तरम् :
(क) अहं स्वामिमहोदयम् अप्राक्षं किमहं तत्र गन्तुं शक्नोमि । 
(ख) अस्य 'किन्तोः' कारणात् कस्मिन्नपि कार्य सफलता दुर्घटा अस्ति। 
(ग) तस्य स्वादसूत्रेण सन्दानितः अहं यथैव द्वितीयं ग्रासमगृह्णम्, तथैव 'किन्तुः' मम कण्ठनलिकामरुधत्। 
(घ) गरिष्ठवस्तुनो भोजने अवधानम् अत्यावश्यकम्।। 
(ङ) विगुणः कार्षापणः कुत्सितश्च पुत्रः संकटे कदाचिदुपयुक्तो भवेत्। 
(च) राज्यतो लब्धाया भूमेरभियोगो बहो: कालात् न्यायालये चलति स्म।
(छ) मम सर्वोऽप्युत्साहः पलायाञ्चक्रे। 
(ज) अहं निश्चिन्तताया एकं शान्तं नि:श्वासममुचम्। 
(झ) जातस्य तस्या विवाहस्य अद्य तृतीयो दिवसः। 
(ञ) बहुकालानन्तरं संस्कृते एवं विधा नवीनता दृष्टिगताऽभवत् । 

प्रश्न 3. 
अधोलिखितैः उचितक्रियापदैः रिक्तस्थानानि पूरयत - 
परिगण्येत, परावर्तिषि, आच्छिनत्ति, मन्यामहे, दीयेत, अलिखिष्यत्। 
(क) प्रधानः एकं पत्रं प्रेषितवानस्ति। एतदुपर्यपि लक्ष्यदानमावश्यकं ...............।
(ख) गृहाभिमुखं मुखं कुर्वन् तस्मात् स्थानादेव ...........। 
(ग) यदि हिन्दीभाषायाम् ............ तर्हि सम्यगभविष्यत्। 
(घ) इदमेवोचितं प्रतीयते यत् एवंविधस्थले पुनर्विवाहस्य व्यवस्था ............. 
(ङ) कदाचित् कदाचित्त्वयं क्रूरः 'किन्तुः' मुखस्य कवलमपि ................... 
(च) नाद्यापि चतुर्थीकर्म सम्पन्नं येन विवाहः पूर्णः .............। 
उत्तरम् :
(क) प्रधानः एकं पत्रं प्रेषितवानस्ति। एतदुपर्यपि लक्ष्यदानमावश्यकं मन्यामहे। 
(ख) गृहाभिमुखं मुखं कुर्वन् तस्मात् स्थानादेव परावर्तिषि। 
(ग) यदि हिन्दीभाषायाम् अलिखिष्यत् तर्हि सम्यगभविष्यत् । 
(घ) इदमेवोचितं प्रतीयते यत् एवंविधस्थले पुनर्विवाहस्य व्यवस्था दीयेत। 
(ङ) कदाचित् कदाचित्त्वयं क्रूरः 'किन्तुः' मुखस्य कवलमपि आच्छिनत्ति। 
(च) नाद्यापि चतुर्थीकर्म सम्पन्नं येन विवाह: पूर्णः परिगण्येत।

प्रश्न 4. 
सन्धिच्छेदं कुरुत - 
उत्तरसहितम् : 
(क) तत्रैवास्य = तत्र + एव + अस्य 
(ख) सर्वाण्येव = सर्वाणि + एव 
(ग) मन्निर्मितमेकम् = मत् + निर्मितम् + एकम् 
(घ) किलैकोऽधिकारी = किल + एकः + अधिकारी 
(ङ) द्वयोरुपर्येव = द्वयोः + उपरि + एव। 

प्रश्न 5.
प्रकृति-प्रत्ययविभागः क्रियताम् - 
उत्तरसहितम् :
(क) निर्मूच्च = निर् + √मुच् + क्त्वा > ल्यप् 
(ख) आदाय = आ + √दा + क्त्वा > ल्यप् 
(ग) प्रविष्टः = प्र + √विश् + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्) 
(घ) आगत्य = आ + √गम् + क्त्वा > ल्यप् 
(ङ) परिज्ञातम् = परि + √ज्ञा + क्त (नपुंसकलिङ्गम् प्रथमा-एकवचनम्) 

प्रश्न 6. 
अधोलिखितेषु पदेषु विभक्तिं वचनं च दर्शयत - 
उत्तरसहितम् :
(क) कार्ये  - कार्य-सप्तमी विभक्तिः, एकवचनम् 
(ख) अभियोक्तुः - अभियोक्त--पञ्चमी/षष्ठी विभक्तिः, एकवचनम्
(ग) बालिकायाः - बालिका–पञ्चमी/षष्ठी विभक्तिः, एकवचनम् 
(घ) न्यायालयेन - न्यायालय - तृतीया विभक्तिः, एकवचनम् 
(ङ) नेतुः - नेतृ-सप्तमी विभक्तिः, एकवचनम् 
(च) शक्तौ - शक्ति - सप्तमी विभक्तिः, एकवचनम् 
(छ) औषधिम् - औषधि - द्वितीया विभक्तिः, एकवचनम् 

प्रश्न 7. 
स्वरचितवाक्येषु अधोलिखितपदानां प्रयोगं कुरुत - 
किन्तु, गन्तुम्, मह्यम्, विभीषिका, भरणपोषणम्, दृष्ट्वा 
उत्तरम् :
(क) किन्तु - अहं धावनप्रतियोगितायां सर्वतो अग्रे आसम्, किन्तु सहसा मम पादस्खलनम् अभवत्। 
(ख) गन्तुम् - अहं विद्यालयं गन्तुम् इच्छामि। 
(ग) मह्यम् - मयं पठनम् अतीव रोचते।
(घ) विभीषिका - परीक्षायाः विभीषिका मनः उद्वेलयति। 
(ङ) भरणपोषणम् - परिवारस्य भरणपोषणं तु सर्वेषां कर्तव्यम् अस्ति। 
(च) दृष्ट्वा - अधः दृष्ट्वा कथं न गच्छसि ? 

प्रश्न 8. 
विलोमशब्दान् लिखत - 
उत्तरसहितम् : विलोमपदम् 
(क) विगुणः - सगुणः 
(ख) शौर्यम् - अशौर्यम् 
(ग) सुरक्षितः - विनष्टः 
(घ) शत्रुता - मित्रता 
(ङ) धीरः - अधीरः
(च) भयम् - निर्भयम् 

बहुविकल्पीयाः प्रश्नाः 

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत - 

(i) भोजनगोष्ठ्यां लेखकस्य कण्ठनलिकां क: अरुधत् ? 
(A) पत्नी 
(B) स्वामिमहोदस्य किन्तुः
(C) मन्त्रिमहोदयस्य किन्तुः 
(D) शिक्षकः। 
उत्तरम् :
(B) स्वामिमहोदस्य किन्तुः

(ii) वाक्यमध्ये प्रविश्य सर्वं कार्य केन विनाश्यते ? 
(A) स्वामिना 
(B) सेवकेन 
(C) अधिकारिणा 
(D) किन्तुना। 
उत्तरम् :
(C) अधिकारिणा 

(iii) गरिष्ठवस्तुनो भोजने किम् अत्यावश्यकम् ? 
(A) मिष्ठान्नम् 
(B) तिक्त-व्यञ्जनम् 
(C) अवधानम् 
(D) क्षीरम्। 
उत्तरम् :
(B) तिक्त-व्यञ्जनम् 

(vi) गृहिणी कस्य कर्णसमीपे आगत्य शनैः अवदत् ? 
(A) पत्युः 
(B) अधिकारिणः 
(C) किन्तोः 
(D) मन्त्रिणः। 
उत्तरम् :
(A) पत्युः 

(v) कस्य कारणात् कस्मिन्नपि कार्ये सफलता दुर्घटा अस्ति ? 
(A) पत्न्याः 
(B) न्युः 
(C) किन्तोः 
(D) स्वामिनः। 
उत्तरम् :
(A) पत्न्याः 

(vi) भूमेः अभियोगः कुत्र चलति स्म ? 
(A) ग्रामपञ्चायते 
(B) न्यायालये 
(C) नगरे 
(D) ग्रामे। 
उत्तरम् :
(D) ग्रामे। 

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत - 

(i) क्रूरः किन्तुः मध्ये प्रविश्य सर्वं विनाशयति। 
(A) कः 
(B) काः 
(C) के 
(D) किम्। 
उत्तरम् :
(D) किम्।

(ii) राजस्वविभागस्य एकः अधिकारी एतद्विरोधे पत्रं प्रेषितवान्। 
(A) काः 
(B) कस्मात् 
(C) कस्य 
(D) कस्मिन्। 
उत्तरम् :
(C) कस्य 

(iii) कन्यायाः पतिः सहसा अम्रियत। 
(A) कस्याः 
(B) कः 
(C) कथम् 
(D) कौ। 
उत्तरम् :
(B) कः 

(iv) मानवाः क्षणमपि परपीडनात् न विरमन्ति। 
(A) किम् 
(B) कुत्र 
(C) कस्मात् 
(D) कस्य। 
उत्तरम् :
(B) कुत्र 

(v) स्वामिमहाभागस्य औषधिं निषेव्य अधुना अहं नीरोगः अभवम् । 
(A) कीदृशः 
(B) काः 
(C) के 
(D) कथम्। 
उत्तरम् :
(A) कीदृशः