राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) एवं झारखण्ड शैक्षिक अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद् (जेसीईआरटी) के संस्कृत पाठ्यपुस्तक, व्याकरण,अनुवाद एवं रचना पर आधारित अध्ययन सामग्री।
बुधवार, 8 जुलाई 2020
कथं शब्दानुशासनं कर्तव्यम्
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च
विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
मंगलवार, 7 जुलाई 2020
योगस्य वैशिष्ट्यम्
योगस्य वैशिष्ट्यम्
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च
विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
सोमवार, 6 जुलाई 2020
किन्तोः कुटिलता
किन्तोः कुटिलता
कुटिलेनामुना 'किन्तु'-ना कियत्कालात् क्लेशितोऽस्मि। यत्र यत्राहं गच्छामि तत्र तत्रैवास्य शत्रुता सम्मुखस्थिता भवति। अस्य 'किन्तोः' कारणात् कस्मिन्नपि कार्ये सफलता दुर्घटास्ति। बहून् वारान् दृष्टवानस्मि यत्कार्यं सर्वथा सज्जं सम्पद्यते, सर्वप्रकारैः सिद्धिहस्तगता भवति, यथैव सफलताया मूर्तिः सम्मुखमागच्छन्ती विलोक्यते तथैव क्रूरोऽयं किन्तुर्मध्ये प्रविश्य सर्वं विनाशयति। हिन्दी-अनुवादः-इस कुटिल 'किन्तु' शब्द से मैं कितने ही समय से पीड़ित हूँ। मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ-वहाँ ही इसकी शत्रुता सामने आ खड़ी होती है। इस 'किन्तु' के कारण किसी भी कार्य में सफलता अति-कठिन है। मैंने बहुत बार देखा है कि जो काम पूरी तरह से तैयार होता है, सब प्रकार से सफलता हाथ में आने वाली होती है, जैसे ही सफलता की मूर्ति सामने आती हुई दिखाई पड़ती है, वैसे ही यह क्रूर 'किन्तु' बीच में घुसकर सब नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। राज्यतो लब्धाया भूमेरभियोगो बहोः कालान्यायालये चलति स्म। अस्मिन्नभियोगे प्राविवाकमहोदयो निर्णयं श्रावयन् अवोचत् ....'वयं पश्यामो यदभियोक्तुः पक्षादावश्यकानि सर्वाण्येव प्रमाणान्युपस्थितानि सन्ति। राज्यतो लब्धाया भूमेर्दानपत्रमप्युपस्थापितमस्ति। न्यायालयेन परिज्ञातं यत् इयं भूमिरभियोक्तुरधि कारभुक्ताऽस्ति........।' हिन्दी-अनुवादः-राज्य से प्राप्त भूमि का अभियोग बहुत समय से न्यायालय में चल रहा था। इस अभियोग में जज महोदय ने निर्णय सुनाते हुए कहा-'हम देखते हैं कि अभियोक्ता के पक्ष की ओर से सभी आवश्यक प्रमाण उपस्थित कर दिए गए हैं। राज्य से प्राप्त भूमि का दानपत्र भी उपस्थित कर दिया गया है। न्यायालय ने अच्छी तरह जान लिया है कि यह भूमि अभियोक्ता के अधिकार वाली है.............।' अहं निश्चिन्तताया एकं शान्तं निःश्वासममुचम्। मया सर्वथा स्थिरीकृतं यद्भाग्य-लक्ष्मीरनुपदमेव मे कन्धरायां विजयमाल्यं प्रददातीति। परं प्राड्विवाकमहोदयः पुनरग्रे प्रावोचत्- .... किन्तु राजस्व-विभागस्य प्रधानः किलैकोऽधिकारी एतद्विरोधे एक पत्रं प्रेषितवानस्ति। एतदुपर्यपि लक्ष्यदानमावश्यकं मन्यामहे।' मम सर्वोऽप्युत्साहः पलायाञ्चक्रे। 'किन्तु'-कुन्तो ममान्त:-करणं समन्तात् कृन्तति स्म। निजहृदयमवष्टभ्य न्यायं प्रशंसन् गृहमागमम्। हिन्दी-अनुवादः-मैंने निश्चिन्तता से एक शान्त श्वास छोड़ी। मैंने पूरी तरह से निश्चय कर लिया कि भाग्यलक्ष्मी तुरन्त ही मेरे गले में विजयमाला पहनाने वाली है। परन्तु जज महोदय ने फिर आगे कहा-'............किन्तु राजस्व विभाग के एक मुख्य अधिकारी ने इसके विरोध में एक पत्र भेजा है। इस पर भी एक नज़र डालना मैं आवश्यक समझता हूँ।' मेरा सारा उत्साह फुर्र हो गया (गायब हो गया)। किन्तु' रूपी भाला मेरे चित्त को चारों तरफ से काट रहा था। मैं अपने हृदय को सान्त्वना । देकर न्याय की प्रशंसा करते हुए घर वापस आ गया। दृष्टं मया यदेष 'किन्तुः' दयाधर्मादिष्वपि अनधिकारचेष्टातो न विरतो भवति। प्रातः कालस्यैव कथास्ति.... धर्मव्यवस्थापकमहोदयस्य समीपे एको दीन: करुणक्रन्दनपुरःसरं न्यवेदयत्-"महाराज! नववार्षिकी मे कन्या। जातस्य तस्या विवाहस्य अद्य तृतीयो दिवसः। नाद्यापि चतुर्थीकर्म सम्पन्नं येन विवाहः पूर्णः परिगण्येत। तस्याः पतिः सहसाऽम्रियत। हा हन्त! तस्या अबोधबालिकाया अग्रे किं भावि? अस्तकर्मसंख्यावृद्धौ किं ममोच्चकुलमपि सहायकं भविष्यति? आज्ञापयन्तु श्रीमन्तः किं मया साम्प्रतं कर्तव्यम्।" डतमहोदयो गभीरतममद्रयाऽवोचत...."अवश्यमिदं दयास्थानम। वर्तमानकाले समाजस्य भीषणपरिस्थिते: पर्यालोचन इदमेवोचितं प्रतीयते यत् एवं विधस्थले पुनर्विवाहस्य व्यवस्था दीयेत.... 'किन्तु' वयं मुखेन कथमेतत् कथयितुं शक्नुमः। प्राचीनमर्यादापि तु रक्षितव्या स्यात्।" हिन्दी-अनुवादः-मैंने देखा है कि यह 'किन्तु' दया धर्म आदि में भी अपनी अनधिकार चेष्टा से रुकता नहीं है। प्रात: काल की ही बात है....... धर्मव्यवस्थापक महोदय के पास एक गरीब ने करुणक्रन्दन पूर्वक निवेदन किया-"महाराज! नौ वर्ष की मेरी कन्या है। उसका विवाह हुए तीन दिन बीत गए। आज भी 'चतुर्थी कर्म' पूरा नहीं हुआ, जिससे विवाह पूर्ण गिना जाए। उसका पति अचानक मर गया। हाय! उस अबोध बालिका का अब आगे क्या होगा? 'अस्तकर्म' की संख्या बढ़ाने में क्या मेरा उच्च कुल भी सहायक होगा ? आप आज्ञा कीजिए कि मुझे क्या करना है?" पण्डित महोदय ने गम्भीरतम मुद्रा में कहा-"यह तो अवश्य ही दयनीय स्थिति है। वर्तमान समय में समाज की किन्तोः कुटिलता भीषण परिस्थिति को देखते हुए यही उचित प्रतीत होता है कि ऐसी दशा में पुनर्विवाह की व्यवस्था दे दी जाए (नियम बना दिया जाए)। 'किन्तु हम अपने मुख से यह बात कैसे कह सकते हैं? प्राचीन मर्यादा की रक्षा भी तो की जानी चाहिए।" कुत्रचित् सोऽयं 'किन्तुः' नितान्तमनुतापं जनयति। अनेकवर्षाणां परिश्रमस्य फलस्वरूपं मन्निर्मितमेकं नवीनसंस्कृतपुस्तकमादाय साहित्यमर्मज्ञस्य एकस्य देशनेतुः समीपेऽगच्छम्। 'नेतृ'-महोदयः पुस्तकस्य गुणान् सम्यक् परीक्ष्य प्रसन्नः सन्नवोचत्... "पुस्तकं वास्तव एव अद्भुतं निर्मितमस्ति बहुकालानान्तरं संस्कृते एवंविधा नवीनता दृष्टिगताऽभवत्।... 'किन्तु' मत्सम्मत्यां तदिदं पुस्तकं भवान् संस्कृते न विलिख्य यदि हिन्दीभाषायामलिखिष्यत् तर्हि सम्यगभविष्यत्।" हिन्दी-अनुवादः-कहीं पर तो यह 'किन्तु' अत्यधिक दुःख पैदा करता है। अनेक वर्षों के परिश्रम के फलस्वरूप अपने द्वारा रचित एक नवीन संस्कृत पुस्तक लेकर एक साहित्य-मर्मज्ञ देश के नेता के समीप पहँचा। नेता जी ने पुस्तक के गणों की उचित परीक्षा करके प्रसन्न होते हुए कहा-"पुस्तक तो वास्तव में अद्भुत लिखी गई है। बहुत समय के पश्चात् संस्कृत में इस प्रकार की नवीनता देखी गई है।........ किन्तु मेरी सम्मति में आप इस पुस्तक को संस्कृत में न लिखकर यदि हिन्दी भाषा में लिखते तो बहुत अच्छा होता।" गृहं प्रति निवर्तमानोऽहं किन्तु'-कृताया अस्या मर्मवेधकशिक्षाया उपरि समस्तेऽपि गृहमार्गे कर्णं मर्दयन्नगच्छम्। अनेन 'किन्तु'-ना मह्यं सा शिक्षा दत्तास्ति यद्यहं सत्पुरुषः स्यां तर्हि पुनरस्मिन् मार्गे पदनिक्षेपस्य नामापि न गृह्णीयाम्। हिन्दी-अनुवादः- घर वापस लौटते हुए मैं 'किन्तु' द्वारा दी गई इस मर्मवेधक शिक्षा पर, घर के पूरे रास्ते कान मसलता हुआ चला गया। इस 'किन्तु' ने मुझे वह शिक्षा दी थी कि यदि मैं सत्पुरुष हूँ तो फिर इस रास्ते पर पाँव रखने का नाम भी न लूँ। कदाचित् कदाचित्त्वयं क्रूरः 'किन्तुः' मुखस्य कवलमप्याच्छिनत्ति। स्वल्प-दिनानामेव वार्तास्ति। आयुर्वेदमार्तण्डस्य श्रीमतः स्वामिमहाभागस्य औषधिं निषेव्य अधुनैवाहं नीरोगोऽभवम्। अस्मिन्नेव समये मित्रगोष्ठ्या निमन्त्रणं प्राप्नवम्। भोजनगोष्ठ्यां समवेतुं ममापीच्छाशक्तौ प्राबल्यस्य प्रवाहः पूर्णमात्रायां प्रवर्द्धमान आसीत्। अहं स्वामिमहोदयमप्राक्षम्... 'किमहं तत्र गन्तुं शक्नोमि।' उत्तरमलभ्यत... ‘तादृशी हानिस्तु नास्ति। 'किन्तु' गरिष्ठवस्तुनो भोजने अवधानमत्यावश्यकम् अधुनापि दौर्बल्यमस्ति।' हिन्दी-अनुवादः -कभी-कभी तो यह क्रूर किन्तु मुख के कवल (ग्रास) को भी छीन लेता है। थोड़े ही दिनों की बात है। आयुर्वेद मार्तण्ड श्री स्वामी जी महाराज की औषधि का सेवन करके अब मैं स्वस्थ हो गया हूँ। इसी समय मित्र मण्डली की ओर से निमन्त्रण प्राप्त हुआ। भोजनगोष्ठी (पार्टी) में सम्मिलित होने के लिए मेरी इच्छा शक्ति की प्रबलता का प्रवाह पूरी तरह से बढ़ रहा था। मैंने स्वामी जी महाराज से पूछा-"क्या मैं वहाँ जा सकता हूँ।" उत्तर मिला-"वैसे तो कोई हानि नहीं है, 'किन्तु' गरिष्ठ पदार्थों के सेवन में बड़ी सावधानी की आवश्यकता है, अभी भी कमजोरी है।" उत्साहस्य ज्वाला या पर्वं प्रचण्डतमा आसीत् अर्द्धमात्रायां तु तत्रैव निर्वाणाभवत्। अस्तु येन केनापि प्रकारेण भोजनगोष्ठ्याविशेषाधिवेशनेऽस्मिन् सम्मिलितस्त्वभवमेव। भोजनपीठे अधिकारं कुर्वन्नेवाहमपश्यं यत् सर्वाङ्गपूर्णा एका भोज्य-व्यञ्जनानां प्रदर्शनी सम्मुखे वर्तत इति। धीरगम्भीरक्रमेणाहं भोजनकाण्डस्यारम्भमकरवम्। अहं मोदकस्यैकं ग्रासमगृह्णम्। तस्य स्वादसूत्रेण सन्दानितोऽहं यथैव द्वितीय ग्रासमगृणं तथैव 'स्वामिमहोदयस्य 'किन्तुः' मम कण्ठनलिकामरुधत्। मुखस्य ग्रासो मुख एवाऽभ्राम्यत् अग्रे गन्तुं नाशक्नोत्। 'किन्तोः' भीषण विभीषिका प्रत्येकवस्तुनि गरिष्ठतां सम्पाद्य भोजनं तत्रैव समाप्तमकरोत्।' हिन्दी-अनुवादः-उत्साह की जो ज्वाला पहले अत्यधिक प्रचण्ड हो रही थी, आधे ही मिनट में वहीं बुझ गई। भोजन के आसन पर अधिकार जमाते हुए मैंने देखा कि एक सर्वांगपूर्ण भोज्य व्यंजनों की प्रदर्शनी सामने लगी हुई है। धीर-गम्भीर क्रम से मैंने भोजनकाण्ड की शुरुआत कर दी। मैंने लड्डू का एक ग्रास लिया। उसके स्वाद सूत्र से बँधे हुए मैंने जैसे ही दूसरा ग्रास ग्रहण किया तभी स्वामी महोदय की 'किन्तु' से मेरी कण्ठनली ही रुंध गई। मुख का ग्रास मुख में ही घूम गया, आगे जा ही न सका। 'किन्तु' के भीषण भय ने प्रत्येक वस्तु में गरिष्ठता बता कर भोजन वहीं समाप्त कर दिया।" अहं देशसेवां कर्तुं गृहाद् बहिरभवम्। मया निश्चितमासीत् 'एतावन्ति दिनानि स्वोदरसेवायै क्लिष्टोऽभवम्। इदानीं कियन्तं कालं देशसेवायामपि लक्ष्यं ददामि। यथैवाहं मार्गेऽग्रेसरो भवामि, तथैव मम बाल्याध्यापकमहोदयः सम्मुखोऽभवत्। मास्टरमहोदयेन प्रस्थानहेतौ पृष्टे सति सम्पूर्णसमाचारनिवेदनं ममाऽऽवश्यकमभूत्। अध्यापकमहोदयः प्रावोचत्... "तात, सर्वमिदं सम्यक्। किन्तु स्वगृहाभिमुखमपि किञ्चिद्विलोकनीयं भवेत्। येषां भरणपोषणं भवत्येवायत्तम् तान् किं भवान् निराधारमेव निर्मुच्य स्वैरं गन्तुमर्हेत्।" हिन्दी-अनुवादः-मैं देशसेवा करने के लिए घर से बाहर हुआ। मैंने निश्चय किया था कि इतने दिनों तक अपनी पेट-पूजा के लिए कष्ट उठाया है। अब कुछ समय देशसेवा में भी लगाता हूँ। जैसे ही मैं रास्ते में आगे-आगे हुआ, तभी मेरे बचपन के अध्यापक मेरे सामने आ गए। मास्टर महोदय द्वारा प्रस्थान का कारण पूछने पर मेरे लिए सारा समाचार निवेदन करना आवश्यक हो गया था। अध्यापक महोदय ने कहा-"पुत्र, यह सब तो ठीक है। 'किन्तु' अपने घर की तरफ भी थोड़ा ध्यान देना चाहिए। जिनके भरण-पोषण की आपने ज़िम्मेदारी ली है, क्या आप उन्हें बेसहारा छोड़कर अपनी इच्छानुसार जा सकते हो?" पुनः किमासीत्।अत्रैव परोपकारविचाराणाम् इतिश्रीरभूत्। किन्तु'-महोदयेन देशसेवायाः सर्वापि विचारपरम्परा परपारे परावर्त्यत गृहाभिमुखं मुखं कुर्वन् तस्मात् स्थानादेव परावर्तिषि। हिन्दी-अनुवादः-फिर क्या था, यहीं पर परोपकार के विचार की इतिश्री हो गई। 'किन्तु' जी महाराज ने देशसेवा की सारी विचार परम्परा को परले पार कर (लौटा) दिया। घर की ओर मुँह करते हुए उसी स्थान से वापस लौट गया। मयानुभूतमस्ति यदयं कुटिलः 'किन्तुः' नानादेशेषु नानारूपाणि सन्धार्य गुप्तं विचरति। यथैव लोकानां कार्यसिद्धेरवसरः समुपतिष्ठते तथैवायं प्रकटीभूय लोकानां कार्याणि यथावस्थितमवरुणद्धि। अहमेतस्य 'किन्तु' कुठारस्य कठोरतया नितान्तमेव तान्तोऽस्मि। अहं वाञ्छामि यदेतस्याक्रमणात् सुरक्षितो भवेयम्। परं नायं मां त्यक्तुमिच्छति। बहवो मार्मिका मामबोधयन् यत् त्वम् एतं सम्मुखमायान्तं दृष्ट्वैव कथं वित्रस्यसि, कुतश्च एनमपसारयितुं प्रयतसे ? किमेनं सर्वथा अहितकारिणमेव निश्चितवानसि ? नेदं सम्यक् । पशुघातकस्य छुरिकापि पाश-पतितस्य गलबन्धनं छित्त्वा समये प्राणरक्षां कुर्वती दृष्टा।' अहमपि सत्यस्यैकान्ततोऽपलापं न करिष्यामि। एतस्य कथनस्य सत्यताया मयापि परिचयः कदाचित् कदाचित् प्राप्तोऽस्ति। हिन्दी-अनुवादः- मैंने अनुभव किया कि यह कुटिल 'किन्तु' अनेक स्थानों पर अनेक रूप धारण करके गुप्त रूप से कि है। जैसे ही लोगों की कार्य सिद्धि का अवसर समीप होता है, तभी यह प्रकट होकर लोगों के कार्यों को उसी स्थिति में रोक देता है। मैं इस 'किन्तु' के कुल्हाड़े की कठोरता से बुरी तरह पीड़ित हूँ। मैं चाहता हूँ कि इसके आक्रमण से बच जाऊँ। परन्तु यह मुझे छोड़ना ही नहीं चाहता। बहुत से मर्मज्ञों ने मुझे समझाया कि तुम इसे सामने आता हुआ देखकर ही क्यों डर जाते हो और क्यों इसे दूर करने के लिए यत्नशील रहते हो ? क्यों इसे सर्वथा अहितकर ही मानते हो ? यह ठीक नहीं। पशुघातक की छुरी भी जाल में बँधे हुए के गले का बन्धन काटकर, अवसर आने पर प्राण रक्षा करती हुई देखी गई है। मैं भी सच्चाई को पूरी तरह से नहीं झुठलाऊँगा। इस कथन की सत्यता का परिचय मुझे भी कभी कभी प्राप्त हुआ है। 'शब्दैः प्रतीयते यद् गृहे चौरः प्रविष्टोऽस्ति' इति सभयमनुलपन्ती गृहिणी रात्रौ मामबोधयत्। अहं निजशौर्य प्रकाशयन् महता वीरदर्पण लगुडमात्रमादाय अन्धकार एव चौरनिग्रहाय प्रचलितोऽभवम्। गृहिणी कर्णसमीप आगत्य शरवदत्... "अन्धकार-ऽस्मिन् यासि त्वमवश्यम्, 'किन्तु दृश्यताम् स शस्त्रं न प्रहरेत्।" पुनः किमासीत्। मम वीरदर्पस्य शौर्यस्य च प्रज्ज्वलितं ज्योतिस्तत्रैव निर्वाणमभूत। चौरनिग्रहः कीदृशः, निजप्राणपरित्राणमेव मे अन्वेषणीयमभवत्। लगुडं प्रक्षिप्य कोष्ठके निलीनोऽभवम्। तत एव च कम्पित-कण्ठेन चीत्कारमकरवम्-"लोकाः ! आगच्छत, चौरः प्रविष्टोऽस्ति।" हिन्दी-अनुवादः- 'आवाज़ों से प्रतीत होता है कि घर में चोर घुस आया है'-इस प्रकार भयपूर्वक कहती हुई मेरी घरवाली ने रात्री में मुझे जगाया। मैं अपनी शूरवीरता प्रकट करते हुए बड़े घमण्ड से लाठी मात्र लेकर अन्धकार में ही चोर को पकड़ने के लिए चल पड़ा। पत्नी ने कान के पास आकर धीरे से कहा-“अन्धकार में तुम जाना ज़रूर, 'किन्तु' देखना, कहीं वह शस्त्रप्रहार न कर दे।" फिर क्या था। मेरे वीरोचित घमण्ड और शूरता की जली हुई ज्योति वहीं बुझ गई। चोर का पकड़ना कैसा, मैं अपनी प्राणरक्षा ही खोजने लगा। लाठी फेंक कर कोठे (कमरे) में छिप गया। तभी काँपते हुए स्वर से मैं चीखा-"लोगो ! आओ, चोर घुस आया है।" एकेन अमुना 'किन्तु'-ना चौरस्य चपेटाभ्योऽवमुच्य सौख्यस्य सुरक्षिते प्रकोष्ठकेऽहं प्रवेशितः। अनेन किन्तुना कस्मिन्नपि संकटसमये कदाचित् किञ्चित्कार्यं कामं कृतं स्यात् परं भूयसा तु अस्माद् भयमेव भवति। अस्य हि सार्वदिकः स्वभाव एव यत् वार्ता काममुत्तमास्तु अधमा वा परमयं मध्ये प्रविश्य तस्याः कथाया विच्छेदमवश्यं करिष्यति। एतएव कस्मिन्नपि समये कार्यसाधकत्वेऽपिलोका अस्माद वित्रस्यन्त्येव वैरिणां भा हिताधराऽपि करवालधारा क्रूराकारा प्रखरप्रकारा एव प्रसिद्धा लोकेषु। विगुणः कार्षापणः, कुत्सितश्च पुत्रः संकटे कदाचिदुपयुक्तो भवेत् परन्तु जनसमाजे द्वयोरुपर्येव नासा-भूसड्कोचो जातो जनिष्यते च। इदमेव कारणं यत् यस्यां वार्तायां 'किन्तुः' उत्पद्यते तां वार्ता लोका विगुणां गणयन्ति। हिन्दी-अनुवादः- इस एक किन्तु ने चोर की चपेटों से छुड़वाकर मुझे सुख के सुरक्षित कोठे (कमरे) में प्रविष्ट करवा दिया। इस किन्तु ने किसी संकट के समय कभी कोई कार्य शायद किया हो, परन्तु अधिकतर तो इससे भय ही होता है। इसका सदा-सदा रहने वाला स्वभाव ही है कि चाहे बात अच्छी हो बुरी परन्तु यह बीच में प्रविष्ट होकर उस बात को अवश्य ही काट देगा। इसीलिए किसी भी समय कार्य सिद्धि में लोग इससे डरते ही हैं। वैरियों का भार उतारने के लिए शायद हितकारक तलवार की धार भी क्रूर आकार तथा तीखे रूप वाली ही संसार में प्रसिद्ध होती है। खोटा सिक्का तथा निन्दित पुत्र संकट में कभी काम भले ही आ जाए, परन्तु जनसमाज में तो दोनों के ऊपर ही नाक-भौंह सिकोड़ी जाती रही है और आगे भी सिकोड़ी जाती रहेगी। यही कारण है कि जिस किसी बात में 'किन्तु' लग लग जाता है, उस बात को लोग खटाई में पड़ी हुई बात ही समझते हैं।
प्रश्न 1.
संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् -
(क) भूमिविषयके अभियोगे 'किन्तु'-ना का बाधा उपस्थापिता ?
(ख) वाक्यमध्ये प्रविश्य सर्वं कार्यं केन विनाश्यते ?
(ग) लेखकस्य देशसेवायाः विचारस्य कथम् इतिश्रीरभूत् ?
(घ) नेतृमहोदयः पुस्तकप्रशंसां कुर्वन् 'किन्तु' प्रयोगेन कं परामर्शम् अददात् ?
(ङ) भोजन-गोष्ठीस्थले कीदृशी प्रदर्शनी समायोजिता आसीत् ?
(च) भोजनगोष्ठ्यां लेखकस्य कण्ठनलिकां कः अरुधत् ?
(छ) धर्मव्यवस्थापक: विधवायाः पुनर्विवाहमुचितं मन्यमानोऽपि व्यवस्थां किमर्थं न ददौ ?
(ज) गृहिणी पत्युः कर्णसमीपे आगत्य शनैः किम् अवदत् ?
(झ) लोकाः किन्तु-युक्तां वार्ता केन कारणेन विगुणां गणयन्ति ?
(ब) किन्तोः सार्वदिकः प्रभाव: कः ?
उत्तरम् :
(क) 'राजस्वविभागस्य प्रधानः अधिकारी तद्-विरोधे एकं पत्रं प्रेषितवान्'- इति बाधा किन्तुना उपस्थापिता।
(ख) वाक्यमध्ये प्रविश्य सर्वं कार्यं किन्तुना विनाश्यते।
(ग) 'किन्तु किञ्चित् स्वगृहाभिमुखं विलोकनीयम्' इति अध्यापकवचनेन लेखकस्य देशसेवायाः विचारस्य इति श्रीः अभूत्।
(घ) नेतृमहोदयः परामर्शम् अददात्- "यदि इदं पुस्तकं हिन्दीभाषायाम् अलिखिष्यत् तर्हि सम्यग् अभविष्यत्।"
(ङ) भोजन-गोष्ठीस्थले भोज्य-व्यञ्जनानां प्रदर्शनी समायोजिता आसीत्।
(च) लेखकमहोदयस्य कण्ठनलिकां स्वामिमहोदयस्य 'किन्तुः' अरुधत्।
(छ) यतः धर्मव्यवस्थापक: प्राचीनमर्यादाम् अपि रक्षितुम् इच्छति स्म, अतः सः पुनर्विवाहस्य व्यवस्थां न ददौ।
(ज) सा अवदत्-“अन्धकारेऽस्मिन् त्वम् अवश्यं यासि, 'किन्तु' दृश्यताम्, स शस्त्रं न प्रहरेत्।"
(झ) यतः किन्तुयुक्तायाः वार्तायाः सिद्धौ किन्तुना बाधा अवश्यमेव स्थाप्यते, अतः लोकाः किन्तुयुक्तां वार्ता विगुणां गणयन्ति।
(ञ) एषः किन्तुः सर्वासां वार्तानां मध्ये प्रविश्य वार्तायाः विच्छेदम् अवश्यं करोति इत्येव किन्तोः सार्वदिकः प्रभावः ।
प्रश्न 2.
उपयुक्तशब्दान् चित्वा रिक्तस्थानानां पूर्तिः विधेया -
(दुर्घटा, अवधानम्, सन्दानितः, स्वामिमहोदयम्, संस्कृते, विवाहस्य, शान्तम्, पलायांचक्रे, कालात्, संकटे)
(क) अहं................. अप्राक्षं किमहं तत्र गन्तुं शक्नोमि।
(ख) अस्य 'किन्तोः' कारणात् कस्मिन्नपि कार्ये सफलता............. अस्ति।
(ग) तस्य स्वादसूत्रेण ...............अहं यथैव द्वितीयं ग्रासमगृहणम्, तथैव 'किन्तुः' मम कण्ठनलिकामरुधत्।
(घ) गरिष्ठवस्तुनो भोजने.................अत्यावश्यकम्।
(ङ) विगुणः कार्षापणः कुत्सितश्च पुत्रः.................कदाचिदुपयुक्तो भवेत्।
(च) राज्यतो लब्धाया भूमेरभियोगो बहोः.................न्यायालये चलति स्म।
(छ) मम सर्वोऽप्युत्साहः................ ।
(ज) अहं निश्चिन्तताया एकं.................नि:श्वासममुचम्।
(झ) जातस्य तस्या ................. अद्य तृतीयो दिवसः।
(ञ) बहुकालानन्तरं................. एवं विधा नवीनता दृष्टिगताऽभवत्।
उत्तरम् :
(क) अहं स्वामिमहोदयम् अप्राक्षं किमहं तत्र गन्तुं शक्नोमि ।
(ख) अस्य 'किन्तोः' कारणात् कस्मिन्नपि कार्य सफलता दुर्घटा अस्ति।
(ग) तस्य स्वादसूत्रेण सन्दानितः अहं यथैव द्वितीयं ग्रासमगृह्णम्, तथैव 'किन्तुः' मम कण्ठनलिकामरुधत्।
(घ) गरिष्ठवस्तुनो भोजने अवधानम् अत्यावश्यकम्।।
(ङ) विगुणः कार्षापणः कुत्सितश्च पुत्रः संकटे कदाचिदुपयुक्तो भवेत्।
(च) राज्यतो लब्धाया भूमेरभियोगो बहो: कालात् न्यायालये चलति स्म।
(छ) मम सर्वोऽप्युत्साहः पलायाञ्चक्रे।
(ज) अहं निश्चिन्तताया एकं शान्तं नि:श्वासममुचम्।
(झ) जातस्य तस्या विवाहस्य अद्य तृतीयो दिवसः।
(ञ) बहुकालानन्तरं संस्कृते एवं विधा नवीनता दृष्टिगताऽभवत् ।
प्रश्न 3.
अधोलिखितैः उचितक्रियापदैः रिक्तस्थानानि पूरयत -
परिगण्येत, परावर्तिषि, आच्छिनत्ति, मन्यामहे, दीयेत, अलिखिष्यत्।
(क) प्रधानः एकं पत्रं प्रेषितवानस्ति। एतदुपर्यपि लक्ष्यदानमावश्यकं ...............।
(ख) गृहाभिमुखं मुखं कुर्वन् तस्मात् स्थानादेव ...........।
(ग) यदि हिन्दीभाषायाम् ............ तर्हि सम्यगभविष्यत्।
(घ) इदमेवोचितं प्रतीयते यत् एवंविधस्थले पुनर्विवाहस्य व्यवस्था .............
(ङ) कदाचित् कदाचित्त्वयं क्रूरः 'किन्तुः' मुखस्य कवलमपि ...................
(च) नाद्यापि चतुर्थीकर्म सम्पन्नं येन विवाहः पूर्णः .............।
उत्तरम् :
(क) प्रधानः एकं पत्रं प्रेषितवानस्ति। एतदुपर्यपि लक्ष्यदानमावश्यकं मन्यामहे।
(ख) गृहाभिमुखं मुखं कुर्वन् तस्मात् स्थानादेव परावर्तिषि।
(ग) यदि हिन्दीभाषायाम् अलिखिष्यत् तर्हि सम्यगभविष्यत् ।
(घ) इदमेवोचितं प्रतीयते यत् एवंविधस्थले पुनर्विवाहस्य व्यवस्था दीयेत।
(ङ) कदाचित् कदाचित्त्वयं क्रूरः 'किन्तुः' मुखस्य कवलमपि आच्छिनत्ति।
(च) नाद्यापि चतुर्थीकर्म सम्पन्नं येन विवाह: पूर्णः परिगण्येत।
प्रश्न 4.
सन्धिच्छेदं कुरुत -
उत्तरसहितम् :
(क) तत्रैवास्य = तत्र + एव + अस्य
(ख) सर्वाण्येव = सर्वाणि + एव
(ग) मन्निर्मितमेकम् = मत् + निर्मितम् + एकम्
(घ) किलैकोऽधिकारी = किल + एकः + अधिकारी
(ङ) द्वयोरुपर्येव = द्वयोः + उपरि + एव।
प्रश्न 5.
प्रकृति-प्रत्ययविभागः क्रियताम् -
उत्तरसहितम् :
(क) निर्मूच्च = निर् + √मुच् + क्त्वा > ल्यप्
(ख) आदाय = आ + √दा + क्त्वा > ल्यप्
(ग) प्रविष्टः = प्र + √विश् + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(घ) आगत्य = आ + √गम् + क्त्वा > ल्यप्
(ङ) परिज्ञातम् = परि + √ज्ञा + क्त (नपुंसकलिङ्गम् प्रथमा-एकवचनम्)
प्रश्न 6.
अधोलिखितेषु पदेषु विभक्तिं वचनं च दर्शयत -
उत्तरसहितम् :
(क) कार्ये - कार्य-सप्तमी विभक्तिः, एकवचनम्
(ख) अभियोक्तुः - अभियोक्त--पञ्चमी/षष्ठी विभक्तिः, एकवचनम्
(ग) बालिकायाः - बालिका–पञ्चमी/षष्ठी विभक्तिः, एकवचनम्
(घ) न्यायालयेन - न्यायालय - तृतीया विभक्तिः, एकवचनम्
(ङ) नेतुः - नेतृ-सप्तमी विभक्तिः, एकवचनम्
(च) शक्तौ - शक्ति - सप्तमी विभक्तिः, एकवचनम्
(छ) औषधिम् - औषधि - द्वितीया विभक्तिः, एकवचनम्
प्रश्न 7.
स्वरचितवाक्येषु अधोलिखितपदानां प्रयोगं कुरुत -
किन्तु, गन्तुम्, मह्यम्, विभीषिका, भरणपोषणम्, दृष्ट्वा
उत्तरम् :
(क) किन्तु - अहं धावनप्रतियोगितायां सर्वतो अग्रे आसम्, किन्तु सहसा मम पादस्खलनम् अभवत्।
(ख) गन्तुम् - अहं विद्यालयं गन्तुम् इच्छामि।
(ग) मह्यम् - मयं पठनम् अतीव रोचते।
(घ) विभीषिका - परीक्षायाः विभीषिका मनः उद्वेलयति।
(ङ) भरणपोषणम् - परिवारस्य भरणपोषणं तु सर्वेषां कर्तव्यम् अस्ति।
(च) दृष्ट्वा - अधः दृष्ट्वा कथं न गच्छसि ?
प्रश्न 8.
विलोमशब्दान् लिखत -
उत्तरसहितम् : विलोमपदम्
(क) विगुणः - सगुणः
(ख) शौर्यम् - अशौर्यम्
(ग) सुरक्षितः - विनष्टः
(घ) शत्रुता - मित्रता
(ङ) धीरः - अधीरः
(च) भयम् - निर्भयम्
बहुविकल्पीयाः प्रश्नाः
I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत -
(i) भोजनगोष्ठ्यां लेखकस्य कण्ठनलिकां क: अरुधत् ?
(A) पत्नी
(B) स्वामिमहोदस्य किन्तुः
(C) मन्त्रिमहोदयस्य किन्तुः
(D) शिक्षकः।
उत्तरम् :
(B) स्वामिमहोदस्य किन्तुः
(ii) वाक्यमध्ये प्रविश्य सर्वं कार्य केन विनाश्यते ?
(A) स्वामिना
(B) सेवकेन
(C) अधिकारिणा
(D) किन्तुना।
उत्तरम् :
(C) अधिकारिणा
(iii) गरिष्ठवस्तुनो भोजने किम् अत्यावश्यकम् ?
(A) मिष्ठान्नम्
(B) तिक्त-व्यञ्जनम्
(C) अवधानम्
(D) क्षीरम्।
उत्तरम् :
(B) तिक्त-व्यञ्जनम्
(vi) गृहिणी कस्य कर्णसमीपे आगत्य शनैः अवदत् ?
(A) पत्युः
(B) अधिकारिणः
(C) किन्तोः
(D) मन्त्रिणः।
उत्तरम् :
(A) पत्युः
(v) कस्य कारणात् कस्मिन्नपि कार्ये सफलता दुर्घटा अस्ति ?
(A) पत्न्याः
(B) न्युः
(C) किन्तोः
(D) स्वामिनः।
उत्तरम् :
(A) पत्न्याः
(vi) भूमेः अभियोगः कुत्र चलति स्म ?
(A) ग्रामपञ्चायते
(B) न्यायालये
(C) नगरे
(D) ग्रामे।
उत्तरम् :
(D) ग्रामे।
II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत -
(i) क्रूरः किन्तुः मध्ये प्रविश्य सर्वं विनाशयति।
(A) कः
(B) काः
(C) के
(D) किम्।
उत्तरम् :
(D) किम्।
(ii) राजस्वविभागस्य एकः अधिकारी एतद्विरोधे पत्रं प्रेषितवान्।
(A) काः
(B) कस्मात्
(C) कस्य
(D) कस्मिन्।
उत्तरम् :
(C) कस्य
(iii) कन्यायाः पतिः सहसा अम्रियत।
(A) कस्याः
(B) कः
(C) कथम्
(D) कौ।
उत्तरम् :
(B) कः
(iv) मानवाः क्षणमपि परपीडनात् न विरमन्ति।
(A) किम्
(B) कुत्र
(C) कस्मात्
(D) कस्य।
उत्तरम् :
(B) कुत्र
(v) स्वामिमहाभागस्य औषधिं निषेव्य अधुना अहं नीरोगः अभवम् ।
(A) कीदृशः
(B) काः
(C) के
(D) कथम्।
उत्तरम् :
(A) कीदृशः
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च
विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
रविवार, 5 जुलाई 2020
उद्भिज्ज-परिषद्
उद्भिज्ज-परिषद्
अथ ते तावत्तृणेभ्योऽप्यसाराः पशुभ्योऽपि निकृष्टतराश्च। तथा च तृणा-दिसृष्टेरनन्तरं तथाविधजीवनिर्माणं विश्वविधातुः कीदृशं नाम बुद्धिमत्ताप्रकर्षं प्रकटयति। इत्येव हेतुप्रमाणपुरस्सरं सुचिरं बहुविधं विशदं च व्याख्याय सभापतिरश्वत्थदेव उद्भिज्ज-परिषद् विसर्जयामास। हिन्ही-अनुवादः -इस प्रकार वे (मनुष्य) तिनकों से भी तुच्छ तथा पशुओं से भी निकृष्ट हैं। वनस्पति आदि की सृष्टि के पश्चात् इस प्रकार के जीवों (मनुष्यों) का निर्माण करना विश्व के सजनहार विधाता की कैसी बुद्धिमत्ता की अधिकता को प्रकट करता है ? इस प्रकार कारण और प्रमाण निर्देशपूर्वक बहुत देर तक, बहुत प्रकार से तथा विस्तृत व्याख्या करके सभापति अश्वत्थदेव (पीपल-देव) ने वृक्षों की सभा को विसर्जित किया।
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च
विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
शनिवार, 4 जुलाई 2020
दीनबन्धुः श्रीनायारः
दीनबन्धुः श्रीनायारः
जेसीईआरटी तथा एनसीईआरटी के कक्षा-12 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक-शाश्वती भाग 2 के दशमः पाठ: दीनबन्धुः श्रीनायारः का शब्दार्थ सहित हिन्दी अनुवाद एवं भावार्थ तथा उस पर आधारित प्रश्नोत्तर सीबीएसई के लिए यहाँ दिए गए हैं।यहाँ दिए गए हिंदी अनुवाद तथा भावार्थ की मदद से विद्यार्थी पूरे पाठ को आसानी से समझकर अभ्यास के प्रश्नों को स्वयं कर सकते हैं। प्रस्तुत पाठ उड़िया भाषा के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदासवर्मा द्वारा विरचित 'पाषाणीकन्या' कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। इसके अनुवादक डॉ. नारायण दाश हैं। इस कथा के नायक श्रीनायार का पालन-पोषण एक अनाथाश्रम में हुआ है। श्रीनायार ने अपनी कर्मदक्षता, दाक्षिण्य और सेवामनोवृत्ति से समाज में आदर्श स्थापित किया है। वह प्रतिमास अपने वेतन का आधा से अधिक भाग केरल में स्थापित अनाथाश्रम को भेजते हैं। प्रस्तुत कथा में श्रीनायार का लोककल्याणकारी आदर्श चरित्र वर्णित है।
श्रीनायारः केन्द्रसर्वकारतः स्थानान्तरणेन आगत्य ओडिशासर्वकारस्य अधीने प्रायः वर्षत्रयेभ्यः कार्यं करोति। तथाप्यस्मिन् वर्षत्रयात्मके कालखण्डे एकवारमपि स्वराज्यं केरलं प्रति गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् । स स्वल्पभाषी, अतस्तस्य मनःकथा मनोव्यथा वा बोधगम्या नास्ति। सन्तुलितो वार्तालापः, साक्षात्समये आगमनम्, ततः सञ्चिकासु मनोनिवेशः, कार्यं समाप्य स्वगृहं प्रत्यागमनञ्च तस्य वैशिष्ट्यमासीत्। तस्य कर्मनैपुण्यं दृष्ट्वा एव ओडिशासर्वकारस्तं स्थानान्तरणेन स्वीकृत्य खाद्यापूर्तिविभागे सचिवपदे नियुक्तवान् । गतस्य वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यद् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्। खाद्ये अपमिश्रणं न्यूनीभूतम्। अत उपभोक्तृणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे। मन्त्रिणां मध्येऽपि तस्य सुख्यातिः वर्तते।
श्रीनायार केन्द्र सरकार से स्थानान्तरित होकर उड़ीसा सरकार के अधीन प्रायः तीन वर्ष तक कार्य करता है। तो भी (उसने) इस तीन वर्ष के कालखण्ड में एक बार भी अपने राज्य केरल की ओर जाने की इच्छा प्रकट नहीं की। वह बहुत कम बोलने वाला है, इसीलिए उसके मन की बात या मन की पीड़ा नहीं जानी जा सकती है। सन्तुलित वार्तालाप, ठीक समय पर पहुँचना, फिर रजिस्टरों में मन लगाए रखना और कार्य समाप्त कर अपने घर वापिस लौटना उसकी विशेषता थी। उसकी कार्यनिपुणता देखकर ही उड़ीसा सरकार ने उसका स्थानान्तरण स्वीकार कर उसे खाद्य-आपूर्ति विभाग में सचिव पद पर नियुक्त कर दिया था। पिछले तीन वर्ष के आकलन से पता चलता है कि विभाग की कार्यनिपुणता दस गुणा बढ़ गई है। खाद्य सामग्री में मिलावट कम हो गई है। अतः उपभोक्ताओं का भी विभाग के विरोध में (कोई) अभियोग (मुकदमा) नहीं है। मन्त्रियों के बीच में भी उसकी अच्छी ख्याति है।
श्रीनायारस्य दायित्वग्रहणस्य एकमासाभ्यन्तरे बहुदिनेभ्यः स्थगितानां विविध समस्यानामपि समाधानं जातम्। स्वकार्यं त्यक्त्वा अपरस्य सहकारस्तस्य परमधर्मः। सः प्रतिमासं प्रथमदिवसे स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं केरलं प्रेषयति स्म कश्चित् सम्पर्कः। तेनानुमीयते तस्य राज्येन सह अस्ति कश्चित् सम्पर्कः। कानिचन मलयालमभाषायाः संवादपत्राणि अतिरिच्य कदापि तस्य नाम्ना किमपि पत्रमागतमिति कोऽपि कदापि न जानाति।
श्रीनायार के दायित्व (पदभार) ग्रहण करने के एक महीने के अन्दर बहुत दिनों से स्थगित अनेक समस्याओं का भी समाधान हो गया। अपना कार्य छोड़कर दूसरों का सहयोग करना उसका परम धर्म है। वह प्रतिमास के पहले दिन अपने वेतन का आधे से अधिक भाग केरल भेज देता था। इसी से पता चलता है कि उसका राज्य के साथ कोई सम्पर्क है। कुछ मलियालम भाषा के संवाद पत्रों को छोड़कर कभी उसके नाम से कोई पत्र आया है, इसे कभी कोई नहीं जानता।
एकस्मिन् दिने श्रीनायारः पत्रमेकं धृत्वा मस्तकमवनमय्य पठन् आसीत्। नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा आर्दीकरोति स्म पत्रस्य अर्धाधिकं भागम् । तदानीमेव तस्य कार्यालयलिपिकः श्रीदासःप्रविशति। श्रीनायारः तमुक्तवान्-अधुना मम गमनसमयः समुपागत एव। मम दायित्वहस्तान्तरणपत्रकं सज्जीकुरु। अहमधुना द्वित्राणां दिवसानां सकारणावकाशं स्वीकरिष्यामि। पुनः तदनु स्वीकरिष्यामि दीर्घावकाशम् । यदि कस्मैचिद् अज्ञातेन मया रूक्षो व्यवहारः प्रदर्शितः स्यात्, तदर्थं ते मह्यमुदारचित्तेन क्षमा प्रदास्यन्ति इति सर्वेभ्यो निवेदयतु। अनन्तरं सर्वे अश्रुलहृदयैः सौप्रस्थानिद ज्ञापितवन्तः।
हिन्दी-अनुवादः - एक दिन श्रीनायार एक पत्र (हाथ में) पकड़कर मस्तक झुकाकर पढ़ रहा था। आँख के किनारे से गिरी हुई आश्रुधारा ने पत्र का आधे से भी अधिक भाग गीला कर दिया था। तभी उसके कार्यालय का लिपिक (क्लर्क) श्रीदास प्रवेश करता है। श्रीनायार ने उससे कहा-"अब मेरे जाने का समय समीप आ गया है। मेरा दायित्व-हस्तान्तरण पत्र (किसी दूसरे को पदभार सौंपने का पत्र) तैयार करो। अब मैं दो-तीन दिन का सकारण-अवकाश लूँगा (स्वीकार करूँगा)। फिर उसके बाद लम्बी छुट्टी लूँगा। यदि किसी के लिए अनजाने में मुझसे रूखा व्यवहार किया गया हो, तो उसके लिए वे मुझे उदारभाव से क्षमा देंगे-ऐसा सबसे निवेदन करो।" इसके बाद सभी ने आँसू भरे हृदय से विदाई दी।
तस्य गमनस्य दिवसत्रयात्परं कार्यालये पत्रमेकमागतम्। कौतूहलवशात् श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान् । लेखिका आसीत् सुश्री मेरी यस्याः पार्वे सः प्रतिमासमर्धाधिक धनं धनादेशेन प्रेषयति स्म। पत्रे एवं लिखितमासीत्..... श्रीनायार!
उनके जाने के तीन दिन के पश्चात् कार्यालय में एक पत्र आया। जिज्ञासावश श्रीदास ने वह पत्र खोला। लेखिका थी सुश्री मेरी, जिसके पास वह प्रतिमास आधे से अधिक धन मनीआर्डर द्वारा भेजता था। पत्र में लिखा था - श्रीनायार!
भगवान् यीशुस्तव मङ्गलं वितनोतु । मम पूर्वतनं पत्रं त्वया प्राप्तं स्यात्। तव समीपे इदं मम शेषपत्रम्। यतो हि मम जीवनप्रदीपो निर्वापितो भवितुमिच्छति। प्रायस्तवागमनसमये अहं न स्थास्यामि। पूर्वपत्रे-अहमाश्रमस्य सर्वविधमायव्ययाकलनं प्रेषितवती। केवलं यीशोः समीपे गमनात्पूर्वं तव दर्शनमिच्छामि। प्रथमं त्वया निर्मितोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः। अधुनात्र शताधिका अनाथशिशवो लालिताः पालिताश्च भवन्ति । तव हस्तयोस्तव अनाथाश्रमं समर्प्य अहं सौप्रस्थानिकीमिच्छामि। अद्य समाजस्त्वत्तो बहु किमपि इच्छति। यौ कौ वां तव पितरौ भवतां नाम, तौ धन्यवादाौं। कदाचित्ताभ्यां त्वं विस्मृतः स्यात् त्वमवश्यमेतान् शिशून् संपोष्य उत्तममनुष्यान् कारयिष्यसीति मम कामना वर्तते। प्रभुः त्वत्त इमामेवाशां पोषयति। यो जन्म दत्तवान्, स जीवितुमधिकारमपि दत्तवान्। भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु । इति॥
तव शुभाकांक्षिणी
सुश्रीः मेरी
भगवान् यीशु तुम्हारा मंगल करें। मेरा पहला पत्र तुम्हें मिला होगा। तुम्हारे पास यह मेरा शेष पत्र है। क्योंकि मेरा जीवन-दीप बुझ जाना चाहता है। शायद तुम्हारे आने तक मैं न रहूँ। पिछले पत्र में मैंने आश्रम का सारा आय-व्यय चिट्ठा भेज दिया था। केवल यीशु के पास जाने से पहले तुम्हारा दर्शन करना चाहती हूँ। पहले तुम्हारे द्वारा निर्मित अनाथ आश्रम अब बड़े भारी वृक्ष में बदल गया है। अब यहाँ सौ से भी अधिक अनाथ शिशु लालित और पालित हो रहे हैं। तुम्हारे हाथों में तुम्हारा अनाथ आश्रम सौंपकर अब विदाई चाहती हूँ। आज समाज तुम से बहुत कुछ चाहता है। जो कोई भी तुम्हारे माता-पिता हैं, वे धन्यवाद के पात्र हैं। किसी कारणवश उन्होंने तुम्हें भुला दिया होगा, तुम अवश्य ही इन शिशुओं को पाल-पोसकर उत्तम मनुष्य बनाओगे, यह मेरा कामना है। प्रभु तुमसे यही आशा रखते हैं। जिसने जन्म दिया है, उसी ने जीने का अधिकार भी दिया है। भगवान् तुम्हें दीर्घजीवी करें।
तुम्हारी शुभेच्छु,
सुश्री मेरी
प्रश्न 1.
संस्कृतभाषया उत्तराणि लिखत -
(क) श्रीनायारः कुत्र गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् ?
(ख) विभागस्य विपक्षे केषाम् अभियोगो नास्ति ?
(ग) श्रीनायारः स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं कुत्र प्रेषयति स्म ?
(घ) श्रीनायारस्य नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा किम् अकरोत् ?
(ङ) बहुदिनेभ्यः स्थगितानां समस्यानां समाधानं कदा जातम् ?
(च) श्रीनायारस्य पार्वे पत्रं कया प्रेषितम् ?
(छ) आश्रमे के लालिताः पालिताश्च भवन्ति ?
(ज) पत्रलेखिका कस्य हस्तयोः अनाथाश्रमं समर्प्य सौप्रस्थानिकीमिच्छति ?
उत्तरम् :
(क) श्रीनायार: स्वराज्यं केरलं प्रति गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् ?
(ख) विभागस्य विपक्षे उपभोक्तृणाम् अभियोगो नास्ति ?
(ग) श्रीनायार: स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं केरलं प्रेषयति स्म ?
(घ) श्रीनायारस्य नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा पत्रस्य अर्धाधिकं भागम् आर्द्रम् अकरोत् ?
(ङ) श्रीनायारस्य दायित्वग्रहणस्य एकमासाभ्यन्तरे बहुदिनेभ्यः स्थगितानां समस्यानां समाधानं जातम् ?
(च) श्रीनायारस्य पार्श्वे पत्रं सुश्री 'मेरी' प्रेषितवती।
(छ) आश्रमे अनाथा: शिशवः लालिताः पालिताश्च भवन्ति ?
(ज) पत्रलेखिका श्रीनायारस्य हस्तयोः अनाथाश्रमं समर्प्य सौप्रस्थानिकीमिच्छति ?
प्रश्न 2.
सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्यां कुरुत -
(क) उपभोक्तणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे
(ख) सर्वे अश्रुलहृदयैः सौप्रस्थानिकों ज्ञापितवन्तः
(ग) त्वया निर्मितोऽयं क्षुद्रोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः ।
उत्तरम् :
(क) 'उपभोक्तृणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे'।
प्रसंग: - प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती-द्वितीयो भागः' के 'दीनबन्धुःश्रीनायारः' नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित 'पाषाणीकन्या' नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।
व्याख्या - प्रस्तुत पंक्ति में दीनबन्धु श्रीनायार की सत्यनिष्ठा एवं कर्तव्यनिष्ठा के फलस्वरूप खाद्य-आपूर्ति विभाग के विरोध में उपभोक्ताओं की ओर से किसी प्रकार के अभियोग न होने का उल्लेख किया गया है।
श्रीनायार एक सत्यनिष्ठ तथा मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी थे। उड़ीसा सरकार के खाद्य आपूर्ति विभाग के सचिव पद को सम्भालते ही इस विभाग का कायाकल्प हो गया। खाद्यान्न में मिलावट या हेरा-फेरी नाममात्र रह गई, अतः श्रीनायार के कार्यकाल में उपभोक्ताओं को विभाग पर किसी प्रकार का अभियोग चलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। श्रीनायार के आने से विभाग की न केवल सक्रियता बढ़ी अपितु ईमानदारी से काम करने का भी वातावरण बना। परिणामतः उपभोक्ता विभाग की कार्यप्रणाली से सन्तुष्ट हुए और कोर्ट-कचहरी के विवादों से विभाग मुक्त हो गया। इस पंक्ति से श्रीनायार की कर्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदारी का संकेत मिलता है।
(ख) सर्वे अश्रुलहृदयैः सौप्रस्थानिकी ज्ञापितवन्तः।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती द्वितीयो भागः' के 'दीनबन्धुःश्रीनायार:' नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उडिया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित 'पाषाणीकन्या' नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।
व्याख्या - 'सभी ने आँसु भरे हृदय से श्रीनायार को विदाई दी' प्रस्तुतपंक्ति का सम्बन्ध श्रीनायार के जीवन के उस क्षण से है, जब केरल राज्य में श्रीनायार द्वारा स्थापित अनाथ आश्रम की संचालिका सुश्री मेरी ने श्रीनायार को एक पत्र लिखा कि अब उनका अन्तिम समय आ चुका है और उन्हें स्वयं यह आश्रम सँभाल लेना चाहिए।
एक दिन श्रीनायार अपने कार्यालय में बैठे एक पत्र पढ़ रहे थे, उनकी आँखों से अश्रुधारा बह रह थी, जिससे पत्र भी भीग चुका था। उसी क्षण श्रीनायार के क्लर्क श्रीदास का प्रवेश हुआ और उन्होंने श्रीदास को कहा कि अब उनका छुट्टी लेकर चले जाने का समय आ गया है। यदि मुझसे कोई रूखा व्यवहार किसी के साथ अनजाने में हुआ हो तो उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ। श्रीनायार का व्यवहार विभाग के सभी सहकर्मियों के साथ पूर्णतया मानवीय, मित्रतापूर्ण तथा अत्यन्त मधुर था।
विभाग के सभी लोग श्रीनायार के स्वभाव और व्यवहार से सन्तुष्ट थे। आज जब श्रीनायार केरल वापस जाने लगे,तो सहकर्मियों के हृदय को चोट पहुँची और न चाहते हुए भी उन्हें भीगी पलकों से विदाई की। इस पंक्ति से विभाग के लोगों का श्रीनायार के प्रति सच्चा आदर-भाव तथा श्रीनायार की सद्-व्यवहारशीलता प्रकट होती है।
(ग) त्वया निर्मितोऽयं क्षुद्रोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती द्वितीयो भागः' के 'दीनबन्धुःश्रीनायार:' नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित 'पाषाणीकन्या' नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।
व्याख्या - प्रस्तुत पंक्ति सुश्री मेरी के उस पत्र की है, जो श्रीनायार के केरल वापस चले जाने के बाद उनके क्लर्क श्रीदास ने खोलकर पढ़ा था। श्रीनायार ने एक अनाथ आश्रम की स्थापना केरल राज्य में की थी। जिसका संचालन सुश्री मेरी किया करती थी। मेरी अब मृत्यु के निकट थी, अतः उसने श्रीनायार को स्वयं यह अनाथ आश्रम सँभालने तथा अन्तिम क्षणों में श्रीनायार के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी।
मेरी ने इस पत्र में यह भी बताया था कि यह आश्रम कभी बहुत छोटे रूप में था परन्तु आज यह बहुत बड़े वृक्ष का रूप धारण कर चुका है। अब इसमें सौ से भी अधिक अनाथ शिशु पल रहे हैं। श्रीनायार इसी आश्रम के संचालन के लिए अपने वेतन का आधे से भी अधिक भाग प्रतिमास की एक तारीख को ही मनीआर्डर द्वारा सुश्री मेरी के पास भेज दिया करते थे। इस घटना से श्रीनायार का दीनों के प्रति सच्चा दया-भाव प्रकट होता है। इसीलिए पाठ का नाम भी 'दीनबन्धु श्रीनायार' उचित ही दिया गया है।
प्रश्न 3.
अधः समस्तपदानां विग्रहाः दत्ताः तानाश्रित्य समस्तपदानि समासनामापि लिखत -
प्रश्न 4.
रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत -
(क) श्रीनायारः स्वल्पभाषी आसीत्।
(ख) वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम् ।
(ग) तस्य राज्येन सह कश्चित् सम्पर्कः नास्ति।
(घ) पत्रस्य अर्धाधिकं भागं अश्रुधारा आर्दीकरोति स्म।
(ङ) श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान्।
(च) भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु।
उत्तरम् :
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) श्रीनायारः कीदृग्भाषी आसीत् ?
(ख) कस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम् ?
(ग) तस्य केन सह कश्चित् सम्पर्कः नास्ति?
(घ) पत्रस्य अर्धाधिकं भागं का आर्दीकरोति स्म?
(ङ) कः तत्पत्रमुद्घाटितवान् ?
(च) भगवान् कं दीर्घजीवनं कारयतु ?
प्रश्न 5.
विपरीतार्थकपदानि मेलयत -
(क) आगत्य (क) विस्मृतः
(ख) इच्छाम् (ख) गत्वा
(ग) स्वल्पभाषी (ग) न्यूनीभूतम्
(घ) प्रारभ्य (घ) पक्षे
(ङ) अधिकीभूतम् (ङ) बहुभाषी
(च) विपक्षे (च) समाप्य
(छ) स्मृतः (छ) लघुजीवनम्
(ज) दीर्घजीवनम् (ज) अनिच्छाम्
उत्तरम् :
विपरीतार्थकपदमेलनम्
(क) आगत्य - गत्वा
(ख) इच्छाम् - अनिच्छाम
(ग) स्वल्पभाषी - बहुभाषी
(घ) प्रारभ्य - समाप्य
(ङ) अधिकीभूतम् - न्यूनीभूतम्
(च) विपक्षे - पक्षे
(छ) स्मृतः - विस्मृतः
(ज) दीर्घजीवनम् - लघुजीवनम्
प्रश्न 6.
अधोलिखितानां विशेष्यपदानां विशेषणपदानि पाठात् चित्वा लिखत -
वार्तालाप:, वर्षत्रयस्य, अश्रुधारा, समस्यानाम्, व्यवहारः, पत्रम्, शिशवः ।
उत्तरम् :
विशेषणपदम् - विशेष्यपदम्
- सन्तुलितः - वार्तालापः
- गतस्य - वर्षत्रयस्य
- विगलिता - अश्रुधारा
- स्थगितानाम् - समस्यानाम्
- रूक्षः - व्यवहारः
- पूर्वतनम् - पत्रम्
- शताधिकाः - शिशवः
प्रश्न 7.
अधोलिखितेषु पदेषु प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत -
समाप्य, जातम्, त्यक्त्वा, धृत्वा, पठन्, संपोष्य।
उत्तरम् :
बहुविकल्पीया: प्रश्नाः
I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत -
(i) आश्रमे के लालिताः पालिताश्च भवन्ति ?
(A) वृद्धाः
(B) स्त्रियः
(C) शिशवः
(D) अनाथशिशवः।
उत्तरम् :
(D) अनाथशिशवः।
(ii) पत्रलेखिका कस्य हस्तयोः अनाथाश्रमं समर्प्य सौप्रास्थानिकीमिच्छति ?
(A) पुत्रस्य
(B) श्रीदासस्य
(C) श्रीनायारस्य
(D) सर्वकारस्य।
उत्तरम् :
(C) श्रीनायारस्य
(iii) श्रीनायार: कुत्र गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् ?
(A) दिल्लीम्
(B) केरलम्
(C) कोलकातानगरम्
(D) महाराष्ट्रम्।
उत्तरम् :
(B) केरलम्
(iv) विभागस्य विपक्षे केषाम् अभियोगो नास्ति ?
(A) उपभोक्तृणाम्
(B) अधिकारिणाम्
(C) कर्मचारिणाम्
(D) मन्त्रिणाम्।
उत्तरम् :
(A) उपभोक्तृणाम्
(v) श्रीनायार: स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं कुत्र प्रेषयति स्म ?
(A) कानपुरम्
(C) मद्रासम्
(B) पूनानगरम्
(D) केरलम्।
उत्तरम् :
(A) कानपुरम्
II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत -
(i) श्रीनायारः स्वल्पभाषी आसीत्।
(A) कः
(B) कीदृशः
(C) कथम्
(D) किया।
उत्तरम् :
(B) कीदृशः
(ii) वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्।
(A) कस्य
(B) केन
(C) कति
(D) कस्मात्।
उत्तरम् :
(A) कस्य
(iii) तस्य राज्येन सह कश्चित् सम्पर्क: नास्ति।
(A) काः
(B) केन
(C) कम्
(D) कस्मै।
उत्तरम् :
(B) केन
(iv) पत्रस्य अर्धाधिकं भागम् अश्रुधारा आर्दीकरोति स्म।
(A) कया
(B) कान्
(C) कथम्
(D) का।
उत्तरम् :
(D) का।
(v) श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान्।
(A) कः
(B) काभ्याम्
(C) कस्याः
(D) कस्याम्।
उत्तरम् :
(A) कः
(vi) भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु।
(A) कः
(B) कम्
(C) कस्याः
(D) कस्याम्।
उत्तरम् :
(B) कम्
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च
विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
शुक्रवार, 3 जुलाई 2020
कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्
कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्
प्रश्न 1.
संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् -
(क) सायं समये भगवान् भास्कर: कुत्र जिगमिषुः भवति ?
(ख) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्णः कीदृशः भवति ?
(ग) नीडेषु के प्रतिनिवर्तन्ते ?
(घ) शिववीरस्य विश्वासपात्रं किं स्थानं प्रयाति स्म ?
(ङ) प्रतिक्षणमधिकाधिका श्यामतां कानि कलयन्ति ?
(च) शिववीरविश्वासपात्रस्य उष्णीषम् कीदृशमासीत् ?
(छ) मेघमाला कथं शोभते ?
उत्तरम् :
(क) सायं समये भगवान् भास्करः अस्तं जिगमिषुः भवति।
(ख) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्णः अरुणः भवति।
(ग) नीडेषु कलविड्काः प्रतिनिवर्तन्ते।
(घ) शिववीरस्य विश्वासपात्रं तोरणदुर्गं प्रयाति स्म।
(ङ) प्रतिक्षणमधिकाधिका श्यामतां वनानि कलयन्ति।
(च) शिववीरविश्वासपात्रस्य उष्णीषं राजतसूत्रितम्, बहुल-चाकचक्यम्, वक्रम्, हरितवर्णं च आसीत्।
(छ) मेघमाला दीर्घशुण्डमण्डितानां दिग्गजानां दन्तावलाः इव भयानकाकारा शोभते।
प्रश्न 2.
समीचीनोत्तरसङ्ख्यां कोष्ठके लिखत -
अ. शिवराजविजयस्य रचयिता कः अस्ति ?
(क) बाणभट्टः
(ख) श्रीहर्षः
(ग) अम्बिकादत्तव्यासः
(घ) माघः
उत्तरम् :
(ग) अम्बिकादत्तव्यासः
आ. कतिवर्षदेशीयो युवा हयेन पर्वतश्रेणीरुपर्युपरि गच्छति स्म।
(क) चतुर्दशवर्षदेशीयः
(ख) द्वादशवर्षदेशीयः
(ग) पञ्चदशवर्षदेशीयः
(घ) षोडशवर्षदेशीयः
उत्तरम् :
(घ) षोडशवर्षदेशीयः।
इ. शिववीरस्य विश्वासपात्रं किम् आदाय तोरणदुर्गं प्रयाति ?
(क) संवादम् आदाय
उत्तर :
(ख) पत्रम् आदाय
(ग) पुष्पगुच्छम् आदाय
(घ) अश्वम् आदाय
उत्तरम् :
(ख) पत्रम् आदाय
प्रश्न 3.
रिक्तस्थानानि पूरयत।
(क) अथाकस्मात् परितो मेघमाला ................ प्रादुरभूत्।
(ख) क्षणे क्षणे ................खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति।
(ग) पदे पदे ................ वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति।
(घ) कृतप्रतिज्ञोऽसौ ................ निजकार्यान्न विरमति।
उत्तरम् :
(क) अथाकस्मात् परितो मेघमाला पर्वतश्रेणी: इव प्रादुरभूत्।
(ख) क्षणे क्षणे हयस्य खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति।
(ग) पदे पदे दोधूयमानाः वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति।
(घ) कृतप्रतिज्ञोऽसौ शिववीरचरः निजकार्यान्न विरमति।
प्रश्न 4.
अधोलिखितानां पदानाम् अर्थान् विलिख्य वाक्येषु प्रयुञ्जत
भास्करः मेघमाला, वनानि, मार्गः वीरः, गगनतलम्, झञ्झावातः मासः, सायम्।
उत्तरम् :
(वाक्यप्रयोगः)
(क) भास्करः (सूर्यः) - पूर्वदिशायां भास्करः उदयति।
(ख) मेघमाला (मेघसमूहः) - मेघमाला आकाशम् आच्छादयति।
(ग) वनानि (अरण्यानि) - नगरं परितः वनानि सन्ति।
(घ) मार्गः (पन्थाः) - महान्धकारे मार्गः न अवलोक्यते।
(ङ) वीरः (वीर्यवान्) - युद्धे वीरः एव जयति।
(च) गगनतलम् (आकाशतलम्) - रात्रौ अन्धकार: गगनतलम् आच्छादयति।
(छ) झञ्झावातः (वात्याचक्रम्, 'तूफान' इति हिन्दीभाषायाम्) - सहसा झञ्झावातः प्रादुरभवत्।
(ज) मासः ('महीना' इति हिन्दी भाषायाम्) - मासोऽयम् आषाढः।
(झ) सायम् (सन्ध्यासमय:) - सायं समये भगवान् भास्करः अस्तं गच्छति।
प्रश्न 5.
अधोलिखितानां पदानां सन्धिच्छेदं कृत्वा सन्धिनिर्देशं कुरुत
तस्यैव, शिखराच्छिखराणि, कोऽपि, प्रादुरभूत्, अथाकस्मात्, कार्यान्न।
(क) तस्यैव
= न + एव
(ख) शिखराच्छिखराणि = शिखरात् + शिखराणि
(ग) कोऽपि = कः + अपि
(घ) प्रादुरभूत् = प्रादुः + अभूत्
(ङ) अथाकस्मात् = अथ + अकस्मात्
(च) कार्यान्न = कार्यात् + न।
प्रश्न 6.
अधोलिखितानां पदानां प्रकृतिप्रत्ययविभागं प्रदर्शयत -
प्रयुक्तः, उत्थितः, उत्प्लुत्य, रुतैः, उपत्यकातः, उत्थितः, ग्रस्यमानः।
उत्तरम् :
(क) प्रयुक्तः = प्र + √युज् + क्त (पुंल्लिङ्गम् प्रथमा-एकवचनम्)
(ख) उत्थितः = उत् + √स्था + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(ग) उत्प्लुत्य = उत् + √प्लु + ल्यप् (अव्यय)
(घ) रुतैः = रु + क्त। (नपुंसकलिङ्गम्, तृतीया-एकवचनम्)
(ङ) उपत्यकातः = उपत्यका + तसिल > तस् (अव्ययपदम्)
(च) 'ग्रस्यमानः = √ग्रस् (कर्मवाच्ये) + शानच् (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
प्रश्न 7.
अलङ्कारनिर्देशं कुरुत -
(1) वदनाम्भोजेन
(2) दिगन्तदन्तावल:
(3) सिन्दूरद्रवस्नातानामिव वरुणदिगवलम्बिनाम्।
उत्तरम् :
(1) वदनाम्भोजेन - रुपकः अलङ्कारः
(2) दिगन्तदन्तावल: - अनुप्रासः अलङ्कारः
(3) सिन्दूरद्रवस्नातामिव वरुणदिगवलम्बिनाम् - उत्प्रेक्षा अलङ्कारः
प्रश्न 8.
विग्रहवाक्यं विलिख्य समासनामानि निर्दिशत -
मेघमाला, महान्धकारः, पवर्तश्रेणी:, महोत्साहः, विश्वासपात्रम्, हरितोष्णीषशोभितः।
उत्तरम् :
(क) मेघमाला = मेघानां माला (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ख) महान्धकारः = महान् अन्धकारः (कर्मधारयः)
(ग) पर्वतश्रेणी: = पर्वतानां श्रेणी: (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(घ) महोत्साहः = महान् उत्साहः (कर्मधारयः)
(ङ) विश्वासपात्रम् = विश्वासस्य पात्रम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(च) हरितोष्णीषशोभितः = हरितेन उष्णीषेण शोभितः (तृतीया-तत्पुरुषः)
प्रश्न 9.
पाठ्यांशस्य सारं हिन्दीभाषया आङ्ग्लभाषया वा लिखत -
उत्तरम् :
पाठ का सार पहले दिया जा चुका है, वहीं देखें।
प्रश्न 10.
पाठ्यांशे प्रयुक्तानि अव्ययानि चित्वा लिखत -
उत्तरम् :
च (और)
सायम् (सायंकाल)
इव (की तरह, मानो)
अथ (इसके बाद, फिर)
अकस्मात् (अचानक)
परितः (चारों ओर)
परतः (दूसरी ओर)
ततः (उसके बाद)
उपर्युपरि (ऊपर-ऊपर)
एव (ही)
अपि (भी)
तावत् (तभी)
अकस्मात् (अचानक)
पुनः (फिर)
इह (यहाँ, इस विषय में)
न (नहीं)
परम् (परन्तु)
वा (अथवा, या)
इति (यह, इसप्रकार)
प्रतिक्षणम् (पल-पल)
आदाय (लेकर)
पर्वतश्रेणीतः (पर्वतश्रेणी से)
अधित्यकातः (अधित्यका से)
उपत्यकातः (उपत्यका से)
बहुविकल्पीया: प्रश्नाः
I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत -
(i) सायं समये भगवान् भास्करः कुत्र जिगमिषुः भवति ?
(A) गङ्गायाम्
(B) समुद्रम्
(C) अस्तम्
(D) उदयम्।
उत्तरम् :
(B) समुद्रम्
(ii) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्णः कीदृशः भवति ?
(A) अरुणः
(B) हरितः
(C) श्वेतः
(D) पीतः।
उत्तरम् :
(A) अरुणः
(iii) नीडेषु के प्रतिनिवर्तन्ते ?
(A) गर्दभाः
(B) अश्वाः
(C) गजाः
(D) कलविकाः।
उत्तरम् :
(D) कलविकाः।
(iv) शिववीरस्य विश्वासपात्रं किं स्थानं प्रयाति स्म ?
(A) वनानि
(B) चित्राणि
(C) भवनानि
(D) भुवनानि।
उत्तरम् :
(A) वनानि
II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत -
(i) अकस्मात् परितो मेघमाला पर्वतश्रेणी: इव प्रादुरभूत्।
(A) कया।
(B) केन
(C) का
(D) कम्।
उत्तरम् :
(C) का
(ii) क्षणे क्षणे हयस्य खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति।
(A) कस्य
(B) कया
(C) कस्मात्
(D) कस्मिन्।
उत्तरम् :
(A) कस्य
(iii) पदे पदे दोधूयमानाः वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति।
(A) काः
(B) कीदृश्यः
(C) कति
(D) के।
उत्तरम् :
(B) कीदृश्यः
(iv) कृतप्रतिज्ञोऽसौ शिववीरचरः निजकार्यान्न विरमति।
(A) कस्मात्
(B) कस्याः
(C) कस्मिन्
(D) कः।
उत्तरम् :
(D) कः।
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च
विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
गुरुवार, 2 जुलाई 2020
भू-विभागाः
भू-विभागाः
अथ पृथिवीनिरूपणम्-पृथिव्याः सप्तभेदाः। ते च भेदाः सप्तपुटान्युच्यन्ते। तानि च पुटानि-अतल-वितल-सुतल-तलातल-रसातल-पातालाख्यानि। अस्मन्मतेऽपि सप्तभेदाः। यथाऽस्मद्वेदे श्रूयते परमेश्वरो यथा सप्तगगनानि तद्वत् पृथिव्याः सप्तविभागान् कृतवान्।
अब पृथिवी का निरूपण किया जाता है-पृथिवी के सात भेद हैं और उन्हें 'सप्तपुट' कहा जाता है। उन पुटों के नाम हैं-(1) अतल, (2) वितल, (3) सुतल, (4) प्रतल, (5) तलातल, (6) रसातल, (7) पाताल। हमारे मत में भी सात भेद हैं। जैसे कि हमारे वेद (कुरान शरीफ) में सुना जाता है; जैसे परमेश्वर ने सात प्रकार के आकाश बनाए हैं उसी प्रकार पृथिवी के सात भेद किए गए हैं। ..
अथ पृथिव्याः विभागनिरूपणं यत्र लोकास्तिष्ठन्ति। तस्याः दार्शनिकैः सप्तधा विभागः कृतस्तान् विभागान् सप्त अअक्लिम इति वदन्ति। पौराणिकास्तु सप्त द्वीपानि वदन्ति। एतान् खण्डान् पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधो भावेन न ज्ञायन्ते, “किन्तु' निःश्रेणी सोपानवज्जानन्ति।
अब पृथिवी के विभागों का निरूपण किया जाता है, जहाँ लोग रहते हैं। उस पृथिवी के दार्शनिकों ने सात विभाग किए हैं, उन विभागों को सात अअक्लिम = अकूलीन = खण्ड कहते हैं। पौराणिक उन्हें सात द्वीप कहते हैं। इन खण्डों को प्याज के छिलके की तरह ऊपर-नीचे के भाव से नहीं समझना चाहिए, परन्तु सीढ़ी में लगने वाले काष्ठ-दण्ड की भाँति समझ सकते हैं।
सप्त पर्वतान् सप्त कुलाचलान् वदन्ति, तेषां पर्वतानां नामान्येतानि प्रथमः सुमेरुमध्ये, द्वितीयो हिमवान्, तृतीयो हेमकूटः, चतुर्थो निषधः एते सुमेरोरुत्तरतः। माल्यवान् पूर्वस्यां, गन्धमादनः पश्चिमायां कैलासश्च मर्यादापर्वतेभ्योऽतिरिक्तः। यथाऽस्मद्वेदे श्रूयते- “अस्माभिः पर्वताः शंकवः कृताः।
सात पर्वतों को सात कुलाचलन कहते हैं। उन पर्वतों के नाम ये हैं- पहला सुमेरु पर्वत (जो) मध्य में है। दूसरा हिमालय, तीसरा हेमकूट, चौथा निषध-ये सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में हैं। (पाँचवाँ) मूल्यवान् पूर्व दिशा में (छठा) गन्धमादन पश्चिम दिशा में और (सातवाँ) कैलास पर्वत मर्यादा पर्वतों से अलग है। जैसा हमारे वेद (कुरान शरीफ) में सुना जाता है-"हमने पर्वतों को शकु (कीलें) बना दिया।"
एतेषां सप्तद्वीपानां प्रत्येकमावेष्टनरूपाः सप्तसमुद्राः। लवणो जम्बुद्वीपस्यावरकः। इक्षुरसः प्लक्षद्वीपस्य दधिसमुद्रः क्रौञ्चद्वीपस्य, क्षीरसमुद्रः शाकद्वीपस्य, स्वादुजलसमुद्रः पुष्करद्वीपस्यावरकः इति। समुद्राः सप्त अस्मद्वेदेऽपि प्रकटाः भवन्ति।
इन सात द्वीपों में प्रत्येक द्वीप के आवरण रूप सात समुद्र हैं। लवण (समुद्र) जम्बुद्वीप का आवरण है। इक्षुरस (सुरा) प्लक्षद्वीप का, दधिसमुद्र क्रौञ्चद्वीप का, क्षीर सागर शाकद्वीप का (और) स्वादु जल समुद्र पुष्कर द्वीप का आवरक है। हमारे वेद (कुरान शरीफ़) में भी सात समुद्र प्रकट होते हैं।
वृक्षाः लेखनी भवेयुः समुद्रोऽपि मसी भवेत्, परं भगवद्वाक्यानि समाप्तानि न भवन्ति। प्रतिद्वीपं प्रतिपर्वतं प्रतिसमुद्र नानाजातयोऽनन्ता जन्तवस्तिष्ठन्ति। या पृथिवी ये पर्वताः ये समुद्रा सर्वाभ्यः पृथिवीभ्यः सर्वेभ्यः पर्वतेभ्यः सर्वेभ्यः समुद्रेभ्यः उपरि तिष्ठन्ति तान् ‘स्वर्ग' इति वदन्ति। या पृथिवी ये पर्वताः ये समुद्राः सर्वाभ्यः पृथिवीभ्यः सर्वेभ्यः पर्वतेभ्यः सर्वेभ्यः समुद्रेभ्योऽधो भागे तिष्ठन्ति स 'नरक' इति वदन्ति। निश्चितं किल सिधैः स्वर्गनरकादिकं सर्वं ब्रह्माण्डान्न किञ्चिबहिरस्तीति। ते सप्तगगनाश्रिताः सप्त ग्रहाः स्वर्गं परितो मेखलावत् परिभ्रमन्तीति वदन्ति; न स्वर्गस्योपरि। अथ स्वर्गस्य यदि 911 मन आकाशं जानन्ति अस्मदीयास्तमर्श इति वदन्ति। स्वर्गभूमिं कुर्शीति वदन्ति।"
सभी वृक्ष लेखनी बन जाएँ, समुद्र स्याही बन जाए, परन्तु भगवद्-वचन समाप्त नहीं होते (अर्थात् भगवान् की महिमा लिखने के लिए ये सब अपर्याप्त ही होते हैं)। प्रत्येक द्वीप में प्रत्येक पर्वत पर, प्रत्येक समुद्र में विविध जाति वाले अनन्त प्राणी रहते हैं। जो पृथिवी, जो पर्वत, जो समुद्र सभी पृथिवियों से, सभी पर्वतों से, सभी समुद्रों से ऊपर विद्यमान हैं उन्हें 'स्वर्ग' कहते हैं। जो पृथिवी, जो पर्वत, जो समुद्र सभी पृथिवियों से, सभी पर्वतों से तथा समुद्रों से निचले भाग में स्थित हैं उन्हें 'नरक' कहते हैं। सिद्ध पुरुषों ने निश्चित मत बनाया है कि स्वर्ग-नरक आदि (सब यहाँ पर ही हैं) ब्रहमाण्ड से कछ भी बाहर नहीं है। सात आकाशों के आश्रित रहने वाले (जो) सात ग्रह हैं, वे स्वर्ग के चारों ओर मेखला की भाँति भ्रमण करते हैं, स्वर्ग के ऊपर नहीं। अब यदि स्वर्ग का मन आकाश को समझते हैं (तो) हमारे लोग उसे 'अर्श' कहते हैं। स्वर्गभूमि को 'कुर्शी' कहते हैं।
प्रश्न 1.
संस्कृतेन उत्तरं दीयताम्
(क) पृथिव्याः कति भेदाः ?
(ख) पृथिव्याः सप्तपुटानां नामानि कानि सन्ति ?
(ग) पर्वताः कति सन्ति ?
(घ) समुद्राः कति सन्ति ?
(ङ) दधिसमुद्रः कस्य द्वीपस्यावरकः ?
(च) 'अर्श' इति पदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
(छ) 'कुर्शी' इति पदं कस्मिन्नर्थे प्रयुक्तम् ?
(ज) 'अस्मद्वेद' इति शब्द: दाराशिकोहेन कस्य ग्रन्थस्य कृते प्रयुक्तः ?
उत्तरम् :
(क) पृथिव्याः सप्त भेदाः ?
(ख) पृथिव्याः सप्तपुटानां नामानि सन्ति 1. अतल: 2. वितलः, 3. सुतलः, 4. प्रतलः, 5. तलातलः, 6. रसातल, 7. पातालः।
(ग) पर्वताः सप्त सन्ति ?
(घ) समुद्राः सप्त सन्ति ?
(ङ) दधिसमुद्रः क्रौञ्च-द्वीपस्यावरकः ?
(च) 'अर्श' इति पदम् आकाशाय प्रयुक्तम् ?
(छ) 'कुर्शी' इति पदं परमेश्वस्य सिंहासने अर्थे प्रयुक्तम् ?
(ज) 'अस्मद्वेद' इति शब्द: दाराशिकोहेन 'कुरानशरीफ़' ग्रन्थस्य कृते प्रयुक्तः ?
प्रश्न 2.
हिन्दीभाषया आशयं लिखत -
एतान् खण्डान् पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधोभावेन न ज्ञायन्ते, किन्तु निःश्रेणी-सोपानवजानन्ति। सप्तपर्वतान् सप्तकुलाचलान् वदन्ति, तेषां पर्वतानां नामान्येतानि-प्रथमः सुमेरुमध्ये, द्वितीयो हिमवान्, तृतीयो हेमकूटः, चतुर्थो निषधः एते सुमेरोरुत्तरतः।
प्रसंग: - प्रस्तुत गद्यांश 'शाश्वती-द्वितीयो भागः' के 'भू-विभागाः' नामक पाठ से उद्धृत है। यह पाठ दाराशिकोह रा रचित 'समुद्रसङ्गमः' नामक ग्रन्थ से लिया गया है। प्रस्तुत गद्यांश में भूलोक के सात विभागों तथा सप्त पर्वतों की चर्चा की है।
व्याख्या - पृथिवी जिस पर सब लोगों का निवास है, दार्शनिकों ने उसके सात खण्ड माने हैं, इन्हें सप्तद्वीप भी कहा जाता है। ये खण्ड प्याज के छिलकों की तरह एक के नीचे एक-एक के नीचे एक नहीं होते, अपितु जैसे सीढ़ी में अलग-अलग समान दूरी पर लकड़ी/बाँस में डण्डे लगे होते हैं उसी प्रकार इन सप्तद्वीपों की स्थिति भी समझनी चाहिए। सप्तपर्वतों को 'सप्तकुलाचल' नाम से भी जाना जाता है। इन सात पर्वतों के नाम और उनकी स्थिति इस प्रकार है। पृथिवी के मध्य में सुमेरु नामक पहला पर्वत है। दूसरा हिमालय, तीसरा हेमकूट और चौथा निषध नामक पर्वत है ये तीनों सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में स्थित हैं। इन सबके अतिरिक्त माल्यवान्, गन्धमादन तथा कैलास पर्वत हैं। इन्हें जोड़कर ही सात समुद्रों की संख्या पूर्ण होती है। प्रस्तुत गद्यांश में इन तीनों का उल्लेख नहीं है।
प्रश्न 3.
अधोलिखितानां पदानां स्वसंस्कृतवाक्येषु प्रयोगं कुरुत
पुटानि, कृतवान्स, आवेष्टनरूपा, सर्वेभ्यः ब्रह्माण्डात्, परिभ्रमन्ति।
उत्तरम् :
(वाक्यप्रयोगः)
(क) पुटानि-पृथिव्याः सप्त विभागाः ‘सप्तपुटानि' अपि कथ्यन्ते।
(ख) कृतवान्–दाराशिकोहः श्रीमद्भगवद्गीतायाः अनुवादं फारसीभाषायां कृतवान्।
(ग) आवेष्टनरूपा:-सप्तद्वीपाः सप्तसमुद्राणाम् आवेष्टनरूपाः सन्ति।
(घ) सर्वेभ्य:-सर्वेभ्यः शिक्षकेभ्यः नमः।
(ङ) ब्रहमाण्डात-स्वर्गनरकादिकं ब्रहमाण्डात बहिः नास्ति।
(च) परिभ्रमन्ति-सप्त ग्रहाः गगने परिभ्रमन्ति।
प्रश्न 4.
अधोलिखितानां पदानां सन्धिच्छेदं कुरुत -
पुटान्युच्यन्ते, अस्मन्मते, पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधोभावेन, सोपानवजानन्ति, सुमेरोरुत्तरतः, समुद्रोऽपि, किञ्चिद्वहिरस्तीति, अस्मदीयास्तमर्श।
उत्तरम् :
(क) पुटान्युच्यन्ते = पुटानि + उच्यन्ते।
(ख) अस्मन्यते = अस्मत् + मते।
(ग) पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधोभावेन = पलाण्डुत्वग्वत् + उपरि + अधः + भावेन।
(घ) सोपानवज्जानन्ति = सोपानवत् + जानन्ति।
(ङ) सुमेरोरुत्तरतः = सुमेरोः + उत् + तरतः।
(च) समुद्रोऽपि = समुद्रः + अपि।
(छ) किञ्चिदहिरस्तीति = किञ्चित् + बहिः + अस्ति + इति।
5. अधोलिखितानां पदानां पर्यायवाचिपदानि लिखत -
पृथिवी, पर्वतः, समुद्रः, गगनम्, स्वर्ग:
उत्तरम् :
(पर्यायवाचिपदानि)
(क) पृथिवी = भूमिः, भू, पृथ्वी, धरणी, धरा।
(ख) पर्वतः = गिरिः, अचलः, भूधरः, धरणीधरः।
(ग) समुद्रः = सागरः, जलधिः, वारिधिः, रत्नाकरः।
(घ) गगनम् = आकाशः, खः, क्षितिजः, नभः।
(ङ) स्वर्गः = दिवम्, 'अर्श' इति फारसीभाषायाम्।
6. रिक्तस्थानानाम् पूर्तिः विधेया -
(क) पौराणिकास्तु ............... द्वीपानि वदन्ति।
(ख) सप्त ............... सप्त कुलाचलान् वदन्ति।
(ग) ............. जम्बुद्वीपस्यावरकः।
(घ) स्वर्गभूमिं ............... वदन्ति।
उत्तरम् :
(क) पौराणिकास्तु सप्त द्वीपानि वदन्ति।
(ख) सप्त पर्वतान् सप्त कुलाचलान् वदन्ति।
(ग) लवण: जम्बुद्वीपस्यावरकः।
(घ) स्वर्गभूमिम्: कुर्शी इति वदन्ति।
बहुविकल्पीया प्रश्नाः
I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत -
(i) पृथिव्याः कति भेदा: ?
(A) अष्ट
(B) सप्त
(C) षड्
(D) नव।
उत्तरम् :
(B) सप्त
(ii) पर्वता: कति सन्ति ?
(A) नव
(B) सहस्रम्
(C) अष्ट
(D) सप्त।
उत्तरम् :
(A) सप्त
(iii) समुद्राः कति सन्ति ?
(A) सप्त
(B) अष्ट
(C) नव
(D) चत्वारः।
उत्तरम् :
(D) चत्वारः।
(iv) दधिसमुद्रः कस्य द्वीपस्यावरक: ?
(A) सुमेरुद्वीपस्य
(B) मालद्वीपस्य
(C) सिंहद्वीपस्य
(D) क्रौञ्चद्वीपस्य।
उत्तरम् :
(A) सुमेरुद्वीपस्य
(v) 'अर्श' इति पदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
(A) आकाशाय
(B) द्वीपाय
(C) समुद्राय
(D) पर्वताय।
उत्तरम् :
(A) आकाशाय
II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत -
(i) परमेश्वरः पृथिव्याः सप्तविभागान् कृतवान्।
(A) किम्
(B) कः
(C) कस्याः
(D) काः।
उत्तरम् :
(C) कस्याः
(ii) पौराणिकाः सप्त द्वीपानि वदन्ति।
(A) काम्
(B) के
(C) कः
(D) कति।
उत्तरम् :
(B) के
(iii) सप्तद्वीपानाम् आवेष्टनरूपाः सप्त समुद्राः।
(A) कः
(B) कस्मात्
(C) कति
(D) केषाम्।
उत्तरम् :
(D) केषाम्।
(iv) सप्त ग्रहाः स्वर्गं परितः मेखलावत् परिभ्रमन्ति।
(A) कथम्
(B) कति
(C) केन
(D) कया।
उत्तरम् :
(A) कथम्
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च
विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406